इकाई 1: भाषा और व्याकरण — एक नज़र में
इस इकाई में हम भाषा की मूलभूत संकल्पनाओं को समझेंगे। भाषा क्या है, इसकी प्रकृति कैसी है, हिन्दी भाषा की क्या विशेषताएँ हैं, वर्ण व्यवस्था (स्वर, व्यंजन, संयुक्त व्यंजन), शब्द भंडार (तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी) तथा व्याकरण के प्रमुख अंग — क्रिया, विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण और अव्यय — का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
- भाषा की परिभाषा, प्रकृति और विशेषताएँ
- हिन्दी भाषा की विशेषताएँ
- वर्ण व्यवस्था: 11 स्वर, 33 व्यंजन, संयुक्त व्यंजन
- शब्द भंडार के 4 प्रकार
- क्रिया, विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण, अव्यय के भेद और उदाहरण
1. भाषा: तात्पर्य और परिभाषा
1.1 भाषा का तात्पर्य
भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों, भावों और अनुभूतियों को दूसरों तक पहुँचाता है। भाषा मनुष्य की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धि है। मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों में भी संकेतों के द्वारा भाव प्रकट करने की क्षमता होती है, परंतु मनुष्य की भाषा व्यवस्थित, सार्थक और विकसित होती है।
भाषा ध्वनियों की व्यवस्थित व्यवस्था है, जिसका प्रत्येक समाज अपने-अपने ढंग से प्रयोग करता है। भाषा के माध्यम से ही ज्ञान का संचार, संस्कृति का विकास और सभ्यता का प्रसार संभव हुआ है।
1.2 भाषा की परिभाषा — विभिन्न विद्वानों के मत
| विद्वान | परिभाषा |
|---|---|
| महर्षि पतंजलि | "व्यक्तायां वाचि वर्णा यन्ते इति वर्णाः" — भाषा वर्णों से बनी व्यक्त वाणी है। |
| आचार्य कात्यायन | "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" — शब्द और अर्थ का संबंध सिद्ध होता है, वही भाषा है। |
| डॉ. बाबूराम सक्सेना | "जिन ध्वनि-चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उसे भाषा कहते हैं।" |
| डॉ. भोलानाथ तिवारी | "भाषा उच्चारण अवयवों से उच्चरित, यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा समाज विशेष के लोग परस्पर विचार-विनिमय करते हैं।" |
| स्वीट | "भाषा ध्वनियों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति है।" |
| ब्लॉक और ट्रेगर | "भाषा यादृच्छिक मुखर ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग और विचार-विनिमय करते हैं।" |
| सुमित्रानंदन पंत | "भाषा संसार का नादमय चित्र है, ध्वनिमय स्वरूप है।" |
परीक्षा के लिए सर्वोत्तम परिभाषा (डॉ. भोलानाथ तिवारी): "भाषा उच्चारण अवयवों से उच्चरित, यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा समाज विशेष के लोग परस्पर विचार-विनिमय करते हैं।"
2. भाषा की प्रकृति और विशेषताएँ
2.1 भाषा की प्रकृति
भाषा की प्रकृति से तात्पर्य उसके मूल स्वभाव और गुणों से है। भाषा के अध्ययन से निम्नलिखित मौलिक तथ्य सामने आते हैं —
- भाषा अर्जित संपत्ति है — भाषा जन्मजात नहीं होती, इसे समाज में रहकर सीखा जाता है।
- भाषा सामाजिक वस्तु है — भाषा का विकास समाज में होता है, समाज के बिना भाषा का कोई अस्तित्व नहीं।
- भाषा परिवर्तनशील है — समय के साथ भाषा में परिवर्तन होता रहता है; पुराने शब्द लुप्त होते हैं, नए शब्द आते हैं।
- भाषा यादृच्छिक है — किसी वस्तु और उसके नाम में कोई तार्किक संबंध नहीं होता; यह समाज की स्वीकृति पर निर्भर करता है।
- भाषा का संबंध परंपरा से है — भाषा पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपरा के रूप में हस्तांतरित होती है।
2.2 भाषा की विशेषताएँ
| क्रम | विशेषता | विवरण |
|---|---|---|
| 1 | सार्थकता | भाषा की प्रत्येक ध्वनि या शब्द का कोई न कोई अर्थ होता है। |
| 2 | व्यवस्था | भाषा ध्वनियों, शब्दों और वाक्यों की एक सुनियोजित व्यवस्था है। |
| 3 | सामाजिकता | भाषा समाज की उपज है और समाज के लिए ही होती है। |
| 4 | अर्जितता | भाषा सीखी जाती है, जन्म से नहीं मिलती। |
| 5 | परिवर्तनशीलता | भाषा निरंतर बदलती रहती है — यह जीवंतता का लक्षण है। |
| 6 | यादृच्छिकता | शब्द और अर्थ का संबंध यादृच्छिक (मनमाना) होता है। |
| 7 | द्वैतता | भाषा में ध्वनि-स्तर और अर्थ-स्तर दोनों होते हैं। |
| 8 | सृजनात्मकता | सीमित ध्वनियों से असीमित वाक्य बनाए जा सकते हैं। |
| 9 | स्थानांतरणीयता | भाषा से भूत, वर्तमान और भविष्य — तीनों कालों की बात कही जा सकती है। |
| 10 | परंपरागतता | भाषा परंपरा से प्राप्त होती है और परंपरा से ही आगे बढ़ती है। |
परीक्षा टिप: "भाषा की प्रकृति" और "भाषा की विशेषताएँ" पर 5 अंक के प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। कम से कम 6-8 बिंदु याद रखें और प्रत्येक को एक-दो पंक्ति में स्पष्ट करें।
3. हिन्दी भाषा की विशेषताएँ
हिन्दी भारत की राजभाषा और विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं —
- वैज्ञानिक लिपि (देवनागरी) — देवनागरी लिपि पूर्णतः वैज्ञानिक है; जैसा लिखा जाता है, वैसा ही पढ़ा जाता है। एक ध्वनि के लिए एक ही चिह्न है।
- ध्वनि-प्रधानता — हिन्दी में उच्चारण और लेखन में एकरूपता है; अंग्रेजी की तरह उच्चारण और लेखन में विरोधाभास नहीं हैं।
- समृद्ध शब्द भंडार — तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्दों के मेल से हिन्दी का शब्द भंडार अत्यंत विशाल है।
- सरल व्याकरण — अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी का व्याकरण अपेक्षाकृत सरल और नियमित है।
- लचीलापन — हिन्दी अन्य भाषाओं के शब्दों को आसानी से अपना लेती है (जैसे — रेल, टिकट, डॉक्टर)।
- संगीतात्मकता — हिन्दी की ध्वनियाँ मधुर और संगीतात्मक हैं; इसी कारण हिन्दी कविता और गीत विश्व प्रसिद्ध हैं।
- विभक्ति-प्रधानता — हिन्दी में कारक संबंध विभक्तियों और परसर्गों से स्पष्ट होते हैं।
- लिंग-व्यवस्था — हिन्दी में प्रत्येक संज्ञा पुल्लिंग या स्त्रीलिंग होती है, जो वाक्य-रचना को प्रभावित करती है।
- साहित्यिक समृद्धि — हिन्दी में वेदों से लेकर आधुनिक युग तक का विपुल साहित्य उपलब्ध है।
- राष्ट्रीय एकता का सूत्र — हिन्दी विभिन्न प्रांतों और भाषाओं के लोगों को जोड़ने वाली संपर्क भाषा है।
याद रखें: 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है।
4. वर्ण व्यवस्था
भाषा की सबसे छोटी इकाई वर्ण कहलाती है। वर्ण वह मूल ध्वनि है जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते। हिन्दी वर्णमाला में कुल 44 वर्ण हैं — 11 स्वर और 33 व्यंजन।
4.1 स्वर (11)
जिन वर्णों के उच्चारण में वायु बिना किसी रुकावट के मुख से निकलती है, उन्हें स्वर कहते हैं। स्वर स्वतंत्र रूप से उच्चारित होते हैं।
11 स्वर: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ
| प्रकार | स्वर | उदाहरण |
|---|---|---|
| ह्रस्व स्वर | अ, इ, उ, ऋ | अमर, इलायची, उल्लू, ऋषि |
| दीर्घ स्वर | आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ | आम, ईख, ऊन, एक, ऐनक, ओखली, औरत |
स्वरों के भेद (उच्चारण-काल के आधार पर):
- ह्रस्व स्वर — जिनके उच्चारण में कम समय लगता है: अ, इ, उ, ऋ
- दीर्घ स्वर — जिनके उच्चारण में ह्रस्व से दोगुना समय लगता है: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
- प्लुत स्वर — जिनके उच्चारण में तीन गुना समय लगता है (जैसे — ओम् का लंबा उच्चारण); इसका प्रयोग बहुत कम होता है।
4.2 व्यंजन (33)
जिन वर्णों के उच्चारण में वायु मुख के किसी भाग से टकराकर या रुककर निकलती है, उन्हें व्यंजन कहते हैं। व्यंजन स्वरों की सहायता से बोले जाते हैं।
| वर्ग | व्यंजन | उच्चारण स्थान |
|---|---|---|
| क-वर्ग (कंठ्य) | क, ख, ग, घ, ङ | कंठ |
| च-वर्ग (तालव्य) | च, छ, ज, झ, ञ | तालु |
| ट-वर्ग (मूर्धन्य) | ट, ठ, ड, ढ, ण | मूर्धा |
| त-वर्ग (दंत्य) | त, थ, द, ध, न | दाँत |
| प-वर्ग (ओष्ठ्य) | प, फ, ब, भ, म | होंठ |
| अंतःस्थ | य, र, ल, व | — |
| ऊष्म | श, ष, स, ह | — |
प्रत्येक वर्ग का पाँचवाँ वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) अनुनासिक कहलाता है।
4.3 संयुक्त व्यंजन
जब दो या दो से अधिक व्यंजन बिना स्वर के मिलकर एक ध्वनि बनाते हैं, तो उन्हें संयुक्त व्यंजन कहते हैं।
प्रमुख संयुक्त व्यंजन: क्ष (क् + ष), त्र (त् + र), ज्ञ (ज् + ञ), श्र (श् + र)
| संयुक्त व्यंजन | मेल | उदाहरण |
|---|---|---|
| क्ष | क् + ष | क्षमा, क्षत्रिय, परीक्षा |
| त्र | त् + र | त्रिभुज, मित्र, पत्र |
| ज्ञ | ज् + ञ | ज्ञान, विज्ञान, अज्ञानी |
| श्र | श् + र | श्रम, श्रवण, आश्रम |
| द्य | द् + य | विद्या, विद्यार्थी |
| द्व | द् + व | द्वार, विद्वान |
परीक्षा टिप: स्वरों की संख्या (11), व्यंजनों की संख्या (33) और कुल वर्ण (44) — ये संख्याएँ वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में बार-बार पूछी जाती हैं। संयुक्त व्यंजन क्ष, त्र, ज्ञ, श्र के मेल भी याद रखें।
5. शब्द भंडार
किसी भाषा में प्रयुक्त समस्त शब्दों के समूह को शब्द भंडार कहते हैं। उत्पत्ति के आधार पर हिन्दी के शब्द चार प्रकार के होते हैं —
5.1 तत्सम शब्द
जो शब्द संस्कृत से बिना किसी परिवर्तन के हिन्दी में आए हैं, उन्हें तत्सम (तत् + सम = उसके समान) कहते हैं।
उदाहरण: अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्र, माता, पिता, पुस्तक, विद्यालय, धर्म, कर्म
5.2 तद्भव शब्द
जो शब्द संस्कृत से परिवर्तित होकर (बिगड़कर) हिन्दी में आए हैं, उन्हें तद्भव (तत् + भव = उससे उत्पन्न) कहते हैं।
| तत्सम | तद्भव |
|---|---|
| अग्नि | आग |
| कर्ण | कान |
| हस्त | हाथ |
| दुग्ध | दूध |
| मुख | मुँह |
| रात्रि | रात |
| सप्त | सात |
| घृत | घी |
| नयन | नैन |
| ग्राम | गाँव |
5.3 देशज शब्द
जो शब्द न संस्कृत से आए हैं, न विदेशी भाषाओं से, बल्कि स्थानीय बोलियों और जन-जीवन से उत्पन्न हुए हैं, उन्हें देशज कहते हैं।
उदाहरण: लोटा, थाली, खटिया, पगड़ी, झोपड़ी, टट्टी, खिड़की, चूल्हा, डिबिया
5.4 विदेशी शब्द
जो शब्द विदेशी भाषाओं (अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी, पुर्तगाली आदि) से हिन्दी में आए हैं, उन्हें विदेशी कहते हैं।
| भाषा | उदाहरण |
|---|---|
| अरबी | अदालत, कानून, किताब, दुनिया, हकीम |
| फारसी | दरबार, बाजार, चश्मा, खुश, दोस्त |
| तुर्की | तोप, कैंची, बेगम, लाश |
| अंग्रेजी | रेल, टिकट, डॉक्टर, स्कूल, पुलिस |
| पुर्तगाली | अनन्नास, आलू, चाबी, तम्बाकू |
परीक्षा टिप: तत्सम-तद्भव के जोड़े (अग्नि-आग, कर्ण-कान, दुग्ध-दूध) मिलान वाले प्रश्नों में बहुत पूछे जाते हैं। विदेशी शब्दों की भाषा पहचानने का अभ्यास अवश्य करें।
6. क्रिया
परिभाषा: जिस शब्द से किसी कार्य के करने या होने का बोध हो, उसे क्रिया कहते हैं। जैसे — खाना, पीना, सोना, दौड़ना, लिखना।
6.1 क्रिया के भेद (कर्म के आधार पर)
(1) सकर्मक क्रिया — जिस क्रिया का फल कर्ता को छोड़कर कर्म पर पड़ता है, अर्थात् जिस क्रिया के साथ कर्म होता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं।
- राम आम खाता है। (क्या खाता है? — आम; कर्म है)
- सीता पत्र लिखती है। (क्या लिखती है? — पत्र; कर्म है)
- मोहन पानी पीता है।
(2) अकर्मक क्रिया — जिस क्रिया का फल कर्ता पर ही पड़ता है, अर्थात् जिस क्रिया के साथ कर्म नहीं होता, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं।
- राम सोता है। (क्या सोता है? — उत्तर नहीं मिलता; कर्म नहीं)
- बच्चा रोता है।
- पक्षी उड़ता है।
पहचान की तरकीब: क्रिया से पहले "क्या" या "किसको" लगाकर प्रश्न करें। यदि उत्तर मिले तो सकर्मक, न मिले तो अकर्मक। "राम आम खाता है" — क्या खाता है? आम मिलता है, अतः सकर्मक। "राम सोता है" — क्या सोता है? कोई उत्तर नहीं, अतः अकर्मक।
6.2 अन्य भेद
- प्रेरणार्थक क्रिया — जिस क्रिया से कर्ता स्वयं कार्य न करके दूसरे से करवाता है। जैसे — पढ़ाना, लिखवाना, खिलाना। (राम मोहन से पत्र लिखवाता है।)
- संयुक्त क्रिया — दो क्रियाओं के मेल से बनने वाली क्रिया। जैसे — खा लेना, सो जाना, कर देना।
- नामधातु क्रिया — संज्ञा या विशेषण से बनने वाली क्रिया। जैसे — हाथ (संज्ञा) से हथियाना, गरम (विशेषण) से गरमाना।
7. विभक्ति (कारक)
परिभाषा: संज्ञा या सर्वनाम का वाक्य के अन्य शब्दों से जो संबंध होता है, उसे कारक कहते हैं। इस संबंध को प्रकट करने वाले चिह्नों को विभक्ति कहते हैं। हिन्दी में 8 कारक (विभक्तियाँ) होते हैं।
| क्रम | कारक | विभक्ति चिह्न | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1 | कर्ता | ने | राम ने रावण को मारा। |
| 2 | कर्म | को | मोहन ने श्याम को बुलाया। |
| 3 | करण | से, के द्वारा | वह कलम से लिखता है। |
| 4 | संप्रदान | को, के लिए | गरीबों को दान दो। |
| 5 | अपादान | से (अलग होने के भाव में) | पेड़ से पत्ता गिरा। |
| 6 | संबंध | का, के, की | यह राम की पुस्तक है। |
| 7 | अधिकरण | में, पर | छात्र कक्षा में बैठा है। / किताब मेज पर है। |
| 8 | संबोधन | हे, अरे, ओ | हे राम! मेरी रक्षा करो। |
परीक्षा टिप: करण और अपादान दोनों में "से" आता है — अंतर समझें: करण में "से" साधन का बोध कराता है (कलम से लिखना), अपादान में अलग होने का भाव होता है (पेड़ से गिरना)। कर्म और संप्रदान दोनों में "को" आता है — कर्म में क्रिया का फल पड़ता है, संप्रदान में देने का भाव होता है।
8. सर्वनाम
परिभाषा: संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं। जैसे — मैं, तुम, वह, यह, कौन, क्या।
सर्वनाम के 6 भेद
| क्रम | भेद | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1 | पुरुषवाचक | बोलने वाले, सुनने वाले या अन्य व्यक्ति के लिए प्रयुक्त | मैं, हम, तुम, आप, वह, वे |
| 2 | निश्चयवाचक | निश्चित व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करने वाले | यह, वह, ये, वे |
| 3 | अनिश्चयवाचक | अनिश्चित व्यक्ति या वस्तु के लिए प्रयुक्त | कोई, कुछ, किसी |
| 4 | प्रश्नवाचक | प्रश्न पूछने के लिए प्रयुक्त | कौन, क्या, किसे, कब |
| 5 | संबंधवाचक | दो वाक्यों या शब्दों में संबंध जोड़ने वाले | जो, सो, जैसा, वैसा |
| 6 | निजवाचक | स्वयं (अपने आप) के लिए प्रयुक्त | आप, स्वयं, खुद |
वाक्यों में प्रयोग:
- पुरुषवाचक: मैं विद्यालय जाता हूँ। तुम कहाँ जा रहे हो?
- निश्चयवाचक: यह मेरी पुस्तक है। वह मेरा मित्र है।
- अनिश्चयवाचक: दरवाजे पर कोई खड़ा है। थाली में कुछ फल हैं।
- प्रश्नवाचक: कौन आया है? तुम क्या कर रहे हो?
- संबंधवाचक: जो परिश्रम करेगा, सो सफल होगा।
- निजवाचक: मैं अपना काम स्वयं करता हूँ।
परीक्षा टिप: पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन पुरुष होते हैं — उत्तम पुरुष (मैं, हम), मध्यम पुरुष (तुम, आप), अन्य पुरुष (वह, वे)। "आप" शब्द निजवाचक भी होता है (मैं अपना काम आप करता हूँ) और आदरसूचक मध्यम पुरुष भी (आप कहाँ जा रहे हैं?) — वाक्य के भाव से पहचानें।
9. विशेषण
परिभाषा: जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता (गुण, संख्या, परिमाण आदि) बताते हैं, उन्हें विशेषण कहते हैं। जैसे — अच्छा लड़का, पाँच पुस्तकें, मीठा आम।
विशेषण के 4 भेद
| क्रम | भेद | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1 | गुणवाचक | संज्ञा के गुण-दोष, रंग, आकार आदि बताने वाले | अच्छा, बुरा, लाल, लंबा, मीठा, सुंदर |
| 2 | संख्यावाचक | संज्ञा की संख्या बताने वाले | एक, दो, पाँचवाँ, दोगुना, कुछ |
| 3 | परिमाणवाचक | संज्ञा की मात्रा या परिमाण बताने वाले | थोड़ा, बहुत, सारा, कम, ज्यादा |
| 4 | सार्वनामिक | सर्वनाम से बने विशेषण | यह, वह, कैसा, जैसा, इतना |
वाक्यों में प्रयोग:
- गुणवाचक: सुंदर फूल खिले हैं। वह ईमानदार लड़का है।
- संख्यावाचक: कक्षा में चालीस छात्र हैं। यह मेरा पहला प्रयास है।
- परिमाणवाचक: मुझे थोड़ा पानी चाहिए। उसने सारा दूध पी लिया।
- सार्वनामिक: यह लड़का मेरा भाई है। कैसा मौसम है!
परीक्षा टिप: संख्यावाचक और परिमाणवाचक में अंतर: गिनी जा सकने वाली वस्तु के साथ संख्या (पाँच पुस्तकें) और न गिनी जा सकने वाली वस्तु के साथ परिमाण (थोड़ा पानी) आता है। "विशेष्य" वह संज्ञा होती है जिसकी विशेषता बताई जाए (अच्छा लड़का — लड़का विशेष्य है)।
10. अव्यय
परिभाषा: जिन शब्दों के रूप में लिंग, वचन, कारक आदि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता, उन्हें अव्यय कहते हैं। (अ + व्यय = जिसमें व्यय/परिवर्तन न हो)। जैसे — और, परंतु, धीरे, वाह।
अव्यय के 4 भेद
| क्रम | भेद | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1 | क्रियाविशेषण | क्रिया की विशेषता बताने वाले | धीरे, तेज, आज, कल, यहाँ, वहाँ |
| 2 | संबंधबोधक | संज्ञा/सर्वनाम का वाक्य के अन्य शब्दों से संबंध जोड़ने वाले | के साथ, के बिना, के ऊपर, के नीचे |
| 3 | समुच्चयबोधक | दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ने वाले | और, परंतु, क्योंकि, या, अतः |
| 4 | विस्मयादिबोधक | आश्चर्य, हर्ष, शोक आदि भाव प्रकट करने वाले | वाह, अहा, हाय, छिः, शाबाश |
वाक्यों में प्रयोग:
- क्रियाविशेषण: वह धीरे-धीरे चलता है। राम कल आएगा।
- संबंधबोधक: मोहन के साथ सोहन गया। छत के ऊपर कौआ बैठा है।
- समुच्चयबोधक: राम और श्याम मित्र हैं। वह गरीब है परंतु ईमानदार है।
- विस्मयादिबोधक: वाह! क्या दृश्य है। हाय! यह क्या हो गया।
क्रियाविशेषण के उपभेद (अतिरिक्त जानकारी)
- कालवाचक: आज, कल, परसों, अभी, तब
- स्थानवाचक: यहाँ, वहाँ, ऊपर, नीचे, भीतर
- रीतिवाचक: धीरे, तेज, अचानक, वैसे
- परिमाणवाचक: बहुत, कम, थोड़ा, इतना
परीक्षा टिप: अव्यय की परिभाषा में "अ + व्यय = जिसमें कोई परिवर्तन न हो" — यह व्युत्पत्ति अवश्य लिखें, इससे उत्तर प्रभावशाली बनता है। संबंधबोधक और समुच्चयबोधक में अंतर स्पष्ट रखें: संबंधबोधक संज्ञा के साथ जुड़ता है (के साथ, के ऊपर), समुच्चयबोधक दो पदों/वाक्यों को जोड़ता है (और, परंतु)।
इकाई 1: सारांश — परीक्षा से पहले दोहराएँ
- भाषा = यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की व्यवस्था (डॉ. भोलानाथ तिवारी की परिभाषा सर्वोत्तम)
- हिन्दी वर्णमाला = 44 वर्ण (11 स्वर + 33 व्यंजन); संयुक्त व्यंजन = क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
- शब्द भंडार = तत्सम (अपरिवर्तित), तद्भव (परिवर्तित), देशज (स्थानीय), विदेशी (अरबी/फारसी/अंग्रेजी आदि)
- क्रिया = सकर्मक (कर्म सहित) / अकर्मक (कर्म रहित) — "क्या/किसको" से पहचानें
- 8 कारक: कर्ता (ने), कर्म (को), करण (से), संप्रदान (को/के लिए), अपादान (से), संबंध (का/के/की), अधिकरण (में/पर), संबोधन (हे/अरे)
- सर्वनाम के 6 भेद: पुरुषवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, प्रश्नवाचक, संबंधवाचक, निजवाचक
- विशेषण के 4 भेद: गुणवाचक, संख्यावाचक, परिमाणवाचक, सार्वनामिक
- अव्यय के 4 भेद: क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक
