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नाटक एवं कथेतर साहित्य

Guess paper sets — practise one set at a time.

सेट 1

सेट 1 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। खंड अ के दस प्रश्न अनिवार्य। खंड ब में प्रत्येक इकाई से आंतरिक विकल्प — पाँचों प्रश्न करने हैं। खंड स में पाँच दीर्घ में से कोई तीन।

Section A

Q. 1. आधे-अधूरे किस वर्ष प्रकाशित हुए?

राकेश। आषाढ़ का एक दिन 1958; लहरों के राजहंस 1963।

Q. 2. अंधेर नगरी में दृश्यों की संख्या है —

1881; प्रहसन। अंधायुग भारती का पद्य-नाटक है, यह नहीं।

Q. 3. साहब को ज़ुकाम है के लेखक हैं —

1910–1996। अंजो दीदी अलग नाटक है।

Q. 4. सत्य के साथ मेरे प्रयोग का अंग्रेज़ी रूप किसने दिया?

मूल गुजराती; नवजीवन। हिन्द स्वराज 1909 अलग है।

Q. 5. बालकृष्ण भट्ट का जन्म-स्थान है —

23 जून 1844। निधन 1914। शुक्ल आगोना-बस्ती के हैं।

Q. 6. आषाढ़ का एक दिन _____ ई. में आया।

Answer: 1958 — राकेश; कालिदास-प्रसंग। आधे-अधूरे 1969।

Q. 7. कबीरा खड़ा बाजार में _____ ई. का नाटक है।

Answer: 1981 — साहनी। तमस 1973 उपन्यास है।

Q. 8. आवाज़ बेचने वाला पात्र _____ है।

Answer: दिवाकर — आवाज़ का नीलाम। सेठ बाजोरिया खरीदता है, लौटाता नहीं।

Q. 9. घीसा का छोटा उपहार _____ है।

Answer: तरबूज — अतीत के चलचित्र। गिल्लू गिलहरी है।

Q. 10. विद्यानिवास मिश्र को पद्म भूषण _____ में मिला।

Answer: 1999 — निधन 2005। द्विवेदी का पद्म भूषण 1957 है।

Section B

Q. 1 (8 marks) · Unit 1

पारसी रंगमंच हिन्दी नाटक को दर्शक कैसे देता है?

Or: आधे-अधूरे को प्रसाद के नाटक से क्या अलग करता है?

Model answer

पारसी रंगमंच हिन्दी नाटक को दर्शक इसलिए देता है कि तमाशा, गीत, चमत्कार और हिन्दुस्तानी संवाद भीड़ लाते हैं। हिन्दी नाटक का उद्भव आधुनिक गद्य के साथ है, यद्यपि शास्त्र पुराना है। भरत के नाट्यशास्त्र में नाट्य अनुकृति है। भास, कालिदास, शूद्रक, भवभूति संस्कृत के शिखर हैं। मध्य काल में रामलीला, रास और स्वांग लोक में बचे। उन्नीसवीं शताब्दी में पारसी थियेटर तमाशा, गीत और हिन्दुस्तानी संवाद लाता है। आगा हश्र कश्मीरी उसी धारा के नाम हैं। उद्भव एक तिथि नहीं; अर्थ यह है कि खड़ी बोली गद्य ने दृश्य-कथा अपनाई। भारतेंदु से पहले अनुवाद और रूपांतर हैं।

उद्भव भारतेंदु युग से पहचाना जाता है। जन्म 9 सितंबर 1850, निधन 6 जनवरी 1885, काशी। भारत दुर्दशा देश-करुण है। अंधेर नगरी 1881 सार्वजनिक व्यंग्य-प्रहसन है। नीलदेवी ऐतिहासिक स्त्री-केंद्र छूती है। मंडल में प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, बालकृष्ण भट्ट नाटक-निबंध छूते हैं। पारसी दर्शक देता है; भारतेंदु प्रश्न देते हैं। बिना भरत के परिभाषा अधूरी है। बिना भारतेंदु के साहित्य-नाटक नहीं खुलता। दशरथ ओझा इसी क्रम को इतिहास बनाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि पारसी दर्शक देता है, साहित्य भारतेंदु देते हैं; दोनों आधुनिक दृश्य-गद्य के अलग काम हैं।

Or

आधे-अधूरे को प्रसाद से यह अलग करता है कि राकेश 1969 का दांपत्य-यथार्थ बोलचाल की खड़ी बोली में है, प्रसाद काव्य-इतिहास। जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 काशी, निधन 15 जनवरी 1937 काशी। नाटक की विशेषताएँ चार सिरों पर बैठती हैं। प्रथम, ऐतिहासिक-पौराणिक आख्यान — स्कंदगुप्त 1928, चंद्रगुप्त 1931, ध्रुवस्वामिनी 1933। द्वितीय, काव्य-संवाद और संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली का गरिमा-भार। तृतीय, राष्ट्र, प्रेम और स्वाभिमान का संघर्ष; इतिहास-पुरुष आधुनिक प्रश्न बोलते हैं। चतुर्थ, नारी केवल आलंबन नहीं, निर्णय की ओर बढ़ती है — ध्रुवस्वामिनी का प्रश्न दांपत्य और राज्य दोनों छूता है। ये युग के शिखर-नाम हैं। आकाशदीप कहानी है, नाटक नहीं।

प्रसाद भारतेंदु का व्यंग्य नहीं चलाते, राकेश का दांपत्य-यथार्थ भी नहीं। द्विवेदी युग नाटक में पतला रहा; प्रसाद ने नाटक को साहित्य का शिखर दिया। सीमा काव्य-संवाद की दुरुहता और रंग-कठिनाई है। गुण गरिमा और नारी-द्वंद्व है। लक्ष्मीनारायण मिश्र समस्या-नाटक की ओर हैं, प्रसाद का मार्ग इतिहास-काव्य है। आधे-अधूरे बोलचाल है; अंधेर नगरी लोक-व्यंग्य है; अंधायुग पद्य-अँधेरा है। तीनों प्रसाद की विशेषता नहीं। बिना उदाहरण के विशेषताएँ सूखी गिनती रह जाती हैं।

निष्कर्ष यह है कि आधे-अधूरे बोलचाल का अधूरापन हैं, प्रसाद काव्य-इतिहास हैं; एक नाम से नहीं ढके जाते।

Q. 2 (8 marks) · Unit 2

टके सेर भाजी का समीकरण क्या तोड़ता है?

Or: लोई संत-पथ पर क्यों द्वंद्व रखती हैं?

Model answer

टके सेर भाजी का समीकरण विवेक इसलिए तोड़ता है कि गुण और अवगुण एक भाव पर बिकते हैं — सब्जी और मिठाई एक दाम। अंधेर नगरी भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रहसन है, 1881। काशी के हिंदू नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में लिखा गया कहा जाता है। पूर्ण शीर्षक प्रायः अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा कहा जाता है। नाम अँधेरे शासन का है, किसी एक भूगोल का नहीं। चौपट राजा नाम ही बिखरे न्याय का संकेत है — शासन बिखरा, निर्णय उलटा। सूत्र-वाक्य मूल्य का समीकरण है। सब्जी और मिठाई एक दाम। अर्थ यह कि विवेक का तराजू टूटा है।

अंधायुग धर्मवीर भारती का पद्य-नाटक है, 1955, कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा। अँधेरा-साम्य नाम का भ्रम है; शतक, रूप और प्रश्न अलग हैं। एक कुशासन पर हँसता है, दूसरा युद्ध के बाद की नैतिक राख पूछता है। लक्ष्य कुशासन है, नगर-नाम कथामात्र है। जातवाला जाति बेचता है — व्यंग्य केवल राजा पर नहीं। ओझा इसे लोकप्रिय व्यंग्य मानते हैं। बिना सूत्र-वाक्य के नाम केवल अँधेरे का विशेषण रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि समीकरण विवेक तोड़ता है; सस्ताई न्याय नहीं। कृति 1881 का प्रहसन है, अंधायुग नहीं।

Or

लोई संत-पथ पर इसलिए द्वंद्व रखती हैं कि गृहस्थी और वचन दोनों खींचते हैं; साहनी उन्हें छोड़कर लौटता भी दिखाते हैं। लोई कबीर की पत्नी हैं। भीष्म साहनी के नाटक कबीरा खड़ा बाजार में वे संत के साथ गृहस्थी का द्वंद्व देती हैं। कथा-सूत्र किंवदंती और रंग मिलाते हैं। वे छोड़ती हैं, लौटती भी हैं। स्वर तेज हो सकता है, सपाट छाया नहीं। भावना का दृश्य है। बिना उनके कबीर केवल उपदेशक रह जाता; गृहस्थ का दबाव यहीं से आता है। नीरू-नीमा पालन और श्रम हैं; लोई जीवन-साथी हैं। रैदास सत्संग की साथ की आवाज़ हैं।

वे नायिका-आलंबन नहीं, द्वंद्व की पात्रा हैं। ध्रुवस्वामिनी राज्य और दांपत्य का प्रश्न है; लोई संत-पथ और गृहस्थ का प्रश्न है। प्रसाद की नारी गरिमा-इतिहास में निर्णय लेती है; लोई काशी की बस्ती में साथ और टकराव दोनों रखती है। सीमा यह कि कुछ प्रसंग नाटक-आवश्यकता से तेज हैं। गुण यह कि संत मूर्ति नहीं रह जाता। लंबा संवाद उतारने की जगह प्रसंग पर्याप्त है — छोड़ना, लौटना, श्रम का दबाव। तमस का दंगा यहाँ कथा नहीं।

निष्कर्ष यह है कि द्वंद्व इसलिए है कि संत-पथ आसक्ति मापता है, गृहस्थी मिटाता नहीं।

Q. 3 (8 marks) · Unit 3

जुकाम फाइल कैसे रोकता है?

Or: जाला शिकार को कैसे बाँधता है?

Model answer

जुकाम फाइल इसलिए रोकता है कि काम साहब की नाक पर टिका है, नियम पर नहीं; अश्क का व्यंग्य शरीर नहीं, अधिकार है। उपेन्द्रनाथ अश्क का जन्म 14 दिसंबर 1910 जलंधर, निधन 19 जनवरी 1996। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी। गिरती दीवारें उपन्यास-श्रृंखला है। अंजो दीदी नाटक है। कैद। छठा बेटा। निर्धारित एकांकी साहब को ज़ुकाम है — कार्यालय-व्यंग्य। भाषा बोलचाल। दृष्टि मध्यवर्ग, दांपत्य, तंत्र। प्रसाद की काव्य-गरिमा नहीं रखते। राकेश के निकट बोलचाल में हैं; दांपत्य-शिखर आधे-अधूरे पर है, यह कार्यालय है। व्यंग्य शरीर पर नहीं, अधिकार पर है। साहब की सर्दी बहाना भी है, लक्षण भी। फाइलें रुकती हैं।

अंधेर नगरी का राजा शराब में है; यह साहब सर्दी में है। दोनों कुशासन के छोटे रूप हैं; शतक और विधा अलग हैं — 1881 प्रहसन, यह बीसवीं शताब्दी की एकांकी। वर्मा का मुरारीलाल मन से टूटता है; यहाँ तंत्र बाहर से ठहरता है। अंजो दीदी निर्धारित नहीं। गिरती दीवारें उपन्यास हैं, एकांकी नहीं। अंधायुग पद्य-नाटक है। सीमा कभी घटना का बिखराव और सपाट साहब है। गुण यह कि छोटा जुकाम सार्वजनिक अड़चन बनकर याद रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि जुकाम फाइल इसलिए रोकता है कि काम नाक पर टिका है; रूप एकांकी है, अंजो दीदी नहीं।

Or

जाला शिकार को इसलिए बाँधता है कि मकड़ी बुनती है और शिकार स्वयं फँसता है; स्वार्थ दूसरों को, अंत में स्वयं को बाँधता है। मकड़ी का जाला जगदीश चंद्र माथुर की निर्धारित एकांकी है। शीर्षक प्रतीक है। मकड़ी जाल बुनती है। शिकार स्वयं फँसता है। आधुनिक मनुष्य स्वार्थ और भौतिक मोह के जाल में है। संबंध भी जाल बन सकते हैं। एकांकी इस जाल को एक स्थिति में दिखाती है, महाकाव्य नहीं फैलाती। पात्र मध्यवर्ग के हैं। संघर्ष भीतर की फँसन है, सेना नहीं। प्रसंग — बुनना, फँसना, शिकार। भाव — स्वार्थ दूसरों को और अंत में स्वयं को बाँधता है।

कोणार्क 1951 मंदिर-शिल्पी का बड़ा रूप है; यह जाला एक स्थिति का नैतिक चित्र है। भोर का तारा भावुकता छूता है; निर्धारित पाठ जाल की चोट है। वर्मा की अफ़ीम प्राण का दाम है। अश्क का जुकाम पद का तंत्र है। भारती का नीलाम प्रेस-पूँजी है। चार मध्यवर्ग; आलंबन अलग। अंधायुग पद्य-नाटक है, यह गद्य-एकांकी है। अंधेर नगरी हाट पर हँसती है; यहाँ सिमटी फँसन है। बिना कोणार्क-निषेध के प्रतीक केवल शीर्षक रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि जाला शिकार को स्वार्थ से बाँधता है, अंत में बुनने वाले को भी; कृति एकांकी है, कोणार्क नहीं।

Q. 4 (8 marks) · Unit 4

दक्षिण अफ्रीका गांधी के प्रयोग का स्थल क्यों है?

Or: शर्मा भाई के सामने आलोचक क्यों नहीं रह जाते?

Model answer

दक्षिण अफ्रीका गांधी के प्रयोग का स्थल इसलिए है कि रंग-भेद का अपमान सत्य को अहिंसा से बाँधता है; घटना कारण बनती है। मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 पोरबंदर, निधन 30 जनवरी 1948। वकील, सत्याग्रही, सार्वजनिक पुरुष। आत्मकथा गुजराती मूल की है। नवजीवन में धारावाहिक — 29 नवंबर 1925 से 3 फरवरी 1929। हिन्दी सत्य के साथ मेरे प्रयोग। अंग्रेज़ी महादेव देसाई। जीवन यहाँ घटना-सूची नहीं, सत्य के प्रयोग की डायरी है। निर्धारित पाँच अंश हैं। सभ्य पोशाक में लंदन का प्रयोग है — फ्रॉक-कोट से सभ्यता नहीं, सदाचार से।

आत्मिक शिक्षा टॉल्स्टॉय फार्म की है — शरीर-बुद्धि सरल, चरित्र कठिन; शिक्षक का जीवन पाठ है। शांति निकेतन 1915 का सहयोग है — दक्षिण अफ्रीका से लौटकर राजकोट से जाना, स्वयं पाक, काका कालेलकर से भेंट। खादी का जन्म आश्रम के करघे से है — हाथ का सूत, खोया हाथ लौटना। बलवान से भिड़न्त जोहानिसबर्ग के एशियाई विभाग के अधिकारियों की रिश्वत-पद्धति से है; व्यक्तिगत वैर नहीं, बाहुबल नहीं। हिन्द स्वराज 1909 का अलग ग्रंथ है।

निष्कर्ष यह है कि अफ्रीका इसलिए स्थल है कि अपमान अभ्यास बनता है, नारा नहीं; लंदन परीक्षा है, जोहानिसबर्ग के एशियाई अधिकारी टकराव हैं।

Or

शर्मा भाई के सामने आलोचक इसलिए नहीं रह जाते कि पाती सम्बोधन है — वाचक भाई से बात करता है, सभा से नहीं। रामविलास शर्मा का जन्म 10 अक्टूबर 1912 उन्नाव — ऊँचगाँव सानी, निधन 30 मई 2000। आलोचक, निबंधकार, विचारक। पेशे से अंग्रेज़ी के अध्यापक, कर्म से हिन्दी जाति और प्रगतिशील आलोचना। निराला की साहित्य साधना शिखर-आलोचना है, साहित्य अकादमी; निर्धारित वह ग्रंथ नहीं। परम्परा का मूल्यांकन अलग निबंध है। निर्धारित भैया के नाम पाती है — पत्र-रूप आत्मकथांश। मित्र संवाद केदारनाथ अग्रवाल से पत्र हैं; निर्धारित शीर्षक पाती है। वे मार्क्स और ऋग्वेद दोनों पढ़ते हैं; यहाँ वह बहस नहीं, भाई को लिखी स्मृति है। वाचक भाई से बात करता है, सभा से नहीं।

आत्मकथांश बचपन, गाँव, परिवार, पढ़ाई की ओर मन बाँधता है। देशकाल बैसवाड़ा-उन्नाव की स्मृति है, नर्मदा का तट नहीं। गांधी की आत्मकथा सार्वजनिक प्रयोग है; यह सम्बोधन की स्मृति है। महादेवी घीसा में दूसरे को रेखा देती हैं; शर्मा भाई को लिखते हैं। वेगड़ नदी देखते हैं। निराला-ग्रंथ आलोचना है, यह पत्र है। सीमा निजी कचरा बन जाना है; गुण आत्मीयता है। रूप कथेतर है, नाटक नहीं।

निष्कर्ष यह है कि पाती सम्बोधन है, आलोचना-ग्रंथ नहीं; निराला की साहित्य साधना निर्धारित पाठ नहीं।

Q. 5 (8 marks) · Unit 5

भट्ट संकल्प को सार्वजनिक क्यों बनाते हैं?

Or: श्रद्धा एकान्तिक प्रेम क्यों नहीं?

Model answer

भट्ट संकल्प को इसलिए सार्वजनिक बनाते हैं कि व्यक्ति अपने को थामे, तभी समाज थमता है; युग सुधार माँगता था। मन की दृढ़ता बालकृष्ण भट्ट का निर्धारित निबंध है। नाम तराजू है। मन सोच है; दृढ़ता अटल संकल्प है। विषय चरित्र है, घटना नहीं। दुर्बल मन ज्ञान रखते हुए भी रुक जाता है। दृढ़ मन बाधा को काम बनाता है। प्रसंग भारतेंदु युग का सार्वजनिक नैतिक गद्य — व्यक्ति अपने को थामे, तभी समाज थमता है। भाव यह कि सफलता औजारों की भीड़ नहीं, इच्छा की एक लकीर है। रूप निबंध है, नाटक नहीं। भाषा खड़ी बोली। वाचक उपदेशक के निकट है। पत्र हिन्दी प्रदीप उनके गद्य-घर जैसा है।

साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है दूसरा निबंध-स्वर है। नूतन ब्रह्मचारी उपन्यास है। यह शुक्ल की श्रद्धा-भक्ति नहीं — वहाँ भाव कटते हैं, यहाँ आह्वान है। यह द्विवेदी का नाखून-प्रश्न नहीं। यह मिश्र की तमाल-दृष्टि नहीं। अंधेर नगरी कुशासन हँसती है; भट्ट मन को थामने को कहते हैं। गांधी सत्य को प्रयोग बनाते हैं; भट्ट संकल्प को चरित्र बनाते हैं। दोनों सार्वजनिक हैं; विधा अलग है।

निष्कर्ष यह है कि संकल्प इसलिए सार्वजनिक है कि चरित्र केवल निजी शौक नहीं; रूप निबंध है, उपन्यास नहीं।

Or

श्रद्धा एकान्तिक प्रेम इसलिए नहीं कि वह कर्म और महत्ता की स्वीकृति है; प्रेम व्यक्ति पर बैठता है, एकान्तिक होता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म 4 अक्टूबर 1884 आगोना — बस्ती, निधन 2 फरवरी 1941 काशी। आलोचक, इतिहासकार, निबंधकार। हिन्दी साहित्य का इतिहास 1928–29, नागरीप्रचारिणी सभा — प्रवृत्ति-इतिहास का केंद्र-ग्रंथ, यह पाठ नहीं। निबंध-संग्रह चिंतामणि। निर्धारित श्रद्धा और भक्ति उसी मनोविकार-शृंखला का निबंध है। निबंध को व्यक्ति-व्यंजक गद्य कहते हैं — निजी विवेक, केवल सूचना नहीं। कविता क्या है अलग निबंध है। गद्य को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं।

श्रद्धा श्रेष्ठ गुण की स्वीकृति है, कर्म और महत्ता पर। प्रेम व्यक्ति पर बैठता है। भक्ति दोनों का योग है — श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है। भट्ट आह्वान करते हैं; शुक्ल विवेक बाँधते हैं। द्विवेदी पूछते हैं; मिश्र देखते हैं। यह तुलसी का विनय नहीं, सूर का माधुर्य नहीं; औजार हो सकता है, स्वयं पद नहीं। अंधेर नगरी हँसकर शासन काटती है; शुक्ल श्रद्धा और प्रेम काटते हैं। बिना चिंतामणि के आधुनिक निबंध का विवेक अधूरा है।

निष्कर्ष यह है कि श्रद्धा सार्वजनिक स्वीकृति हो सकती है, प्रेम एक का है; इसलिए एक नहीं। भक्ति दोनों का योग है।

Section C

Q. 1 (20 marks) · Unit 1

आधुनिक हिन्दी नाटक तमाशा से प्रश्न तक कैसे पहुँचा?

Model answer

आधुनिक हिन्दी नाटक तमाशा से प्रश्न तक पारसी, भारतेंदु, प्रसाद, एकांकी और स्वातंत्र्योत्तर सोपानों से पहुँचा। प्रमुख सोपान इतिहास को चलती सीढ़ी बनाते हैं, केवल जन्म-वर्ष की सूची नहीं। पहला सोपान पूर्व-आधुनिक लोक और पारसी है। नाट्यशास्त्र जड़ है। रामलीला, रास, स्वांग लोक में बचे। उन्नीसवीं शताब्दी में पारसी थियेटर तमाशा, गीत और हिन्दुस्तानी संवाद लाता है। आगा हश्र कश्मीरी उसी धारा के नाम हैं। दूसरा सोपान भारतेंदु युग है। जन्म 1850, निधन 1885, काशी। भारत दुर्दशा देश-करुण है। अंधेर नगरी 1881 निर्धारित प्रहसन है। खड़ी बोली सार्वजनिक हुई। पारसी तमाशा रहा; भारतेंदु प्रश्न बने। ये दो आरंभ की सीढ़ी हैं — तमाशा से व्यंग्य तक।

तीसरा सोपान प्रसाद का काव्य-ऐतिहासिक नाटक है। जन्म 1889, निधन 1937, काशी। स्कंदगुप्त 1928, चंद्रगुप्त 1931, ध्रुवस्वामिनी 1933। राष्ट्र, प्रेम, स्वाभिमान। नारी निर्णय की ओर। द्विवेदी युग नाटक में पतला रहा; प्रसाद ने नाटक को साहित्य का शिखर दिया। सीमा काव्य-संवाद की दुरुहता और रंग-कठिनाई है। गुण गरिमा और नारी-द्वंद्व है। आकाशदीप कहानी है, इस सोपान का नाटक नहीं। चौथा सोपान एकांकी और समस्या-नाटक है। रामकुमार वर्मा एकांकी स्थिर करते हैं। अश्क मध्यवर्ग-तंत्र देते हैं। माथुर प्रतीक और कोणार्क दोनों रखते हैं — कोणार्क पूर्ण नाटक, निर्धारित मकड़ी का जाला एकांकी। भारती व्यंग्य-एकांकी और अंधायुग दोनों रखते हैं। लक्ष्मीनारायण मिश्र समस्या-नाटक की चर्चा में हैं। भुवनेश्वर प्रयोग साथ हैं, निर्धारित नहीं। रेडियो ने संक्षेप माँगा।

पाँचवाँ सोपान स्वातंत्र्योत्तर यथार्थ और प्रयोग है। राकेश आषाढ़ का एक दिन 1958, आधे-अधूरे 1969। भारती अंधायुग 1955। साहनी कबीरा खड़ा बाजार में 1981। हबीब तनवीर लोक-रंग। बादल सरकार बंगला-नुक्कड़ की चर्चा, हिन्दी केंद्र नहीं। तमस उपन्यास है, नाटक नहीं। गुनाहों का देवता उपन्यास है। प्रत्येक सोपान अगले को संभव बनाता है, स्वयं अंतिम नहीं। सोपान कृति से पहचाने जाते हैं। भारतेंदु अंधेर नगरी। प्रसाद ध्रुवस्वामिनी। वर्मा एकांकी। राकेश आधे-अधूरे। भारती अंधायुग। साहनी कबीरा। बिना नाम के सोपान सूखे हैं। बिना धारा के नाम कमजोर है।

सीमा यह कि सोपान रेखाएँ काटते हैं, कृतियाँ दो सोपान छूती हैं। माथुर एकांकी और कोणार्क दोनों रखते हैं। भारती एकांकी और अंधायुग दोनों रखते हैं। भारतेंदु व्यंग्य और करुण दोनों छूते हैं — अंधेर नगरी और भारत दुर्दशा। गुण यह कि इतिहास चलता है, सूची नहीं रहती। ओझा उद्भव और विकास बाँधते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग-परंपरा रखते हैं। जयदेव तनेजा आधुनिक रंग देखते हैं। जगदीश चतुर्वेदी नाटक और रंगमंच साथ पढ़ते हैं। अंधायुग और अंधेर नगरी नाम-साम्य से एक सोपान नहीं बनते — एक 1881 प्रहसन, दूसरा 1955 पद्य। कबीर ग्रंथावली कविता है, साहनी का संवाद अलग सोपान है। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; ये सोपान उसी चिह्न के दृश्य-हाथ हैं।

निष्कर्ष यह है कि तमाशा भीड़ देता है और भारतेंदु-प्रसाद-राकेश प्रश्न देते हैं; आधुनिक नाटक उसी पहुँच का दृश्य-गद्य है। अंधेर नगरी 1881 व्यंग्य है। स्कंदगुप्त-ध्रुवस्वामिनी काव्य-इतिहास हैं। आधे-अधूरे यथार्थ है। अंधायुग पद्य है। कबीरा संत-बाजार है। सोपान शत्रु नहीं, सीढ़ी हैं।

Q. 2 (20 marks) · Unit 2

अंधेर नगरी का अंत राजा को स्वयं दंड क्यों देता है?

Model answer

अंधेर नगरी का अंत राजा को स्वयं इसलिए दंड देता है कि बैकुंठ का लालच उसी तर्क को निगल लेता है जिससे शासन चला। अंधेर नगरी भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रहसन है, 1881। काशी के हिंदू नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में लिखा गया कहा जाता है। रूप प्रहसन है — छह दृश्य, पारंपरिक पाँच अंक नहीं। लक्ष्य नगर का नाम नहीं, कुशासन का स्वभाव है। अंधायुग भारती का पद्य-नाटक है; अँधेरा-साम्य नाम का भ्रम है। भारत दुर्दशा देश-करुण है, यह हँसी है। कथावस्तु कारण की उलटी नकल है। लोभ मिठाई से फंदे तक जाता है। पहला दृश्य महंत और दो शिष्य — गोवर्धन दास और नारायण दास। पाठ्य-नाम गोबरधनदास भी है। गुरु लोभ से सावधान करते हैं।

दूसरा दृश्य हाट है। कबाबवाला, हलवाई, कुंजड़िन, नरंगीवाली, मुगल, पाचकवाला, मछलीवाली पुकारते हैं। दाम एक है — टका सेर। जातवाला जाति बेचता है। गोवर्धन ढाई सेर मिठाई ले आता है। तीसरे दृश्य में महंत कुदेश पहचानते हैं — जहाँ कपूर और कपास एक भाव हों, उस देश में बास न किया जाए। गुणी-अवगुणी एक भाव। नारायण चल देता है। गोवर्धन स्वाद में ठहरता है। गुरु विवेक है, एक शिष्य संतोष, दूसरा स्वाद। स्वाद मोटा करता है। मोटा आगे फंदे का नाप बनता है।

चौथा दृश्य दरबार है। चौपट राजा शराब में है। फरियादी की बकरी दीवार से दबकर मरती है। न्याय गर्दन माँगता है, कारण नहीं। श्रृंखला — बनिया कल्लू, कारीगर, चूनेवाला, भिश्ती, कसाई, गड़ेरिया, अंत कोतवाल। फाँसी कोतवाल के गले पर चढ़े। फंदा दुबले पर बड़ा बैठता है। हुक्म — मोटे को चढ़ाओ। पाँचवें दृश्य में मोटा गोवर्धन पकड़ा जाता है। संबंध बकरी से नहीं, नाप से है। अरस्तू कथा को प्राण कहते हैं; यह कथा प्राण की उलटी नकल है। शासन संयोग चलाता है।

छठा दृश्य श्मशान है। महंत कान में मंत्र देते हैं। गुरु-शिष्य फाँसी की उतावली दिखाते हैं। राजा सुनता है — इस घड़ी चढ़ने वाला बैकुंठ जाएगा। वह स्वयं चढ़ता है। कुशासन अपने लोभ-तर्क से मरता है। रस हास्य-व्यंग्य है। उद्देश्य सुधार है। सीमा आसान समाधान और सपाट राजा है। गुण तराजू की पहचान है। आलोचना औपनिवेशिक और देशी दोनों कुशासनों पर चोट पढ़ती है। ओझा इसे लोकप्रिय व्यंग्य मानते हैं। लंबे संवाद नहीं; दृश्य-क्रम ही कथावस्तु है।

निष्कर्ष यह है कि अंत स्वयं दंड इसलिए देता है कि बैकुंठ का लालच उसी तर्क को निगल लेता है जिससे शासन चला; रूप प्रहसन है, पद्य-अंधायुग नहीं। छह दृश्य महंत-शिष्य, हाट, चेतावनी, दरबार, मोटे का नाप और श्मशान हैं। गोवर्धन पेट है, चौपट राजा विवेकहीन शासन है, महंत विवेक है।

Q. 3 (20 marks) · Unit 3

एक तोला अफ़ीम में प्राण का दाम कैसे नापा जाता है?

Model answer

एक तोला अफ़ीम में प्राण का दाम इसलिए नापा जाता है कि सस्ती वस्तु जीवन से टकराती है; मुरारीलाल आवेश में मूल्य सस्ता कर लेता है। एक तोला अफ़ीम की कीमत रामकुमार वर्मा की निर्धारित एकांकी है। वर्मा जन्म 15 सितंबर 1905 सागर, निधन 1990। प्रयाग अध्यापन, पद्म भूषण 1963। आलोचना उन्हें एकांकी-केंद्र कहती है; जनक कहना विवाद रखता है, भुवनेश्वर प्रयोग साथ हैं। पृथ्वीराज की आँखें 1938, रेशमी टाई 1941 — निर्धारित नहीं। कविता में छाया-रहस्य है; एकांकी गद्य-दृश्य है। कथावस्तु एक स्थिति है। नायक मुरारीलाल मध्यवर्ग का पुरुष है। आर्थिक अभाव, प्रतिष्ठा का बोझ, निराशा। वह आत्महत्या की ओर मुड़ता है। साधन अफ़ीम चुनता है। घटना पतली है; निर्णय घना है। पात्र कम, स्थान सिमटा, समय एक स्थिति जितना।

नाम तराजू है। एक तोला अफ़ीम सस्ती लगती है। कीमत जीवन से टकराती है। जो प्राण महँगा होना चाहिए, वह सस्ती वस्तु से मिटाया जा रहा है। भाव यह कि मनुष्य आवेश में अपना मूल्य सस्ता नाप लेता है। यह नशा-प्रचार नहीं, मूल्य का व्यंग्य है। वर्मा मनोवैज्ञानिक एकांकी की ओर हैं। संघर्ष मुरारीलाल और निराश मन के बीच है। प्रयत्न असफल रहता है। असफलता बोध बनती है। पाठ धक्का है, उपदेश-सूची नहीं। लंबे उद्धरण नहीं; प्रसंग-भाव पर्याप्त हैं।

शिल्प एक चोट माँगता है। दूसरे अंक की लालसा दोष है। भाषण दोष है। गुण शीर्षक का प्रश्न है। सीमा नैतिक अंगुली है। रेशमी टाई दिखावा है; यह पाठ प्राण का दाम है। पृथ्वीराज की आँखें ऐतिहासिक हैं, यह सामाजिक-नैतिक है। अंधेर नगरी का मूल्य हाट पर टूटता है; यहाँ एक मन में टूटता है। अश्क का साहब बाहर का तंत्र है; मुरारीलाल भीतर से टूटता है। माथुर का जाला संबंध है। भारती का दिवाकर आवाज़ बेचता है। रूप एकांकी है। अंधायुग पद्य-नाटक है, यह गद्य-चोट है।

तत्त्व संक्षेप में बैठते हैं — कथावस्तु एक स्थिति, चरित्र मुरारीलाल, कथोपकथन प्रधान, देशकाल मध्यवर्ग, उद्देश्य बोध। ओझा एकांकी को सोपान कहते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग से नहीं काटते। वह पूर्ण नाटक की कटी पूँछ नहीं। कहानी से इसलिए अलग है कि खेली जाती है। भारतेंदु का प्रहसन हँसता है; यह भीतर का धक्का देती है। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; यह चिह्न यहाँ एक मन की निराशा बनता है।

निष्कर्ष यह है कि प्राण का दाम अफ़ीम की सस्ताई से उलटा नापा जाता है; रूप एकांकी है, रेशमी टाई नहीं। वर्मा 1905–1990 एकांकी-केंद्र हैं। निर्धारित कृति यही अफ़ीम-पाठ है। मूल्य का प्रश्न शीर्षक से खुलता है, भाषण से नहीं। असफल प्रयत्न उपदेश नहीं, बोध है।

Q. 4 (20 marks) · Unit 4

घीसा में छोटा जीवन गरिमा कैसे पाता है?

Model answer

घीसा में छोटा जीवन गरिमा इसलिए पाता है कि करुणा रेखा बनती है, उपहास नहीं; महादेवी निर्धन बालक-सेवक को तराजू बनाती हैं। घीसा महादेवी वर्मा का रेखाचित्र है, कहानी का प्लॉट नहीं, नाटक नहीं, प्रगीत नहीं। जन्म 26 मार्च 1907 फर्रुखाबाद, निधन 11 सितंबर 1987 प्रयाग। छायावाद की कवयित्री — नीहार, नीरजा, यामा। वही लेखक रेखाचित्र की शिखर हैं। संग्रह अतीत के चलचित्र। स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी, मेरा परिवार दूसरे गद्य-स्वर हैं। निर्धारित घीसा पहले संग्रह का है। गद्य करुणा का है। कविता में वेदना वाचक की है; रेखाचित्र में करुणा दूसरे की ओर मुड़ती है। दोनों महादेवी हैं; विधा अलग है। श्रृंखला की कड़ियाँ निबंध-स्वर है, यह रेखाचित्र है। रूप कथेतर है। खेला नहीं जाता।

पात्र निर्धन, दुबला, गाँव का बालक-सेवक। गुरु-भक्ति अपना बल मानता है। कठिनाई में भी तरबूज जैसा छोटा उपहार लाता है। लेखिका करुणा लिखती हैं, उपहास नहीं। रेखा एक की है; पीछे गाँव की गरीबी खड़ी है। प्रसंग सेवा, भक्ति, अभाव। भाव — छोटा जीवन भी गरिमा रखता है। शिल्प स्मृति की सरल खड़ी बोली है। दोष केवल रूप-वर्णन। गुण गरिमा दिखाना। लंबा चित्रण नहीं उतारा जाता। गिल्लू मेरा परिवार की गिलहरी है। भक्तिन स्मृति की रेखाएँ की नारी-रेखा है। रमा उसी संग्रह का दूसरा सेवक-स्वर है, निर्धारित घीसा है। नीहार प्रगीत है, यह गद्य है।

आत्मकथा स्वयं को कसौटी बनाती है। रेखाचित्र दूसरे को रेखा देती है। गांधी अपने प्रयोग लिखते हैं। महादेवी करुणा दूसरे बालक-सेवक की ओर मुड़ती हैं। वेगड़ नदी देखते हैं; यहाँ एक बालक देखा जाता है। शर्मा भाई को लिखते हैं; यहाँ सेवक रेखा है। चार स्मृति, चार आलंबन। अंधेर नगरी हँसकर शासन काटती है; घीसा करुणा से व्यक्ति उठाती है। एकांकी एक चोट है; रेखाचित्र एक स्वर है। निबंध तर्क है; यह रेखा है।

तत्त्व में चरित्र रेखा है, घटना पतली। उद्देश्य बोध है। भाषा सरल गद्य माँगती है। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; यह चिह्न यहाँ करुणा की रेखा बनता है। सीमा अंश है, पूरा संग्रह नहीं। गुण विधा याद रह जाना है। महत्त्व यह है कि हिन्दी गद्य कथन में भी सार्वजनिक हुआ। महादेवी करुणा की रेखा देती हैं, उपहास नहीं। बिना गिल्लू-भक्तिन-निषेध के नाम ढेर लगते हैं। पाठ प्रसंग-भाव है, अध्याय के उतार से नहीं। तरबूज जैसा उपहार कठिनाई में भी गरिमा रखता है।

निष्कर्ष यह है कि छोटा जीवन गरिमा इसलिए पाता है कि करुणा रेखा बनती है, उपहास नहीं; कृति रेखाचित्र है, गिल्लू नहीं। संग्रह अतीत के चलचित्र है। पात्र निर्धन सेवक है, गिलहरी नहीं। गांधी स्वयं को तराजू बनाते हैं; यहाँ दूसरा व्यक्ति तराजू है। रूप कथेतर है, नाटक नहीं।

Q. 5 (20 marks) · Unit 5

नाखून मनुष्य की अधूरी संस्कृति कैसे याद दिलाते हैं?

Model answer

नाखून मनुष्य की अधूरी संस्कृति इसलिए याद दिलाते हैं कि काटने के बाद भी अवशेष बढ़ता है; द्विवेदी का प्रश्न यही अभ्यास है। नाखून क्यों बढ़ते हैं हजारीप्रसाद द्विवेदी का निर्धारित निबंध है, कहानी नहीं, उपन्यास नहीं, जीव-विज्ञान नहीं। जन्म 19 अगस्त 1907 दुबे का छपरा, ओझवलिया, बलिया। बचपन का नाम वैद्यनाथ। निधन 19 मई 1979 दिल्ली। शांतिनिकेतन में अध्यापन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। पद्म भूषण 1957। साहित्य अकादमी 1973 — आलोक पर्व; निर्धारित नहीं। संग्रह अशोक के फूल। कुटज दूसरा स्वर है। उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा 1946, अनामदास का पोथा 1976 — निर्धारित निबंध नहीं। महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के आचार्य हैं, यह लेखक नहीं। नामवर उन्हें दूसरी परंपरा कहते हैं — लोक, भक्ति, संस्कृति।

शीर्षक प्रश्न है। नाखून पशु-रक्षा के अवशेष माने जाते हैं। काटना संस्कृति का काम है। फिर बढ़ना याद दिलाता है कि मनुष्यता पूरी नहीं हुई। प्रसंग सभ्यता और पशुता का द्वंद्व, एक छोटे अंग से। भाव — संस्कृति अभ्यास है, जन्म-सिद्ध मुकुट नहीं। निबंध प्रश्न से विचार खोलता है। बिहार-पाठ्य में कभी कहानी कहा जाता है; रूप निबंध है। यह कुटज नहीं, आलोक पर्व नहीं, पोथा नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; लंबा चित्रण नहीं। कबीर-आलोचना दूसरा कर्म है।

शिल्प प्रश्न से विचार है। दोष जीव-विज्ञान बन जाना। गुण छोटे अंग से बड़ा द्वंद्व। भट्ट संकल्प माँगते हैं। शुक्ल भाव काटते हैं। द्विवेदी संस्कृति पूछते हैं। मिश्र देखते हैं। घीसा रेखाचित्र है; यह प्रश्न-निबंध है। गांधी सत्य को प्रयोग बनाते हैं; द्विवेदी संस्कृति को प्रश्न बनाते हैं। अंधेर नगरी हँसकर शासन काटती है; यह पशुता याद दिलाती है। तत्त्व — सीमित विषय, संस्कृति की दृष्टि, प्रश्न का क्रम, निबंध-गद्य, उद्देश्य अभ्यास। शुक्ल व्यक्ति-व्यंजक कहते हैं; यहाँ प्रश्न विवेक बनता है, आत्मकथा नहीं।

निषेध साथ हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी अलग हैं। बाणभट्ट की आत्मकथा अलग है। अनामदास का पोथा उपन्यास है। कुटज और आलोक पर्व निर्धारित नहीं। बिना निषेध के नाम ढेर लगते हैं। महत्त्व यह है कि संस्कृति मुकुट नहीं, अभ्यास है। सीमा चार शीर्षक हैं, पूरा अशोक के फूल नहीं। द्विवेदी सर्वाधिकार में हैं — भाव लिखा जाता है, अध्याय नहीं। नामवर की दूसरी परंपरा लोक और संस्कृति की है, जीव-विज्ञान की नहीं। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; यह चिह्न यहाँ प्रश्न बनता है।

निष्कर्ष यह है कि नाखून अधूरी संस्कृति इसलिए याद दिलाते हैं कि अवशेष काटना रोज़ का काम है; रूप निबंध है, पोथा या महावीर-युग नहीं। नाखून अवशेष हैं, काटना संस्कृति है, बढ़ना अधूरी मनुष्यता है। संग्रह अशोक के फूल है। संस्कृति जन्म-सिद्ध मुकुट नहीं, रोज़ का अभ्यास है।

सेट 2

सेट 2 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। प्रश्न सेट 1 और इकाई टेस्ट से भिन्न हैं। खंड अ अनिवार्य। खंड ब आंतरिक विकल्प सहित पाँचों। खंड स में कोई तीन।

Section A

Q. 1. अंधायुग किस वर्ष का पद्य-नाटक है?

भारती। अंधेर नगरी 1881 प्रहसन; कबीरा 1981; आधे-अधूरे 1969।

Q. 2. कबीरा खड़ा बाजार में के नाटककार हैं —

1915–2003। तमस 1973 उपन्यास है, यह नाटक नहीं।

Q. 3. कोणार्क मुख्यतः क्या है?

माथुर, 1951। निर्धारित मकड़ी का जाला एकांकी है।

Q. 4. सौंदर्य की नदी नर्मदा किसकी पुस्तक है?

चित्र-पदयात्रा। वोल्गा से गंगा राहुल की है।

Q. 5. चिंतामणि के निबंधकार हैं —

श्रद्धा और भक्ति इसी संग्रह की है। भट्ट प्रदीप के हैं।

Q. 6. भारतेंदु का निधन _____ ई. में हुआ।

Answer: 1885 — 6 जनवरी, काशी। जन्म 1850।

Q. 7. तमस _____ ई. का उपन्यास है।

Answer: 1973 — साहनी। निर्धारित नाटक कबीरा 1981 है।

Q. 8. एक तोला अफ़ीम की कीमत का नायक _____ है।

Answer: मुरारीलाल — वर्मा। दिवाकर नीलाम का है।

Q. 9. गांधी की आत्मकथा मूलतः _____ भाषा में है।

Answer: गुजराती — नवजीवन 1925–1929। हिन्दी अनुवाद साथ।

Q. 10. हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म _____ में हुआ।

Answer: 1907 — 19 अगस्त, दुबे का छपरा। निधन 1979।

Section B

Q. 1 (8 marks) · Unit 1

भरत के चार अभिनय नाटक के शरीर कैसे हैं?

Or: प्रसाद का ऐतिहासिक नाटक भारतेंदु के व्यंग्य से कैसे मुड़ता है?

Model answer

भरत के चार अभिनय नाटक के शरीर इसलिए हैं कि आंगिक अंग है, वाचिक वचन, आहार्य वेश, सात्विक भाव का स्पंदन। नाटक दृश्य-काव्य है। वह रंगमंच पर अभिनय से पूरा होता है। कविता श्रव्य रह सकती है; उपन्यास वर्णन फैलाता है; नाटक संवाद और दृश्य माँगता है। भरत के नाट्यशास्त्र में नाट्य लोक की अनुकृति है। चार अभिनय शरीर हैं — आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक। अरस्तू कथा को प्राण कहते हैं। शुक्ल नाटक को गद्य का सार्वजनिक रूप कहते हैं। नगेन्द्र उसे संघर्ष का दृश्य-रूप कहते हैं। नेमिचंद्र जैन पाठ और प्रदर्शन दोनों देखते हैं। केंद्र मनुष्य का द्वंद्व है। बिना संघर्ष के संवाद उपदेश रह जाते हैं।

परिभाषा तीन बिंदु माँगती है — दृश्य, संवाद-अभिनय, बोध। पारसी चमत्कार प्रधान रही। भारतेंदु ने व्यंग्य जोड़ा — अंधेर नगरी 1881। प्रसाद ने इतिहास-संघर्ष जोड़ा — स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी। राकेश ने बोलचाल का दांपत्य जोड़ा — आधे-अधूरे। साहनी ने संत-संस्था जोड़ा — कबीरा खड़ा बाजार में। गोदान उपन्यास है; कामायनी महाकाव्य है। बिना रंग के परिभाषा सूखी रहती है।

निष्कर्ष यह है कि चार अभिनय शरीर हैं, कथा प्राण है; दोनों मिलकर नाटक पूरा होता है।

Or

प्रसाद का ऐतिहासिक नाटक भारतेंदु के व्यंग्य से इसलिए मुड़ता है कि हाट की हँसी के बाद इतिहास-सभा की गरिमा बैठती है। जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 काशी, निधन 15 जनवरी 1937 काशी। नाटक की विशेषताएँ चार सिरों पर बैठती हैं। प्रथम, ऐतिहासिक-पौराणिक आख्यान — स्कंदगुप्त 1928, चंद्रगुप्त 1931, ध्रुवस्वामिनी 1933। द्वितीय, काव्य-संवाद और संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली का गरिमा-भार। तृतीय, राष्ट्र, प्रेम और स्वाभिमान का संघर्ष; इतिहास-पुरुष आधुनिक प्रश्न बोलते हैं। चतुर्थ, नारी केवल आलंबन नहीं, निर्णय की ओर बढ़ती है — ध्रुवस्वामिनी का प्रश्न दांपत्य और राज्य दोनों छूता है। ये युग के शिखर-नाम हैं। आकाशदीप कहानी है, नाटक नहीं।

प्रसाद भारतेंदु का व्यंग्य नहीं चलाते, राकेश का दांपत्य-यथार्थ भी नहीं। द्विवेदी युग नाटक में पतला रहा; प्रसाद ने नाटक को साहित्य का शिखर दिया। सीमा काव्य-संवाद की दुरुहता और रंग-कठिनाई है। गुण गरिमा और नारी-द्वंद्व है। लक्ष्मीनारायण मिश्र समस्या-नाटक की ओर हैं, प्रसाद का मार्ग इतिहास-काव्य है। आधे-अधूरे बोलचाल है; अंधेर नगरी लोक-व्यंग्य है; अंधायुग पद्य-अँधेरा है। तीनों प्रसाद की विशेषता नहीं। बिना उदाहरण के विशेषताएँ सूखी गिनती रह जाती हैं।

निष्कर्ष यह है कि प्रसाद व्यंग्य-हाट से इतिहास-सभा की ओर मुड़ते हैं; दोनों हिन्दी नाटक के सोपान हैं।

Q. 2 (8 marks) · Unit 2

गोवर्धन का मोटा गला व्यंग्य कैसे बनता है?

Or: तमस को कबीरा क्यों नहीं कहा जाता?

Model answer

गोवर्धन का मोटा गला व्यंग्य इसलिए बनता है कि फंदा दुबले कोतवाल पर नहीं बैठता और न्याय नाप चलता है, कारण नहीं। गोवर्धन दास महंत का शिष्य है। पाठ्य-नाम गोबरधनदास भी है। वह नायक नहीं, लोभ का दृष्टांत है। पहले दृश्य में गुरु सावधान करते हैं। हाट में सब टके सेर देखकर वह आनंदित होता है। ढाई सेर मिठाई लाता है। तीसरे दृश्य में महंत कुदेश पहचानते हैं — जहाँ कपूर और कपास एक भाव हों, बास न किया जाए। नारायण दास चल देता है; यह ठहरता है। स्वाद मोटा करता है।

प्रहसन उसे गोल मन नहीं देता, पेट देता है। पेट ही फाँसी तक ले जाता है। कबीर वाणी का पुरुष है; यह स्वाद का पुरुष है। चौपट राजा विवेकहीन शासन है; यह लोभी जन है। सीमा एकआयामी होना है। गुण यह कि लोभ सार्वजनिक दंड बन जाता है। बिना उसके प्रहसन का शिकार नहीं बैठता। अंत श्मशान में गुरु के मंत्र से वह फाँसी की उतावली भी दिखाता है; राजा उसी जाल में फँसता है।

निष्कर्ष यह है कि मोटा गला व्यंग्य इसलिए है कि न्याय नाप चलता है, कारण नहीं; पेट सार्वजनिक दंड बन जाता है।

Or

तमस को कबीरा इसलिए नहीं कहा जाता कि तमस 1973 का विभाजन-दंगा उपन्यास है और कबीरा 1981 का संत-नाटक। कबीरा खड़ा बाजार में भीष्म साहनी का नाटक है, 1981। शीर्षक कबीर के प्रचलित दोहे से आता है — संत चौक पर खड़ा है, लुकाठी हाथ में, आसक्ति जलाने का आह्वान। अर्थ सार्वजनिक इंकार है। घर यहाँ आसक्ति का संकेत है, वास्तु-वर्णन नहीं। देशकाल काशी की जुलाहा-बस्ती, घाट और हाट है। नायक जुलाहा-संत है, ग्रंथावली का पद-संग्रह नहीं। साहनी संवाद दोहे का पर्याय नहीं; प्रसंग गढ़ते हैं, भाव चौक का रखते हैं। बिना चौक के संत केवल भक्त रह जाता। बिना संत के चौक केवल व्यापार रह जाता।

रूप इतिहास-पुनर्पाठ है, प्रहसन नहीं। तमस 1973 विभाजन-उपन्यास है, यह कृति नहीं। माधवी और हानूश दूसरे नाटक हैं। अंधेर नगरी 1881 हँसकर कुशासन काटती है; यह 1981 खड़ा रहकर पंथ और जाति पूछता है। अंधायुग पद्य-नैतिक अँधेरा है, यह गद्य-संत-प्रश्न है। हजारीप्रसाद द्विवेदी कबीर को नाथ-योग और भक्ति की धारा से पढ़ते हैं; साहनी रंग पर सार्वजनिक पुरुष बनाते हैं। दोनों ग्रंथ अलग हैं।

निष्कर्ष यह है कि तमस उपन्यास है, कबीरा नाटक है; निर्धारित यही कबीरा है। माधवी और हानूश दूसरे नाटक हैं।

Q. 3 (8 marks) · Unit 3

मुरारीलाल सस्ती अफ़ीम क्यों चाहता है?

Or: दिवाकर आवाज़ क्यों बेचता है?

Model answer

मुरारीलाल सस्ती अफ़ीम इसलिए चाहता है कि प्राण का हिसाब उलटा हो चुका है; नशा मूल्य से सस्ता दिखता है, जीवन महँगा पड़ता है। एक तोला अफ़ीम की कीमत रामकुमार वर्मा की निर्धारित एकांकी है। नाम तराजू है। एक तोला अफ़ीम सस्ती वस्तु लगती है। कीमत जीवन से टकराती है। नायक मुरारीलाल मध्यवर्ग का पुरुष है। आर्थिक अभाव, प्रतिष्ठा का बोझ, निराशा। वह आत्महत्या की ओर मुड़ता है। साधन अफ़ीम चुनता है। पता चलता है — जान लेने वाली वस्तु का दाम बहुत छोटा है। भाव यह कि मनुष्य आवेश में अपना मूल्य सस्ता नाप लेता है। असफल प्रयत्न बोध बनता है।

अंधेर नगरी में टका-सेर तराजू टूटा है; यहाँ तोला जीवन को सस्ता दिखाता है। दोनों मूल्य पूछते हैं; रूप अलग है — प्रहसन हँसता है, यह एकांकी भीतर का धक्का है। रेशमी टाई सामाजिक दिखावा है। पृथ्वीराज की आँखें ऐतिहासिक हैं। अश्क का जुकाम बाहर का तंत्र है; मुरारीलाल भीतर से टूटता है। माथुर का जाला संबंध है। भारती का दिवाकर आवाज़ बेचता है। अंधायुग पद्य-नाटक है, यह गद्य-चोट है। वर्मा मनोवैज्ञानिक एकांकी की ओर हैं।

निष्कर्ष यह है कि सस्ती अफ़ीम इसलिए चाहिए कि प्राण का हिसाब उलटा हो चुका है; रूप एकांकी है, नशा-प्रचार नहीं।

Or

दिवाकर आवाज़ इसलिए बेचता है कि पत्नी की लंबी बीमारी और तंगी नैतिक बेड़ी बनती हैं; स्वतंत्रता के बाद भी रीढ़ झुकती है। आवाज़ का नीलाम धर्मवीर भारती की निर्धारित एकांकी है। नाम दोहरा है। आवाज़ दिवाकर के अखबार का नाम है। आवाज़ अभिव्यक्ति भी है। नीलाम बिकना है। पत्रकार जनता की बात होता है; वही बिक जाए तो व्यंग्य पूरा है। मंच प्रायः दो पात्र। दिवाकर निडर संपादक हैं। सेठ बाजोरिया पूँजी हैं। तंगी और पत्नी की बीमारी दिवाकर को बेचने को विवश करती है। नीलाम पूरा होने पर रीढ़ झुकती है। पत्नी की मृत्यु के बाद लौटाना चाहते हैं; सेठ नहीं लौटाता — बिकी आवाज़ वापस नहीं होती।

अंधायुग 1955 पद्य-नाटक है, कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा; यह पाठ नहीं। गुनाहों का देवता उपन्यास है। धर्मयुग संपादन दूसरा कर्म है। अंधेर नगरी का अँधेरा नाम-साम्य मात्र होगा; यहाँ नीलाम है, प्रहसन नहीं। वर्मा प्राण का दाम पूछते हैं; भारती आवाज़ का दाम पूछते हैं। सीमा सेठ का एकआयामी खल है। गुण दो अर्थ का नाम है। देशकाल स्वातंत्र्योत्तर नगर है, महाभारत नहीं।

निष्कर्ष यह है कि आवाज़ इसलिए बिकती है कि तंगी नैतिक बेड़ी बनती है, स्वतंत्रता के बाद भी; सेठ बाजोरिया नहीं लौटाता।

Q. 4 (8 marks) · Unit 4

हिन्द स्वराज आत्मकथा से वर्ष और विषय कैसे कटता है?

Or: गिल्लू और घीसा दो रेखाएँ क्यों हैं?

Model answer

हिन्द स्वराज आत्मकथा से वर्ष और विषय इसलिए कटता है कि वह 1909 का सभ्यता-स्वराज तर्क है, आत्मकथा नवजीवन 1925–1929। सत्य के साथ मेरे प्रयोग आत्मकथा का नाम तराजू है। सत्य सिद्धांत नहीं, प्रयोग है। मेरे प्रयोग — व्यक्ति अपना जीवन कसौटी बनाता है। आहार, भय, ब्रह्मचर्य, रंग-भेद, अहिंसा अभ्यास हैं। मूल गुजराती। नवजीवन 1925–1929। हिन्दी साथ-साथ। वाचक उत्तम पुरुष। प्रसंग बचपन का डर, लंदन की परीक्षा, दक्षिण अफ्रीका का अपमान। भाव — नैतिकता भाषण नहीं, रोज़ का काम है। दोष आत्म-प्रशंसा हो जाना है; गांधी उलटा करते हैं — कमजोरी लिखते हैं। गुण यह कि पाठक प्रयोग दोहरा सकता है, केवल पूजा नहीं करता।

निर्धारित पाँच शीर्षक वही विधि हैं। सभ्य पोशाक में लंदन का वेश-लोभ है। बलवान से भिड़न्त जोहानिसबर्ग के एशियाई अधिकारियों से है। आत्मिक शिक्षा टॉल्स्टॉय फार्म का चरित्र है। शांति निकेतन 1915 का श्रम-सहयोग है। खादी का जन्म आश्रम-करघा है। हिन्द स्वराज 1909 स्वराज का तर्क है, आत्मकथा नहीं। नेहरू की आत्मकथा अलग है। शर्मा की पाती भाई-सम्बोधन है, यह सार्वजनिक प्रयोग है। रूप कथेतर है, नाटक नहीं।

निष्कर्ष यह है कि हिन्द स्वराज तर्क है, आत्मकथा प्रयोग है; दो गांधी-ग्रंथ एक नहीं।

Or

गिल्लू और घीसा दो रेखाएँ इसलिए हैं कि एक मेरा परिवार की गिलहरी है, दूसरा अतीत के चलचित्र का बालक-सेवक। महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 फर्रुखाबाद, निधन 11 सितंबर 1987 प्रयाग। छायावाद की कवयित्री — नीहार, नीरजा, यामा। वही लेखक रेखाचित्र की शिखर हैं। गद्य-संग्रह अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी, मेरा परिवार। निर्धारित घीसा अतीत के चलचित्र का रेखाचित्र है। पात्र निर्धन, दुबला, गाँव का बालक-सेवक। गुरु-भक्ति अपना बल मानता है। कठिनाई में भी तरबूज जैसा छोटा उपहार लाता है। लेखिका करुणा लिखती हैं, उपहास नहीं।

गिल्लू मेरा परिवार की गिलहरी है, घीसा नहीं। भक्तिन स्मृति की रेखाएँ की नारी-रेखा है। रमा उसी संग्रह का दूसरा सेवक-स्वर है, निर्धारित घीसा है। नीहार प्रगीत है, यह गद्य है। गांधी स्वयं को कसौटी बनाते हैं; यहाँ दूसरा व्यक्ति रेखा है। वेगड़ नदी देखते हैं; यहाँ एक बालक देखा जाता है। रूप कथेतर है, नाटक नहीं, कहानी का प्लॉट नहीं। शिल्प स्मृति की सरल खड़ी बोली है। गुण गरिमा दिखाना है। सीमा केवल रूप-वर्णन हो जाना है।

निष्कर्ष यह है कि दो रेखाएँ दो संग्रह और दो आलंबन हैं; निर्धारित घीसा है, गिल्लू नहीं।

Q. 5 (8 marks) · Unit 5

मिश्र की ललित दृष्टि शुक्ल की परिभाषा से कैसे कटती है?

Or: आत्मनिर्भरता निर्धारित शीर्षक क्यों नहीं?

Model answer

मिश्र की ललित दृष्टि शुक्ल की परिभाषा से इसलिए कटती है कि विवेक गीत के निकट रहता है, चिंतामणि भाव काटती है। ललित निबंध वह गद्य है जिसमें विवेक गीत के निकट रहता है, रिपोर्ट के नहीं। तमाल के झरोखे से विद्यानिवास मिश्र का निर्धारित शीर्षक है। तमाल भारतीय स्मृति का वृक्ष-संकेत है — ब्रज और कृष्ण-काव्य से जुड़ा नाम। झरोखा देखने की मुद्रा है, सूची नहीं। संस्कृति, भाषा, ऋतु और स्मृति एक दृष्टि में बँधते हैं। प्रसंग भारतीय मन को भीतर से देखना। भाव — आधुनिकता स्मृति काट कर नहीं बनती। लेखक मिश्र, 1926–2005, काशी-केंद्र, पद्म भूषण 1999। शिल्प नरम खड़ी बोली है।

यह यात्रावृत्त नहीं — नर्मदा-पद नहीं गिनता, छिलगाँव-अमरकंटक का तट नहीं बाँधता। यह रेखाचित्र नहीं — घीसा जैसा एक सेवक नहीं खींचता। यह शुक्ल की परिभाषा-पंक्ति नहीं — श्रद्धा-भक्ति का काट यहाँ नहीं। भट्ट आह्वान करते हैं; द्विवेदी नाखून से पूछते हैं; मिश्र आँख देते हैं। छितवन की छाँह दूसरा संग्रह है। तुम चन्दन हम पानी अलग है। अंगद की नियति अलग है। वोल्गा से गंगा राहुल सांकृत्यायन हैं। बिना इन निषेधों के ललित केवल वृक्ष-नाम रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि ललित दृष्टि देखती है, चिंतामणि काटती है; दोनों निबंध हैं, चाल अलग है।

Or

आत्मनिर्भरता निर्धारित शीर्षक इसलिए नहीं कि भट्ट के दूसरे निबंध-स्वरों में वह गिना जाता है; पत्र मन की दृढ़ता माँगता है। मन की दृढ़ता बालकृष्ण भट्ट का निर्धारित निबंध है। नाम तराजू है। मन सोच है; दृढ़ता अटल संकल्प है। विषय चरित्र है, घटना नहीं। दुर्बल मन ज्ञान रखते हुए भी रुक जाता है। दृढ़ मन बाधा को काम बनाता है। प्रसंग भारतेंदु युग का सार्वजनिक नैतिक गद्य — व्यक्ति अपने को थामे, तभी समाज थमता है। भाव यह कि सफलता औजारों की भीड़ नहीं, इच्छा की एक लकीर है। रूप निबंध है, नाटक नहीं। भाषा खड़ी बोली। वाचक उपदेशक के निकट है। पत्र हिन्दी प्रदीप उनके गद्य-घर जैसा है।

साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है दूसरा निबंध-स्वर है। नूतन ब्रह्मचारी उपन्यास है। यह शुक्ल की श्रद्धा-भक्ति नहीं — वहाँ भाव कटते हैं, यहाँ आह्वान है। यह द्विवेदी का नाखून-प्रश्न नहीं। यह मिश्र की तमाल-दृष्टि नहीं। अंधेर नगरी कुशासन हँसती है; भट्ट मन को थामने को कहते हैं। गांधी सत्य को प्रयोग बनाते हैं; भट्ट संकल्प को चरित्र बनाते हैं। दोनों सार्वजनिक हैं; विधा अलग है।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित दृढ़ता है, आत्मनिर्भरता का पर्याय नहीं; नूतन ब्रह्मचारी उपन्यास है।

Section C

Q. 1 (20 marks) · Unit 1

एकांकी स्वतंत्र रूप कैसे है, नाटक का टुकड़ा नहीं?

Model answer

एकांकी स्वतंत्र रूप इसलिए है कि एक अंक, एक स्थिति, एक प्रभाव पूरा होता है; वह पूर्ण नाटक की कटी पूँछ नहीं। निर्धारित चार एकांकी हैं। वर्मा — एक तोला अफ़ीम की कीमत। अश्क — साहब को ज़ुकाम है। माथुर — मकड़ी का जाला। भारती — आवाज़ का नीलाम। साम्य रूप है — एक अंक, कम पात्र, सिमटा समय, एक संघर्ष, एक प्रभाव, खेला जाने वाला गद्य। साम्य युग मध्यवर्ग का आधुनिक नगर-मन है। साम्य व्यंग्य या नैतिक चोट है। कहानी नहीं, क्योंकि खेली जाती है। पूर्ण नाटक की कटी पूँछ नहीं। वर्मा इस रूप को हिन्दी में स्थिर करते हैं। ओझा एकांकी को सोपान मानते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग से नहीं काटते। रेडियो ने एकांकी को कान तक पहुँचाया; माथुर आकाशवाणी से जुड़े। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; ये चार उसी चिह्न के छोटे दृश्य-सिरे हैं।

वैषम्य आलंबन पर है। वर्मा मूल्य पूछते हैं — मुरारीलाल, सस्ती अफ़ीम, प्राण का दाम। अश्क तंत्र पूछते हैं — साहब की सर्दी, रुकी फाइलें। माथुर जाल पूछते हैं — स्वार्थ-मोह, बुनना और फँसना। भारती आवाज़ पूछते हैं — दिवाकर, बाजोरिया, बिकी अभिव्यक्ति, न लौटना। वैषम्य भीतर-बाहर पर भी है। अफ़ीम मन की निराशा है। जुकाम कार्यालय का अधिकार है। जाला संबंध का फँसना है। नीलाम प्रेस और पूँजी है। वर्मा मनोवैज्ञानिक एकांकी की ओर हैं। अश्क बोलचाल-तंत्र की ओर। माथुर प्रतीक की ओर। भारती स्वातंत्र्योत्तर नैतिक बेड़ी की ओर।

अंधेर नगरी का हाट सार्वजनिक तमाशा है; ये चार सिमटी स्थितियाँ हैं। कबीरा संत का चौक है; एकांकी वह चौक नहीं। कोणार्क माथुर का पूर्ण नाटक है; जाला एक स्थिति का नैतिक चित्र है। अंधायुग भारती का पद्य-नाटक है; नीलाम प्रेस-पूँजी की एकांकी है। अंतर विन्यास का है, केवल लंबाई का नहीं। एकांकी दूसरी कड़ी की लालसा नहीं पालती। चारों तत्त्व संक्षेप माँगते हैं — एक स्थिति, एक संघर्ष, कम चरित्र, प्रधान संवाद, बोध का उद्देश्य।

निषेध साथ लिखे जाते हैं। पृथ्वीराज की आँखें और रेशमी टाई वर्मा की दूसरी एकांकी हैं। अंजो दीदी अश्क का नाटक है। भोर का तारा माथुर का संग्रह-स्वर है। गुनाहों का देवता भारती का उपन्यास है। सीमा तुलना को शत्रु-युद्ध बना देना है। गुण चार स्वर को सोपान मानना है। दोष अलग हैं — उपदेश, सपाट साहब, अमूर्त जाला, एकआयामी सेठ। महत्त्व यह है कि हिन्दी एकांकी तमाशा से समस्या तक आई। पाठ प्रसंग-भाव है।

निष्कर्ष यह है कि एकांकी स्वतंत्र रूप इसलिए है कि एक प्रभाव पूरा होता है, दूसरे अंक की लालसा नहीं; कटी पूँछ नहीं। वर्मा स्थिर करते हैं, अश्क तंत्र देते हैं, माथुर प्रतीक देते हैं, भारती प्रेस देते हैं। कोणार्क और अंधायुग शिखर हैं, इस सूची में नहीं। अंधेर नगरी छह दृश्य का प्रहसन है, एकांकी नहीं।

Q. 2 (20 marks) · Unit 2

कबीरा में संत और संस्था कैसे टकराते हैं?

Model answer

कबीरा में संत और संस्था इसलिए टकराते हैं कि वचन चौक पर खड़ा है और पंडित-काजी का आयोजन पाखंड बन सकता है। साहनी का कबीर काशी का जुलाहा-संत है, ग्रंथावली का पद-संग्रह नहीं। नाटक कबीरा खड़ा बाजार में 1981 है। भीष्म साहनी जन्म 8 अगस्त 1915 रावलपिंडी, निधन 11 जुलाई 2003 दिल्ली। तमस 1973 उपन्यास अलग। माधवी और हानूश दूसरे नाटक हैं। जन्म की कथा ब्राह्मण विधवा से जुड़ी है। पालन नीरू-नीमा करते हैं। वह पंडित नहीं बनता, श्रम पर रहता है। वचन उसका कर्म है — जाति का घमंड, पूजा का शोर, हिंसा के बाद दया का उपदेश। शीर्षक प्रचलित दोहे से आता है — संत चौक पर खड़ा, लुकाठी हाथ में, आसक्ति जलाने का आह्वान। बिना चौक के संत केवल भक्त रह जाता। बिना संत के चौक केवल व्यापार रह जाता।

लोई पत्नी हैं। गृहस्थी और संत-पथ का द्वंद्व उनके पास है। वे छोड़ती हैं, लौटती भी हैं। बिना उनके कबीर केवल उपदेशक रह जाता। रैदास सत्संग के साथ हैं — गाना भी, प्रतिरोध भी। रामानंद गुरु-प्रभाव के रूप में छूते हैं; लंबा गुरु-प्रवाद केंद्र नहीं। नीरू-नीमा श्रम और पालन हैं। सपाट खल पंडित-काजी अधिक हैं; संत गोल है क्योंकि वह चोट भी खाता है, गाता भी है। अंधेर नगरी का गोवर्धन पेट है; यह कबीर वाणी है। ध्रुवस्वामिनी राज्य-प्रश्न है; लोई संत-गृहस्थ प्रश्न है।

संस्था से टकराव चरित्र खोलता है। हिन्दू और मुसलमान दोनों के आयोजन पाखंड बन सकते हैं। अखाड़ों का हिंसा-दृश्य काशी का दबाव है। कबीर निराकार भक्ति की ओर है। व्यापार बना धर्म चोट खाता है। यह तमस का दंगा-उपन्यास नहीं। सिकंदर लोदी से बात का दृश्य नाटक रखता है। इतिहास में भेंट विवादित है। काम यह है कि सत्ता संत को नापना चाहती है; संत उस तराजू पर नहीं बैठता। सीमा यह कि कुछ प्रहार कल्पना से तेज हैं। गुण यह कि संत मूर्ति नहीं, आधुनिक प्रश्न का पुरुष है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी कबीर को नाथ-योग और भक्ति की धारा से पढ़ते हैं; साहनी रंग पर सार्वजनिक पुरुष बनाते हैं। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, सत्संग का स्वर, हाट का दबाव। अंधायुग का योद्धा-नैतिक पुरुष यह नहीं। प्रसाद का इतिहास-पुरुष यह नहीं। राकेश का अधूरा पति यह नहीं। साहनी संवाद दोहे का पर्याय नहीं; प्रसंग गढ़ते हैं, भाव चौक का रखते हैं। पाठ प्रसंग-भाव है; लंबे उद्धरण नहीं।

निष्कर्ष यह है कि संत वचन है और संस्था पाखंड हो सकती है; टकराव चौक पर पूरा होता है, ग्रंथालय में नहीं। लोई, नीरू-नीमा, रैदास साथ की कड़ियाँ हैं। पंडित-काजी और सिकंदर-प्रसंग संस्था के तराजू हैं। नाटक 1981 का संत-प्रश्न है, तमस नहीं, अंधायुग नहीं, कबीर-काव्य नहीं।

Q. 3 (20 marks) · Unit 3

साहब की सर्दी तंत्र की अड़चन कैसे है?

Model answer

साहब की सर्दी तंत्र की अड़चन इसलिए है कि फाइलें रुकती हैं और अधिकार नाक पर टिकता है; अश्क का व्यंग्य पद का है। साहब को ज़ुकाम है उपेन्द्रनाथ अश्क की निर्धारित एकांकी है। अश्क जन्म 14 दिसंबर 1910 जलंधर, निधन 19 जनवरी 1996। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी। गिरती दीवारें उपन्यास-श्रृंखला। अंजो दीदी नाटक। कैद। छठा बेटा। निर्धारित पाठ कार्यालय-व्यंग्य है। भाषा बोलचाल। दृष्टि मध्यवर्ग, दांपत्य, तंत्र। प्रसाद की गरिमा नहीं रखते। राकेश के निकट बोलचाल में हैं; दांपत्य-शिखर आधे-अधूरे पर है, यह कार्यालय है। व्यंग्य शरीर पर नहीं, अधिकार पर है। देशकाल कार्यालय है। साहब सर्दी से ग्रस्त हैं, या सर्दी मुखौटा है। फाइलें रुकती हैं। अधीनस्थ प्रतीक्षा करते हैं। छोटा रोग बड़ा तंत्र बन जाता है। जुकाम बहाना भी है, लक्षण भी। प्रसंग — काम साहब की नाक पर टिका है।

यह वर्मा की अफ़ीम का भीतर का धक्का नहीं। मुरारीलाल मन से टूटता है; यहाँ तंत्र बाहर से ठहरता है। मकड़ी का जाला संबंध-स्वार्थ है; यह जुकाम पद का है। आवाज़ का नीलाम पूँजी और प्रेस है। चारों मध्यवर्ग छूते हैं; आलंबन अलग है। अंधेर नगरी का राजा शराब में है; यह साहब सर्दी में है। दोनों कुशासन के छोटे रूप हैं। शतक और विधा अलग हैं — 1881 प्रहसन, यह बीसवीं शताब्दी की एकांकी। चौपट राजा सार्वजनिक तमाशा है; साहब कार्यालय का दबाव है। कबीरा संत का चौक है; एकांकी वह चौक नहीं। संघर्ष एक है — काम बनाम साहब की अनुपस्थिति या बहाना। पात्र कम। स्थान कार्यालय। समय एक स्थिति जितना।

शिल्प संवाद का है, भाषण का नहीं। एक अंक, एक चोट। दोष दूसरी कड़ी की लालसा और कहानी जैसा वर्णन हैं। सीमा सपाट साहब हो जाना है। गुण यह कि छोटा जुकाम सार्वजनिक अड़चन बनकर याद रह जाता है। अंजो दीदी इस व्यंग्य का पर्याय नहीं। गिरती दीवारें उपन्यास हैं, एकांकी नहीं। तत्त्व संक्षेप माँगते हैं। कथावस्तु रुकी फाइलें हैं। चरित्र साहब और अधीनस्थ। कथोपकथन प्रधान। उद्देश्य व्यंग्य है, तमाशा नहीं। रेडियो ने एकांकी को कान तक पहुँचाया। ओझा एकांकी को सोपान कहते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग रखते हैं। बिना उदाहरण के तंत्र-व्यंग्य सूखा रहता है। उदाहरण यही जुकाम है।

अश्क मध्यवर्ग को रंग देते हैं, इतिहास-पुरुष को नहीं। स्कंदगुप्त यह पाठ नहीं। अंधायुग पद्य-नाटक है, यह गद्य-एकांकी है। भारतेंदु शासन को हाट पर हँसाते हैं; अश्क अधिकार को सर्दी पर हँसाते हैं। दोनों सार्वजनिक हैं; रूप अलग है। माथुर आकाशवाणी से जुड़े; अश्क बोलचाल से जुड़े। भारती प्रेस-पूँजी काटते हैं; अश्क फाइल काटते हैं। चार निर्धारित एकांकी चार स्वर हैं — मूल्य, साहब, जाल, नीलाम। मिलाए बिना इतिहास अधूरा है। पाठ प्रसंग-भाव है; लंबे संवाद नहीं उतारे जाते।

निष्कर्ष यह है कि सर्दी अड़चन इसलिए है कि काम व्यक्ति की नाक पर टिका है; रूप एकांकी है, अंजो दीदी नहीं। जुकाम बहाना भी है, लक्षण भी। अंजो दीदी अलग नाटक है। सत्ता की सर्दी फाइलें रोकती है, शरीर नहीं। अंधेर नगरी का राजा शराब में है; यह साहब सर्दी में है।

Q. 4 (20 marks) · Unit 4

नर्मदा-गद्य चित्र और जन को कैसे जोड़ता है?

Model answer

नर्मदा-गद्य चित्र और जन को इसलिए जोड़ता है कि वेगड़ तट पर रेखा खींचते हैं, फिर गद्य; सौंदर्य नदी का है, जन तट का। अमृतलाल वेगड़ का यात्रावृत्त नर्मदा का तट-गद्य है, आत्मकथा नहीं, रेखाचित्र नहीं। जन्म 3 अक्टूबर 1928 जबलपुर, निधन 6 जुलाई 2018। चित्रकार और यात्रा-लेखक। शांतिनिकेतन में कला। नर्मदा की पद-परिक्रमा दो बार याद की जाती है। तट पर रेखाएँ, फिर गद्य। पुस्तकें — सौंदर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा, तीरे-तीरे नर्मदा। साहित्य अकादमी और राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार नाम के साथ आते हैं। निर्धारित तीन मार्ग ऊपरी नर्मदा के हैं — छिलगाँव से अमरकंटक; अमरकंटक से डिंडोरी होते महाराजपुर; महाराजपुर से ग्वारीघाट। पूरा परिक्रमा-चक्र पत्र नहीं माँगता। चित्रकार रंग देखता है, केवल मील नहीं गिनता।

पहला मार्ग छिलगाँव से अमरकंटक जन्म देखता है। नदी पतली लकीर है। मैकल की हरियाली, तीर्थ की घंटी, वन का दबाव साथ चलते हैं। अमरकंटक उद्गम है — जल कम, महत्त्व अधिक। चित्रकार स्रोत को रेखा देता है। जन श्रम और श्रद्धा मिलाते हैं। मूल का सौंदर्य नाजुक है। यह ग्वारीघाट का बसा घाट नहीं। वोल्गा से गंगा बौद्ध-मार्ग का बड़ा आख्यान है; यह मुख का पहला कदम है। दूसरा मार्ग अमरकंटक से डिंडोरी होते महाराजपुर प्रवाह को चौड़ा करता है। डिंडोरी ऊपरी घाटी का पड़ाव है — वन, आदिवासी श्रम, छोटे घाट। महाराजपुर तक स्रोत से मैदान की ओर झुकाव है। रंग बदलते हैं — घना वन, फिर खुला तट। बाँध और कटाव आँख से आते हैं, नारे से नहीं।

तीसरा मार्ग महाराजपुर से ग्वारीघाट नदी को नगर के घाट पर उतारता है। जबलपुर के निकट नर्मदा बस्ती से मिलती है। नाव, स्नान, मेला, शहर की ध्वनि — सौंदर्य अब एकांत वन का नहीं। वेगड़ का जन्म जबलपुर से जुड़ा है। चित्रकार घाट की रेखा खींचता है, पर्यटन-सूची नहीं बाँटता। जन घने हैं; दबाव भी — कचरा, भीड़, फिर भी श्रद्धा का पानी। पारिस्थितिकी चोट दिखाई देती है — विस्थापन, धारा का बदलना। प्रसंग चलना, देखना, स्केच, फिर लिखना। भाव — नदी पूजा की वस्तु ही नहीं, जीवित प्रवाह है। तीनों एक यात्रावृत्त के सोपान हैं, तीन पुस्तकें नहीं।

यह गांधी का भीतर का प्रयोग नहीं। यह घीसा की एक रेखा नहीं। यह पाती का सम्बोधन नहीं। राहुल सांकृत्यायन वोल्गा से गंगा के यायावर हैं; यह मध्य प्रदेश की नदी का तट-गद्य है। काका कालेलकर अलग स्वर हैं। शिल्प चलता वर्तमान है। पात्र-नाम गढ़कर संवाद नहीं उतारे जाते। प्रसंग-भाव पर्याप्त है। सीमा अंश है, पूरा चक्र नहीं। गुण तीन नाम याद रह जाना है। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; यह चिह्न यहाँ चलती नदी बनता है। अंधेर नगरी हँसकर शासन काटती है; वेगड़ देखकर तट लिखते हैं।

निष्कर्ष यह है कि चित्र रंग देखता है और जन तट देता है; रूप यात्रावृत्त है, वोल्गा-आख्यान नहीं। छिलगाँव से अमरकंटक जन्म है। अमरकंटक से डिंडोरी से महाराजपुर प्रवाह है। महाराजपुर से ग्वारीघाट नगर-घाट है। बाँध आँख से आता है, नारे से नहीं। पूरा चक्र पत्र नहीं माँगता।

Q. 5 (20 marks) · Unit 5

श्रद्धा और भक्ति का योग आधुनिक गद्य को क्या औजार देता है?

Model answer

श्रद्धा और भक्ति का योग आधुनिक गद्य को वह औजार देता है जिससे पूजा और सम्मान एक ढेर नहीं रह जाते; शुक्ल काट कर जोड़ते हैं। श्रद्धा और भक्ति आचार्य रामचंद्र शुक्ल का निर्धारित निबंध है, भक्तिकाव्य नहीं, इतिहास-ग्रंथ नहीं। जन्म 4 अक्टूबर 1884 आगोना — बस्ती, निधन 2 फरवरी 1941 काशी। हिन्दी साहित्य का इतिहास 1928–29 नागरीप्रचारिणी सभा का प्रवृत्ति-ग्रंथ है, यह पाठ नहीं। संग्रह चिंतामणि। निर्धारित निबंध मनोविकार-शृंखला का है। कविता क्या है अलग निबंध है। शुक्ल निबंध को व्यक्ति-व्यंजक गद्य कहते हैं — निजी विवेक, केवल सूचना नहीं। गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं। वे शास्त्र बाँधते हैं, केवल आह्वान नहीं। सीमा कठोर वर्गीकरण है। गुण यह कि भावों को परिभाषा मिली। बिना चिंतामणि के आधुनिक निबंध का विवेक अधूरा है।

श्रद्धा श्रेष्ठ गुण की स्वीकृति है, कर्म और महत्ता पर। प्रेम व्यक्ति पर बैठता है, एकान्तिक होता है। भक्ति दोनों का योग है। सूत्र — श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है। श्रद्धा महापुरुष और आदर्श की ओर खुलती है। भक्ति समर्पण माँगती है। प्रसंग मनोविकार का विवेक है, भक्तिकाल का इतिहास नहीं। दो शब्द एक नहीं; बिना काटे पूजा और सम्मान ढेर लगते हैं। यह तुलसी का विनय नहीं, सूर का माधुर्य नहीं। निबंध उन काव्यों का औजार हो सकता है; स्वयं पद नहीं है। चिंतामणि संग्रह है, इतिहास-ग्रंथ नहीं।

यह भट्ट का संकल्प-आह्वान नहीं। यह द्विवेदी का नाखून-प्रश्न नहीं। यह मिश्र की तमाल-दृष्टि नहीं। शिल्प परिभाषा और भेद का गद्य है। दोष सूखी गिनती। गुण भावों को औजार देना। व्यक्ति-व्यंजकता विवेक है, पूरी आत्मकथा नहीं। गांधी सत्य को प्रयोग बनाते हैं; शुक्ल भाव को काटते हैं। अंधेर नगरी हँसकर शासन काटती है; शुक्ल श्रद्धा और प्रेम काटते हैं। कबीरा संत का चौक है; यह मनोविकार है, पद-संग्रह नहीं। तत्त्व — सीमित विषय, विवेक, भेद का क्रम, शास्त्र-गद्य, उद्देश्य काट।

निषेध साथ हैं। कविता क्या है अलग है। हिन्दी साहित्य का इतिहास प्रवृत्ति-ग्रंथ है। नूतन ब्रह्मचारी उपन्यास है। अनामदास का पोथा द्विवेदी का उपन्यास है। बिना निषेध के नाम ढेर लगते हैं। महत्त्व यह है कि भावों को परिभाषा मिली, पूजा और सम्मान एक ढेर नहीं रहे। सीमा चार शीर्षक हैं, पूरा चिंतामणि नहीं। शुक्ल व्यक्ति-व्यंजकता को प्राण कहते हैं; भट्ट में वह आह्वान बनती है, मिश्र में रंग, यहाँ काट। पाठ प्रसंग-भाव है। निबंध पद नहीं, औजार है।

निष्कर्ष यह है कि योग औजार इसलिए देता है कि श्रद्धा और भक्ति एक शब्द नहीं रह जाते; रूप चिंतामणि का निबंध है, इतिहास नहीं। श्रद्धा कर्म पर है, प्रेम व्यक्ति पर है, भक्ति दोनों का योग है। भट्ट थामते हैं, द्विवेदी पूछते हैं, मिश्र देखते हैं; शुक्ल काटते हैं। निबंध पद नहीं, औजार है।

सेट 3

सेट 3 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। प्रश्न सेट 1–2 से भिन्न हैं। खंड अ अनिवार्य। खंड ब आंतरिक विकल्प सहित पाँचों। खंड स में कोई तीन।

Section A

Q. 1. स्कंदगुप्त किस नाटककार की कृति है?

1928। ध्रुवस्वामिनी 1933। आकाशदीप कहानी है।

Q. 2. चौपट राजा किस नाटक का शासक है?

1881; प्रहसन। गोवर्धन लोभ का दृष्टांत है।

Q. 3. आकाशवाणी से जुड़े निर्धारित एकांकीकार हैं —

1917–1978, खुर्जा। कोणार्क पूर्ण नाटक अलग है।

Q. 4. निराला की साहित्य साधना मुख्यतः क्या है?

शर्मा; साहित्य अकादमी। निर्धारित पाती है।

Q. 5. नूतन ब्रह्मचारी क्या है?

सौ अजान एक सुजान भी कथा है। निर्धारित मन की दृढ़ता निबंध है।

Q. 6. दशरथ ओझा हिन्दी _____ का इतिहास लिखते हैं।

Answer: नाटक — नेमिचंद्र जैन रंग-परंपरा बाँधते हैं।

Q. 7. कबीर की पत्नी का नाटक-नाम _____ है।

Answer: लोई — नीरू-नीमा पालन हैं। तमस अलग कृति है।

Q. 8. सेठ बाजोरिया _____ एकांकी का पात्र है।

Answer: आवाज़ का नीलाम — भारती। दिवाकर बेचता है, सेठ नहीं लौटाता।

Q. 9. नवजीवन में आत्मकथा _____ ई. से धारावाहिक छपी।

Answer: 1925 — 29 नवंबर 1925 से 3 फरवरी 1929। हिन्द स्वराज 1909।

Q. 10. शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास _____ ई. के आसपास है।

Answer: 1929 — नागरीप्रचारिणी सभा। चिंतामणि निबंध-संग्रह है।

Section B

Q. 1 (8 marks) · Unit 1

शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न क्यों कहते हैं?

Or: अंधायुग को अंधेर नगरी क्यों नहीं मिलाया जाता?

Model answer

शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न इसलिए कहते हैं कि नया विचार उसी माध्यम में स्थिर होता है; नाटक उसी चिह्न का दृश्य रूप है। हिन्दी नाटक का उद्भव आधुनिक गद्य के साथ है, यद्यपि शास्त्र पुराना है। भरत के नाट्यशास्त्र में नाट्य अनुकृति है। भास, कालिदास, शूद्रक, भवभूति संस्कृत के शिखर हैं। मध्य काल में रामलीला, रास और स्वांग लोक में बचे। उन्नीसवीं शताब्दी में पारसी थियेटर तमाशा, गीत और हिन्दुस्तानी संवाद लाता है। आगा हश्र कश्मीरी उसी धारा के नाम हैं। उद्भव एक तिथि नहीं; अर्थ यह है कि खड़ी बोली गद्य ने दृश्य-कथा अपनाई। भारतेंदु से पहले अनुवाद और रूपांतर हैं।

उद्भव भारतेंदु युग से पहचाना जाता है। जन्म 9 सितंबर 1850, निधन 6 जनवरी 1885, काशी। भारत दुर्दशा देश-करुण है। अंधेर नगरी 1881 सार्वजनिक व्यंग्य-प्रहसन है। नीलदेवी ऐतिहासिक स्त्री-केंद्र छूती है। मंडल में प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, बालकृष्ण भट्ट नाटक-निबंध छूते हैं। पारसी दर्शक देता है; भारतेंदु प्रश्न देते हैं। बिना भरत के परिभाषा अधूरी है। बिना भारतेंदु के साहित्य-नाटक नहीं खुलता। दशरथ ओझा इसी क्रम को इतिहास बनाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि शुक्ल गद्य को आधुनिक इसलिए कहते हैं कि नया विचार उसी माध्यम में स्थिर होता है; नाटक उसी चिह्न का दृश्य रूप है।

Or

अंधायुग को अंधेर नगरी इसलिए नहीं मिलाया जाता कि एक 1955 का पद्य-नाटक है — कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा — दूसरा 1881 का प्रहसन। अंधेर नगरी भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रहसन है, 1881। काशी के हिंदू नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में लिखा गया कहा जाता है। पूर्ण शीर्षक प्रायः अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा कहा जाता है। नाम अँधेरे शासन का है, किसी एक भूगोल का नहीं। चौपट राजा नाम ही बिखरे न्याय का संकेत है — शासन बिखरा, निर्णय उलटा। सूत्र-वाक्य मूल्य का समीकरण है। सब्जी और मिठाई एक दाम। अर्थ यह कि विवेक का तराजू टूटा है।

अंधायुग धर्मवीर भारती का पद्य-नाटक है, 1955, कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा। अँधेरा-साम्य नाम का भ्रम है; शतक, रूप और प्रश्न अलग हैं। एक कुशासन पर हँसता है, दूसरा युद्ध के बाद की नैतिक राख पूछता है। लक्ष्य कुशासन है, नगर-नाम कथामात्र है। जातवाला जाति बेचता है — व्यंग्य केवल राजा पर नहीं। ओझा इसे लोकप्रिय व्यंग्य मानते हैं। बिना सूत्र-वाक्य के नाम केवल अँधेरे का विशेषण रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि एक पद्य-युद्ध के बाद का अँधेरा है, दूसरा हाट का कुशासन है; मिलाए नहीं जाते।

Q. 2 (8 marks) · Unit 2

महंत का दोहा कुदेश कैसे पहचानता है?

Or: नीरू-नीमा पालन क्यों हैं, पंडित-कुल नहीं?

Model answer

महंत का दोहा कुदेश इसलिए पहचानता है कि जहाँ कपूर और कपास एक भाव हों, गुणी-अवगुणी एक दाम हों, वहाँ बास न किया जाए। महंत गोवर्धन दास और नारायण दास के गुरु हैं। पहले दृश्य में वे लोभ से सावधान करते हैं। तीसरे दृश्य में कुदेश पहचानते हैं — जहाँ कपूर और कपास एक भाव हों, गुणी-अवगुणी एक दाम हों, उस देश में बास न किया जाए। नारायण मानता है, नगर छोड़ता है। गोवर्धन नहीं मानता, मिठाई में ठहरता है। गुरु विवेक हैं, एक शिष्य संतोष, दूसरा स्वाद। बिना इस काट के कथा केवल हाट की पुकार रह जाती। छठे दृश्य में महंत श्मशान आते हैं। कान में मंत्र देते हैं। गुरु-शिष्य फाँसी की उतावली दिखाते हैं।

महत्त्व विवेक और अंतिम चाल दोनों का है। बिना गुरु के शिष्य केवल पेट रह जाता। बिना अंत के चेतावनी उपदेश रह जाती। वे नायक नहीं, सूत्रधार-समीप हैं। रूप प्रहसन है, इसलिए गुरु भी तमाशा चलाते हैं, केवल प्रवचन नहीं। सीमा यह कि समाधान आसान लग सकता है; गुण यह कि विवेक कथा को मोड़ता है।

निष्कर्ष यह है कि दोहा कुदेश इसलिए पहचानता है कि एक भाव विवेक की मृत्यु है; कुदेश भूगोल नहीं, मूल्यहीन शासन है।

Or

नीरू-नीमा पालन इसलिए हैं कि कबीर जुलाहा रहता है, पंडित-कुल नहीं बनता; श्रम गरिमा है, जाति का घमंड नहीं। साहनी का कबीर काशी का जुलाहा-संत है, ग्रंथावली का पद-संग्रह नहीं। नाटक कबीरा खड़ा बाजार में 1981 है। भीष्म साहनी जन्म 8 अगस्त 1915 रावलपिंडी, निधन 11 जुलाई 2003 दिल्ली। तमस 1973 उपन्यास अलग। माधवी और हानूश दूसरे नाटक हैं। जन्म की कथा ब्राह्मण विधवा से जुड़ी है। पालन नीरू-नीमा करते हैं। वह पंडित नहीं बनता, श्रम पर रहता है। वचन उसका कर्म है — जाति का घमंड, पूजा का शोर, हिंसा के बाद दया का उपदेश।

लोई पत्नी हैं। गृहस्थी और संत-पथ का द्वंद्व उनके पास है। वे छोड़ती हैं, लौटती भी हैं। बिना उनके कबीर केवल उपदेशक रह जाता। रैदास सत्संग के साथ हैं — गाना भी, प्रतिरोध भी। रामानंद गुरु-प्रभाव के रूप में छूते हैं; लंबा गुरु-प्रवाद केंद्र नहीं। नीरू-नीमा श्रम और पालन हैं। सपाट खल पंडित-काजी अधिक हैं; संत गोल है क्योंकि वह चोट भी खाता है, गाता भी है। अंधेर नगरी का गोवर्धन पेट है; यह कबीर वाणी है। ध्रुवस्वामिनी राज्य-प्रश्न है; लोई संत-गृहस्थ प्रश्न है।

निष्कर्ष यह है कि नीरू-नीमा पालन इसलिए हैं कि संत वचन जुलाहा-बस्ती से उठता है, कुल-अभिमान से नहीं।

Q. 3 (8 marks) · Unit 3

रेशमी टाई निर्धारित पाठ क्यों नहीं?

Or: कोणार्क मकड़ी का जाला क्यों नहीं?

Model answer

रेशमी टाई निर्धारित पाठ इसलिए नहीं कि वह वर्मा की सामाजिक-व्यंग्य एकांकी है, 1941 संग्रह-संकेत; पत्र अफ़ीम-पाठ माँगता है। रामकुमार वर्मा का जन्म 15 सितंबर 1905 सागर, निधन 1990। प्रयाग विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्यापन। पद्म भूषण 1963। आलोचना उन्हें हिन्दी एकांकी का केंद्र-नाम कहती है; जनक कहना विवाद रखता है, क्योंकि भुवनेश्वर का प्रयोग साथ है। ऐतिहासिक एकांकी पृथ्वीराज की आँखें, 1938 संग्रह। सामाजिक-व्यंग्य रेशमी टाई, 1941 संग्रह। निर्धारित पाठ एक तोला अफ़ीम की कीमत है — मूल्य और निराशा का व्यंग्य, नायक मुरारीलाल। कविता में छाया-रहस्य का स्पर्श है; एकांकी गद्य-दृश्य है। शिल्प एक स्थिति पर कसा है। संवाद नैतिक प्रश्न खोलते हैं, भाषण नहीं बनने चाहिए।

सीमा उपदेश का बोझ और नैतिक अंगुली है। गुण एक चोट और मध्यवर्ग का चित्र है। मुरारीलाल आर्थिक अभाव में प्राण सस्ता नापता है; असफल प्रयत्न बोध बनता है। रेशमी टाई दिखावा है, निर्धारित नहीं। पृथ्वीराज की आँखें ऐतिहासिक हैं, निर्धारित नहीं। अंधायुग पद्य-नाटक है, यह गद्य-एकांकी नहीं। कोणार्क पूर्ण नाटक है। ओझा एकांकी को सोपान कहते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग से नहीं काटते। बिना अफ़ीम-उदाहरण के केंद्र-नाम सूखा रहता है।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित अफ़ीम-पाठ है, रेशमी टाई का पर्याय नहीं; पृथ्वीराज की आँखें भी अलग संग्रह हैं।

Or

कोणार्क मकड़ी का जाला इसलिए नहीं कि कोणार्क 1951 पूर्ण नाटक है — मंदिर, शिल्पी, व्यवस्था; जाला एकांकी है, एक चोट। जगदीश चंद्र माथुर का जन्म 16 जुलाई 1917 खुर्जा, निधन 14 मई 1978। आईसीएस। आकाशवाणी के महासंचालक; रेडियो का नाम आकाशवाणी इन्हीं के समय जुड़ा। रंग-शिल्प और लोक-नाट्य पर लेखन — परंपराशील नाट्य। एकांकी भोर का तारा, ओ मेरे सपने। पूर्ण नाटक कोणार्क 1951 — शिल्पी, मंदिर, व्यवस्था; निर्धारित नहीं। निर्धारित एकांकी मकड़ी का जाला है। शैली मँजी, संवाद वातावरण के अनुकूल। मध्यवर्ग पर परिवर्तन का दबाव। प्रतीक कोणार्क में शिल्प है; जाला स्वार्थ का है। दोनों माथुर हैं; विधा अलग है।

रेडियो ने एकांकी को कान तक पहुँचाया; माथुर उसी संक्षेप के व्यावहारिक बोध से जुड़े। भोर का तारा भावुकता छूता है; निर्धारित पाठ जाल की चोट है। अंधायुग भारती का पद्य-नाटक है, यह गद्य-एकांकी नहीं। अंधेर नगरी का हाट सार्वजनिक तमाशा है; जाला सिमटी स्थिति है। सीमा प्रतीक का अमूर्त हो जाना है। गुण याद रहने वाला शीर्षक और मँजी शैली है। बिना कोणार्क-अंतर के परिचय अधूरा रहता है। ओझा एकांकी को सोपान कहते हैं।

निष्कर्ष यह है कि कोणार्क पूर्ण नाटक है, जाला एकांकी है; मिलाए नहीं जाते। निर्धारित पाठ जाला है।

Q. 4 (8 marks) · Unit 4

प्रयोग शीर्षक में सत्य कैसे बैठता है?

Or: पाती निराला-ग्रंथ से कैसे कटती है?

Model answer

प्रयोग शीर्षक में सत्य इसलिए बैठता है कि सत्य सिद्धांत नहीं, अभ्यास है; आहार, भय, ब्रह्मचर्य, रंग-भेद जीवन कसौटी हैं। सत्य के साथ मेरे प्रयोग आत्मकथा का नाम तराजू है। सत्य सिद्धांत नहीं, प्रयोग है। मेरे प्रयोग — व्यक्ति अपना जीवन कसौटी बनाता है। आहार, भय, ब्रह्मचर्य, रंग-भेद, अहिंसा अभ्यास हैं। मूल गुजराती। नवजीवन 1925–1929। हिन्दी साथ-साथ। वाचक उत्तम पुरुष। प्रसंग बचपन का डर, लंदन की परीक्षा, दक्षिण अफ्रीका का अपमान। भाव — नैतिकता भाषण नहीं, रोज़ का काम है। दोष आत्म-प्रशंसा हो जाना है; गांधी उलटा करते हैं — कमजोरी लिखते हैं। गुण यह कि पाठक प्रयोग दोहरा सकता है, केवल पूजा नहीं करता।

निर्धारित पाँच शीर्षक वही विधि हैं। सभ्य पोशाक में लंदन का वेश-लोभ है। बलवान से भिड़न्त जोहानिसबर्ग के एशियाई अधिकारियों से है। आत्मिक शिक्षा टॉल्स्टॉय फार्म का चरित्र है। शांति निकेतन 1915 का श्रम-सहयोग है। खादी का जन्म आश्रम-करघा है। हिन्द स्वराज 1909 स्वराज का तर्क है, आत्मकथा नहीं। नेहरू की आत्मकथा अलग है। शर्मा की पाती भाई-सम्बोधन है, यह सार्वजनिक प्रयोग है। रूप कथेतर है, नाटक नहीं।

निष्कर्ष यह है कि सत्य शीर्षक में इसलिए बैठता है कि नैतिकता रोज़ का काम बनती है; कृति आत्मकथा है, हिन्द स्वराज नहीं।

Or

पाती निराला-ग्रंथ से इसलिए कटती है कि पत्र-रूप आत्मकथांश सम्बोधन है; निराला की साहित्य साधना शिखर-आलोचना है। भैया के नाम पाती रामविलास शर्मा का पत्र-रूप आत्मकथांश है। पाती पत्र है। भैया सम्बोधन है। वाचक भाई से बात करता है, सभा से नहीं। आत्मीयता विचार को नरम रखती है, कमजोर नहीं। प्रसंग स्मृति का सीधा पत्र — बचपन, गाँव, परिवार, पढ़ाई की ओर बढ़ता मन। भाव — आलोचक भी भाई के सामने मनुष्य रहता है। भाई का निजी नाम गढ़ा नहीं जाता। शिल्प सरल गद्य, उत्तम पुरुष, सम्बोधन। देशकाल बैसवाड़ा-उन्नाव है। उद्देश्य मनुष्य दिखाना है, केवल आलोचक नहीं। निराला की साहित्य साधना शिखर-ग्रंथ है, यह पाठ नहीं।

मित्र संवाद केदारनाथ अग्रवाल से पत्र हैं; निर्धारित शीर्षक पाती है। परम्परा का मूल्यांकन अलग निबंध है। गांधी सत्य के साथ मेरे प्रयोग में सार्वजनिक कसौटी बनाते हैं; यहाँ सम्बोधन स्मृति पहुँचाता है। घीसा दूसरे को रेखा देती है; पाती भाई को सम्बोधित करती है। वेगड़ तट लिखते हैं, यह नदी नहीं। अंधेर नगरी हँसकर शासन काटती है; यह कथन से बोलती है। रूप कथेतर है, नाटक नहीं, आलोचना-ग्रंथ नहीं।

निष्कर्ष यह है कि पाती सम्बोधन की स्मृति है, निराला-ग्रंथ नहीं; मित्र संवाद दूसरा पत्र-संसार है।

Q. 5 (8 marks) · Unit 5

तमाल स्मृति का संकेत कैसे है?

Or: कुटज निर्धारित नाखून क्यों नहीं?

Model answer

तमाल स्मृति का संकेत इसलिए है कि वृक्ष-नाम ब्रज और कृष्ण-काव्य से जुड़ा है; झरोखा देखने की मुद्रा है, सूची नहीं। ललित निबंध वह गद्य है जिसमें विवेक गीत के निकट रहता है, रिपोर्ट के नहीं। तमाल के झरोखे से विद्यानिवास मिश्र का निर्धारित शीर्षक है। तमाल भारतीय स्मृति का वृक्ष-संकेत है — ब्रज और कृष्ण-काव्य से जुड़ा नाम। झरोखा देखने की मुद्रा है, सूची नहीं। संस्कृति, भाषा, ऋतु और स्मृति एक दृष्टि में बँधते हैं। प्रसंग भारतीय मन को भीतर से देखना। भाव — आधुनिकता स्मृति काट कर नहीं बनती। लेखक मिश्र, 1926–2005, काशी-केंद्र, पद्म भूषण 1999।

यह यात्रावृत्त नहीं — नर्मदा-पद नहीं गिनता, छिलगाँव-अमरकंटक का तट नहीं बाँधता। यह रेखाचित्र नहीं — घीसा जैसा एक सेवक नहीं खींचता। यह शुक्ल की परिभाषा-पंक्ति नहीं — श्रद्धा-भक्ति का काट यहाँ नहीं। भट्ट आह्वान करते हैं; द्विवेदी नाखून से पूछते हैं; मिश्र आँख देते हैं। छितवन की छाँह दूसरा संग्रह है। तुम चन्दन हम पानी अलग है। अंगद की नियति अलग है। वोल्गा से गंगा राहुल सांकृत्यायन हैं। बिना इन निषेधों के ललित केवल वृक्ष-नाम रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि तमाल संकेत इसलिए है कि दृष्टि स्मृति से देखती है, मील नहीं गिनती। यह नर्मदा-पद नहीं।

Or

कुटज निर्धारित नाखून इसलिए नहीं कि कुटज द्विवेदी का दूसरा निबंध-स्वर है; पत्र नाखून क्यों बढ़ते हैं माँगता है, अशोक के फूल से। नाखून क्यों बढ़ते हैं हजारीप्रसाद द्विवेदी का निर्धारित निबंध है। शीर्षक प्रश्न है, उत्तर तालिका नहीं। नाखून पशु-रक्षा के अवशेष माने जाते हैं। काटना संस्कृति का काम है। फिर बढ़ना याद दिलाता है कि मनुष्यता पूरी नहीं हुई। प्रसंग सभ्यता और पशुता का द्वंद्व, एक छोटे अंग से। भाव — संस्कृति अभ्यास है, जन्म-सिद्ध मुकुट नहीं। रूप निबंध है, कहानी नहीं, जीव-विज्ञान नहीं। संग्रह अशोक के फूल। भाषा प्रश्न से विचार खोलती है। दोष शास्त्र-भ्रम बन जाना है। गुण छोटे अंग से बड़ा द्वंद्व है।

कुटज दूसरा निबंध है। आलोक पर्व अकादमी-संग्रह है। अनामदास का पोथा उपन्यास है। बाणभट्ट की आत्मकथा अलग है। महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के आचार्य हैं, यह लेखक नहीं। भट्ट संकल्प माँगते हैं; शुक्ल भाव काटते हैं; मिश्र देखते हैं; द्विवेदी पूछते हैं। घीसा रेखाचित्र है; यह प्रश्न-निबंध है। गांधी सत्य को प्रयोग बनाते हैं; यह संस्कृति को प्रश्न बनाता है। कभी इसे कहानी समझ लिया जाता है; रूप निबंध है।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित नाखून है, कुटज का पर्याय नहीं; आलोक पर्व अकादमी-संग्रह है, पोथा उपन्यास है।

Section C

Q. 1 (20 marks) · Unit 1

भारतेंदु मंडल नाटक और निबंध दोनों कैसे छूता है?

Model answer

भारतेंदु मंडल नाटक और निबंध दोनों इसलिए छूता है कि काशी-केंद्रित लेखक दृश्य भी देते हैं, विचार भी; भारतेंदु सीमा-पुरुष हैं, भट्ट प्रदीप के। साम्य पहले लिखा जाता है। दोनों काशी के लेखक हैं — भारतेंदु 9 सितंबर 1850 से 6 जनवरी 1885, प्रसाद 30 जनवरी 1889 से 15 जनवरी 1937। दोनों खड़ी बोली गद्य को नाटक देते हैं। दोनों आधुनिक मनुष्य का प्रश्न सार्वजनिक करते हैं। शुक्ल के गद्य-चिह्न पर दोनों खड़े हैं। निर्धारित कृति भारतेंदु की अंधेर नगरी है; प्रसाद के स्कंदगुप्त-ध्रुवस्वामिनी युग के शिखर-नाम हैं। दोनों रंगमंच माँगते हैं। दोनों पारसी तमाशे से कटकर साहित्य-नाटक बनाते हैं। दशरथ ओझा दोनों को इतिहास की सीढ़ी पर रखते हैं। नेमिचंद्र जैन दोनों को रंग से काटते नहीं।

भारतेंदु व्यंग्य और सुधार के नाटककार हैं। अंधेर नगरी 1881 प्रहसन है, छह दृश्य। लक्ष्य कुशासन, पाखंड, उलटा न्याय। सूत्र टके सेर भाजी, टके सेर खाजा। संवाद लोक-लय का है। भारत दुर्दशा देश-करुण है, अंधेर नगरी हँसती है। सीमा शीघ्रता और सपाट राजा है। गुण सार्वजनिक हँसी-चोट है। प्रसाद काव्य-ऐतिहासिक नाटककार हैं। स्कंदगुप्त 1928, चंद्रगुप्त 1931, ध्रुवस्वामिनी 1933। संवाद काव्य-गर्भ का है। संघर्ष भीतर और राज्य दोनों पर है। नारी आलंबन से निर्णय की ओर बढ़ती है। आकाशदीप कहानी है, नाटक नहीं। सीमा दुरुहता और रंग-कठिनाई है। गुण गरिमा और द्वंद्व है।

बालकृष्ण भट्ट का जन्म 23 जून 1844 प्रयाग, निधन 20 जुलाई 1914। भारतेंदु मंडल के गद्य-पुरुष। पत्र हिन्दी प्रदीप — 1877 के आसपास आरंभ, वर्षों चला। निबंधकार और पत्रकार। उपन्यास नूतन ब्रह्मचारी, सौ अजान एक सुजान — कथा हैं, निर्धारित नहीं। निर्धारित मन की दृढ़ता निबंध है। भाषा खड़ी बोली। स्वर सार्वजनिक सुधार और चरित्र का। दृष्टि संकल्प को जाति के काम से जोड़ती है। भारतेंदु नाटक देते हैं; भट्ट निबंध देते हैं। मंडल एक है; विधा अलग है। सीमा शीघ्रता और उपदेश का आक्षेप है। गुण यह कि हिन्दी निबंध को सार्वजनिक चरित्र मिला। शुक्ल मनोविकार बाँधते हैं; भट्ट आह्वान करते हैं। द्विवेदी संस्कृति पूछते हैं; मिश्र देखते हैं। साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है दूसरा निबंध-स्वर है, निर्धारित दृढ़ता नहीं।

बाद के नाम तुलना को चौड़ा करते हैं, मिलाते नहीं। राकेश बोलचाल से दोनों से कटते हैं — आधे-अधूरे 1969। भारती अंधायुग 1955 से पद्य जोड़ते हैं; अंधेर नगरी से नाम-साम्य मात्र है। साहनी संत-बाजार से भारतेंदु के लोक-व्यंग्य के निकट भी हैं, प्रसाद की गरिमा से दूर भी। सीमा यह कि तुलना दो पुरुषों को शत्रु बना दे। गुण यह कि व्यंग्य और काव्य-इतिहास दो सिरे याद रह जाते हैं। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; एक चिह्न पर दो चालें हैं — हाट की पुकार और काव्य-संवाद।

निष्कर्ष यह है कि मंडल नाटक से हाट पर बोलता है और निबंध से संकल्प माँगता है; दोनों आधुनिक गद्य के आरंभ हैं, एक विधा नहीं। अंधेर नगरी 1881 व्यंग्य है। मन की दृढ़ता निबंध है, नूतन ब्रह्मचारी उपन्यास है। प्रसाद बाद के इतिहास-काव्य हैं, मंडल के नहीं। अंधायुग मंडल का नहीं।

Q. 2 (20 marks) · Unit 2

दो निर्धारित नाटक सार्वजनिक चौक पर कैसे बोलते हैं?

Model answer

दो निर्धारित नाटक सार्वजनिक चौक पर इसलिए बोलते हैं कि अंधेर नगरी हाट को तराजू बनाती है और कबीरा वचन को चौक पर खड़ा करता है। दोनों निर्धारित नाटक हैं। दोनों काशी से छूते हैं — भारतेंदु काशी के लेखक, कबीर काशी के संत। दोनों हाट-चौक को तराजू बनाते हैं। दोनों पाखंड पर सार्वजनिक चोट करते हैं। दोनों खेले जाने के लिए लिखे गए। शुक्ल के गद्य-चिह्न पर दोनों दृश्य-गद्य हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र 1850–1885। भीष्म साहनी 1915–2003। एक भारतेंदु युग का व्यंग्य है। दूसरा स्वातंत्र्योत्तर इतिहास-पुनर्पाठ है। दशरथ ओझा दोनों को इतिहास की अलग सीढ़ी पर रखते हैं। नेमिचंद्र जैन दोनों को रंग से काटते नहीं। साम्य सार्वजनिक चौक और पाखंड-चोट पर है। अंतर शतक, रूप और शिकार पर है। बिना साम्य के वैषम्य शत्रु-युद्ध लगते हैं।

अंधेर नगरी 1881 प्रहसन है। छह दृश्य। गोवर्धन का लोभ, टका-सेर, जातवाला, चौपट राजा, बकरी से कोतवाल तक फाँसी, फंदा-नाप, महंत का मंत्र, राजा स्वयं फाँसी। हँसी कड़वी है। रस हास्य-व्यंग्य है। भारत दुर्दशा करुण है, यह व्यंग्य है। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 है। जुलाहा-संत, नीरू-नीमा पालन, लोई का गृहस्थ-द्वंद्व, रैदास सत्संग, पंडित-काजी, अखाड़ा, चौक-प्रश्न, सिकंदर-प्रसंग। हँसी प्रधान नहीं, प्रश्न प्रधान है। रूप इतिहास-पुनर्पाठ है। भाषा बोलचाल और सत्संग की है, हाट की पुकार नहीं। एक का अंत उलटा तर्क है। दूसरे का अंत वचन का खड़ा रहना है।

वैषम्य शिकार पर है। एक में पेट और मूर्ख शासन। दूसरे में वाणी और पंथ-संस्था। एक का नायक नहीं, लोभी शिष्य दृष्टांत है। दूसरे का नायक संत है। एक सपाट खल रखता है। दूसरा गोल संत रखता है — चोट भी खाता है, गाता भी है। एक वर्तमान कुशासन का तमाशा तोड़ता है। दूसरा अतीत के संत को आधुनिक प्रश्न बनाता है। आलोचना अंधेर नगरी को औपनिवेशिक और देशी दोनों कुशासनों पर चोट पढ़ती है। कबीरा में सिकंदर-भेंट इतिहास-प्रमाण से अधिक नाटक-आवश्यकता है। द्विवेदी कबीर को धारा से पढ़ते हैं; साहनी रंग पर खड़ा करते हैं। भारतेंदु दो सूत्र-वाक्य पर्याप्त हैं; साहनी के लंबे संवाद नहीं उतारे जाते।

निषेध साथ लिखे जाते हैं। अंधायुग 1955 पद्य-नाटक है, अंधेर नगरी नहीं। तमस 1973 साहनी का उपन्यास है, कबीरा नहीं। कबीर ग्रंथावली पद है, नाटक संवाद है। माधवी और हानूश दूसरे नाटक हैं। भारत दुर्दशा करुण है, तीनों एक नहीं। आधे-अधूरे दांपत्य है, ये दो सार्वजनिक चौक हैं। सीमा तुलना को शत्रु-युद्ध बना देना है। गुण यह कि दो शतक के दो औजार याद रह जाते हैं — प्रहसन और पुनर्पाठ। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; एक चिह्न पर दो दृश्य-सिरे हैं। एक 1881 हँसता है। दूसरा 1981 खड़ा रहकर पूछता है।

निष्कर्ष यह है कि दोनों चौक पर बोलते हैं — एक हँसी से शासन काटता है, दूसरा वचन से संस्था नापता है; रूप प्रहसन और पुनर्पाठ हैं, एक कृति नहीं। गोवर्धन पेट है, कबीर वाणी है। चौपट राजा विवेकहीन शासन है, संस्था पंथ का तराजू है। अंधायुग और तमस इन दोनों का पर्याय नहीं। तुलना सोपान दिखाती है, एकाकार नहीं।

Q. 3 (20 marks) · Unit 3

आवाज़ का नीलाम स्वतंत्रता के बाद की विडंबना कैसे है?

Model answer

आवाज़ का नीलाम स्वतंत्रता के बाद की विडंबना इसलिए है कि 1947 के बाद भी आवाज़ बिक सकती है; दिवाकर बेचता है, बाजोरिया नहीं लौटाता। आवाज़ का नीलाम धर्मवीर भारती की निर्धारित एकांकी है। भारती जन्म 25 दिसंबर 1926 प्रयाग, निधन 4 सितंबर 1997। कवि, कथाकार, नाटककार, संपादक — धर्मयुग। गुनाहों का देवता उपन्यास अलग। अंधायुग 1955 पद्य-नाटक, कुरुक्षेत्र के बाद का नैतिक अँधेरा — यह पाठ नहीं। दो रूप एक लेखक के हैं; मिलाए नहीं जाते। मंच प्रायः दो पात्र। दिवाकर अखबार आवाज़ के संपादक हैं। निडर पत्रकार। जन की बात। सेठ बाजोरिया पूँजीपति हैं। जो गलत काम पर धिक्कार पाता था, विवशता में देवता जैसा लगने लगता है। देशकाल स्वातंत्र्योत्तर नगर है, कुरुक्षेत्र नहीं। नाम दोहरा है। आवाज़ अखबार का नाम है। आवाज़ अभिव्यक्ति भी है। नीलाम बिकना है।

कथा एक दबाव से चलती है। पत्नी की लंबी बीमारी। तंगी। दिवाकर आवाज़ बेचते हैं। नीलाम पूरा होने पर पत्रकार की रीढ़ झुकती है। संवाद यहाँ नहीं उतारे जाते; प्रसंग यही है। पत्नी की मृत्यु के बाद दिवाकर आवाज़ लौटाना चाहते हैं। सेठ नहीं लौटाता। बिकी वस्तु वापस नहीं होती। भाव — जनता की आवाज़ एक बार बिक जाए तो नैतिक वापसी पूँजी नहीं मानती। स्वतंत्रता 1947 के बाद का व्यंग्य है, अंधायुग का महाभारत नहीं। यहाँ नीलाम है, अँधेरा नहीं। अंधेर नगरी के अँधेरे से नाम-साम्य मात्र होगा; रूप प्रहसन नहीं, एकांकी है। धर्मयुग संपादन लेखक का दूसरा कर्म है, यह कथा नहीं।

वर्मा का मुरारीलाल प्राण सस्ता नापता है; दिवाकर आवाज़ सस्ती बेचता है। दोनों मूल्य पूछते हैं; आलंबन अलग है। अश्क का साहब फाइलें रोकता है; बाजोरिया आवाज़ खरीदता है। माथुर का जाला संबंध बाँधता है; यह पूँजी प्रेस बाँधती है। चार मध्यवर्ग; चार चोट। तत्त्व संक्षेप हैं। कथावस्तु बिक्री और न लौटना। संघर्ष पत्रकार और पूँजी। चरित्र दो तक सिमट सकते हैं। कथोपकथन प्रधान। उद्देश्य विडंबना है। शिल्प एक अंक, एक चोट। सीमा सेठ का एकआयामी खल। गुण दो अर्थ का नाम। ओझा एकांकी को सोपान कहते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग रखते हैं। पाठ प्रसंग-भाव है; लंबे संवाद नहीं।

भारती एक लेखक, दो रूप। पद्य-नाटक युद्ध के बाद का प्रश्न है। एकांकी पत्रकार की बिकी आवाज़ है। गुनाहों का देवता उपन्यास अलग है। कोणार्क माथुर का पूर्ण नाटक है, यह भारती नहीं। रेशमी टाई वर्मा की दूसरी एकांकी है। अंजो दीदी अश्क का नाटक है। बिना निषेध के नाम ढेर लगते हैं। महत्त्व यह है कि हिन्दी एकांकी प्रेस-पूँजी तक आई। स्वतंत्रता के बाद भी नैतिक बेड़ी दिखती है। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; यह चिह्न यहाँ बिकी आवाज़ बनता है। अंधायुग शिखर है, इस पत्र की एकांकी-सूची में नहीं।

निष्कर्ष यह है कि विडंबना इसलिए है कि स्वतंत्रता के बाद भी आवाज़ नीलाम हो सकती है; रूप एकांकी है, अंधायुग नहीं। आवाज़ दो अर्थ है — पत्र और अभिव्यक्ति। नीलाम बिकना है। निर्धारित कृति यही व्यंग्य है, पद्य-नाटक या उपन्यास नहीं। बिकी आवाज़ वापस नहीं होती — यही चोट है।

Q. 4 (20 marks) · Unit 4

चार कथेतर रूप कथन के चार आलंबन कैसे हैं?

Model answer

चार कथेतर रूप कथन के चार आलंबन इसलिए हैं कि आत्मकथा प्रयोग है, यात्रा तट, रेखा व्यक्ति, पत्र सम्बोधन; खेले नहीं जाते। निर्धारित चार कथेतर रचनाएँ हैं। गांधी — सत्य के साथ मेरे प्रयोग के पाँच अंश। वेगड़ — नर्मदा के तीन मार्ग। महादेवी — घीसा। रामविलास शर्मा — भैया के नाम पाती। साम्य कथेतर है — कथन, खड़ी बोली गद्य, खेला नहीं जाता। साम्य स्मृति और बोध है। चारों नाटक के संवाद से कटते हैं। अंधेर नगरी हँसकर शासन काटती है; ये चार कथन से बोलते हैं। एकांकी एक स्थिति है; कथेतर एक स्वर है। निबंध — मन की दृढ़ता, श्रद्धा और भक्ति, नाखून क्यों बढ़ते हैं, तमाल के झरोखे से — अलग सोपान हैं। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; ये चार उसी गद्य के कथन-सिरे हैं।

वैषम्य विधा पर है। आत्मकथा प्रयोग है। यात्रावृत्त तट है। रेखाचित्र एक व्यक्ति है। पत्र सम्बोधन है। गांधी सत्य को प्रयोग बनाते हैं — सभ्य पोशाक में, बलवान से भिड़न्त, आत्मिक शिक्षा, शांति निकेतन, खादी का जन्म। वेगड़ नदी देखते हैं — छिलगाँव से अमरकंटक, अमरकंटक-डिंडोरी-महाराजपुर, महाराजपुर से ग्वारीघाट। महादेवी निर्धन रेखा खींचती हैं। शर्मा भाई को लिखते हैं। गांधी 1869–1948। वेगड़ 1928–2018। महादेवी 1907–1987। शर्मा 1912–2000। आत्मकथा में वाचक केंद्र है। रेखाचित्र में देखा गया व्यक्ति केंद्र है।

वैषम्य भूमि पर भी है। गांधी लंदन, जोहानिसबर्ग, टॉल्स्टॉय आश्रम, शांति निकेतन, गुजरात-आश्रम छूते हैं। वेगड़ ऊपरी नर्मदा छूते हैं। महादेवी गाँव का सेवक छूती हैं। शर्मा बैसवाड़ा-उन्नाव छूते हैं। बलवान से भिड़न्त एशियाई विभाग के अधिकारियों की रिश्वत-पद्धति है, व्यक्ति-वैर नहीं। तीन मार्ग पूरी परिक्रमा नहीं। घीसा गिल्लू नहीं। पाती निराला-ग्रंथ नहीं। तत्त्व अलग बैठते हैं — सत्य का संघर्ष, आँख, पतली घटना, सम्बोधन। उद्देश्य बोध है, तमाशा नहीं। आत्मकथा कसौटी है, यात्रा आँख है, रेखाचित्र व्यक्ति है, पत्र सम्बोधन है। कबीरा संत का चौक है; कथेतर वह चौक नहीं।

निषेध साथ हैं। हिन्द स्वराज 1909 अलग है। वोल्गा से गंगा राहुल सांकृत्यायन हैं। गिल्लू और भक्तिन दूसरी रेखाएँ हैं। निराला की साहित्य साधना आलोचना है। मित्र संवाद दूसरा पत्र-संसार है। सीमा तुलना को शत्रु-युद्ध बनाना है। गुण चार विधा को सोपान मानना है। दोष भाषण, यात्रा-सूची, रूप-वर्णन, निजी कचरा — अलग-अलग हैं। पाठ प्रसंग-भाव है। पाँच गांधी-अंश और तीन नर्मदा-मार्ग उदाहरण हैं, पूरा ग्रंथ नहीं।

निष्कर्ष यह है कि चार रूप प्रयोग-नदी-रेखा-पाती चार आलंबन हैं; नाटक का पर्याय नहीं। गांधी सत्य को अभ्यास बनाते हैं। वेगड़ नदी को आँख देते हैं। महादेवी करुणा खींचती हैं। शर्मा भाई को लिखते हैं। चार विधा चार हाथ हैं, एक ढेर नहीं। हिन्द स्वराज और वोल्गा से गंगा इस तुलना में नहीं आते।

Q. 5 (20 marks) · Unit 5

चार निबंध आह्वान, शास्त्र, प्रश्न और दृष्टि कैसे बाँटते हैं?

Model answer

चार निबंध आह्वान, शास्त्र, प्रश्न और दृष्टि इसलिए बाँटते हैं कि भट्ट थामते हैं, शुक्ल काटते हैं, द्विवेदी पूछते हैं, मिश्र देखते हैं। निर्धारित चार निबंध हैं। भट्ट — मन की दृढ़ता। शुक्ल — श्रद्धा और भक्ति। द्विवेदी — नाखून क्यों बढ़ते हैं। मिश्र — तमाल के झरोखे से। साम्य निबंध है — कथन, खड़ी बोली, विचार, खेला नहीं जाता। साम्य सीमित विषय पर विवेक है। चारों नाटक के संवाद से कटते हैं। चारों आत्मकथा के पूरे जीवन से कटते हैं, यद्यपि शुक्ल व्यक्ति-व्यंजक कहते हैं — अर्थ निजी विवेक है, पूरी कथा नहीं। अंधेर नगरी हँसकर शासन काटती है; ये चार तर्क या दृष्टि से बोलते हैं। एकांकी एक चोट है; निबंध एक विषय है। रेखाचित्र व्यक्ति है; निबंध विचार है। शुक्ल गद्य को चिह्न कहते हैं; निबंध उसी चिह्न का विचार-सिरा है।

वैषम्य चाल पर है। भट्ट संकल्प का आह्वान करते हैं — दुर्बल मन रुकता है, दृढ़ मन काम करता है, प्रदीप का सुधार। शुक्ल श्रद्धा और भक्ति काटते हैं — श्रद्धा कर्म पर, प्रेम व्यक्ति पर, भक्ति योग; चिंतामणि। द्विवेदी पशुता से संस्कृति पूछते हैं — नाखून अवशेष, काटना संस्कृति; अशोक के फूल। मिश्र तमाल से देखते हैं — वृक्ष-संकेत, झरोखा, स्मृति; ललित दृष्टि। भट्ट 1844–1914। शुक्ल 1884–1941। द्विवेदी 1907–1979। मिश्र 1926–2005। भारतेंदु मंडल आह्वान देता है। चिंतामणि काटती है। अशोक के फूल पूछते हैं। तमाल देखते हैं।

वैषम्य शिल्प पर भी है। भट्ट सीधी बोली। शुक्ल परिभाषा-भेद। द्विवेदी प्रश्न। मिश्र नरम गद्य। दोष अलग हैं — भाषण, सूखी गिनती, जीव-विज्ञान, वृक्ष-वर्णन। गुण अलग हैं — संकल्प, भाव का औजार, छोटे अंग से द्वंद्व, संवेदना। घीसा रेखा है; पाती सम्बोधन है; ये चार विषय हैं। गांधी प्रयोग लिखते हैं; निबंध विचार है। वेगड़ नदी लिखते हैं; मिश्र यात्रावृत्त नहीं। कबीरा संत का चौक है; शुक्ल पद नहीं, मनोविकार काटते हैं। तत्त्व — एक विषय, लेखक का दृष्टिकोण, तर्क या दृष्टि का क्रम, गद्य, बोध।

निषेध साथ हैं। नूतन ब्रह्मचारी उपन्यास है। कविता क्या है और हिन्दी साहित्य का इतिहास शुक्ल के दूसरे कर्म हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के आचार्य हैं, यह लेखक नहीं। अनामदास का पोथा उपन्यास है। कुटज, आलोक पर्व निर्धारित नहीं। छितवन की छाँह अलग संग्रह है। सीमा तुलना को शत्रु-युद्ध बनाना है। गुण चार चाल को सोपान मानना है। पाठ प्रसंग-भाव है। द्विवेदी और मिश्र सर्वाधिकार में हैं — भाव लिखा जाता है, अध्याय नहीं।

निष्कर्ष यह है कि चार निबंध आह्वान-शास्त्र-प्रश्न-दृष्टि बाँटकर विचार-सिरा पूरा करते हैं; नाटक या रेखा का पर्याय नहीं। भट्ट थामते हैं, शुक्ल काटते हैं, द्विवेदी पूछते हैं, मिश्र देखते हैं। अंधेर नगरी हँसती है; ये चार सोचते हैं। चार आलंबन चार हाथ हैं, एक ढेर नहीं।