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नाटक एवं कथेतर साहित्य

इकाई 1 · हिन्दी नाटक और एकांकी — शास्त्र और इतिहास

विषय नाटक और एकांकी का शास्त्र है। तीन सूत्र हैं। पहला — अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और तत्त्व। दूसरा — हिन्दी नाटक का उद्भव और विकास। तीसरा — प्रमुख रचनाकार और रचनाएँ। आचार्य रामचंद्र शुक्ल गद्य के आविर्भाव को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं। नाटक उसी गद्य का दृश्य-रूप है। दशरथ ओझा हिन्दी नाटक का इतिहास लिखते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग-परंपरा बाँधते हैं।

आधार दशरथ ओझा का हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास; नेमिचंद्र जैन का रंग परंपरा और भारतीय नाट्य परंपरा; जयदेव तनेजा संपादित आधुनिक भारतीय रंग परिदृश्य; जगदीश चतुर्वेदी का भारतीय नाटक और रंगमंच। शिखर-नाम भारतेंदु, प्रसाद, राकेश, भारती, साहनी हैं; एकांकी में वर्मा केंद्र हैं। अंधायुग भारती का पद्य-नाटक है, अंधेर नगरी नहीं।

इतिहास तीन सोपान में बैठता है — भारतेंदु व्यंग्य, प्रसाद काव्य-इतिहास, राकेश-भारती-साहनी आधुनिक प्रश्न। एकांकी चौथा सोपान है, कटी पूँछ नहीं। अंधायुग पद्य-नाटक है; अंधेर नगरी गद्य-प्रहसन है। बिना रंग के शास्त्र सूखा है; बिना शास्त्र के रंग तमाशा है।

सार: शास्त्र = परिभाषा, एकांकी से अंतर, तत्त्व, रंग-शिल्प। इतिहास = संस्कृत-पारसी से भारतेंदु, प्रसाद, राकेश, साहनी। एकांकी = वर्मा केंद्र। अंधायुग नाटक है, अंधेर नगरी नहीं।

1 नाटक — अर्थ और परिभाषा

नाटक दृश्य-काव्य है। वह रंगमंच पर अभिनय से पूरा होता है। कविता श्रव्य है; उपन्यास वर्णन है; नाटक संवाद और दृश्य है। भरत के नाट्यशास्त्र में नाट्य लोक की अनुकृति है। चार अभिनय हैं — आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक। अरस्तू त्रासदी में कथा, चरित्र, विचार, वाणी, संगीत और दृश्य गिनते हैं। परिभाषा इन्हीं दो धाराओं को मिलाकर बैठती है। शुक्ल नाटक को गद्य का सार्वजनिक रूप कहते हैं। नगेन्द्र उसे संघर्ष का दृश्य-रूप कहते हैं। नेमिचंद्र जैन रंग को साहित्य से अलग नहीं काटते; वे पाठ और प्रदर्शन दोनों देखते हैं।

परिभाषा तीन बिंदुओं पर बैठती है। रूप दृश्य है, केवल पढ़ा जाने वाला निबंध नहीं। माध्यम संवाद और अभिनय है। केंद्र संघर्ष है — व्यक्ति-समाज, व्यक्ति-व्यक्ति, व्यक्ति-आत्म। उद्देश्य मनोरंजन से आगे बोध और प्रश्न है। पारसी कम्पनी तमाशा प्रधान रही। भारतेंदु ने व्यंग्य और सुधार जोड़ा। प्रसाद ने इतिहास और संघर्ष जोड़ा। राकेश ने दांपत्य और भाषा जोड़ी। बिना परिभाषा के इतिहास नामों की सूची रह जाता है। बिना रंग के परिभाषा सूखी रहती है।

गलत वाक्य — नाटक केवल पढ़ी जाने वाली लंबी कहानी है। सही वाक्य — नाटक दृश्य-काव्य है जो अभिनय से पूरा होता है। शुक्ल उसे गद्य का सार्वजनिक रूप कहते हैं क्योंकि वह मंच पर समाज के सामने आता है। नगेन्द्र संघर्ष को केंद्र कहते हैं — बिना द्वंद्व के संवाद उपदेश रह जाता है। भरत की अनुकृति का अर्थ नकल नहीं, लोक का रूपांतर है। अरस्तू कथा को प्राण इसलिए कहते हैं कि चरित्र कर्म से खुलता है, भाषण से नहीं।

ओझा इतिहास लिखते हैं, परिभाषा को सोपान देते हैं। जैन पाठ और प्रदर्शन दोनों देखते हैं — केवल पुस्तक अधूरी है। तनेजा आधुनिक रंग-परिदृश्य में प्रकाश और नेपथ्य को शिल्प का अंग मानते हैं। चतुर्वेदी नाटक को रंगमंच से अलग नहीं पढ़ते। अंधायुग पद्य-नाटक है; यह परिभाषा गद्य-प्रहसन और यथार्थ दोनों पर बैठती है। गोदान उपन्यास का उदाहरण है, कामायनी महाकाव्य का, अंधेर नगरी व्यंग्य-नाटक का। बिना उदाहरण के परिभाषा सूखी रहती है।

आचार्य / आलोचकसूत्र
भरतनाट्य = अनुकृति; चार अभिनय
अरस्तूकथा प्राण; त्रासदी के अंग
दशरथ ओझाहिन्दी नाटक : उद्भव और विकास
नेमिचंद्र जैनरंग परंपरा; भारतीय नाट्य परंपरा