Guess paper sets — practise one set at a time.
सेट 1
सेट 1 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। खंड अ के दस प्रश्न अनिवार्य। खंड ब में प्रत्येक इकाई से आंतरिक विकल्प — पाँचों प्रश्न करने हैं। खंड स में पाँच दीर्घ में से कोई तीन।
Section A
Q. 1. एक टोकरी भर मिट्टी किस वर्ष की मानी जाती है?
सप्रे; प्रायः प्रथम। गुलेरी 1915 कला-टिक हैं।
Q. 2. उसने कहा था किस पत्रिका में छपी?
जून 1915। हंस 1997 फुलवा का है।
Q. 3. चीफ की दावत किस वर्ष की कहानी है?
साहनी। शरणदाता 1947; गदल 1955; तमस 1973।
Q. 4. आपका बंटी मुख्यतः क्या है?
मन्नू, 1971। अकेली निर्धारित कहानी है।
Q. 5. इदन्नमम मुख्यतः क्या है?
पुष्पा, 1994। फैसला कहानी है; कस्तूरी कुंडल बसै आत्मकथा है।
Q. 6. गुलेरी का जन्म-नगर _____ है।
Answer: जयपुर — 7 जुलाई 1883। निधन 1922, काशी।
Q. 7. आकाशदीप की नायिका _____ है।
Answer: चंपा — दीपस्तंभ; बुद्धगुप्त प्रेमी। ध्रुवस्वामिनी नाटक की है।
Q. 8. चीफ की दावत में माँ _____ जानती है।
Answer: फुलकारी — चीफ रीझता है। शामनाथ पुत्र है।
Q. 9. गलत होता पंचतंत्र की लेखिका _____ हैं।
Answer: राजे सेठ — पाठ्यक्रम राजे; जन्म 1935, नौशेरा छावनी।
Q. 10. फुलवा का पति _____ की सींग से मरता है।
Answer: बैल — जमींदार का बैल। बेटा राधा मोहन एस.पी. बनता है।
Section B
Q. 1 (8 marks) · Unit 1
पो का एक प्रभाव कहानी को उपन्यास से कैसे काटता है?
Or: शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न क्यों कहते हैं?
Model answer
पो का एक प्रभाव कहानी को उपन्यास से इसलिए काटता है कि कहानी एक चोट माँगती है। आशय यह है कि कहानी एक चोट, एक रस, एक प्रश्न छोड़े। कई उपकथाएँ और कई उपदेश कहानी को उपन्यास की कटी पूँछ बना देते हैं। कसाव तत्त्वों को एक दिशा देता है। नामवर सिंह उसी कसाव को हिन्दी आलोचना में बाँधते हैं। उपन्यास कई प्रभाव जोड़ सकता है; कहानी एक माँगती है। उसने कहा था वचन की चोट है। ईदगाह बाल-मन की चोट है। परिंदे अकेलेपन की चोट है। फुलवा जाति की चोट है। चार उदाहरण चार स्वाद नहीं, एक-एक पाठ की एक-एक चोट हैं।
आशय लंबाई का नहीं, विन्यास का है। छोटी कहानी भी बिखर सकती है। दीर्घ-सी कहानी भी एक प्रभाव रख सकती है। संयोग का बोझ और उपकथा का फैलाव दोष हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कहानी में कारण और भी सघन है। तत्त्व छह हों, दिशा एक हो। बिना प्रभाव के चरित्र और संवाद ढेर रह जाते हैं। परीक्षा में सूत्र के साथ एक उदाहरण और एक सीमा लिखनी होती है।
निष्कर्ष यह है कि एक प्रभाव काटता है इसलिए कि विस्तार नहीं, विन्यास पूरा होता है; कई उपदेश उपन्यास की कटी पूँछ बन जाते हैं।
Or
आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिन्दी साहित्य का इतिहास में गद्य के आविर्भाव को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं। कहानी उसी गद्य का संक्षिप्त कथा-सिरा है। नाटक दृश्य सिरा है; निबंध विचार सिरा है। तिलिस्म कौतुक प्रधान रहा। प्रेमचंद ने कहानी को समाज का प्रश्न बनाया। जैनेन्द्र ने मन का प्रश्न बनाया। नई कहानी ने व्यक्ति का अनुभव बनाया। बिना गद्य के कहानी पद्याख्यान रह जाती। भारतेंदु युग नाटक-निबंध में अधिक शक्ति रखता है; कहानी द्विवेदी युग की सरस्वती से भाषा और पाठक पाती है। सप्रे 1901 और गुलेरी 1915 उसी चिह्न की पहली चालें हैं।
नामवर सिंह नई कहानी पर कसाव और नया अनुभव देखते हैं। नगेन्द्र जीवन-खंड का कलात्मक चित्र कहते हैं। पो एक प्रभाव माँगते हैं। शुक्ल उद्देश्य को जीवन की आलोचना से जोड़ते हैं। ईदगाह और कफन यथार्थ हैं। परिंदे व्यक्ति हैं। फुलवा जाति है। चिह्न एक लेखक का नारा नहीं, आधुनिक मनुष्य का माध्यम है। गोदान उपन्यास है, यह पत्र कहानी का है। बिना उदाहरण के सूत्र सूखा रहता है।
निष्कर्ष यह है कि शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न इसलिए कहते हैं कि आधुनिक मनुष्य गद्य में बोलता है; कहानी उसी चिह्न की छोटी चाल है, पद्य-आख्यान नहीं।
Q. 2 (8 marks) · Unit 2
लहना सिंह वचन युद्ध में कैसे पूरा करता है?
Or: चंपा दीप क्यों नहीं छोड़ती?
Model answer
लहना सिंह वचन युद्ध में इसलिए पूरा करता है कि बचपन का वाक्य प्राण बन जाता है। शीर्षक वचन है, व्यक्ति-नाम नहीं। प्रसंग अमृतसर के बचपन से खुलता है। लहना सिंह लगभग बारह वर्ष का है। सहेली बाद में विवाह सूबेदार बोधा सिंह से करती है। जाने से पहले वचन लेती है — पति संकट में हो तो उसे बचाना। नाम कहानी में प्रायः नहीं रहता; सर्वनाम शीर्षक चलता है। अर्थ यह है कि वचन व्यक्ति से बड़ा हो जाता है। भाव यह है कि प्रेम अधिकार नहीं, रक्षा है। लहना रखता है। पलटन उसे प्रथम विश्वयुद्ध के फ्रांस ले जाती है।
रूप कहानी है। शिल्प पूर्वदीप्ति है — वर्तमान युद्ध से स्मृति खुलती है, फिर युद्ध पर लौटती है। पाँच खंड कथा बाँधते हैं। एक प्रभाव त्याग की चोट है। सहेली आलंबन है; कर्म लहना का है। 1960 की फिल्म पाठ नहीं। सुखमय जीवन और बुद्ध का काँटा अन्य कहानियाँ हैं। एक टोकरी भर मिट्टी सप्रे 1901 की है, यह नहीं।
निष्कर्ष यह है कि वचन गोली से नहीं, बचाव और मृत्यु से पूरा होता है; रूप 1915 की सरस्वती-कहानी है, फिल्म नहीं।
Or
चंपा आकाशदीप इसलिए नहीं छोड़ती कि कर्तव्य प्रेम से बड़ा बैठता है। संग्रह 1929 उसी नाम का है; परीक्षा का पाठ कहानी है, पूरी पुस्तक नहीं। नाम दीपस्तंभ है — समुद्र पर जहाजों का मार्ग। अर्थ कर्तव्य का प्रकाश भी है। रूप ऐतिहासिक-आदर्श कहानी है। देशकाल ताम्रलिप्ति का स्पर्श, पोत, द्वीप, सागर। नायिका चंपा क्षत्रिय-पुत्री है। नायक बुद्धगुप्त ताम्रलिप्ति का क्षत्रिय, जलदस्यु-जीवन से जुड़ा। सेविका जया। पोताध्यक्ष मणिभद्र का प्रस्ताव घृणा जगाता है; यहीं प्रतिशोध का बीज है। चंपा आजीवन आलोक जलाती है। प्रेम साथ चलना चाहता है; कर्तव्य दीप जलाए रखना चाहता है।
शीर्षक वस्तु भी है, मूल्य भी है। बिना दीप के नाम खाली रह जाता। बिना चंपा के आलोक केवल स्तंभ रह जाता। अंत भारत-प्रस्थान पूरा नहीं होता। प्रेम अधिकार की विजय नहीं, प्रकाश की विजय है। स्कंदगुप्त 1928 का नाटक है, यह दीप नहीं। ध्रुवस्वामिनी और चंद्रगुप्त भी नाटक हैं। कामायनी महाकाव्य है। पुरस्कार दूसरी कहानी है। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली, गरिमा।
निष्कर्ष यह है कि दीप इसलिए नहीं छूटता कि कर्तव्य प्रेम से बड़ा बैठता है; कृति 1928 की कहानी है, स्कंदगुप्त नहीं।
Q. 3 (8 marks) · Unit 3
रफीकुद्दीन की शरण अधूरी क्यों रहती है?
Or: शामनाथ माँ को दावत में कैसे इस्तेमाल करता है?
Model answer
रफीकुद्दीन की शरण इसलिए अधूरी रहती है कि दंगे का दबाव फर्ज तोड़ता है। देशकाल लाहौर, 1947, विभाजन। शीर्षक फर्ज है — शरण देना। अर्थ यह भी है कि फर्ज टूटता है। नायक देविन्दरलाल हिन्दू है, जालंधर जाना चाहता है। मित्र रफीकुद्दीन मुसलमान वकील है। वह बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक की रक्षा का फर्ज बताता है, जाने नहीं देता। दंगा शुरू होता है। लूट, आग, हत्या। देविन्दरलाल का बसा स्थान जलता है। पनाह मित्र के यहाँ बैठती है। नाम देने वाले और टूटने वाले दोनों पर बैठता है। रूप विभाजन-कहानी है, इतिहास-उपन्यास नहीं।
एक प्रभाव इंसानियत की चोट है। रफीकुद्दीन दबाव में अधूरी शरण देता है, फिर शेख अतीउल्लाह की गैरेज तक ले जाता है। सुरक्षित जगह उपद्रव की जड़ भी बनती है। जैबुन्निसा काट करती है। पत्र बाद में अहसान नहीं, इल्तजा है। शेखर एक जीवनी 1941–44 उपन्यास है, व्यक्ति-विकास। नदी के द्वीप उपन्यास अलग है। तमस साहनी का दंगा-उपन्यास है, यह शरण-पाठ नहीं। झूठा सच यशपाल का है, निर्धारित नहीं।
निष्कर्ष यह है कि शरण इसलिए अधूरी है कि फर्ज संस्था के भय से कटता है; रूप 1947 की लाहौर-कहानी है, तमस नहीं।
Or
शामनाथ माँ को दावत में इसलिए इस्तेमाल करता है कि तरक्की माँ के शरीर पर टिकती है। चीफ विभाग का अफसर है, अंग्रेजी-बोल। दावत तरक्की का औजार है। नाम मेहमान का है; केंद्र माँ का है। नायक मिस्टर शामनाथ कर्मचारी-पुत्र है। साथ पत्नी। माँ ग्रामीण बोली, अनपढ़ अंग्रेजी, फुलकारी। खल दबाव दिखावा है। एक बैठक की तैयारी एक प्रभाव बनाती है — इज्जत माँ को छिपाती है। प्रसंग सजावट, पेय, फूल से खुलता है। चिंता यह है कि माँ दिख न जाए — खर्राटे, देसी वेश, ग्रामीण बोली। माँ बरामदे के कोने या पीछे ठहराई जाती है।
शीर्षक विडम्बना रखता है। दावत चीफ की कही जाती है; श्रम माँ का है। चीफ आता है, सामना हो जाता है, गाँव और फुलकारी रीझते हैं। अंत उपयोग है — पुत्र तभी गले लगता है जब अफसर खुश होता है। माँ हरिद्वार जाना चाहती है; तरक्की सुनकर रुकती है। रूप मध्यवर्गीय व्यंग्य-कहानी है। तमस 1973 उपन्यास है, यह दावत नहीं। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 नाटक है। बलराज साहनी अभिनेता हैं, लेखक भीष्म हैं।
निष्कर्ष यह है कि इस्तेमाल इसलिए है कि इज्जत माँ के शरीर पर टिकती है, प्रेम पर नहीं; रूप 1956 की कहानी है, तमस नहीं।
Q. 4 (8 marks) · Unit 4
न्योता न आने पर सोमा का दिन कैसे कटता है?
Or: वाचक-माँ लेखन और बच्चे के बीच क्यों पिसती है?
Model answer
न्योता न आने पर सोमा का दिन काम से कटता है, सूनापन मिटता नहीं। शीर्षक स्थिति है — स्त्री अकेली है। नायिका सोमा बुआ। आरंभ में परित्यक्ता का संकेत है। जवान बेटा मर चुका है। पति संन्यासी हैं, साल में एक महीना आते हैं, शेष हरिद्वार। स्वभाव कर्कश है, प्यार से बात नहीं, बाहर जाना नापसंद है। विवाह का नाम बाकी है, साथ नहीं। पति होते हुए भी सूनापन पूरा है। रूप स्त्री-अकेलापन की कहानी है, विधवा-उपदेश नहीं। एक प्रभाव सूनेपन की चोट है। नाम दोनों ओर काटता है। जो अकेली कही जाती है, वही दूसरों के शुभ-अशुभ में काम करके दिन काटती है।
प्रसंग न्योता है। मृत देवर के रिश्तेदार की बेटी का ब्याह। अंगूठी बेचकर सौगात, साड़ी रंगना, नई चूड़ियाँ। मुहूर्त पाँच बजे का था, सात बज जाते हैं। राधा पूछती है; बुआ कहती है — अभी बना लूँगी। अंत चूल्हा चलता है, दिल बुझा रहता है। महाभोज 1979 उपन्यास है। आपका बंटी 1971 बाल-उपन्यास है। यही सच है दूसरी कहानी है; रजनीगंधा फिल्म अलग है। एक इंच मुस्कान सह-लेखन है। बिना दीवारों का घर नाटक है।
निष्कर्ष यह है कि दिन काम से कटता है, सूनापन मिटता नहीं; रूप कहानी है, महाभोज नहीं।
Or
वाचक-माँ गलत होता पंचतंत्र में लेखन और बच्चे के बीच इसलिए पिसती है कि एक शरीर दो साधना नहीं चला पाता। पाठ्यक्रम-नाम राजे सेठ; लेखिका राजी सेठ भी कही जाती हैं — एक ही नाम। पंचतंत्र विष्णु शर्मा की नीति-कथा है — पशु-कथा से जीना सिखाना। शीर्षक कहता है कि वही नीति आधुनिक स्त्री-रिश्ते में गलत बैठती है। रूप आत्मकथात्मक कहानी है, नीति-ग्रंथ नहीं, उपन्यास नहीं। वाचक युवा माँ है। छोटा बच्चा आँचल तक सीमित है। पितृसत्ता पुरुष को जन्मजात फायदा देती है। माँ होना अपने को भूलना — समाज की यह सचाई कथा का दबाव है। वाचक खाना, बर्तन, व्यवस्था और लेखन एक साथ साधना चाहती है। एक प्रभाव स्वप्न और दायित्व के बीच पिसने की चोट है।
नाम व्यंग्य है, उपदेश नहीं। अंत दोहरी हार है — न लिखना चल पाता है, न बच्चे के साझे पल बचते हैं। बचा अपराध-बोध। तत-सम उपन्यास है। निष्कवच उपन्यास है। हिंदी अकादमी सम्मान कथा नहीं। अकेली स्त्री-नाम है। ज़िंदगी और जोंक प्रतीक-नाम है। यह नीति-नाम है जो टूटता है।
निष्कर्ष यह है कि पिसना इसलिए है कि पितृसत्ता माँ और लेखिका को एक साथ नहीं चलने देती; रूप कहानी है, नीति-ग्रंथ नहीं।
Q. 5 (8 marks) · Unit 5
वर्षगाँठ माँ की चिंता कैसे काटती है?
Or: एक वोट रनवीर को कैसे हराता है?
Model answer
वर्षगाँठ स्नेहबंध में माँ की चिंता इसलिए काटती है कि बहू के आचरण पर गर्व बैठता है। एम.ए. हिन्दी, आगरा विश्वविद्यालय, 1956। कहानी, बाल-कथा, उपन्यास। पद्मश्री 2018, साहित्य-शिक्षा। भवभूति अलंकरण 1998, मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन। निर्धारित स्नेहबंध है। वाचक माँ है। पुत्र ध्रुव सेतु है। होनेवाली बहू मीता कसौटी है। आचार-सूची स्नेह का कठोर सिरा है; वर्षगाँठ गर्व का नरम सिरा है। संग्रह स्नेह बंध तथा अन्य कहानियाँ; पहले मध्यांतर 1977, पटाक्षेप, पराजय। कुछ कथाओं से सात फेरे धारावाहिक बना; गुलज़ार के किरदार में कुछ कथाएँ गईं — निर्धारित यही एक कहानी है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, छोटे अनुभव। दृष्टि परिवार, स्नेह, दैनंदिन क्षण की है।
वाचक प्रायः उत्तम पुरुष। मनोहर श्याम जोशी अलग लेखक हैं। जोशी मन्नू का विलोम नहीं, परिवार-परत हैं। मन्नू सूनापन देती हैं। जोशी स्नेह को बंधन और अपनापन दोनों बनाती हैं। पुष्पा गाँव की राजनीति देती हैं। सीमा मध्यवर्ग-सिमटाव। गुण यह कि छोटी अनुभूति परीक्षा का प्रश्न बनती है। बिना स्नेहबंध काटे परिचय पद्मश्री-पर्दा रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि वर्षगाँठ चिंता इसलिए काटती है कि आचरण सूची से बड़ा बैठता है; रूप कहानी है, धारावाहिक नहीं।
Or
एक वोट फैसला में रनवीर को इसलिए हराता है कि पत्नी का वोट नहीं मिलता। शीर्षक निर्णय है। रूप पत्र-शैली है — नायिका वसुमती गुरु मास्साब को लिखती है। पंचायत-नाटक नहीं। नायिका स्त्रियों के वोट से प्रधान चुनी जाती है। पति रनवीर पहले प्रधान, फिर ब्लॉक प्रमुख। मर्यादा थोपते हैं — चबूतरे पर मत बैठो, बाहर मत निकलो, दस्तखत दो। दस्तखत बसुमती देवी। स्कूल-गली-दवा के सपने कटते हैं। हरदेई फौजी-पति की स्त्री है, बाप का शोषण। वसुमती पंचायत में पक्ष में फैसला देकर लौटती है। रात पति डपटता है। भोर कुएँ की मृत्यु। अर्थ यह भी है कि निर्णय पलटा जाता है।
नाम तीन परत है। पंचायत का फैसला। पति का रोक। अंत में एक वोट का फैसला — रनवीर एक वोट से हारते हैं, पत्नी का वोट नहीं मिला। एक प्रभाव पद की विडम्बना है। चाक 1997 उपन्यास है। इदन्नमम 1994 उपन्यास है। अल्मा कबूतरी, झूला नट उपन्यास हैं। कस्तूरी कुंडल बसै आत्मकथा है। फैसला पर कथा पुरस्कार; इसी नाम का संग्रह भी है, निर्धारित कहानी है।
निष्कर्ष यह है कि एक वोट इसलिए हराता है कि फैसला काटने वाली स्त्री वोट नहीं देती; रूप पत्र-कहानी है, चाक नहीं।
Section C
Q. 1 (20 marks) · Unit 1
हिन्दी कहानी तिलिस्म से यथार्थ तक कैसे आई?
Model answer
हिन्दी कहानी तिलिस्म से यथार्थ तक इसलिए आई कि गद्य ने संक्षिप्त कला-कथा अपनाई। पृष्ठभूमि प्रेस, शिक्षा, सरस्वती जैसी पत्रिकाएँ, बंगला-अंग्रेज़ी गल्प और नवजागरण है। माधवराव सप्रे — 1871–1926 — की एक टोकरी भर मिट्टी 1901 प्रायः प्रथम हिन्दी कहानी मानी जाती है। विषय ज़मीन, कर और निर्धन किसान है। भाषा खड़ी बोली गद्य है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी — 7 जुलाई 1883, जयपुर; निधन 1922, काशी — की उसने कहा था जून 1915 सरस्वती में छपी। आलोचना उसे पहली पूर्ण कलात्मक आधुनिक कहानी कहती है — वचन, युद्ध-स्मृति, कसाव। राजेंद्र यादव आरंभ का बड़ा नाम यहीं देखते हैं। इंशा अल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, आधुनिक कहानी का पूरा रूप नहीं। भारतेंदु युग नाटक और निबंध में अधिक शक्ति रखता है; कहानी अभी सीख रही है।
दूसरा सोपान प्रेमचंद युग है। धनपत राय प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880, लमही, वाराणसी; निधन 8 अक्टूबर 1936। नमक का दारोगा, पंच परमेश्वर, ईदगाह, पूस की रात, कफन, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी परीक्षा के स्थिर संकेत हैं। दृष्टि यथार्थ है। भाषा खड़ी बोली बोलचाल की है। नायक किसान, बालक, स्त्री, निर्धन कर्मचारी हो सकता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। जयशंकर प्रसाद — 30 जनवरी 1889–15 जनवरी 1937, काशी — आकाशदीप जैसी कहानी में आदर्श, त्याग और काव्य-गद्य रखते हैं। विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, सुदर्शन साथ की पंक्ति हैं। गोदान और रंगभूमि उपन्यास हैं, यह पत्र नहीं। कहानी-संग्रह मानसरोवर की चर्चा इतिहास में आती है।
तीसरा सोपान प्रेमचंदोत्तर है। जैनेन्द्र कुमार — 1905, कौड़ियागंज–1988 — पाजेब 1942। अज्ञेय — 1911–1987 — शरणदाता। यशपाल 1903–1976 प्रगतिशील स्वर। अश्क 1910–1996 मध्यवर्ग। भीष्म साहनी — 1915 रावलपिंडी–2003 — चीफ की दावत। रांगेय राघव — 1923 आगरा–1962 — गदल। मन, व्यक्ति, जाति, व्यंग्य खुलते हैं। त्यागपत्र, शेखर एक जीवनी, तमस, मुर्दों का टीला उपन्यास हैं, यह विकास कहानी का है। चौथा नई कहानी है — स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर 1950 का दशक। मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा का परिंदे 1959, मन्नू भंडारी। नामवर सिंह कहानी नई कहानी में इस मोड़ को बाँधते हैं।
पाँचवाँ साठोत्तरी, समांतर और स्त्री-दलित है। ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह शहर और कटु यथार्थ लाते हैं। समांतर कहानी कमलेश्वर से जुड़ी चर्चा है — आम आदमी, तंत्र, समाचार-गद्य। अकहानी प्रयोग का सिरा है — गंगा प्रसाद विमल जैसे नाम संकेत रहते हैं। अमरकांत सादी भाषा से करुण-यथार्थ रखते हैं — ज़िंदगी और जोंक। राजे सेठ गलत होता पंचतंत्र, मालती जोशी स्नेहबंध, मैत्रेयी पुष्पा फैसला, सांभरिया फुलवा। विकास निषेध और ग्रहण दोनों है। सप्रे आरंभ देते हैं। गुलेरी कला देते हैं। प्रेमचंद यथार्थ देते हैं। नई कहानी व्यक्ति देती है। दलित गवाही देती है। सीमा यह कि हर सोपान को केवल एक नाम से बाँधना अधूरा है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं।
निष्कर्ष यह है कि तिलिस्म कौतुक है और यथार्थ साधारण मनुष्य है; हिन्दी कहानी सप्रे-गुलेरी से प्रेमचंद तक उसी मोड़ पर आती है, फिर मन और स्त्री-दलित खुलते हैं।
Q. 2 (20 marks) · Unit 2
उसने कहा था वचन की कहानी कैसे है?
Model answer
उसने कहा था वचन की कहानी इसलिए है कि बचपन का वाक्य युद्ध में प्राण बनता है। कथावस्तु दो समयों की है, संयोग की नहीं। पहला अमृतसर का बचपन। लहना सिंह लगभग बारह वर्ष का है। सहेली से बात, हँसी, छुपना, बाज़ार और खेल। बाद में वह विवाह सूबेदार बोधा सिंह से करती है। जाने से पहले वचन लेती है — पति संकट में हो तो उसे बचाना। भाव यह है कि प्रेम अधिकार नहीं, रक्षा है। लहना रखता है। वर्ष बीतते हैं। पलटन उसे फ्रांस ले जाती है। शीर्षक सर्वनाम से चलता है; सहेली का नाम प्रायः नहीं रहता। वचन व्यक्ति से बड़ा हो जाता है। रूप कहानी है, उपन्यास नहीं, नाटक नहीं।
दूसरा समय प्रथम विश्वयुद्ध का फ्रांस है। वर्तमान खाई और घाव है। वजीरा सिंह पलटन का हँसोड़ साथी है। लहना मन की बात उसी से कहता है। बोधा सिंह और हजारा सिंह उसी मोर्चे पर हैं। लहना पहचानता है। वचन जागता है। वह अपना कपड़ा-आराम देता है, घाव छिपाता है, दूसरों को बचाता है। गोली और त्याग एक हो जाते हैं। मृत्यु वचन पूरा करती है। प्रभाव करुण और वीर मिला है। यह कफन की भूख नहीं। यह चंपा का दीप नहीं। यह शंका का बाल-मन नहीं। एक सिपाही एक वाक्य के नीचे मरता है।
फॉर्स्टर कारण कहते हैं; यहाँ कारण एक वाक्य है, गोली नहीं। आकाशदीप में कारण दीप और प्रतिशोध है। पाजेब में कारण शंका है। तीनों अलग हैं। पाँच खंड और पूर्वदीप्ति कथा को बाँधते हैं। वर्तमान युद्ध से स्मृति खुलती है, स्मृति से युद्ध पर लौटती है। हिन्दी में यह कसाव 1915 में नया कहा जाता है। बिना बचपन के युद्ध समाचार रह जाता। बिना युद्ध के वचन अधूरा रह जाता। बिना पूर्वदीप्ति के दो देशकाल जुड़ते नहीं। वाचक वर्णन और संवाद मिलाता है। भाषा खड़ी बोली है, पंजाबी-स्वाद और युद्ध-गद्य मिला है। प्रसाद का संस्कृत-गर्भ यहाँ नहीं।
पात्र कम हैं। लहना नायक है। सहेली आलंबन है, पूरी नायिका-कथा नहीं। बोधा सिंह बचाने का लक्ष्य है। हजारा सिंह मोर्चे का साथी है। वजीरा हँसी से दबाव हल्का करता है, फिर चोट बैठती है। सीमा आदर्शीकरण की है। गुण यह कि हिन्दी कहानी को 1915 में युद्ध और वचन मिला। निषेध साफ हैं। एक टोकरी भर मिट्टी सप्रे 1901 की है, यह नहीं। सुखमय जीवन और बुद्ध का काँटा गुलेरी की अन्य कहानियाँ हैं, निर्धारित यह वचन-पाठ है। 1960 की फिल्म उसने कहा था पाठ की जगह नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; बचपन के लंबे संवाद यहाँ नहीं उतारे जाते। पो एक प्रभाव माँगते हैं; यह प्रभाव वचन पूरा होना है।
निष्कर्ष यह है कि वचन की कहानी इसलिए है कि बचपन का वाक्य युद्ध में प्राण बनता है; कृति सरस्वती की कहानी है, फिल्म नहीं।
Q. 3 (20 marks) · Unit 3
शरणदाता विभाजन में फर्ज कैसे टूटता है?
Model answer
शरणदाता विभाजन में फर्ज इसलिए टूटता है कि शरण देने वाला दबाव में अधूरा रह जाता है। देशकाल लाहौर, 1947, विभाजन। अज्ञेय जन्म 7 मार्च 1911, कसया, कुशीनगर; निधन 4 अप्रैल 1987। दृष्टि व्यक्ति, निर्णय, नैतिक दबाव की है। भाषा खड़ी बोली; वाक्य कसे, विचार घने। कथावस्तु इतिहास-उपन्यास नहीं, एक बैठक का फर्ज है। नायक देविन्दरलाल हिन्दू है, जालंधर जाना चाहता है। मित्र रफीकुद्दीन मुसलमान वकील है। वह बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक की रक्षा का फर्ज बताता है। जाने नहीं देता। दंगा शुरू होता है। लूट, आग, हत्या। देविन्दरलाल का बसा स्थान जलता है। पनाह मित्र के यहाँ बैठती है। शीर्षक दोनों पर बैठता है — जो देता है, जो नहीं निभा पाता।
मध्य दबाव है। गुंडे शिकार माँगते हैं, धर्म का नारा उनका औजार है। डॉक्टर मरीज देखने जाता है, छुरा पीछे से लगता है। रेल-कर्मचारी शरण देता है, पुलिस उसे मारती है। सिक्ख भी शरण का फर्ज निभाते हैं। ये रेखाएँ दंगे को केवल एक परिवार की कथा नहीं रहने देतीं। रफीकुद्दीन लाचार होता है। अकेले इंसान को झुकना पड़ता है। वह मित्र को निकालता नहीं चाहता, निकालने पर मजबूर होता है। शरण अधूरी रहती है। मित्र को शेख अतीउल्लाह की गैरेज में रखवाता है। शेख पुलिस दफ्तर का हेड क्लर्क है। पत्नी, पुत्री जैबुन्निसा, पुत्र आबिद। सुरक्षित जगह उपद्रव की जड़ भी बनती है।
अंत विष और काट है। खाने की तह में चेतावनी आती है। बिलार मरता है। जैबू प्राण बचाती है। हिन्दुस्तान पहुँचकर रेडियो-अपील होती है। लाहौर से पत्र आता है। भाव अहसान नहीं, इल्तजा है — अल्पसंख्यक मजलूम को इंसान की तरह याद रखना। विडम्बना तीन परत है। एक मित्र रोकता है, फिर निकालता है। दूसरा शरण के साथ विष देता है। तीसरी पुत्री काट करती है। आबिद और शेख संप्रदाय का विष हैं। जैबू मनुष्य है, केवल मुसलमान पात्र नहीं। एक प्रभाव इंसानियत की चोट है, युद्ध-वचन नहीं, दीप नहीं। तमस दंगा फैलाता है। यह फर्ज सिमटाता है। शेखर व्यक्ति-विकास है, यह संकट-एक बैठक है।
शिल्प नैतिक द्वंद्व और कसे वाक्य हैं। घटना दंगा है, केंद्र फर्ज है। गुलेरी पूर्वदीप्ति रखते हैं। प्रसाद गरिमा रखते हैं। अज्ञेय निर्णय और विडम्बना रखते हैं। सीमा यह कि दंगे की चौड़ाई उपन्यास माँग सकती है; कहानी सिमटाती है। गुण यह कि छोटी कथा बड़ा प्रश्न बनाती है। निषेध साफ हैं। शेखर एक जीवनी 1941–44 उपन्यास है। नदी के द्वीप उपन्यास है। तमस 1973 साहनी का विभाजन-उपन्यास है, यह शरण-पाठ नहीं। झूठा सच यशपाल का है, यह पाठ नहीं। चीफ की दावत दिखावे का नाम है, फर्ज का नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; दंगे के दृश्य और पत्र का पाठ यहाँ नहीं उतारे जाते। बिना लाहौर के शीर्षक हवा में रहता। बिना जैबू के अंत केवल भागना रह जाता।
निष्कर्ष यह है कि फर्ज इसलिए टूटता है कि शरण देने वाला दबाव में अधूरा रह जाता है; रूप विभाजन की कहानी है, तमस या शेखर नहीं।
Q. 4 (20 marks) · Unit 4
अकेली सूनापन को कैसे कथा बनाती है?
Model answer
अकेली सूनापन को इसलिए कथा बनाती है कि साथ नाम का है, जीवन का नहीं। कथावस्तु सोमा बुआ की है। मन्नू जन्म 3 अप्रैल 1931, भानपुरा, मंदसौर; निधन 15 नवंबर 2021, गुरुग्राम; बचपन महेंद्र कुमारी। पति राजेंद्र यादव; सारा आकाश उनकी कृति है, यह पाठ नहीं। दृष्टि स्त्री-मन, परिवार-दबाव, नई कहानी की है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली। शीर्षक स्थिति है — स्त्री अकेली है। आरंभ में परित्यक्ता का संकेत है। जवान बेटा मर चुका है। पति संन्यासी हैं, साल में एक महीना आते हैं, शेष हरिद्वार। स्वभाव कर्कश है। प्यार से बात नहीं। बाहर जाना नापसंद है। भाव यह है कि विवाह का नाम बाकी है, साथ नहीं। सोमा पति के होते हुए भी अकेली है, विधवा-सूची से नहीं।
दिनचर्या काम की है। गाँव में शादी, मुंडन, गमी — छाती फाड़कर श्रम। हारी-बीमारी नहीं देखती। व्यवधान उसी एक महीने का है जब पति आते हैं। नाम दोनों ओर काटता है। जो अकेली कही जाती है, वही दूसरों के शुभ-अशुभ में काम करके दिन काटती है। चीफ की दावत माँ को छिपाती है। यह स्त्री खुद दिखना चाहती है, बुलावा नहीं आता। बिना सोमा के शीर्षक हवा में रहता। बिना काम के सूनापन केवल रोना रह जाता। एक प्रभाव सूनेपन की चोट है, दावत की हँसी नहीं, पाँत की गोली नहीं। रूप कहानी है, विधवा-उपदेश नहीं।
मध्य न्योता है। मृत देवर के रिश्तेदार की बेटी का ब्याह गाँव में तय होता है। बुआ जान लेती है कि बुलावा आ सकता है। दो चिंताएँ — खाली हाथ न जाना, पहनकर क्या जाना। मृत पुत्र की अंगूठी बेचकर सौगात बनती है। पुरानी साड़ी रंगी जाती है, कलफ और चमक। घिसी चूड़ियाँ उतरती हैं, नई चढ़ती हैं। उत्साह बच्चे जैसा है। विवाह-दिन सुबह से दरवाजे पर टकटकी है। मुहूर्त पाँच बजे का था। शाम सात बज जाते हैं। राधा छत पर छाया-मूर्ति देखकर पूछती है। बुआ यकीन नहीं करती कि सात बज गए। खाने का प्रश्न आने पर निराशा छिपाकर कहती है — अभी बना लूँगी।
अंत इंतजार है। सौगात संदूक में लौटती है। साड़ी तह होती है। नई चूड़ियाँ उतरती हैं। दिल बुझा रहकर भी चूल्हा चलता है। भाव यह है कि स्त्री के दुख पर काम हावी रहता है। महाभोज 1979 राजनीति फैलाता है। आपका बंटी 1971 बच्चे को फैलाता है। यही सच है दूसरी कहानी है; रजनीगंधा फिल्म है। एक इंच मुस्कान सह-लेखन है। बिना दीवारों का घर नाटक है। यह एक दिन का सूनापन सिमटाता है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा दृश्य नहीं। सीमा यह कि व्यथा एक विवाह-दिन पर सिमट सकती है। गुण यह कि न्योता न आने पर भी चौका नहीं रुकता। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव अकेलेपन की चोट है।
निष्कर्ष यह है कि सूनापन कथा इसलिए बनता है कि साथ नाम का है, जीवन का नहीं; रूप कहानी है, महाभोज या फिल्म नहीं।
Q. 5 (20 marks) · Unit 5
फैसला पत्र में स्त्री-पद कैसे फँसता है?
Model answer
फैसला पत्र में स्त्री-पद इसलिए फँसता है कि प्रधान हाथ में रहकर भी पति का साया काटता है। कथावस्तु पत्र की है। पुष्पा जन्म 30 नवंबर 1944, सिकुर्रा, अलीगढ़; बचपन बुंदेलखंड; शिक्षा झाँसी, खिल्ली; एम.ए. हिन्दी, बुंदेलखंड कालेज। दृष्टि ग्रामीण स्त्री, पंचायत, पितृसत्ता की है। भाषा ब्रज-बुंदेली स्पर्श की खड़ी बोली, संवाद तेज। वाचक वसुमती गुरु मास्साब को लिखती है। रूप पत्र-शैली की कहानी है, पंचायत-नाटक नहीं, उपन्यास नहीं। नायिका स्त्रियों के वोट से प्रधान चुनी जाती है। चकित है। पति रनवीर पहले प्रधान, फिर ब्लॉक प्रमुख। मर्यादा थोपते हैं — चबूतरे पर मत बैठो, बाहर मत निकलो, दस्तखत दो। शीर्षक निर्णय है। अर्थ यह भी है कि निर्णय पलटा जाता है, और अंत में वोट का फैसला पति को काटता है।
मध्य स्त्री-मंडल है। ईसुरिया गड़रिया की बहू मुखर मित्र है, बराबरी का ज़माना कहती है। कुसुमा, गोपी, सरूपी साथ हैं। देववीर देवर रोकता है। दस्तखत बसुमती देवी — स्कूल-गली-दवा के सपने कटते हैं। हरदेई फौजी-पति की स्त्री है, बाप का शोषण। वसुमती पंचायत में पक्ष में फैसला देकर लौटती है। रात पति डपटता है। भोर कुएँ की मृत्यु। पिता पति पर इल्जाम रखता है। भाव यह है कि स्त्री का फैसला व्यवस्था पलट देती है। नाम तीन परत है। पंचायत का फैसला। पति का रोक। अंत में एक वोट का फैसला। अकेली स्त्री-नाम है। फुलवा स्त्री-नाम है। यह निर्णय-नाम है। बिना पत्र के शैली हवा में रहती। बिना प्रधान पद के शीर्षक केवल झगड़ा रह जाता।
अंत प्रमुख-चुनाव है। रनवीर एक वोट से हारते हैं — पत्नी का वोट नहीं मिला। एक वोट शीर्षक पूरा करता है। चाक 1997 उपन्यास फैलाता है। इदन्नमम 1994 उपन्यास है। यह पत्र एक फैसला सिमटाता है। फैसला पर कथा पुरस्कार; इसी नाम का संग्रह भी है, परीक्षा कहानी माँगती है। आत्मकथा कस्तूरी कुंडल बसै 2003, गुड़िया भीतर गुड़िया 2008 अलग विधा हैं। अल्मा कबूतरी, झूला नट, बेतवा बहती रही उपन्यास हैं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा पत्र नहीं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण पद और पत्नी-मर्यादा है, संयोग नहीं। स्नेहबंध में कारण स्नेह-नियम है। फुलवा में कारण जाति-उलटन है।
शिल्प पत्र, गाँव-संवाद, स्त्री-मंडल है। घटना चुनाव और पंचायत है, केंद्र फैसला है। जोशी बैठक रखती हैं। पुष्पा चबूतरा रखती हैं। सीमा राजनीति की चौड़ाई। गुण यह कि एक वोट अंत काटता है। हिंदी अकादमी दिल्ली से जुड़ाव की चर्चा रहती है; निर्धारित पाठ यही पत्र-कहानी है। निषेध साफ हैं। बिना हरदेई के शीर्षक केवल पद रह जाता। बिना एक वोट के अंत दया रह जाता, फैसला नहीं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव पद की विडम्बना है। नामवर कसाव कहते हैं; पुष्पा पत्र से कसाव चलाती हैं। पुष्पा जोशी का विलोम नहीं, गाँव की अगली परत हैं। प्रधान पद स्त्री के हाथ में रहकर भी पति का साया काटता है।
निष्कर्ष यह है कि स्त्री-पद इसलिए फँसता है कि प्रधान हाथ में रहकर भी पति का साया काटता है; रूप कहानी है, चाक या आत्मकथा नहीं।
सेट 2
सेट 2 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। प्रश्न सेट 1 और इकाई टेस्ट से भिन्न हैं। खंड अ अनिवार्य। खंड ब आंतरिक विकल्प सहित पाँचों। खंड स में कोई तीन।
Section A
Q. 1. गुलेरी का निधन कहाँ हुआ?
1922। जन्म 7 जुलाई 1883, जयपुर।
Q. 2. स्कंदगुप्त मुख्यतः क्या है?
प्रसाद, 1928। आकाशदीप उसी वर्ष की कहानी है।
Q. 3. गदल जनवरी 1955 में किस पत्रिका में छपी?
राघव। हंस मई 1997 फुलवा है।
Q. 4. डिप्टी कलेक्टरी किस वर्ष की ख्याति-कहानी है?
अमरकांत। निर्धारित ज़िंदगी और जोंक है।
Q. 5. जूठन मुख्यतः क्या है?
ओमप्रकाश वाल्मीकि। फुलवा सांभरिया की कहानी है।
Q. 6. प्रेमचंद का जन्म _____ गाँव में हुआ।
Answer: लमही — 31 जुलाई 1880। निधन 8 अक्टूबर 1936।
Q. 7. पाजेब _____ ई. की कहानी है।
Answer: 1942 — जैनेन्द्र। त्यागपत्र 1937 उपन्यास है।
Q. 8. शरणदाता के मुसलमान वकील _____ हैं।
Answer: रफीकुद्दीन — देविन्दरलाल हिन्दू मित्र। जैबू काट है।
Q. 9. अमरकांत का निधन _____ में हुआ।
Answer: इलाहाबाद — 17 फरवरी 2014। जन्म 1 जुलाई 1925, बलिया।
Q. 10. चाक _____ ई. का उपन्यास है।
Answer: 1997 — पुष्पा। फैसला निर्धारित कहानी है।
Section B
Q. 1 (8 marks) · Unit 1
नई कहानी व्यक्ति को केंद्र कैसे बनाती है?
Or: सप्रे और गुलेरी उद्भव पर कैसे बँटते हैं?
Model answer
नई कहानी व्यक्ति को इसलिए केंद्र बनाती है कि अनुभव निजी रहकर भी सामाजिक दबाव रखता है। मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर तीन स्थिर नाम हैं। निर्मल वर्मा का परिंदे 1959 प्रायः कला-टिक कहा जाता है — मौन, यूरोप-स्पर्श, भीतर की रिक्तता। मन्नू भंडारी स्त्री-स्वर जोड़ती हैं; अकेली उसी परत का निर्धारित पाठ है। नामवर सिंह कहानी नई कहानी में इस मोड़ को बाँधते हैं। यादव एक दुनिया समानांतर संकलन से स्वर जोड़ते हैं। प्रेमचंद का ग्राम-यथार्थ यहाँ केवल आलंबन नहीं रहता; अनुभव निजी और शहरी भी होता है।
शिल्प संकेत, फ्लैशबैक, अधूरा संवाद और मौन माँगता है। नई कहानी प्रेमचंद का पूरा निषेध नहीं; वह आदर्श और केवल ग्राम-यथार्थ से मुड़ती है। सीमा यह कि व्यक्ति कभी समाज से कटकर कमरे का चित्र रह जाता है। गुण यह कि हिन्दी कहानी को शहर और स्त्री-मन मिला। परिंदे कविता नहीं। आधे-अधूरे नाटक है, नई कहानी का पर्याय नहीं। सारा आकाश यादव का उपन्यास है। अकेली महाभोज नहीं।
निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति इसलिए केंद्र है कि अनुभव निजी रहकर भी सामाजिक दबाव रखता है; नाटक या उपन्यास उसके पर्याय नहीं।
Or
सप्रे और गुलेरी उद्भव पर इसलिए बँटते हैं कि एक आरंभ है, दूसरा कला। पृष्ठभूमि प्रेस, शिक्षा, सरस्वती, बंगला-अंग्रेज़ी गल्प और नवजागरण है। माधवराव सप्रे — 1871–1926 — की एक टोकरी भर मिट्टी 1901 प्रायः प्रथम हिन्दी कहानी मानी जाती है। विषय ज़मीन, कर और निर्धन किसान है। भाषा खड़ी बोली गद्य है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी — 1883 जयपुर, निधन 1922 काशी — की उसने कहा था जून 1915 सरस्वती में छपी। आलोचना उसे पहली पूर्ण कलात्मक आधुनिक कहानी कहती है — वचन, युद्ध-स्मृति, कसाव। इंशा अल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, पूरा आधुनिक रूप नहीं।
उद्भव एक तिथि नहीं। अर्थ यह है कि हिन्दी गद्य ने संक्षिप्त कला-कथा अपनाई। भारतेंदु युग नाटक-निबंध में अधिक शक्ति रखता है; कहानी अभी रूप सीख रही है। द्विवेदी युग सरस्वती से भाषा-शुद्धि और पाठक देता है। सहमति दो सिरों पर है — सप्रे 1901 आरंभ, गुलेरी 1915 कला। राजेंद्र यादव आरंभ का बड़ा नाम गुलेरी पर देखते हैं। बिना सहमति के विवाद अधूरा रहता है।
निष्कर्ष यह है कि सप्रे आरंभ हैं, गुलेरी कला हैं; दो सिरे एक तिथि नहीं, इंशा पूरा आधुनिक रूप नहीं।
Q. 2 (8 marks) · Unit 2
आशुतोष पर शंका क्यों बैठती है?
Or: स्कंदगुप्त आकाशदीप क्यों नहीं?
Model answer
आशुतोष पर शंका इसलिए बैठती है कि खोया गहना चोरी बन जाता है। पाजेब पैर का गहना है। शीर्षक वस्तु है, प्रतीक भी — चाह, दिखावा, संदेह। प्रसंग मध्यवर्गीय परिवार है। मुन्नी गहना पहनना चाहती है। गहना खो जाता है। चोरी की शंका आशुतोष पर बैठती है। बौजी और परिवार की दृष्टि दबाव चलाती है। घटना पतली है, दबाव घना है। जैनेन्द्र कहते हैं कि केवल शंका पर दंड नहीं चलता। अंत में पाजेब चोरी नहीं, खोई निकली। आशुतोष का बोझ झूठा था। रूप बाल-मनोविज्ञान की कहानी है, पूरा मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं।
नाम गहने से चलता है, न्याय-कथा से नहीं। एक प्रभाव शंका की चोट है। त्यागपत्र 1937 उपन्यास है, मृणाल-प्रमोद का विस्तार, यह गहना नहीं। सुनीता 1935, परख 1929, कल्याणी 1939 उपन्यास-पंक्ति है। मुक्तिबोध उपन्यास पर अकादमी 1979 निर्धारित नहीं। पद्म भूषण 1971 सम्मान है, कथा नहीं। भाषा छोटे वाक्य, विचार घने। देशकाल घर-परिवार का है। मध्यवर्ग की इज्जत बच्चे के भीतर उतरती है।
निष्कर्ष यह है कि शंका इसलिए बैठती है कि मध्यवर्ग की इज्जत बच्चे के भीतर उतरती है; रूप 1942 की कहानी है, त्यागपत्र नहीं।
Or
स्कंदगुप्त आकाशदीप इसलिए नहीं कि वर्ष पास है, विधा अलग है। नायिका चंपा। दीपस्तंभ, सागर, पोत, प्रेम और प्रतिशोध। पढ़ी जाती है। एक प्रभाव प्रकाश की चोट है। स्कंदगुप्त 1928 का नाटक है। ऐतिहासिक संघर्ष, रंगमंच, अभिनय, संवाद-दृश्य। खेला जाता है। लेखक एक — जयशंकर प्रसाद, जन्म 30 जनवरी 1889 काशी, निधन 15 जनवरी 1937। वर्ष पास है; विधा अलग है। चंपा ध्रुवस्वामिनी नहीं। बुद्धगुप्त चंद्रगुप्त नहीं। एक नारी-निर्णय नाटक में है, एक दीप-निर्णय कहानी में है। मिलाए बिना मूल्यांकन अधूरा, मिलाकर विधा भ्रम।
और भेद साफ रखे जाते हैं। ध्रुवस्वामिनी 1933 और चंद्रगुप्त 1931 भी नाटक हैं। कामायनी पद्य है। पुरस्कार दूसरी कहानी है। आकाशदीप का शिल्प संवाद-गरिमा और संस्कृत-गर्भ है। स्कंदगुप्त का शरीर रंगमंच है। कहानी एक बैठक में पूरी होती है; नाटक दृश्य माँगता है। प्रसाद कवि, नाटककार, कहानीकार तीनों हैं; पत्र कहानी माँगता है। सीमा आदर्श का बोझ कहानी पर भी है, पर रूप गद्य-कथा का रहता है।
निष्कर्ष यह है कि स्कंदगुप्त नाटक है, आकाशदीप निर्धारित कहानी है; एक नाम और एक वर्ष से दो विधाएँ नहीं ढकतीं।
Q. 3 (8 marks) · Unit 3
जैबू हैवानियत के बीच क्या काटती है?
Or: गदल पाँत पर क्यों आगे रहती है?
Model answer
जैबू शरणदाता में हैवानियत के बीच इंसानियत इसलिए काटती है कि विष के घर में चेतावनी बचती है। शेख अतीउल्लाह पुलिस दफ्तर का हेड क्लर्क है। पुत्री जैबू, पुत्र आबिद। रफीकुद्दीन मित्र देविन्दरलाल को उसी अहाते की गैरेज में रखवाता है। सुरक्षित जगह उपद्रव की जड़ भी बनती है। खाने की तह में चेतावनी आती है। बिलार मरता है। जैबू प्राण बचाती है। पिता विष की परत है। भाई संप्रदाय की परत है। वह मनुष्य है, केवल मुसलमान पात्र नहीं। प्रसंग दंगे का है; भाव यह है कि नेकी अकेले घर में भी बच सकती है।
बाद हिन्दुस्तान पहुँचकर रेडियो-अपील होती है। लाहौर से पत्र आता है। अहसान नहीं जताती; इल्तजा करती है कि अल्पसंख्यक मजलूम को इंसान की तरह याद रखा जाए। एक प्रभाव इंसानियत की चोट है। रफीकुद्दीन अधूरी शरण देता है; जैबू पूरी काट करती है। शेखर की नायिका यह नहीं। तमस का विस्तार यह नहीं। रूप कहानी का पात्र है। बिना चेतावनी के अंत केवल भागना रह जाता। बिना पत्र के इंसानियत नारा रह जाती।
निष्कर्ष यह है कि जैबू हैवानियत के बीच इंसानियत काटती है; रूप कहानी का पात्र है, शेखर की नायिका नहीं।
Or
गदल पाँत पर इसलिए आगे रहती है कि स्वाभिमान बिरादरी की नाक बन जाता है। जनवरी 1955, पत्रिका कहानी। शीर्षक नायिका का नाम है। वह गुर्जर स्त्री है। विधवा होकर मौनी से ब्याही जाती है। बड़ा बेटा निहाल। नरायन दूसरा पुत्र। चंपा और चमेली ब्याही बेटियाँ। डोड़ी देवर है, पहले पति गुन्ना का भाई। दुल्लो नए कुनबे की स्त्री-रेखा है। रूप बिरादरी और नारी-स्वाभिमान की कहानी है, दलित-आत्मकथा नहीं, प्रेम-त्रिकोण नहीं। दबाव वहाँ घन होता है जहाँ बिरादरी की पाँत और सरकार का कानून आमने-सामने होते हैं। निहाल कायर और सिंधनी कहता है; गदल उसी ताने को सीना ठोंककर लेती है।
नाम स्त्री-नाम है, पर अर्थ पाँत पर पूरा होता है। बिना पाँत के शीर्षक केवल नाम रह जाता। अंत गोली पेट में लगती है, सिर गिरता है। एक प्रभाव स्वाभिमान की मृत्यु है। मुर्दों का टीला उपन्यास अलग है। फुलवा बाद का दलित पाठ है, यह गुर्जर नायिका है। जूठन आत्मकथा है, यह नहीं। भाषा आंचल-स्पर्श की खड़ी बोली, संवाद तेज।
निष्कर्ष यह है कि आगे इसलिए रहती है कि स्वाभिमान पाँत का नाक बन जाता है; रूप 1955 की कहानी है, फुलवा नहीं।
Q. 4 (8 marks) · Unit 4
रजुआ की मृत्यु वाचक को शांति क्यों देती है?
Or: महाभोज अकेली क्यों नहीं?
Model answer
रजुआ की मृत्यु वाचक को इसलिए शांति देती है कि इस्तेमाल का आदमी हटता है। शीर्षक दो वस्तुएँ जोड़ता है। जोंक खून चूसती है। अर्थ यह है कि गरीबी और अपमान मनुष्य को चूसते हैं। उल्टा अर्थ भी बैठता है — मध्यवर्ग निर्धन को जोंक कहता है, श्रम चूसता खुद है। नायक रजुआ — निर्धन मजदूर, छोटे काम, बचा खाना, अपमान। वाचक उत्तम पुरुष, मध्यवर्ग, दर्पण। रजुआ साला कहकर पुकारा जाता है। श्रम लिया जाता है, इज्जत नहीं। रूप करुण-यथार्थ की कहानी है, दलित-आत्मकथा का पर्याय नहीं। देशकाल कस्बा-शहर का कर्मचारी-परिवेश, स्टेशन, खंडहर। एक प्रभाव शोषण की चोट है।
प्रसंग बीमारी तक जाता है। मृत्यु पर वाचक को शांति मिलती है, बोझ उतरता है। भाव दया का सुख नहीं, व्यंग्य है — निर्धन की ज़िंदगी काँटा थी, मृत्यु राहत बनती है। डिप्टी कलेक्टरी 1955 की दूसरी कहानी है, नौकरी-दिखावा, यह जोंक नहीं। हत्यारे, बहादुर, फर्क, मूस अन्य हैं। इन्हीं हथियारों से उपन्यास है। इसी नाम का संग्रह भी है; निर्धारित कहानी है।
निष्कर्ष यह है कि शांति इसलिए मिलती है कि इस्तेमाल का आदमी हटता है; राहत कलंक है, दया का सुख नहीं।
Or
महाभोज अकेली इसलिए नहीं कि राजनीति-विस्तार और सूनापन दो रूप हैं। नायिका सोमा बुआ। संन्यासी पति, मृत पुत्र, न्योता, सूनापन। एक दिन का इंतजार, एक प्रभाव। पढ़ी जाती है। महाभोज 1979 का उपन्यास है। राजनीति, नौकरशाही, भ्रष्टाचार, आम आदमी। विस्तार कई सूत्रों का है। लेखक एक — मन्नू भंडारी, 1931 भानपुरा–2021 गुरुग्राम। विधा अलग है। अकेली नई कहानी की स्त्री-परत है। महाभोज समकालीन राजनीति का दीर्घ रूप है। आपका बंटी 1971 बाल-उपन्यास है, धर्मयुग-ख्याति अलग। एक इंच मुस्कान 1962 सह-लेखन है। यही सच है कहानी है, रजनीगंधा फिल्म है। बिना दीवारों का घर नाटक है।
भेद आलंबन पर भी है। अकेली में आलंबन बुआ का अकेलापन है। महाभोज में आलंबन तंत्र और सत्ता है। बिना अंतर के एक लेखिका दो कृतियाँ एक नाम लगती हैं। पत्र कहानी माँगता है। सारा आकाश यादव का उपन्यास है, मन्नू का पर्याय नहीं। सीमा यह कि व्यथा एक विवाह-दिन पर सिमट सकती है; गुण यह कि न्योता न आने पर भी चौका नहीं रुकता।
निष्कर्ष यह है कि महाभोज उपन्यास है, अकेली निर्धारित कहानी है; एक नाम से दो विधाएँ नहीं ढकतीं।
Q. 5 (8 marks) · Unit 5
कुएँ का पानी फुलवा में कैसे उलटा दर्पण है?
Or: पत्र-शैली फैसला को पंचायत-नाटक से कैसे काटती है?
Model answer
फुलवा में कुएँ का पानी उलटा दर्पण इसलिए है कि पुरानी परत थूक और फूटे मटके की है, नई परत नल की है। नायिका दलित विधवा थी; बेटा राधा मोहन एस.पी. है। रामेश्वर जमींदार बलकार सिंह का पुत्र ईर्ष्या से आता है। पानी माँगा, थूक पड़ा, मटका फूटा। आज फुलवा के नल में पानी, रामेश्वर अभी उसी कुएँ पर है। हंस मई 1997, सांभरिया। पंडित माताप्रसाद का पता नहीं; फुलवा का पता शहर जानता है। रूप दलित-यथार्थ की कहानी है, आत्मकथा नहीं।
जूठन आत्मकथा है, यह मिलन नहीं। गदल पाँत पर मरती है; यह जीतती है। जोंक मजदूर चूसती है; यह जाति का अहं गिराती है। परती सिरहाने-पैताने शहर की परत है। संती बहू है; कुँवर नौकरानी जाति काटती है। बिना कुएँ के उलटन इतिहास खो देता है। एक प्रभाव जाति-उलटन की चोट है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, वैभव का पूरा दृश्य नहीं।
निष्कर्ष यह है कि कुआँ उलटा दर्पण इसलिए है कि जाति का अहं नल के आगे गिरता है; रूप कहानी है, जूठन नहीं।
Or
फैसला मैत्रेयी पुष्पा की कहानी है। जन्म 30 नवंबर 1944, सिकुर्रा। रूप पत्र-शैली है — नायिका वसुमती गुरु मास्साब को लिखती है। पढ़ी जाती है, खेली नहीं जाती। पंचायत घटना है, विधा नाटक नहीं। नायिका स्त्रियों के वोट से प्रधान चुनी जाती है। रनवीर मर्यादा थोपते हैं। हरदेई पर फैसला, रात उलटाव, कुएँ की मृत्यु। अंत एक वोट। अंधेर नगरी प्रहसन अलग पत्र है। चाक 1997 उपन्यास-विस्तार है।
भेद रूप पर है। पत्र एक प्रभाव सिमटाता है — पद की विडम्बना। नाटक संवाद और रंगमंच माँगता है। इदन्नमम उपन्यास है। आत्मकथा कस्तूरी कुंडल बसै अलग है। जोशी बैठक देती हैं; पुष्पा चबूतरा देती हैं — यह स्वर-भेद है, पंचायत-नाटक का पर्याय नहीं। ईसुरिया बराबरी याद दिलाती है। देववीर देवर रोकता है। फैसला पर कथा पुरस्कार है; निर्धारित कहानी है, संग्रह-मात्र नहीं। कुसुमा, गोपी, सरूपी स्त्री-मंडल हैं। पत्र पढ़ी जाती है, रंगमंच नहीं माँगती।
निष्कर्ष यह है कि पत्र-शैली कहानी है, पंचायत-नाटक नहीं; कृति निर्धारित फैसला है, चाक या प्रहसन नहीं।
Section C
Q. 1 (20 marks) · Unit 1
नई कहानी प्रेमचंद की अगली परत कैसे है?
Model answer
नई कहानी प्रेमचंद की अगली परत इसलिए है कि यथार्थ रहता है, केंद्र व्यक्ति और शिल्प बनते हैं। धनपत राय 1880–1936, लमही। ईदगाह, पूस की रात, कफन, नमक का दारोगा, पंच परमेश्वर सामाजिक प्रश्न प्रधान हैं। वाचक प्रायः सर्वज्ञ है। आदर्श कभी चित्र के साथ रहता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। नायक किसान, बालक, स्त्री, निर्धन कर्मचारी हो सकता है। नई कहानी स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर 1950 के दशक का मोड़ है। मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर स्थिर केंद्र हैं। निर्मल वर्मा का परिंदे 1959 कला-टिक कहा जाता है — मौन, यूरोप-स्पर्श, भीतर की रिक्तता। मन्नू भंडारी स्त्री-स्वर जोड़ती हैं, अकेली निर्धारित पाठ है। नामवर सिंह कहानी नई कहानी में इसे बाँधते हैं। यादव एक दुनिया समानांतर से स्वर जोड़ते हैं।
साम्य आधुनिक मनुष्य, खड़ी बोली और कहानी को जीवन का माध्यम मानना है। दोनों तिलिस्म से कटते हैं। दोनों साधारण नायक रख सकते हैं। कफन का घीसू और अकेली की सोमा दोनों दबाव में हैं, मार्ग अलग हैं। ईदगाह का मेला सामाजिक है; चीफ की दावत का दिखावा भी सामाजिक है, परत नई है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; दोनों सोपान उसी चिह्न की चालें हैं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रेमचंद की चोट भूख-मर्यादा है, नई कहानी की चोट अकेलापन-दांपत्य हो सकती है। अमरकांत सादी भाषा से यथार्थ वापस लाते हैं, पर प्रेमचंद का युग नहीं दोहराते। दोनों में उद्देश्य चित्र से निकलता है, नारे से नहीं।
वैषम्य आलंबन और दृष्टि पर है। प्रेमचंद बाहर का समाज और कारण दिखाते हैं — ऋण, ठंड, मेला, लाश। नई कहानी भीतर का अनुभव और संकेत दिखाती है — शहर, दांपत्य, रिक्तता। वर्मा मौन रखते हैं। प्रेमचंद वर्णन रखते हैं। शिल्प प्रेमचंद में सरल सर्वज्ञ है; बाद में दृष्टि, फ्लैशबैक, अधूरा संवाद तेज होते हैं। ग्राम बनाम शहर एक सुविधा है, पूरी सचाई नहीं — प्रेमचंद नगर भी लिखते हैं; नई कहानी गाँव भी छूती है, मन्नू की अकेली गाँव-बुआ पर है। आधे-अधूरे नाटक है, नई कहानी का पर्याय नहीं। परिंदे कविता नहीं। सारा आकाश उपन्यास है। गोदान उपन्यास है, प्रेमचंद-युग की कहानी नहीं।
सीमा दोनों ओर है। प्रेमचंद पर आदर्श और उपदेश का आक्षेप है। नई कहानी पर समाज-कटान या शिल्प-बोझ का आक्षेप है — व्यक्ति कभी कमरे का चित्र रह जाता है। गुण प्रेमचंद का यह कि हिन्दी कहानी को किसान और करुण-यथार्थ मिला। गुण नई कहानी का यह कि शहर और स्त्री-मन मिला। मूल्यांकन एक को रद्द करके नहीं होता; दोनों सोपान हैं। प्रेमचंदोत्तर जैनेन्द्र-अज्ञेय मन देते हैं, फिर नई कहानी व्यक्ति को शहर में खड़ा करती है। निर्धारित अकेली नई कहानी की स्त्री-परत है; कफन प्रेमचंद का शिखर-संकेत है। बिना साम्य के वैषम्य शत्रुता लगती है। बिना वैषम्य के साम्य एक युग रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि नई कहानी अगली परत इसलिए है कि यथार्थ रहता है, केंद्र व्यक्ति और शिल्प बनते हैं; निषेध पूरा तोड़ नहीं।
Q. 2 (20 marks) · Unit 2
आकाशदीप प्रेम और कर्तव्य कैसे बाँधती है?
Model answer
आकाशदीप प्रेम और कर्तव्य इसलिए बाँधती है कि चंपा दीप जलाए रखना चुनती है। कथावस्तु पोत और द्वीप दो स्थानों की है। आरंभ बंदी-पोत, शीत, सागर। चंपा क्षत्रिय-पुत्री और बुद्धगुप्त मिलते हैं। स्वतंत्रता और प्रेम खुलते हैं। पिता मणिभद्र के यहाँ प्रहरी रहे। मणिभद्र का प्रस्ताव घृणित है; अतीत प्रतिशोध का कारण बनता है। सेविका जया साथ है। रूप ऐतिहासिक-आदर्श कहानी है। देशकाल ताम्रलिप्ति का स्पर्श, पोत, द्वीप, सागर। नायक बुद्धगुप्त ताम्रलिप्ति का क्षत्रिय, जलदस्यु-जीवन से जुड़ा। खल दबाव पोत और प्रस्ताव पर है। कहानी और संग्रह दोनों का नाम आकाशदीप है; परीक्षा का पाठ कहानी है, पूरी पुस्तक नहीं। जयशंकर प्रसाद 1889–1937, काशी; छायावाद के शिखर। गुण गरिमा है, सीमा आदर्श का बोझ है।
मध्य द्वीप और दीपस्तंभ है। आकाशदीप नाम दीपस्तंभ है — समुद्र पर जहाजों का मार्ग। अर्थ कर्तव्य का प्रकाश भी है। जहाज आलोक से मार्ग पाते हैं। प्रेम साथ चलना चाहता है। कर्तव्य दीप जलाए रखना चाहता है। द्वंद्व यहीं घन होता है। भाव दो धाराएँ हैं, उपकथाओं का बिखराव नहीं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण प्रस्ताव और दीप हैं, संयोग नहीं। उसने कहा था में कारण वचन है। पाजेब में कारण शंका है। तीन कथावस्तु तीन केंद्र। बिना मणिभद्र के प्रतिशोध पतला है। बिना दीप के शीर्षक खाली है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; काव्य-संवाद का ढेर यहाँ नहीं उतरता।
अंत चंपा आलोक जलाती रहती है। भारत-प्रस्थान पूरा नहीं। प्रेम अधिकार की जीत नहीं, प्रकाश की जीत है। एक प्रभाव त्याग की चोट है, युद्ध-वचन नहीं, बाल-शंका नहीं। स्कंदगुप्त की कथा रंग-संघर्ष है। यह सागर-कर्तव्य है। गोदान ऋण है। कफन भूख है। विधा कहानी है, नाटक नहीं। वर्ष 1928 कहानी का टिक है; स्कंदगुप्त भी 1928 का नाटक है — यही भ्रम बैठता है। एक पढ़ी जाती है, एक खेली जाती है। चंपा ध्रुवस्वामिनी नहीं। बुद्धगुप्त चंद्रगुप्त नहीं। स्वरूप प्रेम और प्रतिशोध दो भावों का द्वंद्व है; अंत प्रेम-कर्तव्य की ओर झुकता है।
शिल्प संवाद-गरिमा और संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली है। पूर्वदीप्ति-केंद्र गुलेरी का है, यह नहीं। छोटे वाक्य जैनेन्द्र के हैं, यह नहीं। रस शृंगार और त्याग मिला है। सीमा दुरुहता और आदर्श का बोझ। गुण गरिमा और नारी-कर्ता। निषेध साफ हैं। कामायनी पद्य है। पुरस्कार दूसरी कहानी है। ध्रुवस्वामिनी और चंद्रगुप्त नाटक हैं। प्रेमचंद समाज फैलाते हैं; प्रसाद एक दीप सिमटाते हैं। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; यह चिह्न आदर्श-शाखा से भी चलता है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; कई उपदेश कथा को उपन्यास की कटी पूँछ बना देते।
निष्कर्ष यह है कि प्रेम और कर्तव्य दीप पर बँधते हैं; कृति 1928 की कहानी है, स्कंदगुप्त या कामायनी नहीं।
Q. 3 (20 marks) · Unit 3
चीफ की दावत तरक्की का व्यंग्य कैसे है?
Model answer
चीफ की दावत तरक्की का व्यंग्य इसलिए है कि पुत्र माँ को तब अपनाता है जब अफसर रीझता है। कथावस्तु मिस्टर शामनाथ के कर्मचारी-परिवार की है। चीफ विभाग का अफसर है, अंग्रेजी-बोल। दावत तरक्की का औजार है। नाम मेहमान का है, केंद्र माँ का है। रूप मध्यवर्गीय व्यंग्य-कहानी है। देशकाल शहर का कर्मचारी-परिवेश। साथ पत्नी। माँ ग्रामीण बोली, अनपढ़ अंग्रेजी, फुलकारी। खल दबाव दिखावा है, दंगा नहीं। एक बैठक की तैयारी एक प्रभाव बनाती है — इज्जत माँ को छिपाती है। शीर्षक विडम्बना रखता है। दावत चीफ की कही जाती है; श्रम माँ का है। साहनी 1915 रावलपिंडी–2003 दिल्ली; भाषा बोलचाल की खड़ी बोली।
आरंभ तैयारी है। सजावट, पेय, फूल। चिंता माँ को छिपाना है — खर्राटे, देसी वेश, ग्रामीण बोली। माँ बरामदे के कोने या पीछे ठहराई जाती है। वह उदास रहकर भी नहीं टोकती। पत्नी साथ है। मध्य दावत है। चीफ आता है। सामना हो जाता है। माँ पल्ला रखती है, काँपती है। चीफ मुस्कराता है, नमस्ते करता है, गाँव रीझता है, फुलकारी माँगता है, गाना सुनता है, फिर आने का संकेत देता है। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण तरक्की की भूख है, संयोग नहीं। शरणदाता में कारण फर्ज है। गदल में कारण पाँत है। तीन कथावस्तु तीन केंद्र।
अंत उपयोग है। शामनाथ माँ को गले लगाता है जब चीफ रीझता है। माँ हरिद्वार जाना चाहती है; पुत्र फुलकारी और अफसर की खुशी से रोकता है। माँ बेटे की तरक्की सुनकर मान जाती है। भाव यह है कि त्याग माँ का है, इज्जत पुत्र की भूख है। चीफ खल नहीं, दर्पण है। एक प्रभाव उपेक्षा की चोट है, इंसानियत की चोट नहीं, स्वाभिमान की मृत्यु नहीं। शरणदाता दंगा है। गदल पाँत है। यह ड्राइंग-रूम का व्यंग्य है। तमस फैलाव है। रूप कहानी है। गोदान ऋण है, यह तरक्की है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; मेनू और संवाद का ढेर यहाँ नहीं उतारा जाता।
शिल्प व्यंग्य, बोलचाल, एक बैठक का कसाव है। सीमा यह कि व्यंग्य सपाट लग सकता है। गुण यह कि हँसी चोट बनती है। निषेध साफ हैं। तमस 1973 उपन्यास है। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 नाटक है। बलराज साहनी फिल्म-नाम हैं। शेखर और नदी के द्वीप अज्ञेय के उपन्यास हैं, यह दावत नहीं। मुर्दों का टीला राघव का उपन्यास है। बिना माँ के मेज नहीं लगती। बिना चीफ के छिपाना नहीं बैठता। पो एक प्रभाव माँगते हैं; कई उपदेश कथा को तोड़ देते। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; व्यंग्य उसी चिह्न की चाल है। प्रेमचंद समाज देते हैं; साहनी दिखावा काटते हैं।
निष्कर्ष यह है कि तरक्की व्यंग्य इसलिए है कि पुत्र माँ को तब अपनाता है जब अफसर रीझता है; रूप कहानी है, तमस नहीं।
Q. 4 (20 marks) · Unit 4
पंचतंत्र आधुनिक माँ पर क्यों गलत होता है?
Model answer
पंचतंत्र आधुनिक माँ पर इसलिए गलत होता है कि नीति आज के रिश्ते में उलटी पड़ती है। पाठ्यक्रम-नाम राजे सेठ; लेखिका राजी सेठ, राज़ी सेठ भी लिखी जाती हैं — एक ही नाम। जन्म अक्तूबर 1935, नौशेरा छावनी; बचपन विभाजन की त्रासदी में। एम.ए. अंग्रेजी। पहली कहानी 1975, अज्ञेय-संपादित नया प्रतीक। दृष्टि मानव-मन, स्त्री-स्वप्न, मनोविज्ञान की है। भाषा तत्सम-स्पर्श, आंतरिक परत। पंचतंत्र विष्णु शर्मा की नीति-कथा है — पशु-कथा से जीना सिखाना। शीर्षक कहता है कि वही नीति आज गलत बैठती है। रूप आत्मकथात्मक कहानी है, नीति-ग्रंथ नहीं, उपन्यास नहीं। वाचक युवा माँ है। छोटा बच्चा आँचल तक सीमित है। एक प्रभाव स्वप्न और दायित्व के बीच पिसने की चोट है।
संवेदना विवाह की व्यवस्था से बैठती है। बच्चा चाह नहीं था, थोप दिया गया। फिर सहज ममता उमड़ती है। पितृसत्ता पुरुष को जन्मजात फायदा देती है। माँ होना अपने को भूलना — समाज की यह सचाई कथा का दबाव है। वाचक खाना, बर्तन, व्यवस्था और लेखन एक साथ साधना चाहती है। दिन-रात अपने से जूझती है। व्यक्तिगत जीवन सँवारने का स्वप्न है। बच्चा छोटी जिज्ञासा तक माँ पर निर्भर है। ध्यान न पाकर धीरे आत्मनिर्भर किशोर की ओर बढ़ता है। उधर लिखना-पढ़ना टूटता है। दोनों साधना टूटती है। नाम व्यंग्य है, उपदेश नहीं। अकेली स्त्री-नाम है। ज़िंदगी और जोंक प्रतीक-नाम है। यह नीति-नाम है जो टूटता है।
अंत दोहरी हार है। न लिखना चल पाता है, न बच्चे के साझे पल बचते हैं। लड़की के स्वप्न का हरण पितृसत्ता करती है। बचा अपराध-बोध। क्षोभ केवल उस युवती पर नहीं, जुड़े हर व्यक्ति पर पड़ता है। अकेली बाहर का न्योता है। जोंक बाहर का अपमान है। यह भीतर का लेखन और मातृत्व है। तत-सम विस्तार है, यह कहानी का एक प्रभाव है। निष्कवच उपन्यास अलग है। हिंदी अकादमी सम्मान; तत-सम पर भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार — सम्मान कथा नहीं। पाठ संवाद-ढेर नहीं उतारता; द्वंद्व यहीं बैठता है। बिना लेखन के कथा केवल माँ-व्याख्यान रह जाती। बिना बच्चे के स्वप्न अकेली जैसा सूनापन रह जाता, नीति-भंग नहीं।
शिल्प आत्मकथात्मक वाचक, आंतरिक परत, मनोविज्ञान है। घटना बड़ी लड़ाई नहीं, दिनचर्या है। अज्ञेय नैतिक घन रखते हैं। साहनी व्यंग्य रखते हैं। सेठ भीतर का द्वंद्व रखती हैं। सीमा दुरुहता का आक्षेप है। गुण यह कि नीति का नाम यथार्थ काट देता है। सेठ मन्नू का विलोम नहीं, अगली स्त्री-परत हैं। मन्नू सूनापन बाहर के न्योते पर दिखाती हैं। सेठ माँ और लेखिका को एक शरीर में काटती हैं। अमरकांत निर्धन बाहर रखते हैं। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव हार और बोध है। नामवर कसाव कहते हैं; सेठ दिनचर्या काटकर प्रश्न घना करती हैं। युगसाक्षी का सह-संपादन परिचय में आता है; निर्धारित पाठ यही नीति-भंग है।
निष्कर्ष यह है कि नीति इसलिए गलत होती है कि पितृसत्ता माँ और लेखिका को एक साथ नहीं चलने देती; रूप कहानी है, नीति-ग्रंथ या तत-सम नहीं।
Q. 5 (20 marks) · Unit 5
फुलवा जाति का अहं कैसे उलटती है?
Model answer
फुलवा जाति का अहं इसलिए उलटती है कि श्रम और बेटा जाति से ऊपर बैठ जाते हैं। कथावस्तु नायिका फुलवा की है। दलित स्त्री। पति जमींदार के बैल की सींग से मरता है। श्रम उत्तराधिकार जैसा लगता है — टहलुआई। बेटा राधा मोहन पढ़ता है, एस.पी. बनता है। नायिका दलित विधवा से सम्मान तक जाती है। शीर्षक नायिका का नाम है। रूप दलित-यथार्थ की कहानी है, आत्मकथा नहीं। देशकाल गाँव से शहर, कुआँ से नल, टहलुआई से कोठी। एक प्रभाव जाति-उलटन की चोट है, पाँत की मृत्यु नहीं, जोंक की शांति नहीं। रतनकुमार / रत्नकुमार एक लेखक। राजस्थान की दलित कथा-परत। भाषा आंचल-स्पर्श, व्यंग्य तीखा। जन्म-वर्ष नहीं बाँधा जाता; पाठ बाँधा जाता है।
मध्य रामेश्वर का आगमन है। जमींदार बलकार सिंह का पुत्र। दोनों एक-दूसरे को नहीं पहचानते। कोठी का वैभव, कुएँ की स्मृति, नल का पानी — जाति का दर्पण उलटा होता है। पानी माँगा, थूक पड़ा, मटका फूटा — पुरानी चोट। आज फुलवा के नल में पानी, रामेश्वर उसी कुएँ पर। शहर में पंडित माताप्रसाद खोए हैं; फुलवा का पता सब जानते हैं। पढ़ते पोते-पोती, बहू संती, नौकरानी कुँवर ईर्ष्या जगाते हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण पद-पैसे का ज़माना है, संयोग नहीं। स्नेहबंध में कारण स्नेह-नियम है। फैसला में कारण पद-मर्यादा है। तीन कथावस्तु तीन केंद्र। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, वैभव का पूरा दृश्य नहीं।
परती और संती शहर की परत हैं। सिरहाने-पैताने। चाय एक साथ। रामेश्वर धर्म से फुलवा का पानी नहीं पीता, पंडिताइन की चाय पीता है। दीपसिंह की नौकरी। परती कहती है पद और पैसे का ज़माना है, राधा मोहन एस.पी. हैं। रात छोटे आवास की बदबू। कदम कोठी की ओर मुड़ते हैं। जलन सिफारिश माँगती है, मन नहीं मानता। जोंक निर्धन मजदूर चूसती है। यह दलित स्त्री जीतती है, जमींदार-पुत्र जलता है। गदल पाँत पर मरती है। यह उलटन है, मृत्यु नहीं। जूठन आत्मकथा फैलाती है। यह कहानी एक मिलन सिमटाती है। बिना परती के शहर-मित्रता नहीं बैठती। बिना रामेश्वर के शीर्षक केवल सफलता रह जाता।
शिल्प व्यंग्य, आंचल, वैभव-विस्तार। सीमा वर्णन की भीड़। गुण यह कि शोषक सिफारिश माँगने आता है। निषेध साफ हैं। जूठन वाल्मीकि की आत्मकथा है। गदल इकाई 3 है। चाक, इदन्नमम उपन्यास हैं। सात फेरे धारावाहिक है। महाभोज राजनीति-उपन्यास है। डिप्टी कलेक्टरी अन्य कहानी है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव अहं का उलटा दर्पण है। नामवर कसाव कहते हैं; सांभरिया एक दिन के मिलन से जाति काटते हैं। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; दलित-गवाही उसी चिह्न की अंतिम चालों में है। बिना कुएँ के इतिहास खो जाता। बिना सिफारिश के ईर्ष्या केवल डाह रह जाती।
निष्कर्ष यह है कि अहं इसलिए उलटा है कि श्रम और बेटा जाति से ऊपर बैठ जाते हैं; रूप कहानी है, जूठन आत्मकथा नहीं।
सेट 3
सेट 3 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। प्रश्न सेट 1–2 से भिन्न हैं। खंड अ अनिवार्य। खंड ब आंतरिक विकल्प सहित पाँचों। खंड स में कोई तीन।
Section A
Q. 1. परिंदे किस वर्ष की कहानी है?
निर्मल वर्मा; नई कहानी का कला-टिक। आधे-अधूरे 1969 नाटक है।
Q. 2. उसने कहा था कितने खंडों में है?
पूर्वदीप्ति। आकाशदीप यह शिल्प-केंद्र नहीं।
Q. 3. तमस मुख्यतः क्या है?
साहनी, 1973। चीफ की दावत कहानी है; कबीरा नाटक है।
Q. 4. रजनीगंधा मुख्यतः क्या है?
यही सच है से बनी। अकेली निर्धारित कहानी है।
Q. 5. अल्मा कबूतरी मुख्यतः क्या है?
पुष्पा। फैसला कहानी है; झूला नट भी उपन्यास है।
Q. 6. प्रेमचंद का निधन _____ ई. में हुआ।
Answer: 1936 — वाराणसी। जन्म 1880, लमही।
Q. 7. बुद्धगुप्त _____ कहानी के पात्र हैं।
Answer: आकाशदीप — चंपा नायिका। स्कंदगुप्त नाटक अलग है।
Q. 8. गदल _____ बिरादरी की नायिका है।
Answer: गुर्जर — पाँत; राज से टकराव। फुलवा दलित पाठ है।
Q. 9. ज़िंदगी और जोंक का वाचक _____ पुरुष है।
Answer: उत्तम — मध्यवर्ग दर्पण। नायक रजुआ है।
Q. 10. फैसला की नायिका के पति _____ हैं।
Answer: रनवीर — ब्लॉक प्रमुख। नायिका वसुमती प्रधान है।
Section B
Q. 1 (8 marks) · Unit 1
नामवर नई कहानी को कैसे बाँधते हैं?
Or: प्रेमचंद साधारण मनुष्य को कैसे केंद्र बनाते हैं?
Model answer
नामवर सिंह नई कहानी को इसलिए बाँधते हैं कि 1950 के दशक का मोड़ व्यक्ति और शिल्प का है। मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर तीन स्थिर नाम हैं। निर्मल वर्मा का परिंदे 1959 प्रायः कला-टिक कहा जाता है — मौन, यूरोप-स्पर्श, भीतर की रिक्तता। मन्नू भंडारी स्त्री-स्वर जोड़ती हैं; अकेली उसी परत का निर्धारित पाठ है। नामवर सिंह कहानी नई कहानी में इस मोड़ को बाँधते हैं। यादव एक दुनिया समानांतर संकलन से स्वर जोड़ते हैं। प्रेमचंद का ग्राम-यथार्थ यहाँ केवल आलंबन नहीं रहता; अनुभव निजी और शहरी भी होता है।
शिल्प संकेत, फ्लैशबैक, अधूरा संवाद और मौन माँगता है। नई कहानी प्रेमचंद का पूरा निषेध नहीं; वह आदर्श और केवल ग्राम-यथार्थ से मुड़ती है। सीमा यह कि व्यक्ति कभी समाज से कटकर कमरे का चित्र रह जाता है। गुण यह कि हिन्दी कहानी को शहर और स्त्री-मन मिला। परिंदे कविता नहीं। आधे-अधूरे नाटक है, नई कहानी का पर्याय नहीं। सारा आकाश यादव का उपन्यास है। अकेली महाभोज नहीं।
निष्कर्ष यह है कि नामवर मोड़ का नाम देते हैं, निर्धारित बारह कहानियों का पर्याय नहीं; परिंदे कला-टिक है, नाटक नहीं।
Or
प्रेमचंद साधारण मनुष्य को इसलिए केंद्र बनाते हैं कि देवता और तिलिस्म हटते हैं। धनपत राय प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880, लमही, वाराणसी; निधन 8 अक्टूबर 1936। नमक का दारोगा, पंच परमेश्वर, ईदगाह, पूस की रात, कफन, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी परीक्षा के स्थिर संकेत हैं। दृष्टि यथार्थ है। भाषा खड़ी बोली बोलचाल की है। नायक किसान, बालक, स्त्री, निर्धन कर्मचारी हो सकता है। आदर्श अंत में कभी झलकता है; चित्र कठोर है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। कहानी-संग्रह मानसरोवर इतिहास में आता है। गोदान और रंगभूमि उपन्यास हैं, यह युग-महत्त्व कहानी का है।
युग का अर्थ केवल एक लेखक नहीं। जयशंकर प्रसाद आकाशदीप जैसी कहानी में आदर्श, त्याग और काव्य-गद्य रखते हैं — साथ की शाखा, यथार्थ नहीं। विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक और सुदर्शन सामाजिक पंक्ति हैं। महत्त्व यह है कि कहानी तिलिस्म से समाज की ओर मुड़ी। हिन्दी कहानी को किसान, मेला, ठंड और मर्यादा यहीं मिले। सीमा आदर्श का बोझ है। गुण यह कि साधारण मनुष्य केंद्र बैठा। बिना प्रेमचंद के इतिहास अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि साधारण मनुष्य इसलिए केंद्र है कि देवता और तिलिस्म हटते हैं; कफन और ईदगाह शिखर-संकेत हैं, गोदान उपन्यास है।
Q. 2 (8 marks) · Unit 2
पूर्वदीप्ति पाँच खंडों को कैसे जोड़ती है?
Or: मुन्नी का गहना शंका कैसे बनता है?
Model answer
पूर्वदीप्ति उसने कहा था के पाँच खंडों को इसलिए जोड़ती है कि युद्ध से बचपन और फिर युद्ध खुलता है। उसने कहा था पाँच खंडों में युद्ध से बचपन और फिर युद्ध पर लौटती है। वर्तमान फ्रांस की खाई है। स्मृति अमृतसर का वचन खोलती है। वचन कारण बनता है, संयोग नहीं। हिन्दी में यह कसाव 1915 में नया कहा जाता है। सर्वज्ञ वर्णन और संवाद साथ चलते हैं। एक प्रभाव त्याग की चोट है; स्मृति उसी चोट को कारण बनाती है। बिना बचपन के युद्ध समाचार रह जाता। बिना युद्ध के वचन अधूरा रह जाता।
शिल्प का महत्त्व रूप का आरंभ है, केवल चाल नहीं। लहना का चरित्र इसी लौटने से गोल होता है — खेल और कर्म एक पुरुष में। आकाशदीप का शिल्प संवाद-गरिमा है, पूर्वदीप्ति-केंद्र नहीं। पाजेब घटना-पतली वर्तमान है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; पूर्वदीप्ति उसी प्रभाव को गाढ़ती है। नामवर कसाव कहते हैं; गुलेरी उसी कसाव का आरंभ हैं। सीमा आदर्शीकरण की है। गुण यह कि स्मृति कथा चलाती है।
निष्कर्ष यह है कि पूर्वदीप्ति वचन को युद्ध से जोड़ती है; महत्त्व 1915 के रूप-आरंभ का है, केवल स्मृति-चाल का नहीं।
Or
मुन्नी का गहना पाजेब में इसलिए शंका बनता है कि खोना चोरी की दृष्टि जगाता है। पाजेब पैर का गहना है। शीर्षक वस्तु है, प्रतीक भी — चाह, दिखावा, संदेह। प्रसंग मध्यवर्गीय परिवार है। मुन्नी गहना पहनना चाहती है। गहना खो जाता है। चोरी की शंका आशुतोष पर बैठती है। बौजी और परिवार की दृष्टि दबाव चलाती है। घटना पतली है, दबाव घना है। जैनेन्द्र कहते हैं कि केवल शंका पर दंड नहीं चलता। अंत में पाजेब चोरी नहीं, खोई निकली। आशुतोष का बोझ झूठा था। रूप बाल-मनोविज्ञान की कहानी है, पूरा मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं।
नाम गहने से चलता है, न्याय-कथा से नहीं। एक प्रभाव शंका की चोट है। त्यागपत्र 1937 उपन्यास है, मृणाल-प्रमोद का विस्तार, यह गहना नहीं। सुनीता 1935, परख 1929, कल्याणी 1939 उपन्यास-पंक्ति है। मुक्तिबोध उपन्यास पर अकादमी 1979 निर्धारित नहीं। पद्म भूषण 1971 सम्मान है, कथा नहीं। भाषा छोटे वाक्य, विचार घने। देशकाल घर-परिवार का है। मध्यवर्ग की इज्जत बच्चे के भीतर उतरती है।
निष्कर्ष यह है कि गहना शंका इसलिए बनता है कि वस्तु से इज्जत बच्चे पर उतरती है; रूप 1942 की कहानी है, सुनीता नहीं।
Q. 3 (8 marks) · Unit 3
फुलकारी दावत की कसौटी कैसे है?
Or: निहाल गदल को कायर क्यों कहता है?
Model answer
फुलकारी चीफ की दावत की कसौटी इसलिए है कि अफसर उसी श्रम से रीझता है। चीफ विभाग का अफसर है, अंग्रेजी-बोल। दावत तरक्की का औजार है। नाम मेहमान का है; केंद्र माँ का है। नायक मिस्टर शामनाथ कर्मचारी-पुत्र है। साथ पत्नी। माँ ग्रामीण बोली, अनपढ़ अंग्रेजी, फुलकारी। खल दबाव दिखावा है। एक बैठक की तैयारी एक प्रभाव बनाती है — इज्जत माँ को छिपाती है। प्रसंग सजावट, पेय, फूल से खुलता है। चिंता यह है कि माँ दिख न जाए — खर्राटे, देसी वेश, ग्रामीण बोली। माँ बरामदे के कोने या पीछे ठहराई जाती है। वह उदास रहकर भी नहीं टोकती।
शीर्षक विडम्बना रखता है। दावत चीफ की कही जाती है; श्रम माँ का है। चीफ आता है, सामना हो जाता है, गाँव और फुलकारी रीझते हैं। अंत उपयोग है — पुत्र तभी गले लगता है जब अफसर खुश होता है। माँ हरिद्वार जाना चाहती है; तरक्की सुनकर रुकती है। रूप मध्यवर्गीय व्यंग्य-कहानी है। तमस 1973 उपन्यास है, यह दावत नहीं। कबीरा खड़ा बाजार में 1981 नाटक है। बलराज साहनी अभिनेता हैं, लेखक भीष्म हैं।
निष्कर्ष यह है कि फुलकारी कसौटी इसलिए है कि अफसर की खुशी माँ को रोकती है; रूप 1956 की कहानी है, कबीरा नहीं।
Or
निहाल गदल को कायर इसलिए कहता है कि डर राज और पुलिस का है। निधन 12 सितंबर 1962। आयु छोटी, लेखन घना। मूल नाम तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य। निर्धारित गदल जनवरी 1955, पत्रिका कहानी। नायिका गुर्जर स्त्री गदल। विधवा होकर मौनी से ब्याही जाती है। बड़ा बेटा निहाल; डोड़ी देवर। मुर्दों का टीला उपन्यास अलग है। दृष्टि बिरादरी, इतिहास, नारी-स्वाभिमान की है। भाषा आंचल-स्पर्श की खड़ी बोली, संवाद तेज। वे प्रेमचंदोत्तर प्रगति और इतिहास की परत हैं। साहनी व्यंग्य देते हैं; राघव पाँत देते हैं। अज्ञेय व्यक्ति देते हैं; राघव जाति-बिरादरी देते हैं।
प्रसंग कुनबा, पटेल-दरोगा और पाँत से खुलता है। निहाल कायर कहता है; गदल ताना सीना ठोंककर लेती है। राज पिसाता रहा, बिरादरी का धर्म नहीं छोड़ा जाता — यही तर्क है। अंत गोली पेट में लगती है। नारी आलंबन नहीं, कर्ता है। एक प्रभाव स्वाभिमान की मृत्यु है। सीमा यह कि कुनबा और राज दोनों भीड़ करते हैं। गुण यह कि नारी पाँत पर अपना तर्क रखती है। फुलवा बाद का दलित पाठ है, यह गुर्जर नायिका है।
निष्कर्ष यह है कि कायर कहना डर है, पाँत का इंकार नहीं; नायिका आगे रहती है, रूप 1955 की कहानी है।
Q. 4 (8 marks) · Unit 4
संन्यासी पति होते हुए सूनापन कैसे पूरा है?
Or: डिप्टी कलेक्टरी जोंक क्यों नहीं?
Model answer
संन्यासी पति होते हुए सूनापन इसलिए पूरा है कि साथ छुट्टी का है, दांपत्य नहीं। शीर्षक स्थिति है — स्त्री अकेली है। नायिका सोमा बुआ। आरंभ में परित्यक्ता का संकेत है। जवान बेटा मर चुका है। पति संन्यासी हैं, साल में एक महीना आते हैं, शेष हरिद्वार। स्वभाव कर्कश है, प्यार से बात नहीं, बाहर जाना नापसंद है। विवाह का नाम बाकी है, साथ नहीं। पति होते हुए भी सूनापन पूरा है। रूप स्त्री-अकेलापन की कहानी है, विधवा-उपदेश नहीं। एक प्रभाव सूनेपन की चोट है। नाम दोनों ओर काटता है। जो अकेली कही जाती है, वही दूसरों के शुभ-अशुभ में काम करके दिन काटती है।
प्रसंग न्योता है। मृत देवर के रिश्तेदार की बेटी का ब्याह। अंगूठी बेचकर सौगात, साड़ी रंगना, नई चूड़ियाँ। मुहूर्त पाँच बजे का था, सात बज जाते हैं। राधा पूछती है; बुआ कहती है — अभी बना लूँगी। अंत चूल्हा चलता है, दिल बुझा रहता है। महाभोज 1979 उपन्यास है। आपका बंटी 1971 बाल-उपन्यास है। यही सच है दूसरी कहानी है; रजनीगंधा फिल्म अलग है। एक इंच मुस्कान सह-लेखन है। बिना दीवारों का घर नाटक है।
निष्कर्ष यह है कि सूनापन इसलिए पूरा है कि साथ छुट्टी का है, दांपत्य नहीं; रूप कहानी है, महाभोज नहीं।
Or
डिप्टी कलेक्टरी जोंक इसलिए नहीं कि ख्याति-कहानी और निर्धारित पाठ दो हैं। निधन 17 फरवरी 2014, इलाहाबाद। बचपन का नाम श्रीराम, श्रीराम लाल भी। स्वतंत्रता-आंदोलन 1942 का स्पर्श। पत्रकार, संपादक, कहानीकार। ख्याति 1955 डिप्टी कलेक्टरी से — निर्धारित यह पाठ नहीं। यशपाल उन्हें गोर्की कहते थे। साहित्य अकादमी 2007। पत्नी गिरिजा देवी। निर्धारित ज़िंदगी और जोंक है; नायक रजुआ, वाचक मध्यवर्ग। अन्य कहानियाँ हत्यारे, बहादुर, फर्क, मूस — मिलाएँ नहीं। उपन्यास इन्हीं हथियारों से, सूखा पत्ता अलग हैं। दृष्टि करुण-यथार्थ, मध्यवर्ग की निर्ममता, व्यंग्य की है। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, उपमा तीखी।
नई कहानी की त्रयी — राकेश, यादव, कमलेश्वर — के शोर में देर तक हाशिये पर रहे। प्रेमचंद का निषेध नहीं, साधारण मनुष्य की अगली परत हैं। गुण यह कि हँसी और करुणा एक साथ काटती हैं। सीमा यह कि करुणा कभी सपाट दया लग सकती है। बिना जोंक काटे परिचय ख्याति-कहानी रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि डिप्टी कलेक्टरी अन्य कहानी है, निर्धारित ज़िंदगी और जोंक है; एक लेखक दो पाठ एक नहीं।
Q. 5 (8 marks) · Unit 5
ईसुरिया वसुमती को बराबरी क्यों याद दिलाती है?
Or: परती सिफारिश क्यों माँगती है?
Model answer
ईसुरिया फैसला की गड़रिया बहू है, मुखर मित्र। मैत्रेयी पुष्पा जन्म 30 नवंबर 1944, सिकुर्रा; पत्र-शैली मास्साब को। नायिका वसुमती स्त्रियों के वोट से प्रधान चुनी जाती है, चकित है। रनवीर मर्यादा थोपते हैं — चबूतरे पर मत बैठो। कुसुमा, गोपी, सरूपी स्त्री-मंडल हैं। बराबरी का ज़माना ईसुरिया का स्वर है। देववीर देवर रोकता है। दस्तखत बसुमती देवी से स्कूल-गली-दवा कटते हैं। चाक 1997 उपन्यास है, यह पत्र नहीं। रूप कहानी है, पंचायत-नाटक नहीं।
हरदेई गुहार है; ईसुरिया साथ की आवाज़ है। बिना मंडल के पद पति की कृपा लगती है। इदन्नमम उपन्यास है। कस्तूरी कुंडल बसै आत्मकथा है। एक प्रभाव पद की विडम्बना है। एक वोट अंत में पति को काटता है। अल्मा कबूतरी उपन्यास है, यह पत्र नहीं। फैसला पर कथा पुरस्कार है; चाक विस्तार है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा आख्यान नहीं।
निष्कर्ष यह है कि बराबरी इसलिए याद दिलाई जाती है कि पद स्त्री-मंडल से आया, पति की कृपा से नहीं; रूप पत्र-कहानी है, चाक नहीं।
Or
परती फुलवा में सिफारिश इसलिए माँगती है कि बेटा दीपसिंह नौकरी चाहता है। रामेश्वर धर्म से फुलवा का पानी नहीं पीता, पंडिताइन की चाय पीता है। परती कहती है — पद और पैसे का ज़माना है; राधा मोहन एस.पी. हैं; बहू के चरण छुओ। नायिका दलित विधवा से कोठी तक गई है। हंस मई 1997, सांभरिया। कुएँ की पुरानी चोट नल से उलटी है। जूठन यह दृश्य नहीं। एक प्रभाव जाति-उलटन की चोट है।
अहं नौकरी के आगे झुकता है, मन नहीं मानता। रात छोटे आवास की बदबू; कदम कोठी की ओर मुड़ते हैं। संती बहू है, कुँवर नौकरानी। गदल मृत्यु है; यह सिफारिश है। बिना एस.पी. पुत्र के सिफारिश नहीं बैठती। रूप कहानी है, आत्मकथा नहीं। अमरकांत जोंक मजदूर चूसते हैं; यह स्त्री पद-पैसे से काटती है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है, पूरा आख्यान नहीं।
निष्कर्ष यह है कि सिफारिश इसलिए माँगी जाती है कि जाति का अहं पद-पैसे के आगे झुकता है, मन नहीं मानता; रूप कहानी है, जूठन नहीं।
Section C
Q. 1 (20 marks) · Unit 1
कहानी के तत्त्व एक प्रभाव में कैसे बँधते हैं?
Model answer
कहानी के तत्त्व एक प्रभाव में इसलिए बँधते हैं कि सामग्री बिना दिशा के ढेर रह जाती है। शिल्प उन्हें बाँधने का ढंग है। छह तत्त्व स्थिर हैं — कथावस्तु, चरित्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य — साथ एक प्रभाव अनिवार्य है। कथावस्तु घटना-क्रम है। कहानी में वह पतली और कसी होती है। आरंभ स्थिति खोलता है। मध्य द्वंद्व बढ़ाता है। अंत निर्णय या चोट देता है। फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं; कहानी में कारण और भी सघन है। संयोग का बोझ दोष है। उपकथा एक प्रभाव तोड़ती है। प्रेमचंद की कथावस्तु सामाजिक कारण से बँधी है — ऋण, भूख, मर्यादा। जैनेन्द्र की कथावस्तु भीतर के निर्णय पर मुड़ती है। नई कहानी अनुभव के एक टुकड़े पर टिकती है। कफन में कारण भूख है।
चरित्र वह मनुष्य है जो स्थिति को अर्थ देता है। कहानी में पात्र कम हैं। सपाट चरित्र एक गुण पर टिकता है। गोल चरित्र छोटे विस्तार में भी द्वंद्व रखता है। प्रेमचंद के हामिद, घीसू-मधू सामाजिक दबाव में बनते हैं। प्रसाद के चंपा जैसे पात्र आदर्श और त्याग छूते हैं। नई कहानी का व्यक्ति अधूरा, शहरी, अकेला हो सकता है। संवाद अंग है, नाटक जितना प्रधान नहीं। प्रेमचंद का संवाद बोलचाल का है। जैनेन्द्र का संवाद विचार का है। निर्मल वर्मा का संवाद अधूरा और मौन का है। देशकाल पृष्ठ नहीं, दबाव है। पूस की रात ठंड का देशकाल है। चीफ की दावत दिखावे का देशकाल है। गदल जाति-गाँव का देशकाल है।
भाषा शैली है — सरल खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भित, आंचलिक शब्द, व्यंग्य, मौन। प्रेमचंद बोलचाल रखते हैं। प्रसाद काव्य-गद्य छूते हैं। अज्ञेय और वर्मा संकेत रखते हैं। अमरकांत सादी भाषा में करुण-यथार्थ रखते हैं। उद्देश्य नैतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक या कलात्मक हो सकता है। शुक्ल उद्देश्य को जीवन की आलोचना से जोड़ते हैं। कहानी उपदेश-पुस्तिका नहीं। उद्देश्य चित्र से निकलता है, नारे से नहीं। शिल्प दृष्टि से खुलता है। सर्वज्ञ वाचक सब मन पढ़ता है। उत्तम पुरुष मैं-कथन है। सीमित दृष्टि एक पात्र के साथ चलती है। प्रतीक दीपक, दावत, जोंक, फुलवा शीर्षक में बैठ सकते हैं। संरचना आरंभ-मध्य-अंत है। अंत चोटदार या खुला हो सकता है।
संबंध यह है कि तत्त्व बिना शिल्प के ढेर हैं, शिल्प बिना तत्त्व के खाली प्रयोग है। प्रेमचंद तत्त्व भरते हैं, दृष्टि सरल रखते हैं। अज्ञेय और वर्मा शिल्प तेज करते हैं। अमरकांत भाषा को सादा रखते हैं। नामवर कसाव पर बोलते हैं। पो एक प्रभाव माँगते हैं — एक रस, एक आघात, एक प्रश्न। कई उपदेश कहानी को उपन्यास की कटी पूँछ बना देते हैं। सीमा शिल्प का कथा पर सवार होना है। गुण यह कि छह तत्त्व और एक प्रभाव परीक्षा की पूरी सूची बनते हैं। एक तत्त्व लिखकर छूट जाना अधूरा उत्तर है। नाम, उदाहरण और एक सीमा — तीनों के बिना तत्त्व-उत्तर गिनती रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि तत्त्व छह हैं और एक प्रभाव उन्हें कहानी बनाता है; अकेले सूची या अकेले प्रयोग अधूरे हैं।
Q. 2 (20 marks) · Unit 2
पाजेब बच्चे के भीतर मध्यवर्ग कैसे उतारती है?
Model answer
पाजेब बच्चे के भीतर मध्यवर्ग इसलिए उतारती है कि शंका इज्जत का बोझ बन जाती है। बाल-मनोविज्ञान बच्चे की शंका, चाह और निर्दोषता को कथा बनाता है। जैनेन्द्र जन्म 2 जनवरी 1905, कौड़ियागंज, अलीगढ़; बचपन आनंदीलाल; निधन 24 दिसंबर 1988। दृष्टि अंतर्मन, नैतिक द्वंद्व, संकेत की है। भाषा खड़ी बोली; वाक्य छोटे, विचार घने। पाजेब पैर का गहना है। शीर्षक वस्तु है, प्रतीक भी — चाह, दिखावा, संदेह। रूप बाल-मनोविज्ञान की कहानी है, पूरा मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं। मध्यवर्ग बच्चे के भीतर से खुलता है। प्रेमचंद किसान देते हैं। प्रसाद आदर्श देते हैं। जैनेन्द्र शंका देते हैं। घटना पतली है, दबाव घना है।
प्रसंग मध्यवर्गीय परिवार है। मुन्नी पाजेब पहनना चाहती है। गहना खो जाता है। चोरी का संदेह आशुतोष पर ठहरता है। बौजी और परिवार की दृष्टि शंका चलाती है। जैनेन्द्र कहते हैं कि केवल शंका पर दंड नहीं चलता। अंत में पाजेब चोरी नहीं, खोई निकली। आशुतोष का बोझ झूठा था। मध्यवर्ग की इज्जत बच्चे के भीतर उतरती है। यही बाल-मन से वयस्क दबाव है। एक प्रभाव शंका की चोट है, युद्ध की नहीं, दीप की नहीं। चरित्र कम हैं। संवाद भीतर की हल्की हलचल रखते हैं। देशकाल घर-परिवार का है, फ्रांस नहीं, सागर नहीं। उद्देश्य ईमान और दृष्टि है, नारा नहीं।
तुलना तीन बंधन खोलती है। लहना वचन से बँधता है। चंपा दीप से बँधती है। आशुतोष शंका से बँधता है। तीन बंधन तीन आयु — सिपाही, नायिका, बालक। यह त्यागपत्र 1937 का न्यायाधीश-मन नहीं, मृणाल-प्रमोद का विस्तार नहीं। यह कफन की भूख नहीं। यह सुनीता 1935 नहीं, परख 1929 नहीं, कल्याणी 1939 नहीं। मुक्तिबोध उपन्यास पर अकादमी 1979 निर्धारित नहीं। पद्म भूषण 1971 सम्मान है, कथा नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; पूरा पारिवारिक वर्णन यहाँ नहीं उतारा जाता। बिना आशुतोष के शंका नहीं बैठती। बिना मुन्नी के पाजेब नहीं बैठती।
शिल्प छोटे वाक्य, कम पात्र, एक प्रभाव है। चेतना-प्रवाह के निकट संकेत हैं, पूरा धारा-प्रयोग नहीं। सीमा दुरुहता का आक्षेप है। गुण यह कि छोटी वस्तु बड़ा प्रश्न बनती है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; यह प्रभाव निर्दोषता की चोट है। नामवर कसाव कहते हैं; जैनेन्द्र घटना काटकर निर्णय घना करते हैं। प्रेमचंद का पूरक हैं, विलोम नहीं। बाहर का समाज प्रेमचंद, भीतर का निर्णय जैनेन्द्र। निषेध साफ हैं। त्यागपत्र उपन्यास-पत्र की कृति है। सुनीता अलग उपन्यास है। मुक्तिबोध कवि अलग हैं, उपन्यास निर्धारित नहीं। इकाई 2 का तीसरा पाठ मन का सोपान है, आदर्श या युद्ध नहीं।
निष्कर्ष यह है कि मध्यवर्ग इसलिए उतरता है कि शंका बच्चे को इज्जत का बोझ बना देती है; रूप कहानी है, त्यागपत्र नहीं।
Q. 3 (20 marks) · Unit 3
गदल नारी-स्वाभिमान और राज कैसे टकराते हैं?
Model answer
गदल नारी-स्वाभिमान और राज इसलिए टकराते हैं कि पाँत कानून से आमने-सामने होती है। जनवरी 1955, पत्रिका कहानी। नारी गदल है, गुर्जर। विधवा होकर मौनी से ब्याही जाती है। बड़ा बेटा निहाल। नरायन दूसरा पुत्र। चंपा और चमेली ब्याही बेटियाँ। डोड़ी देवर है, पहले पति गुन्ना का भाई। दुल्लो नए कुनबे की स्त्री-रेखा है। रूप बिरादरी और नारी-स्वाभिमान की कहानी है, दलित-आत्मकथा नहीं, प्रेम-त्रिकोण नहीं। फुलवा इकाई 5 अलग पाठ है। राघव जन्म 17 जनवरी 1923, आगरा; निधन 12 सितंबर 1962; मूल नाम तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य। दृष्टि बिरादरी, इतिहास, नारी-स्वाभिमान की है। भाषा आंचल-स्पर्श की खड़ी बोली, संवाद तेज।
कुनबे के झगड़े से भी प्रसंग खुलता है — गहने, सौत, पंचायत। दबाव बड़ा वहाँ बैठता है जहाँ बिरादरी की पाँत और सरकार का कानून आमने-सामने होते हैं। पटेल, दरोगा, सिपाही। निहाल कायर कहता है, सिंधनी कहता है। गदल उसी ताने को सीना ठोंककर लेती है। तर्क यह है कि राज पिसाता रहा, बिरादरी का धर्म नहीं छोड़ा जाता। भाव यह है कि नारी बिरादरी की नाक आप बन जाती है। डोड़ी देवर है। पीछे निकालने का आदेश माँ का है, आगे रहना उसी का है। बिना पाँत के शीर्षक केवल स्त्री-नाम रह जाता। बिना ताने के स्वाभिमान कारण खो देता है। पाठ प्रसंग-भाव से होता है; बंदूक का पूरा दृश्य यहाँ नहीं उतारा जाता।
अंत प्रतिरोध है। पाँत चलती है। पुलिस रोकना चाहती है। गदल निहाल और नरायन को पीछे से निकालने को कहती है, स्वयं आगे रहती है। गोली पेट में लगती है। सिर गिरता है। एक प्रभाव स्वाभिमान की मृत्यु है, दावत की हँसी नहीं, दंगे की शरण नहीं। जैबू बचाती है। माँ दावत में जीती है। गदल पाँत पर मरती है। तीन स्त्री तीन मूल्य — इंसानियत, इस्तेमाल, स्वाभिमान। यह फुलवा नहीं, कोठी की जीत नहीं। यह अकेली नहीं, न्योते का सूनापन नहीं। यह चंपा नहीं, दीप-आलोक नहीं। नारी आलंबन नहीं, कर्ता है।
शिल्प संवाद तेज, आंचल-स्पर्श, कम प्रतीक-बोझ। सीमा यह कि कुनबा और राज दोनों भीड़ करते हैं। गुण यह कि नारी पाँत पर अपना तर्क रखती है। मुर्दों का टीला उपन्यास अलग है। निषेध साफ हैं। जूठन आत्मकथा है, यह नहीं। तमस दंगा-उपन्यास है। कबीरा नाटक है। शरणदाता फर्ज का नाम है। चीफ की दावत अफसर का नाम है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; प्रभाव पाँत की चोट है। नामवर कसाव कहते हैं; राघव इतिहास और जाति को एक स्त्री में काटते हैं। प्रेमचंदोत्तर प्रगति और इतिहास की परत हैं। साहनी व्यंग्य देते हैं; राघव पाँत देते हैं। आयु छोटी, लेखन घना।
निष्कर्ष यह है कि स्वाभिमान बिरादरी की पाँत से राज से टकराता है; रूप 1955 की कहानी है, मुर्दों का टीला नहीं।
Q. 4 (20 marks) · Unit 4
जोंक मध्यवर्ग को कैसे आईना दिखाती है?
Model answer
जोंक मध्यवर्ग को इसलिए आईना दिखाती है कि इस्तेमाल और राहत एक साथ बैठते हैं। कथावस्तु रजुआ और उत्तम-पुरुष वाचक की है। शीर्षक प्रतीक है। जोंक खून चूसती है। ज़िंदगी निर्धन को चूसती है। उल्टा यह भी कि मध्यवर्ग मजदूर को जोंक कहता है, श्रम खुद चूसता है। रूप करुण-यथार्थ। देशकाल कस्बा-शहर का कर्मचारी-परिवेश। अमरकांत 1925 बलिया–2014 इलाहाबाद; 1942 आंदोलन का स्पर्श; पत्रकार, संपादक। निर्धारित यही जोंक-पाठ है; इसी नाम का संग्रह भी है, परीक्षा कहानी माँगती है। मजदूर छोटे काम करता है। बचा भोजन, हँसी-अपमान। जोंक शीर्षक से पहले बैठती है। रजुआ साला कहकर पुकारा जाता है। श्रम लिया जाता है, इज्जत नहीं।
मध्य हाशिये की रेखाएँ हैं। स्टेशन की पगली। शनीचरी डोमिन। बरन की बहू से टूटन, दाढ़ी, भगत। पंडित की दुकान पर राम-सीता। मनुष्य मजदूर से बड़ा दिखता है, इज्जत नहीं मिलती। पाठ पूरा आख्यान नहीं उतारता; प्रतीक और अपमान यहीं बैठते हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण शोषण है, संयोग नहीं। अकेली में कारण न्योता है। पंचतंत्र में कारण मातृत्व-लेखन है। तीन कथावस्तु तीन केंद्र। एक प्रभाव शोषण की चोट है, सूनेपन का न्योता नहीं, नीति का अपराध-बोध नहीं। बिना रजुआ के जोंक जीव-विज्ञान रह जाती। बिना वाचक के व्यंग्य दर्पण खो देता है।
अंत बीमारी, खंडहर, मृत्यु है। वाचक को शांति और बोझ-उतरना मिलता है। व्यंग्य यही है कि निर्धन की ज़िंदगी काँटा थी। दया का सुख नहीं, कलंक है। चीफ की दावत माँ को इस्तेमाल करती है। यह मजदूर को इस्तेमाल कर के राहत महसूस करती है। गदल पाँत पर मरती है; रजुआ बीमारी और उपेक्षा पर मरता है। तीन मृत्यु-राहत तीन मूल्य नहीं; यहाँ राहत कलंक है। अकेली न्योता है। पंचतंत्र लेखन है। यह शोषण है। डिप्टी कलेक्टरी दिखावा-नौकरी है, यह जोंक नहीं। भाषा बोलचाल, उपमा तीखी। शिल्प व्यंग्य। सीमा यह कि प्रतीक शीर्षक में पहले से खुल जाता है। गुण यह कि शांति का वाक्य परीक्षा का केंद्र बनता है।
निषेध साफ हैं। डिप्टी कलेक्टरी 1955 ख्याति-कहानी है, निर्धारित नहीं। हत्यारे, बहादुर, फर्क, मूस अन्य हैं। इन्हीं हथियारों से उपन्यास है। फुलवा इकाई 5 है। जूठन आत्मकथा है। यशपाल गोर्की कहते थे; साहित्य अकादमी 2007 सम्मान है, कथा नहीं। नई कहानी की त्रयी के शोर में देर हाशिये पर रहे। प्रेमचंद की अगली परत हैं, विलोम नहीं। पाठ प्रसंग-भाव से होता है। पो एक प्रभाव माँगते हैं; कई उपदेश कथा तोड़ देते। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; करुण-यथार्थ उसी चिह्न की चाल है। बिना मृत्यु के जोंक अधूरी। बिना शांति के व्यंग्य दया रह जाता।
निष्कर्ष यह है कि आईना इसलिए है कि इस्तेमाल और राहत एक साथ बैठते हैं; रूप कहानी है, डिप्टी कलेक्टरी नहीं।
Q. 5 (20 marks) · Unit 5
इकाई 2 से इकाई 5 तक स्त्री-पात्र कैसे बदलते हैं?
Model answer
बदलाव सोपान का है, शत्रुता का नहीं। इकाई 2 सहेली वचन है — उसने कहा था, गुलेरी, जून 1915 सरस्वती; आलंबन है, कर्म लहना का है। चंपा आकाशदीप 1928 की कर्ता नायिका है; दीप जलाए रखना प्रेम से बड़ा बैठता है। मुन्नी पाजेब 1942 में गहना चाहती है; शंका बच्चे पर उतरती है। तीन स्त्री तीन चालें — वचन, आलोक, चाह। साम्य कहानी-रूप और एक प्रभाव है। स्कंदगुप्त नाटक है, यह दीप नहीं। त्यागपत्र उपन्यास है, यह गहना नहीं। फिल्म 1960 वचन-पाठ नहीं।
इकाई 3 जैबू शरणदाता में हैवानियत के बीच इंसानियत काटती है — चेतावनी और इल्तजा। माँ चीफ की दावत 1956 में कसौटी है; फुलकारी से चीफ रीझता है, पुत्र तभी गले लगता है। गदल जनवरी 1955 गुर्जर नायिका पाँत पर मरती है; निहाल कायर कहता है, वह आगे रहती है। तीन स्त्री तीन मूल्य — काट, इस्तेमाल, स्वाभिमान। शेखर और तमस उपन्यास हैं। कबीरा नाटक है। मुर्दों का टीला अलग है। अज्ञेय फर्ज देते हैं, साहनी व्यंग्य, राघव पाँत।
इकाई 4 सोमा अकेली में पति के रहते सूनी जीती है; न्योता न आने पर चूल्हा चलता है। वाचक-माँ गलत होता पंचतंत्र में लेखन और बच्चे के बीच पिसती है; नीति गलत बैठती है। इकाई 5 मीता स्नेहबंध में कसौटी है, अपराधी नहीं; वर्षगाँठ गर्व जगाती है। वसुमती फैसला में प्रधान है, दस्तखत और एक वोट से पद फँसता भी है, काटता भी है। फुलवा दलित नायिका जीतती है, रामेश्वर जलता है। जोशी 1934 औरंगाबाद। पुष्पा 1944 सिकुर्रा। सांभरिया राजस्थान, हंस 1997। मन्नू 1931–2021। सेठ 1935 नौशेरा।
निषेध साफ रखे जाते हैं। सात फेरे धारावाहिक है। चाक, इदन्नमम, महाभोज, तत-सम, आपका बंटी उपन्यास हैं। जूठन आत्मकथा है। स्कंदगुप्त, तमस, कबीरा मिलाए नहीं जाते। शुक्ल गद्य-चिह्न पूरे पत्र पर है। पो एक प्रभाव हर पाठ माँगता है। नामवर कसाव कहते हैं; स्त्री आलंबन से कर्ता तक कसाव अलग आलंबन से चलता है। परीक्षा नामकरण, चरित्र, अंतर माँगती है। पूरा पाठ पढ़ना है। प्रसंग-भाव, लंबे उद्धरण नहीं। शास्त्र इकाई 1 में रह जाता है; स्त्री-पात्र इकाइयाँ 2–5 की चाल हैं। जैबू काट है, माँ कसौटी है, सोमा सूनी है, वसुमती प्रधान है — चार परतें एक दिशा नहीं। लहना मरता है, चंपा जिलाती है; स्त्री कर्ता इकाई 2 से खुलती है। गदल मरती है, फुलवा जीतती है; स्त्री-पात्र एक साँचा नहीं। पो एक चोट माँगते हैं; पाँच इकाइयाँ पाँच चोटें हैं।
निष्कर्ष यह है कि स्त्री आलंबन से कर्ता, सूनी, प्रधान और दलित-सम्मान तक खुलती है; पाँच इकाइयाँ एक पत्र की चालें हैं, उपन्यास या धारावाहिक नहीं।
