Guess paper sets — practise one set at a time.
सेट 1
सेट 1 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। खंड अ के दस प्रश्न अनिवार्य। खंड ब में प्रत्येक इकाई से आंतरिक विकल्प — पाँचों प्रश्न करने हैं। खंड स में पाँच दीर्घ में से कोई तीन।
Section A
Q. 1. परीक्षा गुरु के लेखक हैं —
1882; प्रायः प्रथम मौलिक। भाग्यवती फिल्लौरी; चंद्रकांता खत्री; रानी केतकी इंशा।
Q. 2. रंगभूमि किस वर्ष प्रकाशित हुई?
प्रेमचंद; नायक सूरदास। सेवासदन 1918; कर्मभूमि 1932; गोदान 1936।
Q. 3. जैनेन्द्र को पद्म भूषण मिला —
जन्म 1905। साहित्य अकादमी 1979 मुक्तिबोध पर; वह निर्धारित नहीं।
Q. 4. अनामदास का पोथा किस प्रकाशन से आई?
1976; अंतिम उपन्यास। महाभोज राधाकृष्ण से है।
Q. 5. महाभोज का प्रकाशक है —
1979। आपका बंटी 1971 अलग कृति है।
Q. 6. मैला आँचल _____ ई. में प्रकाशित हुआ।
Answer: 1954 — रेणु; मेरीगंज। बलचनमा 1952; राग दरबारी 1968।
Q. 7. जोज़फ क्लार्क _____ हैं।
Answer: अंग्रेज़ अफसर — पिस्तौल; सूरदास पर गोली। जॉन सेवक पूँजीपति हैं।
Q. 8. जैनेन्द्र का बचपन का नाम _____ है।
Answer: आनंदीलाल — कौड़ियागंज, अलीगढ़। मन्नू महेंद्र कुमारी हैं, यह नहीं।
Q. 9. छान्दोग्य में दानी राजा _____ हैं।
Answer: जनश्रुति — पक्षी रैक्व की महिमा सुनाते हैं। सत्यकाम अलग प्रसंग है।
Q. 10. बिसेसर के पिता _____ हैं।
Answer: हीरा — महाभोज। साथी बिंदा; पत्नी रुक्मा बिसू की नहीं, बिंदा की हैं।
Section B
Q. 1 (8 marks) · Unit 1
चंद्रकांता हिन्दी गद्य के पाठक क्यों बढ़ाती है?
Or: भाग्यवती को प्रथम उपन्यास कहने में आपत्ति क्या है?
Model answer
देवकीनंदन खत्री का चंद्रकांता 1888 के आसपास तिलिस्मी-ऐयारी का शिखर है। गुफा, ऐयार, राजकुमार — मनोरंजन प्रधान है। आलोचना उसे कला का शिखर नहीं मानती। इतिहास उसे पाठक-निर्माण मानता है। खड़ी बोली गद्य का प्रसार इसी लोकप्रियता से हुआ। परीक्षा गुरु 1882 नगर और नैतिक परीक्षा देता है; भाग्यवती 1877 उपदेश रखती है। किशोरीलाल गोस्वामी ऐतिहासिक-रमानी कथाएँ लिखते हैं। गोपालराम गहमरी जासूसी गद्य चलाते हैं। द्विवेदी युग भाषा-शुद्धि जोड़ता है, प्रश्न अभी प्रेमचंद जितना गहरा नहीं। गोपाल राय इसी क्रम को इतिहास का कंकाल बनाते हैं। आचार्य शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; खत्री उसी गद्य का पाठक बढ़ाते हैं।
प्रेमचंद बाद में कौतुक से यथार्थ की ओर मोड़ते हैं — सेवासदन 1918, रंगभूमि 1925, गोदान 1936। बिना खत्री के पाठक-समुदाय पतला रहता। बिना प्रेमचंद के तिलिस्म ही उपन्यास रह जाता। सोपान का अर्थ सीढ़ी है — प्रत्येक अगली को संभव बनाती है, स्वयं अंतिम नहीं। नगेन्द्र स्वरूप बाँधते हैं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग यह लोकप्रिय गद्य नहीं। भक्त-कवि सूरदास यह नहीं। सीमा घटना-कौतुक का बोझ है। गुण खड़ी बोली का प्रसार है।
निष्कर्ष यह है कि चंद्रकांता पाठक इसलिए बढ़ाती है कि तिलिस्म ने खड़ी बोली गद्य को व्यापक बनाया, प्रश्न गहरा नहीं किया।
Or
श्रद्धाराम फिल्लौरी की भाग्यवती 1877 परीक्षा गुरु से पहले आती है। विषय उपदेश और स्त्री-शिक्षा है। कुछ इतिहास उसे प्रथम कहते हैं। कुछ उसे उपन्यास की सीमा पर रखते हैं, क्योंकि चरित्र-विकास और नगर-व्यापार का आधुनिक रूप पतला है। लाला श्रीनिवास दास का परीक्षा गुरु 1882 व्यापार, नैतिक परीक्षा और मौलिक हिन्दी गद्य रखता है। सहमति इसलिए अधिक है कि नगर, चरित्र-विकास और मौलिक खड़ी बोली मिलते हैं। इंशा अल्ला खाँ की रानी केतकी की कहानी गद्य-कथा है, पूरा उपन्यास नहीं। उद्भव एक तिथि नहीं; गद्य का दीर्घ कथा-रूप अपनाना है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं। गोपाल राय सोपान बाँधते हैं।
उद्भव का अर्थ एक तिथि नहीं। अर्थ यह है कि हिन्दी गद्य ने दीर्घ कथा अपनाई। भारतेंदु युग नाटक और निबंध में अधिक शक्ति रखता है; उपन्यास अभी सीख रहा है। बंकिम का प्रभाव पढ़ने की रुचि बढ़ाता है। अंग्रेज़ी उपन्यास संरचना देता है। शुक्ल गद्य को आधुनिक काल का चिह्न कहते हैं। गोपाल राय इतिहास सोपानों से बाँधते हैं। बिना विवाद लिखे उद्भव अधूरा है, बिना सहमति के विवाद अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि आपत्ति उपदेश-प्रधान रूप पर है; प्रथम मौलिक का सहमति-नाम परीक्षा गुरु रहता है।
Q. 2 (8 marks) · Unit 2
पांडेपुर में पूँजी, रियासत और बस्ती कैसे टकराते हैं?
Or: सोफिया क्लार्क से सगाई के बावजूद विनय क्यों चुनती है?
Model answer
पांडेपुर बनारस के बाहर की गरीब बस्ती है। सूरदास यहीं रहता है — अंधा भिखारी, भक्त-कवि सूरदास नहीं। जॉन सेवक उसी ज़मीन पर सिगरेट का कारखाना चाहता है — पूँजी। राजा महेंद्र कुमार सिंह अंग्रेज़ और कारखाने से तालमेल रखते हैं — रियासत। जोज़फ क्लार्क राज्य की शक्ति है। बस्ती भिक्षा, चराई और साँस रखती है। तीन शक्तियाँ एक जगह ठेलती हैं। पुश्तैनी ज़मीन मुहल्ले के पशुओं की चराई है। पाँच रुपये और मुँहमाँगी कीमत दोनों ठुकराई जाती हैं। इंकार सार्वजनिक उपयोग का तर्क है। गोदान का गाँव ऋण का है; यह बस्ती ज़मीन और कारखाने की है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है, यह टकराव नहीं।
प्रेमचंद मशीन के गाली-कवि नहीं। वे पूँजी को राज्य से जुड़ा देखते हैं। गोदान किसान-ऋण है। कर्मभूमि 1932 अलग कृति है। यह उद्योग बनाम बस्ती है। सीमा यह है कि कारखाने के भीतर का मज़दूर-संगठन गोदान के किसान जितना नहीं फैलता। गुण यह है कि 1925 में सिगरेट-कारखाना नैतिक प्रश्न बना। रश्मिरथी का सर्ग उद्योग-चित्र नहीं।
निष्कर्ष यह है कि पांडेपुर तीन शक्तियों का दबाव है — पूँजी कारखाना लाती है, रियासत तालमेल रखती है, बस्ती इंकार करती है।
Or
सोफिया जॉन सेवक की पुत्री है। धर्म पर विश्वास रखती है, अंधश्रद्धा पर नहीं। ईसा को त्याग का आदर्श मानती है। माता-पिता विवाह जोज़फ क्लार्क से चाहते हैं। सगाई तक होती है। हृदय विनय सिंह के पास रहता है। रानी जान्हवी और सेवा भवन के संपर्क से हिन्दू भाव और विनय का आकर्षण बढ़ता है। वह क्लार्क को मोहित कर जेल तक पहुँचती है। नायकराम सहयोग करता है। लौटकर सेवा भवन जाती है, जॉन के पास नहीं। जान्हवी अंत में विवाह मानती है। चुनना धर्म-संकर प्रेम है, चाल भर नहीं। अंत विनय की मृत्यु के बाद गंगा है। पत्र जान्हवी को है — भौतिक देह बाधक है।
आलोचना कभी छवि अस्थिर कहती है — नायिका और चाल दोनों। फिर भी वह जाति और धर्म का बंधन तोड़ती है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। मृणाल इंकार की नायिका है। यह पूँजीपति-पुत्री सेवा और प्रेम चुनती है। सीमा प्रेम-सूत्र का कभी रमानी लगना है। गुण यह कि स्त्री केवल आभूषण नहीं। रश्मिरथी का सर्ग यह चरित्र नहीं।
निष्कर्ष यह है कि सोफिया क्लार्क के राज्य-विवाह के विरुद्ध विनय इसलिए चुनती है कि हृदय सेवा और त्याग देखता है, संरक्षण नहीं।
Q. 3 (8 marks) · Unit 3
प्रमोद की आँख कथा को कैसे सीमित करती है?
Or: मृणाल प्रमोद का हाथ क्यों नहीं पकड़ती?
Model answer
त्यागपत्र 1937। वाचक उत्तम पुरुष है — प्रमोद, मृणाल का भतीजा, बाद में न्यायाधीश। पर्सी लुबॉक की भाषा में दृष्टि सीमित-व्यक्तिगत है, सर्वज्ञ नहीं। कथा बचपन, कालेज, वकालत उसी स्मृति में है। वह मृणाल की पीड़ा समझता है, निष्पक्ष दर्शक नहीं। सहानुभूति भी देता है, बचाव भी करता है। रंगभूमि का वाचक सर्वज्ञ टिप्पणी करता है; यह मैं अपने मन को भी छिपाता है। शेखर एक जीवनी का मैं चेतना की परत है; यह मैं स्मृति और अपराध-बोध है। बाणभट्ट आत्मकथा-मैं कवि-नायक है। अनामदास संकलक है। सीमा यह है कि नायिका का अनुभव पुरुष-आँख से छनता है। गुण यह है कि द्वंद्व भीतर तक जाता है।
नायक मृणाल है; वाचक प्रमोद है। दोनों को एक कहना अधूरा है। विनय सिंह आवेश में प्राण देते हैं। सूरदास इंकार सार्वजनिक है। यह इंकार निजी और देर का है। शेखर का मैं चेतना की परत है; यह मैं स्मृति और अपराध-बोध है। बिना इस अंतर के वह केवल रिश्तेदार रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि प्रमोद की आँख कथा को स्मृति और द्वंद्व तक सीमित करती है; सर्वज्ञ समाज-चित्र यहाँ नहीं।
Or
प्रमोद सर्वस्व लगाकर दुर्भाग्य पलटना चाहता है। मृणाल इंकार करती है। वह समाज की दावेदारी छोड़ चुकी है। ससुराल से कटे तो मायके का दावा भी नहीं रखती। सहानुभूति लेती नहीं। हाथ पकड़ना वापस लेने का रूप होता। शीर्षक का दूसरा अर्थ यहीं पूरा होता है — दावा छोड़ना। आलोचना आत्मदान में मुक्ति पढ़ती है। सीमा यह कि पीड़ा विद्रोह नहीं बनती; व्यवस्था ज्यों की त्यों रहती है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। सुनीता 1935 अलग कृति है। मृणाल मन और मर्यादा के बीच है। कर्ता के कर्म हैं — सत्य, इंकार, न लौटना। अंधी दया उसे वस्तु बना देती।
यह विनय सिंह की आत्महत्या नहीं। यह सूरदास का सार्वजनिक इंकार नहीं। यह निजी पद छोड़ना है। नायक मृणाल रहती है; वाचक कर्म से अपने को तौलता है, रक्षक नहीं बन पाता। सुनीता में यह पद-त्याग नहीं।
निष्कर्ष यह है कि मृणाल हाथ इसलिए नहीं पकड़ती कि कृपा उसे वस्तु बना देती, निर्णय कर्ता रहने देता है।
Q. 4 (8 marks) · Unit 4
राजा जनश्रुति रैक्व के पास क्यों लौटता है?
Or: पोथा-ढाँचा आत्मकथा-मैं से क्यों अलग है?
Model answer
जनश्रुति दानी राजा है। पक्षियों की वार्ता से वह रैक्व की महिमा सुनता है — शकट के नीचे बैठा साधक, ज्ञान में बड़ा। पहला आगमन अहं लेकर है। रैक्व टालता है। ज्ञान बिकाऊ नहीं, पद और गोत्र से नहीं बिकता। दूसरा आगमन भेंट और कन्या लेकर है। उपन्यास छान्दोग्य के संक्षेप को नेह और समाज-परीक्षा से भरता है। लौटना खलनायक का पश्चात्ताप नहीं; सामंत की ज्ञान-चाह है। बिना जनश्रुति के रैक्व केवल एकांत साधक रह जाता। रंगभूमि में राजा महेंद्र तालमेल रखते हैं; यहाँ राजा ज्ञान माँगता है। जॉन सेवक लोभ का पूँजीपति है; यह राजा दान का अहं है। सत्यकाम-प्रसंग गोत्र का है, यह ज्ञान-याचना है।
बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 आत्मकथा-ढाँचा है, हर्ष-काल का मानस है। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान है। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-काल छूती है। यह उपनिषद्-काल का मानस है। रंगभूमि का नाम कर्म-नीति है। त्यागपत्र पद-त्याग है। महाभोज व्यंग्य-भोज है। बिना रैक्व के आख्यान अधूरा रहता है। बिना अनामदास के पोथा ढाँचा खो देता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस शीर्षक के लेखक नहीं। सत्यकाम-माता का नाम-भ्रम जाबाला पर है, पोथा-ढाँचे पर नहीं।
निष्कर्ष यह है कि जनश्रुति इसलिए लौटता है कि दान पद नहीं देता, ज्ञान अनुभव से माँगा जाता है।
Or
अनामदास का पोथा 1976, राजकमल, द्विवेदी का अंतिम उपन्यास। नाम दो स्तर बाँधता है। पोथा पांडुलिपि है, छपा इश्तिहार नहीं। अनामदास संकलक-वाचक है। भीतर का आख्यान अथ रैक्व-आख्यान है। बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 आत्मकथा-मैं है, हर्ष-काल का मानस, वाचक बाणभट्ट कवि-नायक। शेखर का मैं चेतना की परत है। प्रमोद स्मृति और अपराध-बोध है। महाभोज सर्वज्ञ घटना है। रंगभूमि सर्वज्ञ टिप्पणी है। यह मैं पोथा लिखने वाला साधक है, आख्यान का नायक नहीं। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान है। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-स्पर्श है। निर्धारित कृति अंतिम है। पर्सी लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं; यहाँ दो आँखें हैं — संकलक और साधक।
दोनों को एक कहना अधूरा है। उत्तम पुरुष पूरा धारा नहीं; ढाँचा पांडुलिपि का है। लेखक आरंभ में उपनिषद्-प्रसंग को अधूरा पाता है; मनुष्य का नेह और जिज्ञासा जोड़ता है। वाचक निष्पक्ष दर्शक नहीं। वह संस्कृति का पक्ष लेता है, उपदेश का नारा नहीं। महावीर प्रसाद द्विवेदी भाषा-शुद्धि हैं, यह ढाँचा नहीं। सत्यकाम-माता का नाम-भ्रम जाबाला पर है, पोथा-ढाँचे पर नहीं। बिना वाचक लिखे शिल्प-उत्तर अधूरा है। बिना रैक्व के वाचक सूखा रहता है।
निष्कर्ष यह है कि पोथा-ढाँचा संकलित आख्यान है, आत्मकथा-मैं कवि-नायक का शरीर नहीं; अनामदास रैक्व नहीं।
Q. 5 (8 marks) · Unit 5
सक्सेना की रपट तंत्र में क्यों नहीं टिकती?
Or: रुक्मा कथा के अंत तक क्यों खड़ी रहती है?
Model answer
सक्सेना महाभोज में पुलिस अधीक्षक हैं। सत्य की रपट चाहते हैं। बिसेसर उर्फ़ बिसू की मृत्यु विष और षड्यंत्र की है। जोरावर का हित जुड़ा है। दा साहब मुख्यमंत्री हैं, गृह का प्रभार भी। इशारा काफी है, हाथ नहीं। डीआईजी सिंहा रपट बदलते हैं, पद पाते हैं। सक्सेना निलंबित होते हैं। रंगभूमि में क्लार्क गोली चलाता है; यहाँ पुलिस कागज चलाती है। रपट इसलिए नहीं टिकती कि चुनाव नजदीक है और लाश वोट है। राग दरबारी विकास-कार्यालय की हँसी है; यह फाइल और संरक्षण है। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण सत्ता-रक्षा है। बच्चन सिंह गठजोड़ देखते हैं। ईमानदार अफसर आशा का स्पर्श दे सकता है, व्यवस्था नहीं टूटती।
सीमा यह कि आकर्षण पीड़ा को ढक सकता है। गुण यह कि तंत्र का चेहरा दिखता है, उपदेश का दैत्य नहीं। सूरदास के सामने क्लार्क गोली चलाता है; यहाँ इशारा और फाइल चलती है। बिना जोरावर के हिंसा अधूरी है। बिना दा साहब के संरक्षण अधूरा है। आपका बंटी इस चरित्र की कृति नहीं।
निष्कर्ष यह है कि सक्सेना की रपट सत्य चाहती है, तंत्र सीट चाहता है; इसलिए ईमानदार अफसर हटा दिया जाता है।
Or
रुक्मा बिंदेश्वरी उर्फ़ बिंदा की पत्नी हैं। महाभोज की प्रमुख नारी-पात्र हैं। पहले डर है, फिर भ्रम टूटता है। बिंदा को झूठा मुकदमा देकर बंद किया जाता है। रुक्मा सक्सेना के साथ सबूत आगे ले जाती हैं। स्त्री यहाँ केवल करुण दृश्य नहीं, तंत्र के सामने खड़ी साक्षी है। मृणाल इंकार की नायिका है। सोफिया प्रेम तोड़ती है। जाबाला नेह की कर्ता है, सत्यकाम-माता नहीं। सुमन सेवासदन की नगर-नैतिकता है। रुक्मा लाश और फाइल के बीच है। नारी-केंद्र आपका बंटी जितना नहीं; वहाँ माता शकुंत और बच्चा बंटी हैं। जमुना बहन दा साहब की पत्नी हैं — सादगी का स्वर, केंद्र नहीं। अकेली कहानी है, यह जीवन नहीं।
तुलना से पहचान बैठती है। मृणाल इंकार की नायिका है। सोफिया प्रेम और गंगा चुनती है। जाबाला नेह की कर्ता है, सत्यकाम-माता नहीं। सुमन सेवासदन की नगर-नैतिकता है। रुक्मा लाश और फाइल के बीच है। बिना बिंदा के उसकी भूमिका पतली रहती है। बिना बिसू की हत्या के सबूत का अर्थ नहीं खुलता। नाटक-रूपांतर दृश्य बढ़ाता है; निर्धारित रूप उपन्यास है।
निष्कर्ष यह है कि रुक्मा इसलिए खड़ी रहती है कि सबूत और हक बिसू की लाश के बाद भी चलते हैं।
Section C
Q. 1 (20 marks) · Unit 1
तिलिस्मी-ऐयारी से प्रेमचंद-यथार्थ तक हिन्दी उपन्यास कैसे मुड़ा?
Model answer
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हिन्दी ने दीर्घ गद्य-कथा अपनाई। पृष्ठभूमि प्रेस, शिक्षा, अनुवाद और नवजागरण है। परीक्षा गुरु 1882 नगर और नैतिक परीक्षा देता है। भाग्यवती 1877 उपदेश रखती है, प्रथम होने का विवाद साथ है। चंद्रकांता तिलिस्म से पाठक बढ़ाती है। खड़ी बोली का प्रसार यहीं से चौड़ा होता है। भारतेंदु युग नाटक-निबंध में अधिक शक्ति रखता है; उपन्यास अभी सीख रहा है। तिलिस्मी-ऐयारी घटना-कौतुक है। ऐयार, गुफा, राजकुमार — आलंबन कौतुक है, किसान नहीं। द्विवेदी युग भाषा-शुद्धि और आदर्श जोड़ता है, प्रश्न अभी प्रेमचंद जितना गहरा नहीं। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं। गोपाल राय सोपान को इतिहास का कंकाल बनाते हैं। नगेन्द्र स्वरूप बाँधते हैं।
विकास का पहला बड़ा सोपान तिलिस्मी-ऐयारी और द्विवेदी-आदर्श है। देवकीनंदन खत्री का चंद्रकांता 1888 के आसपास तिलिस्म, ऐयार और राजकुमार से पाठक बढ़ाता है। आलोचना उसे कला का शिखर नहीं मानती; इतिहास उसे पाठक-निर्माण मानता है। किशोरीलाल गोस्वामी ऐतिहासिक-रमानी कथा लिखते हैं। गोपालराम गहमरी जासूसी गद्य चलाते हैं। द्विवेदी युग भाषा-शुद्धि और आदर्श जोड़ता है। उपन्यास अभी प्रेमचंद जितना सामाजिक नहीं। वह पाठक जोड़ता है, प्रश्न गहरा नहीं करता। बिना खत्री के पाठक-समुदाय पतला रहता। बिना प्रेमचंद के तिलिस्म ही उपन्यास रह जाता। सोपान का अर्थ सीढ़ी है — प्रत्येक सीढ़ी अगली को संभव बनाती है। गोपाल राय इसी क्रम को इतिहास का कंकाल बनाते हैं।
दूसरा सोपान प्रेमचंद युग है। धनपत राय ‘प्रेमचंद’ 1880–1936, लमही, वाराणसी। सेवासदन 1918 नारी-नैतिकता, प्रेमाश्रम 1921 किसान, रंगभूमि 1925 उद्योग और श्रम, गबन 1931 मध्यवर्गीय लोभ, कर्मभूमि 1932 आंदोलन, गोदान 1936 होरी और ऋण — शिखर। भाषा खड़ी बोली, दृष्टि यथार्थ; आदर्श कभी चित्र के साथ रहता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। जयशंकर प्रसाद कंकाल, तितली में संस्कृति छूते हैं। वृंदावनलाल वर्मा ऐतिहासिक उपन्यास चलाते हैं। उपन्यास समाज का प्रधान माध्यम बनता है। किसान, स्त्री, श्रम, नगर-कर्मचारी नायक बनते हैं। रंगभूमि पत्र की निर्धारित कृति है। गोदान शिखर-नाम है, यह पत्र निर्धारित नहीं। कर्मभूमि अलग विषय है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कविता है, यह विकास-पंक्ति नहीं।
तीसरा सोपान प्रेमचंदोत्तर मन और संस्कृति है — जैनेन्द्र त्यागपत्र 1937, अज्ञेय शेखर एक जीवनी, यशपाल झूठा सच, द्विवेदी बाणभट्ट की आत्मकथा और अनामदास का पोथा 1976। चौथा आंचल और व्यंग्य है — नागार्जुन बलचनमा, रेणु मैला आँचल 1954, श्रीलाल शुक्ल राग दरबारी। पाँचवाँ समकालीन स्त्री-राजनीति है — मन्नू महाभोज 1979, सोबती, साहनी तमस। विकास निषेध और ग्रहण दोनों है। खत्री पाठक देते हैं, प्रेमचंद यथार्थ, जैनेन्द्र मन, रेणु आंचल, मन्नू तंत्र। सीमा यह कि हर सोपान को केवल एक नाम से बाँधना अधूरा है। निर्धारित चार लेखक इन्हीं मोड़ों के शिखर-नाम हैं।
निष्कर्ष यह है कि तिलिस्म ने गद्य का पाठक बनाया और प्रेमचंद ने उसे समाज का प्रश्न बना दिया; हिन्दी उपन्यास का बड़ा मोड़ यहीं है।
Q. 2 (20 marks) · Unit 2
रंगभूमि में कारखाना प्रगति का शब्द और बस्ती की साँस कैसे टकराते हैं?
Model answer
रंगभूमि 1925, प्रेमचंद, पांडेपुर। जॉन सेवक सिगरेट का कारखाना प्रगति और लाभ दोनों से देखता है। सूरदास की ज़मीन मुहल्ले के पशुओं की चराई है। पाँच रुपये और मुँहमाँगी कीमत दोनों ठुकराई जाती हैं। इंकार निजी हठ नहीं, सार्वजनिक उपयोग का तर्क है। प्रगति का शब्द जॉन के पास है। साँस और पशु बस्ती के पास हैं। कारखाना उठता है तो बाहर के मज़दूर, शराब, ताड़ी, वेश्यालय घुसते हैं। कुछ मुहल्ले वाले व्यापार की लालच में साथ हो जाते हैं। झूठा मुकदमा, कोर्ट ऑफ वार्ड्स, झोपड़ी तोड़ना — यही औद्योगिक चमक का दूसरा मुख है। प्रेमचंद मशीन के दुश्मन नहीं; वे पूँजी को राज्य और रियासत से जुड़ा देखते हैं। बिना क्लार्क के कारखाना अकेला नहीं चलता। नायक अंधा भिखारी है, भक्त-कवि सूरदास नहीं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है, यह कृति नहीं।
राजनीतिक महत्त्व कारखाना, अंग्रेज़ अफसर, रियासत और कोर्ट ऑफ वार्ड्स पर है। जोज़फ क्लार्क राज्य की शक्ति रखता है। आंदोलन कुचलने पर सूरदास पर पिस्तौल चलाता है। राजा महेंद्र अंग्रेज़ और कारखाने से तालमेल रखते हैं। भरत सिंह कोर्ट ऑफ वार्ड्स की सलाह पर रियासत अंग्रेज़ को सौंप देते हैं; यही बेदखली का कानूनी रूप है। सूरदास का आंदोलन कानूनी अर्जी नहीं, जन-शक्ति है। गाँधी-स्पर्श सत्य और अहिंसा पर है, पूरा चरित नहीं। राष्ट्रीय भाव सूरदास की मृत्यु को स्मृति और संगठन बनाता है। आलोचना उसे राष्ट्रनायक कहती है — नेता नहीं, नैतिक केंद्र। बिना क्लार्क के कारखाना अकेला नहीं चलता। प्रेमचंद मशीन के दुश्मन नहीं; वे पूँजी को राज्य और रियासत से जुड़ा देखते हैं। आज भी ज़मीन-अधिग्रहण और कारखाना यही प्रश्न पूछते हैं।
धार्मिक महत्त्व सोफिया के विवेक और सूरदास की भक्ति-पक्ति पर है। धर्म व्यापार का मुखौटा भी है — जॉन सेवक — प्रेम का सेतु भी है — सोफिया। सेवा भवन भरत सिंह और जान्हवी का धर्म-सेवा सिरा है। राजनीतिक उपन्यास पूरा यह नहीं; आंदोलन एक अंग है। मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं; मन है, केंद्र समाज है। आंचलिक उपन्यास नहीं; पांडेपुर नाम की बस्ती है, रेणु का बोली-आंचल नहीं। कर्मभूमि 1932 राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन अधिक सीधे छूती है — अलग कृति। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग काव्य-सभा है, औपनिवेशिक तंत्र नहीं। महाभोज चुनाव-तंत्र है; यह रियासत-अंग्रेज़-पूँजी का त्रिकोण है।
सीमाएँ लिखी जाती हैं। आकार बड़ा है। दो सूत्र कभी ढीले पड़ते हैं। मज़दूर-संगठन गोदान के किसान जितना नहीं फैलता। सूरदास का आदर्शीकरण गाँधी-छाया तक जाता है। सोफिया की छवि अस्थिर कही गई है। विनय की आत्महत्या आदर्श और आवेश दोनों है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास को 1925 में पूँजी-राज्य का प्रश्न और श्रम-नायक मिला। सेवासदन नारी-इज्जत है। गोदान किसान-ऋण है। रंगभूमि उद्योग-बस्ती है। तीनों प्रेमचंद हैं; प्रश्न अलग हैं। गोपाल राय इतिहास में इसे प्रेमचंद के बड़े सामाजिक में रखते हैं। बिना जाति के सामाजिक अधूरा है। बिना क्लार्क के राजनीतिक अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि टकराव शब्द और साँस का है — प्रगति लाभ बोलती है, बस्ती चराई और सत्य बोलती है; कारण ज़मीन-हरण है, संयोग नहीं।
Q. 3 (20 marks) · Unit 3
त्यागपत्र में समाज की दृष्टि दंड कैसे बनती है?
Model answer
त्यागपत्र 1937, जैनेन्द्र, लघु मनोवैज्ञानिक उपन्यास। नायिका मृणाल। वाचक प्रमोद। कथानक का कारण समाज की दृष्टि और मृणाल का सत्य है, संयोग नहीं। फॉर्स्टर क्रम और कारण कहते हैं। क्रम घटनाओं का है; कारण दृष्टि का है। मृणाल के माता-पिता नहीं रहे। भाभी आदर्श नारी बनाना चाहती है। शीला के भाई से प्रेम खुलना दंड बनता है। विवाह अधेड़, पूर्व-विवाहित पुरुष से कर दिया जाता है। मृणाल पति से पूर्व-प्रेम कह देती है — सत्य का दावा। पति निकाल देता है। तथाकथित शिष्ट वृत्त छल रख सकता है; तिरस्कृत बस्ती छल नहीं छिपाती — यही व्यंग्य है, नारा नहीं। पवित्रता शरीर पर नापी जाती है; मृणाल मन पर नापती है। शिक्षा, प्रेम, सत्य — तीनों दंड बन सकते हैं।
प्रमोद द्वंद्व का दूसरा सिरा है। नेह है, मर्यादा है। न्याय का पद है, न्याय का अर्थ अधूरा है। वह व्यक्ति को समझता है, समाज के पद पर बैठता है। करुण है, मुक्त नहीं। समझता है, करता कम है। पद और प्रतिष्ठा पीछे खींचते हैं। आलोचना उसे स्वार्थ और करुणा का मिश्रण कहती है। अंतिम अवस्था तक आंदोलन भीतर ही रहता है। त्यागपत्र उसी द्वंद्व का अंतिम कर्म है — देर का प्रायश्चित्त। विनय सिंह आवेश में प्राण देते हैं; यह वाचक पत्र से पद देता है। सूरदास इंकार सार्वजनिक है। मृणाल इंकार निजी है, दंड सार्वजनिक है। तीनों व्यक्ति-समाज के अलग मार्ग हैं। न्यायाधीश कानून चलाता है; बुआ के सामने कानून अधूरा पड़ जाता है। नाम यहीं द्वंद्व को लिखित करता है।
रंगभूमि का द्वंद्व सार्वजनिक है — ज़मीन, कारखाना, गोली, क्लार्क। गोदान का द्वंद्व ऋण और मर्यादा का है — होरी किसान। महाभोज का द्वंद्व हक और चुनाव का है — बिसू की लाश। अनामदास का पोथा में द्वंद्व ज्ञान और नेह का है — रैक्व, जाबाला, जनश्रुति। त्यागपत्र का द्वंद्व निजी है, दंड सार्वजनिक है। आंचल नहीं। राजनीति नहीं। ऐतिहासिक राज-युद्ध नहीं। नैतिक दृष्टि का दबाव है। तथाकथित शिष्ट वृत्त छल रख सकता है; तिरस्कृत बस्ती छल नहीं छिपाती। व्यक्ति को समाज पतित कहता है; वाचक उसे भीतर से शुद्ध दिखाता है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; द्वंद्व उसी सीमित आँख से दिखता है, सर्वज्ञ समाज-चित्र से नहीं। नारी वस्तु जैसी घटनाएँ पाती है, कर्ता जैसे कर्म करती है। यही व्यक्ति का बचाव है।
सीमा यह कि समाज का ढाँचा नहीं टूटता। व्यक्ति टूटता है या पद छोड़ता है। आत्मदान विद्रोह का नारा नहीं; अलग होकर टूटना है। आलोचना कभी इसे व्यवस्था-समर्थन पढ़ती है। बचाव यह है कि चित्र व्यवस्था की क्रूरता बिना उपदेश के दिखाता है। गुण यह कि द्वंद्व भीतर तक जाता है। सुनीता आकर्षण का दूसरा द्वंद्व है, यह कृति नहीं। बिना समाज की दृष्टि के व्यक्ति केवल संत रह जाता है। दोनों सिरे लिखे बिना उत्तर अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि दृष्टि दंड इसलिए बनती है कि समाज शरीर नापता है और मृणाल सत्य बोलती है; कारण संयोग नहीं, मर्यादा की आँख है।
Q. 4 (20 marks) · Unit 4
अनामदास का पोथा में तप एकांत में सिद्ध है या समाज में — विवेचन कीजिए।
Model answer
अनामदास का पोथा 1976, हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजकमल, अंतिम उपन्यास। आख्यान रैक्व का है। वाचक अनामदास है, साधक नहीं। पृष्ठभूमि छान्दोग्य का रैक्व-जनश्रुति प्रसंग है। रूप सांस्कृतिक उपन्यास है — घटना की नकल नहीं, युग के मानस की कथा। महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के आचार्य हैं, यह लेखक नहीं। रैक्व ऋषिपुत्र है। तूफान के बाद जाबाला मिलती है — संसार का पहला दबाव। अकेले सत्य बोलना सरल है; लोगों के बीच सत्य टिकता है — यही द्विवेदी का सूत्र है। जाबाला इस कृति में राजकन्या है, जनश्रुति की पुत्री। छान्दोग्य की दूसरी जाबाला सत्यकाम की माता हैं; वह यह नायिका नहीं। जनश्रुति ज्ञान माँगता है। पहला हाथ रैक्व नहीं पकड़ता। ज्ञान गोत्र और पद से नहीं बँधता। तप एकांत में सरल है, समाज में कठिन है।
तुलना से महत्त्व बैठता है। गोदान ऋण का समाज है। रंगभूमि कारखाने का समाज है — जाति सार्वजनिक टकराव। त्यागपत्र मर्यादा का समाज है — पवित्रता शरीर पर नापी जाती है। महाभोज चुनाव का समाज है — जाति वोट-बैंक। यहाँ ज्ञान मनुष्य पर नापा जाता है। दलित गवाही पूरा उपन्यास नहीं; प्रश्न वर्ण-अभिमान का है। बाणभट्ट की आत्मकथा हर्ष-काल का मानस है। यह उपनिषद्-काल का मानस है।
नारी-प्रश्न आलंबन का है। जाबाला संसार, सौंदर्य और कर्तव्य का दबाव है। राजा उसे भेंट की तरह भी ले जाता है; उपन्यास वस्तु नहीं रहने देता। प्रेम ब्रह्म-ज्ञान का पहला सोपान कहा जाता है, अंतिम नहीं। मृणाल इंकार की नायिका है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। रुक्मा तंत्र की साक्षी है। जाबाला ज्ञान और नेह के बीच है। बिना समाज की परीक्षा के चरित्र अधूरा है। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भ — संस्कृति का घन, आंचल-शब्द नहीं। व्यंग्य अहं और दान पर है, कार्यालय-व्यंग्य नहीं। शिल्प पोथा है; सांस्कृतिक महत्त्व ढाँचे से भी आता है — कथा छपे नारे की नहीं, संकलित स्मृति की है। हजारीप्रसाद द्विवेदी 1907–1979, बलिया; शांतिनिकेतन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। निबंध अशोक के फूल; आलोचना कबीर। उपन्यास उसी गवेषणा को कथा बनाता है।
सीमा यह कि व्यवस्था नहीं टूटती, दृष्टि बदलती है। आकार उलझ सकता है। दुरुहता और संस्कृत-भार पाठक काट सकते हैं। प्रेम-सूत्र को केवल रमानी पढ़ लेना महत्त्व को घटाता है। गुण यह कि शास्त्र मनुष्य-हित से पढ़ा जाता है, केवल मंत्र से नहीं। सांस्कृतिक उपन्यास पूरा इतिहास नहीं; मानस है। तिथि नहीं माँगी जाती। बिना स्रोत लिखे महत्त्व अधूरा है। बिना जोड़ के स्रोत नकल है। गोपाल राय इतिहास में द्विवेदी को संस्कृति-कथा पर रखते हैं। 1976 का अंतिम उपन्यास पंक्ति को बंद करता है, पहला उपन्यास नहीं।
निष्कर्ष यह है कि तप एकांत में सरल है और समाज में कठिन; पोथा ज्ञान को पद से काटकर नेह और समाज की तराजू पर रखता है।
Q. 5 (20 marks) · Unit 5
महाभोज में थाना, सचिवालय और बस्ती एक चक्र कैसे बनाते हैं?
Model answer
महाभोज 1979, मन्नू भंडारी, राधाकृष्ण। देशकाल सरोहा — पश्चिमी उत्तर प्रदेश, विधानसभा उपचुनाव। केंद्र बिसेसर उर्फ़ बिसू की हत्या। रूप राजनीतिक-यथार्थ उपन्यास है। वाचक सर्वज्ञ-घटना है। आपका बंटी 1971 बच्चे और विवाह-विच्छेद है, यह कृति नहीं। बस्ती हक और सबूत रखती है। बिसू शिक्षित दलित है। दिल्ली न्याय माँगना चाहता था। जोरावर बाहुबली है। विष और षड्यंत्र से मृत्यु कही जाती है। परिजन अंत्येष्टि रोकते हैं। बिंदा प्रतिरोध है; झूठा मुकदमा उसे थाने में बंद करता है। थाना कागज चलाता है। सक्सेना सत्य लिखते हैं; निलंबित होते हैं। सिंहा रपट बदलते हैं। दत्ता बाबू मशाल समाचार पत्र चलाते हैं; कागज-कोटा और अनुकूल खबर पास बैठते हैं। सचिवालय दा साहब हैं — मुख्यमंत्री, गीता और दरी का मुखौटा, इशारा। तीनों मिलकर भोज का चक्र हैं।
चरित्र बिसू, बिंदा, दा साहब गोल के निकट हैं। जोरावर, दत्ता, सिंहा सहायक-सपाट रह सकते हैं। रुक्मा और सक्सेना प्रतिरोध की दूसरी पंक्ति हैं। उद्देश्य चित्रण और राजनीतिक प्रश्न है। भाषा सरल खड़ी बोली। आंचल-शब्द रेणु जैसे ढेर नहीं। संस्कृत-गर्भ द्विवेदी जैसा नहीं। जैनेन्द्र का तर्क-संवाद नहीं; यहाँ सभा और दफ्तर का संवाद है। व्यंग्य राग दरबारी के निकट प्रशासन पर भी है, पर केंद्र लाश है। आलोचना शिल्पहीनता कहती है — अर्थ यह कि वर्णन सीधा है, प्रयोग का बोझ नहीं। गुण यही सीधापन है; पाठक तंत्र तक पहुँचता है। सीमा दुरुहता की नहीं, घटना की तेज़ी की है। कुछ पात्र सपाट रह जाते हैं। पात्र-भीड़ रंगभूमि जैसी है, मन त्यागपत्र जैसा नहीं।
देशकाल सरोहा, उपचुनाव, पश्चिमी उत्तर प्रदेश। गोदान का गाँव ऋण का है। पांडेपुर कारखाने का है। मेरीगंज आंचल का है। वन-आश्रम ज्ञान का है। सरोहा चुनाव और लाश का है। बेलछी प्रेरणा है, शिल्प का अध्याय नहीं। आपका बंटी परिवार-शिल्प है। एक इंच मुस्कान सह-लेखन है। अकेली कहानी है। सारा आकाश यादव का शिल्प है। तत्त्व बिना शिल्प के ढेर हैं; शिल्प बिना बिसू के प्रयोग है। रस व्यंग्य और करुण-रोष है। रूप राजनीतिक-यथार्थ उपन्यास है। बच्चन सिंह गठजोड़ देखते हैं — अपराध का राजनीतिकरण शिल्प का विषय है, नारा नहीं। क्लार्क गोली चलाता है; यहाँ इशारा और फाइल चलती है। संरचना यहीं हिंसा को कागज से बाँधती है।
सीमा दा साहब के आकर्षण की है — पीड़ा ढक सकती है। नाटक से विधा-भ्रम दूसरी सीमा है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास को चुनाव-तंत्र मिला। मन्नू 1931–2021, भानपुरा; नयी कहानी से सत्ता तक आईं। गोपाल राय उन्हें स्त्री-राजनीति के सोपान पर रखते हैं। निर्धारित कृति इन्हीं संवादों से पहचानी जाती है, नाटक की गिनती से नहीं। लंबे उद्धरण नहीं; प्रसंग और भाव याद रहें। बिना लाश के शिल्प अधूरा है। बिना कई कमरों के तंत्र नहीं दिखता। पूरी कथा पढ़नी है; सार विन्यास याद रखने के लिए है।
निष्कर्ष यह है कि थाना फाइल बदलता है, सचिवालय संरक्षण देता है, बस्ती लाश और हक रखती है; तीनों मिलकर भोज का चक्र हैं, केवल शोक नहीं।
सेट 2
सेट 2 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। प्रश्न सेट 1 और इकाई टेस्ट से भिन्न हैं। खंड अ अनिवार्य। खंड ब आंतरिक विकल्प सहित पाँचों। खंड स में कोई तीन।
Section A
Q. 1. आंचलिक धारा का शिखर-ग्रंथ माना जाता है —
रेणु, 1954, मेरीगंज। राग दरबारी व्यंग्य; तमस साम्प्रदायिकता; गोदान किसान-ऋण।
Q. 2. कर्मभूमि किस वर्ष प्रकाशित हुई?
प्रेमचंद; आंदोलन। निर्धारित कृति रंगभूमि 1925 है, कर्मभूमि नहीं।
Q. 3. जैनेन्द्र को साहित्य अकादमी किस कृति पर मिली?
1979। मुक्तिबोध कवि गजानन माधव अलग हैं। निर्धारित त्यागपत्र 1937 है।
Q. 4. द्विवेदी शांतिनिकेतन में हिन्दी-अध्यापन लगभग कितने वर्ष रहे?
1930 से; रवींद्रनाथ और क्षितिमोहन सेन का संग। 1950 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय।
Q. 5. एक इंच मुस्कान किस वर्ष की है?
मन्नू-राजेंद्र यादव सह-लेखन। मैं हार गई 1957 कहानी; आपका बंटी 1971; महाभोज 1979।
Q. 6. राग दरबारी _____ ई. में छपी।
Answer: 1968 — श्रीलाल शुक्ल; विकास-तंत्र व्यंग्य। महाभोज लाश और चुनाव है।
Q. 7. जॉन सेवक की पुत्री _____ है।
Answer: सोफिया — पुत्र प्रभु सेवक। पत्नी मिसेज जॉन सेवक। नायिका सूरदास नहीं, सोफिया दूसरे सूत्र की है।
Q. 8. परख _____ ई. का उपन्यास है।
Answer: 1929 — जैनेन्द्र का पहला बड़ा उपन्यास। त्यागपत्र 1937 तीसरा है।
Q. 9. पुनर्नवा _____ ई. की है।
Answer: 1973 — द्विवेदी; बुद्ध-काल का स्पर्श। निर्धारित कृति 1976 का पोथा है।
Q. 10. दा साहब के प्रत्याशी _____ हैं।
Answer: लखनसिंह — सत्ता का उम्मीदवार। जोरावर बाहुबली हैं; सुकुल प्रतिपक्ष हैं।
Section B
Q. 1 (8 marks) · Unit 1
फॉर्स्टर कथा और कथानक क्यों अलग करते हैं?
Or: लुबॉक दृष्टि को शिल्प का केंद्र क्यों कहते हैं?
Model answer
ई.एम. फॉर्स्टर कथा को क्रम कहते हैं और कथानक को कारण। क्रम यह है कि घटनाएँ एक के बाद एक आती हैं। कारण यह है कि वे क्यों आती हैं। गोदान में होरी की मृत्यु केवल अंत नहीं; ऋण कारण है। त्यागपत्र में घटना पतली है, दृष्टि दंड देती है। महाभोज में लाश संयोग नहीं; चुनाव कारण है। रंगभूमि में गोली संयोग नहीं; ज़मीन-हरण कारण है। अनामदास का पोथा में ज्ञान-चाह कारण है। तिलिस्मी कथा क्रम से चमकती है, कारण पतला रखती है। प्रेमचंद कारण समाज से बाँधते हैं। जैनेन्द्र कारण भीतर की दृष्टि से बाँधते हैं। बिना कारण के उपन्यास संयोगों का ढेर रह जाता। शुक्ल उद्देश्य को जीवन की आलोचना से जोड़ते हैं; आलोचना कारण माँगती है।
उदाहरण तत्त्व को पहचान देते हैं। रंगभूमि में कथावस्तु ज़मीन और कारखाने से बँधती है, देशकाल पांडेपुर का दबाव है। त्यागपत्र में चरित्र निर्णय से खुलता है, संवाद विचार का है। अनामदास का पोथा में भाषा संस्कृति से गाढ़ी है। महाभोज में उद्देश्य राजनीतिक प्रश्न है, देशकाल सरोहा का चुनाव है।
निष्कर्ष यह है कि अंतर क्रम और कारण पर है; परीक्षक कथानक में कारण माँगते हैं, केवल घटना-सूची नहीं।
Or
पर्सी लुबॉक पूछते हैं कि कथा किस आँख से कही गई। दृष्टि शिल्प का केंद्र है। सर्वज्ञ वाचक सब मन पढ़ता है — प्रेमचंद प्रायः यहीं हैं, रंगभूमि और महाभोज। उत्तम पुरुष मैं-कथन है — शेखर एक जीवनी, त्यागपत्र का प्रमोद। सीमित दृष्टि एक पात्र के साथ चलती है। चेतना-प्रवाह भीतर की धारा है — जैनेन्द्र और अज्ञेय के निकट। आत्मकथा-ढाँचा बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 में है। पोथा-ढाँचा संकलक की आँख है — अनामदास रैक्व नहीं। नामवर नए उपन्यास के शिल्प पर बोलते हैं। तत्त्व बिना शिल्प के ढेर हैं। शिल्प बिना तत्त्व के खाली प्रयोग है।
शिल्प तत्त्व का विरोधी नहीं। एक ही घटना सर्वज्ञ, मैं और संकलक से अलग अर्थ देती है। सूरदास की मृत्यु सर्वज्ञ टिप्पणी में शहादत है; प्रमोद की स्मृति में अपराध-बोध है; अनामदास की पोथी में संस्कृति-प्रसंग है। महाभोज कई कमरे दिखाता है — बस्ती, थाना, सचिवालय। बिना दृष्टि लिखे शिल्प-उत्तर अधूरा है। रश्मिरथी का सर्ग काव्य-दृष्टि है, यह गद्य-शिल्प नहीं।
निष्कर्ष यह है कि दृष्टि इसलिए केंद्र है कि एक ही घटना सर्वज्ञ, मैं और संकलक से अलग अर्थ देती है।
Q. 2 (8 marks) · Unit 2
जान्हवी सेवा और जाति के बीच कैसे बँटती हैं?
Or: विनय की आत्महत्या श्रम-नायक से क्यों अलग है?
Model answer
रानी जान्हवी कुंवर भरत सिंह की पत्नी हैं। सेवा भवन चलाती हैं। सोफिया को पास लाती हैं, फिर विनय को जाति-सेवा के नाम पर दूर भी भेजती हैं। अंत में प्रेम देखकर विवाह मानती हैं। सूरदास की मृत्यु पर भक्ति-विह्वल रोती हैं। चरणों पर सिर रखना आदर्श का अंत है। इंदु उनकी पुत्री हैं, राजा महेंद्र से मतभेद रखती हैं। बँटना सामंत-नारी का द्वंद्व है, आभूषण नहीं। वे विरोध में पूरे नहीं उतरतीं; तंत्र के भीतर से करुणा करती हैं। सूरदास बाहर से टकराता है। नायक अंधा भिखारी है, भक्त-कवि नहीं।
सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। मृणाल इंकार की नायिका है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम चुनती है। जाबाला नेह की कर्ता है। रुक्मा तंत्र की साक्षी है। जान्हवी सेवा से खुलती हैं और जाति से सिमटती हैं। गोल वही पात्र हैं जो निर्णय बदलते हैं। सीमा आदर्शीकरण की है। गुण यह कि सामंत-नारी केवल आभूषण नहीं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग यह नारी नहीं।
निष्कर्ष यह है कि जान्हवी सेवा से खुलती हैं और जाति से सिमटती हैं; दोनों सिरे एक पात्र में हैं।
Or
विनय सिंह भरत सिंह के पुत्र हैं। आंदोलन में सूरदास का साथ देते हैं। भीड़ उन्हें रईस का बेटा कहकर अपमानित करती है — गरीब की जान सस्ती। वे पूछते हैं रईसों के बेटे प्राण कैसे देते हैं — और पिस्तौल से स्वयं को मारते हैं। सूरदास क्लार्क की गोली से अस्पताल में मरते हैं। शहीद का दर्जा सूरदास को मिलता है, विनय को उतना नहीं। आत्महत्या आहत स्वाभिमान है, गाँधी-स्पर्श नहीं। सूरदास हिंसा नहीं चलाता। प्रेमचंद श्रम-नायक को केंद्र रखते हैं, कुंवर-पुत्र को करुण छाया। सोफिया का अंत प्रेम की तृप्ति है। तीन मौतें एक दबाव की हैं, अर्थ अलग हैं। नायक सूरदास रहते हैं, भक्त-कवि नहीं।
चरित्र करुण और आदर्श दोनों है। प्रेम में निष्ठा है। वर्ग का बोझ मृत्यु तक जाता है। सूरदास हिंसा नहीं चलाता। विनय भीड़ को रोकते हैं, फिर हिंसा अपने ऊपर कर लेते हैं — यह गाँधी नहीं, आहत स्वाभिमान है। सीमा आत्महत्या का आवेश है। गुण यह कि प्रेम-सूत्र अंत में कारखाने के मैदान पर आता है।
निष्कर्ष यह है कि विनय की मृत्यु आवेश की है, सूरदास की मृत्यु सार्वजनिक शहादत की है; नायक सूरदास रहते हैं।
Q. 3 (8 marks) · Unit 3
विवाह-संस्था त्यागपत्र में सम्मानित और कमजोर दोनों क्यों है?
Or: न्यायाधीश का पद प्रमोद के लिए क्या अर्थ रखता है?
Model answer
त्यागपत्र में समाज आदर्श स्त्री और विवाह का सम्मान माँगता है। शिक्षा, प्रेम, सत्य उसी सम्मान के नाम पर दंड बनते हैं। पति अधेड़ है, पूर्व-विवाह का बोझ रखता है, फिर भी संस्था उसके पक्ष में है। मृणाल पति-धर्म मानती है; पति उसे छोड़ता है क्योंकि वह पूर्व-प्रेम सत्य से कह देती है। संस्था सम्मानित इसलिए है कि नाम और मर्यादा उसी से नापी जाती है। कमजोर इसलिए है कि सत्य उसके भीतर नहीं टिकता। तथाकथित शिष्ट वृत्त निकाल देता है। कोयला-व्यापारी अनुरक्ति लाता है, फिर संपत्ति छीनता है। तीन पुरुष तीन दबाव हैं, देवता नहीं। सेवासदन इज्जत का प्रश्न है। आपका बंटी विच्छेद और बच्चे का प्रश्न है। यहाँ विवाह-दंड और इंकार है।
सेवासदन इज्जत का प्रश्न है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। महाभोज की रुक्मा तंत्र के सामने खड़ी है। सुनीता 1935 अलग प्रयोग है। यहाँ मर्यादा और निर्णय है। सीमा यह कि व्यवस्था नहीं टूटती, व्यक्ति टूटता है। गुण यह कि नारी करुण दृश्य नहीं।
निष्कर्ष यह है कि विवाह नाम से ऊँचा है और आचरण से कमजोर; त्यागपत्र दोनों चेहरे एक साथ रखता है।
Or
प्रमोद वकालत से न्यायाधीश तक पहुँचता है। पद प्रतिष्ठा है, पीछे खींचता भी है। वह मृणाल को समझता है, करता कम है। आलोचना उसे स्वार्थ और करुणा का मिश्रण कहती है। अंतिम अवस्था आंदोलित करती है; पत्र देकर पद छूटता है — प्रायश्चित्त। शीर्षक का पहला अर्थ यहीं है। द्वंद्व तीन हैं — नेह बनाम मर्यादा, कर्म बनाम डर, न्याय का पद बनाम न्याय का अर्थ। कानून बुआ के सामने अधूरा पड़ जाता है। विनय आवेश में प्राण देते हैं; प्रमोद पत्र से पद देते हैं। नायक मृणाल है; वाचक कर्म से अपने को तौलता है, रक्षक नहीं बन पाता। सुनीता में यह पद-त्याग नहीं। शेखर का मैं चेतना है; यह मैं स्मृति है।
यह विनय सिंह की आत्महत्या नहीं। यह सूरदास का सार्वजनिक इंकार नहीं। यह निजी पद छोड़ना है। नायक मृणाल रहती है; वाचक कर्म से अपने को तौलता है, रक्षक नहीं बन पाता। सुनीता में यह पद-त्याग नहीं।
निष्कर्ष यह है कि पद प्रमोद के लिए प्रतिष्ठा और अधूरा न्याय दोनों है; त्याग देर से बाहर आता है।
Q. 4 (8 marks) · Unit 4
रैक्व ज्ञान को मोल क्यों नहीं बनने देता?
Or: उपन्यास की जाबाला राजकन्या क्यों है?
Model answer
उपनिषद् रैक्व को शकट-चालक साधु कहता है। उपन्यास उसे ऋषिपुत्र और साधक बनाता है। राजा जनश्रुति दान से बड़ा मानता है अपने को। पक्षी उसे छोटा ठहराते हैं। पहला हाथ रैक्व नहीं पकड़ता। ज्ञान पद और गोत्र से नहीं बिकता। पीठ की खुजली उपनिषद् का संकेत है; उपन्यास उसे मनुष्य की बेचैनी तक ले जाता है। अनामदास वाचक है, रैक्व आख्यान-पुरुष है। दोनों को एक कहना अधूरा है। सूरदास सार्वजनिक इंकार है। प्रमोद देर का प्रायश्चित्त है। रैक्व ज्ञान का इंकार और नेह का स्वीकार दोनों रखता है। सीमा आदर्शीकरण की है। गुण यह कि अनुभव पद से ऊपर है।
दूसरा आगमन भेंट और कन्या लेकर है; परीक्षा फिर भी परीक्षा है। जाबाला राजकन्या है, सत्यकाम-माता नहीं। बाणभट्ट कवि-नायक है, यह साधक नहीं। महावीर प्रसाद द्विवेदी यह आख्यान नहीं। वर्मा घटना-इतिहास लिखते हैं; द्विवेदी मानस लिखते हैं। बिना जनश्रुति के सार्वजनिक अर्थ पतला है। बिना जाबाला के नेह नारा रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि मोल न बनने देना ज्ञान को खरीद-फरोख्त से बचाना है; दूसरा आगमन भेंट के बाद भी परीक्षा ही है।
Or
जाबाला अनामदास का पोथा में राजकन्या है, राजा जनश्रुति की पुत्री। तूफान के बाद बिखरी बैलगाड़ी में घायल मिलती है। रैक्व साधक है; यहीं साधक और संसार का पहला मिलन है। वह संसार, सौंदर्य और कर्तव्य का दबाव है। राजा उसे भेंट की तरह भी ले जाता है; उपन्यास उसे केवल वस्तु नहीं रहने देता। प्रेम ब्रह्म-ज्ञान का पहला सोपान कहा जाता है, अंतिम नहीं। जिजीविषा यहीं खुलती है। अरुंधति सहायक नारी-पात्र हैं, नायिका नहीं। छान्दोग्य का सत्यकाम-प्रसंग अलग है — वहाँ जाबाला माता हैं, अज्ञात गोत्र, सत्य कहने वाली। मिलाए बिना उत्तर गलत हो जाता है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। मृणाल मर्यादा है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है।
छान्दोग्य का दूसरा प्रसंग सत्यकाम जाबाल है। वहाँ जाबाला माता हैं, दासी या अज्ञात गोत्र, सत्य कहने वाली। वह यह उपन्यास की नायिका नहीं। मिलाए बिना उत्तर गलत हो जाता है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। मृणाल मर्यादा और इंकार है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। रुक्मा तंत्र की साक्षी है। यह ज्ञान और नेह के बीच है। गोल चरित्र है, सपाट भेंट नहीं।
निष्कर्ष यह है कि राजकन्या इसलिए है कि साधक संसार से टकराए; सत्यकाम-माता यह पात्र नहीं।
Q. 5 (8 marks) · Unit 5
सुकुल बाबू दुख बाँटने क्यों आते हैं?
Or: मशाल समाचार पत्र सत्ता से कैसे बँधता है?
Model answer
सुकुल बाबू महाभोज में प्रतिपक्ष हैं, पूर्व मुख्यमंत्री। बिसेसर उर्फ़ बिसू की लाश पर संवेदना दिखाते हैं। सभा चुनावी हो जाती है। दा साहब शांत रहते हैं, तंत्र चलाते हैं। दोनों दल दलित-दुख से शक्ति चाहते हैं, हक नहीं। जाति वोट-बैंक है, न्याय नहीं। बेलछी 1977 प्रेरणा है, अध्याय नहीं। उपन्यास रिपोर्ट नहीं। देशकाल सरोहा, उपचुनाव। आना करुणा का नाटक है, शोक-मात्र नहीं। शीर्षक भोज उसी मेज का व्यंग्य है। लखनसिंह सत्ता के प्रत्याशी हैं। जोरावर हिंसा का हाथ है। बिना चुनाव के संवेदना करुणा रह जाती; चुनाव उसे वोट बनाता है। राग दरबारी कार्यालय-हँसी है; केंद्र यहाँ लाश है।
रंगभूमि का नाम कर्म-नीति है। त्यागपत्र पद-त्याग है। अनामदास का पोथा पांडुलिपि है। राग दरबारी विकास-गाँव का व्यंग्य है, केंद्र लाश नहीं। तमस साम्प्रदायिकता है। आपका बंटी 1971 परिवार है, शीर्षक का पर्याय नहीं। अकेली कहानी है। नाटक-रूपांतर अमल अल्लाना, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, लगभग 1982 — अलग विधा है। बच्चन सिंह उपन्यास को अपराध और राजनीति के गठजोड़ पर रखते हैं। आलोचना उसे अपराध का राजनीतिकरण कहती है। नाम वही गठजोड़ है।
निष्कर्ष यह है कि सुकुल दुख इसलिए बाँटते हैं कि उपचुनाव नजदीक है; संवेदना वोट की भाषा बन जाती है।
Or
दत्ता बाबू महाभोज में मशाल समाचार पत्र के संपादक हैं। नरोत्तम खबर लाता है। संपादन सत्ता देखता है। कागज-कोटा और अनुकूल खबर पास बैठते हैं। रंगभूमि में राज्य-संग खुला हाथ है — क्लार्क की गोली। यहाँ इशारा और छपा शब्द है। राग दरबारी कार्यालय की हँसी है; केंद्र यहाँ लाश है। बिना प्रेस के भोज अधूरा है। बिना थाने के फाइल अधूरी है। बिना दा साहब के संरक्षण अधूरा है। तीनों एक चक्र हैं। बच्चन सिंह अपराध और राजनीति का गठजोड़ देखते हैं। आलोचना अपराध का राजनीतिकरण कहती है। नाम व्यंग्य है — उत्सव लाश की पूँजी पर। वोट, प्रेस और जाँच मेज के आसन हैं।
आपका बंटी इस प्रेस की कृति नहीं। अकेली कहानी है। तमस दंगा है। जूठन गवाही है। यह तंत्र की कथा है। नरोत्तम स्वतंत्र गवाह नहीं रह पाता; संपादन आसन है। सीमा यह कि शब्द मोड़ का चित्र कभी सपाट लग सकता है। गुण यह कि भोज बिना अखबार के अधूरा दिखता है।
निष्कर्ष यह है कि मशाल खबर से अधिक संरक्षण से बँधता है; स्वतंत्र गवाही नहीं, अनुकूलन है।
Section C
Q. 1 (20 marks) · Unit 1
निर्धारित चार कृतियों में वाचक कैसे बदलता है?
Model answer
शास्त्र वाचक को शिल्प का अंग मानता है। पर्सी लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं। निर्धारित चार उपन्यास चार आँखें हैं। साम्य खड़ी बोली और आधुनिक मनुष्य है। वैषम्य आँख पर है। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; उपन्यास उसी गद्य के अलग शिल्प हैं। गोपाल राय इतिहास सोपानों से बाँधते हैं। नगेन्द्र व्यापक जीवन-चित्र कहते हैं। ई.एम. फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं; कारण आँख के बिना संयोग रह जाता है। बिना वाचक लिखे शिल्प-उत्तर अधूरा है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग काव्य-सभा है, यह गद्य-वाचक नहीं। भक्त-कवि सूरदास यह परिचय नहीं। नामवर नए उपन्यास के शिल्प को दृष्टि से पढ़ते हैं। तत्त्व सामग्री हैं; शिल्प उन्हें बाँधने का ढंग है। चार कृतियाँ तत्त्व एक हैं, विन्यास अलग है।
रंगभूमि 1925 सर्वज्ञ वाचक है। मन पढ़ता है, न्याय करता है, सूरदास के पक्ष में झुकता है। दो सूत्र हैं — पांडेपुर का कारखाना, सोफिया-विनय का प्रेम। वर्णन, संवाद, टिप्पणी प्रेमचंद का आम शिल्प है। उत्तम पुरुष नहीं। चेतना-प्रवाह नहीं। नायक पांडेपुर का अंधा भिखारी है, भक्त-कवि नहीं। कर्मभूमि 1932 अलग कृति है। गोदान किसान-ऋण का शिल्प है; यह उद्योग-बस्ती का शिल्प है। कारण पूँजी और राज्य हैं; प्रेम उपकथा नहीं, उसी समाज की दूसरी साँस है। देशकाल पांडेपुर का दबाव है, पृष्ठ नहीं। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है।
त्यागपत्र 1937 उत्तम पुरुष है। प्रमोद स्मृति और अपराध-बोध है। नायिका मृणाल है, वाचक वह नहीं। दोनों को एक कहना अधूरा है। यह सीमा भी है, प्रयोग भी है। घटना पतली है, प्रतिक्रिया घनी है। शेखर एक जीवनी का मैं चेतना की परत है; यह मैं पद और नेह का द्वंद्व है। सुनीता 1935 अलग कृति है। पाजेब कहानी है। संवाद विचार का है, बोलचाल का ढेर नहीं। लुबॉक की भाषा में दृष्टि सीमित-व्यक्तिगत है, सर्वज्ञ नहीं। भाषा खड़ी बोली; वाक्य छोटे, विचार घने। गोदान 1936 के एक वर्ष बाद यह मोड़ प्रेमचंदोत्तर खोलता है।
अनामदास का पोथा 1976 संकलक-वाचक है। अनामदास रैक्व नहीं। बाणभट्ट की आत्मकथा का मैं कवि-नायक है; यह पोथा पांडुलिपि है। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान है। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-स्पर्श है। महावीर प्रसाद द्विवेदी यह वाचक नहीं। महाभोज 1979 सर्वज्ञ-घटना है। थाना, सचिवालय, बस्ती कई कमरे हैं। मन त्यागपत्र जैसा नहीं; पात्र-भीड़ रंगभूमि के निकट है। मन्नू की भाषा सरल है, द्विवेदी का संस्कृत-गर्भ नहीं। आपका बंटी परिवार-शिल्प है। अकेली कहानी है। नाटक-रूपांतर अलग विधा है। बेलछी प्रेरणा है, वाचक-रिपोर्टर नहीं।
निष्कर्ष यह है कि वाचक सर्वज्ञ समाज, उत्तम पुरुष स्मृति, संकलक संस्कृति और घटना-चक्र तंत्र बाँटते हैं; चार कृतियाँ एक आँख नहीं।
Q. 2 (20 marks) · Unit 2
रंगभूमि के दो कथा-सूत्र अंत में एक क्यों हो जाते हैं?
Model answer
रंगभूमि के दो कथा-सूत्र आरंभ में अलग लगते हैं। पहला पांडेपुर, ज़मीन, कारखाना, सूरदास है। दूसरा सोफिया-विनय, जाति, धर्म, जेल है। आलोचना कभी प्रेम-सूत्र को रमानी कहती है। प्रेमचंद बाद में दोनों को एक शरीर देते हैं। कारण पूँजी और राज्य हैं। विनय जाति-सेवा में गिरफ्तार होते हैं, फिर आंदोलन में सूरदास के साथ होते हैं। सोफिया जॉन के पास नहीं, सेवा भवन जाती है। सिपाही झोपड़ियाँ तोड़ते हैं। क्लार्क गोली चलाता है। सोफिया घायल को अस्पताल ले जाती है। भीड़ आक्रोश में उठती है। विनय समझाते हैं, फिर आत्महत्या करते हैं। तीन मौतें — सूरदास, विनय, सोफिया — एक ही दबाव की हैं। नायक अंधा भिखारी है, भक्त-कवि नहीं। रश्मिरथी का सर्ग यह दो-सूत्र नहीं।
दूसरा सूत्र प्रेम का है। सोफिया जॉन सेवक की पुत्री है। धर्म पर विश्वास रखती है, अंधश्रद्धा पर नहीं। विनय सिंह कुंवर भरत सिंह और रानी जान्हवी के पुत्र हैं। जाति और धर्म प्रेम को रोकते हैं। माता-पिता विवाह क्लार्क से चाहते हैं। हृदय विनय के पास रहता है। विनय जाति-सेवा में गिरफ्तार होते हैं। सोफिया जेल तक पहुँचती है। लौटकर सेवा भवन जाती है। जान्हवी अंत में विवाह मानती है। इंदु राजा महेंद्र की पत्नी हैं; प्रजा और सूरदास के पक्ष में पति से मतभेद रखती हैं। यह सूत्र कारखाने से अलग लगता है; बाद में एक हो जाता है।
मध्य में दोनों सिरे बेदखली पर मिलते हैं। विनय, सोफिया और इंदु आंदोलन में सूरदास का साथ देते हैं। सिपाही बस्ती उजाड़ते हैं। क्लार्क सूरदास पर पिस्तौल चलाता है। गोली कंधे पर लगती है। सोफिया घायल को अस्पताल ले जाती है। भीड़ विनय को रईस का बेटा कहकर अपमानित करती है। विनय पिस्तौल से स्वयं को मारते हैं। सूरदास अस्पताल में मरता है। शहीद का दर्जा सूरदास को मिलता है। सोफिया विनय के बाद गंगा में उतरती है। जहाँ झोपड़ी थी, वहाँ मूर्ति बैठती है। रानी जान्हवी चरणों पर सिर रखती है।
फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं। क्रम घटनाओं का है। कारण पूँजी और राज्य हैं; प्रेम उपकथा नहीं, उसी समाज की दूसरी साँस है। गोदान में होरी की मृत्यु ऋण की शृंखला है। यहाँ मृत्यु गोली, आत्महत्या और गंगा तीन रूपों में है। कर्मभूमि 1932 अलग कृति है; नायक सूरदास नहीं। वाचक सर्वज्ञ है; टिप्पणी सूरदास-पक्ष में झुकती है। सीमा दो सूत्रों का आरंभ में ढीला लगना है। गुण यह कि उद्योग, जाति, प्रेम और मृत्यु एक शरीर में आते हैं।
निष्कर्ष यह है कि दो सूत्र अंत में इसलिए एक होते हैं कि पूँजी और मर्यादा एक ही व्यवस्था हैं; प्रेम अलग कथा नहीं, उसी टकराव का दूसरा सिरा है।
Q. 3 (20 marks) · Unit 3
त्यागपत्र लघु आकार में चौड़ा प्रश्न कैसे समेटता है?
Model answer
त्यागपत्र रूप में लघु उपन्यास है — आकार छोटा, प्रश्न चौड़ा। वर्ष 1937। गोदान के एक वर्ष बाद। प्रेमचंद का शिखर किसान-ऋण है; यह शिखर निर्णय-मन है। पात्र कम हैं। घटना-संघटना पर बल कम है। द्वंद्व घना है। परख 1929 पहला बड़ा उपन्यास है, यह तीसरा है। सुनीता 1935 अलग प्रयोग है। वाचक उत्तम पुरुष है — प्रमोद। नायिका मृणाल। चौड़ा प्रश्न नारी वस्तु है या कर्ता। मृणाल पीटी जाती है, ब्याही जाती है, निकाली जाती है — वस्तु जैसी घटनाएँ। सत्य कहना, इंकार करना, न लौटना — कर्ता के कर्म। आत्मदान विद्रोह का नारा नहीं; अलग होकर टूटना है। आलोचना कभी इसे व्यवस्था-समर्थन पढ़ती है। बचाव यह है कि चित्र व्यवस्था की क्रूरता बिना उपदेश के दिखाता है।
गुण तीन हैं। पहला — स्थिर अंतर्मन; घटना पतली, निर्णय घना। दूसरा — वाचक की सीमित आँख; लुबॉक दृष्टि को केंद्र कहते हैं। तीसरा — नारी को दृश्य नहीं, निर्णय बनाना। अज्ञेय और जोशी आगे की पंक्ति हैं। प्रेमचंद बाहर का समाज देते हैं; यह भीतर का निर्णय देता है। सूरदास सार्वजनिक इंकार है; मृणाल निजी सत्य सार्वजनिक दंड पाती है। रंगभूमि दीर्घ है; यह लघु है। गोदान किसान है; यह नगर-परिवार की नैतिकता है। फॉर्स्टर कारण माँगते हैं; कारण दृष्टि है, संयोग नहीं। गोपाल राय इतिहास में इसे प्रेमचंदोत्तर के शिखर-नाम पर रखते हैं। बिना पद-त्याग के शीर्षक अधूरा है। बिना मृणाल के मनोविज्ञान खाली प्रयोग है।
सीमाएँ साफ हैं। आकार छोटा। समाज की चौड़ाई कम। दुरुहता। पुरुष-वाचक स्त्री-केंद्र पर। व्यवस्था नहीं टूटती, व्यक्ति टूटता है। आत्मदान को मुक्ति कहना विवाद है; आलोचना कभी व्यवस्था-समर्थन पढ़ती है। प्रमोद करुण है, रक्षक बन नहीं पाता; त्यागपत्र देर का प्रायश्चित्त है। सहायक पात्र सपाट रह सकते हैं। राष्ट्रीय आंदोलन कथा का केंद्र नहीं — कुछ इसे समाज-कटान कहते हैं, कुछ व्यक्ति-सत्य की शक्ति। दोनों आक्षेप उत्तर में लिखे जाते हैं। गुण चित्र की कठोरता है, नारा नहीं। उपदेश वाचक पर सवार नहीं।
पहचान निषेध से पूरी होती है। पाजेब कहानी अलग है। सुनीता 1935 अलग कृति है; नायिका सुनीता है। परख 1929 पहला बड़ा उपन्यास है, शिखर-नाम यह है। कल्याणी 1939 आगे है। मुक्तिबोध कवि गजानन माधव हैं; जैनेन्द्र का उपन्यास मुक्तिबोध निर्धारित नहीं। शेखर एक जीवनी उत्तम पुरुष है, चेतना की परत अलग है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। मूल्यांकन इन्हीं अंतरों के बिना अधूरा है। पूरी कथा पढ़नी है; सार मृणाल, प्रमोद, 1937, पद-त्याग याद रखने के लिए है, ग्रंथ की जगह नहीं। सीमाओं के बावजूद निर्धारित कृति टिकती है।
निष्कर्ष यह है कि लघु आकार घटना काटता है, प्रश्न नहीं; चौड़ा प्रश्न दृष्टि, पवित्रता और पद-त्याग है।
Q. 4 (20 marks) · Unit 4
छान्दोग्य का संक्षेप उपन्यास में मनुष्य कैसे बनता है?
Model answer
छान्दोग्य उपनिषद् संक्षेप है। राजा जनश्रुति सुनता है, जाता है, ठुकराया जाता है, लौटता है, ज्ञान पाता है। द्विवेदी कहते हैं प्रसंग अधूरा लगता है। उपन्यास बचपन, तूफान, मिलन, नेह और समाज जोड़ता है। यह टीका नहीं, कथा है। सूत्र शास्त्र का है; विस्तार मनुष्य का है। ऐतिहासिक तिथि नहीं माँगी जाती; मानस माँगा जाता है। अनामदास का पोथा 1976, राजकमल, अंतिम उपन्यास। वाचक अनामदास संकलक है; आख्यान रैक्व का है। दोनों एक नहीं। जाबाला राजकन्या है, सत्यकाम की माता नहीं। बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 अलग ढाँचा है। महावीर प्रसाद द्विवेदी यह संबंध नहीं। वर्मा तिथि और युद्ध चाहते हैं; द्विवेदी मानस चाहते हैं।
जोड़ चार स्तरों पर है। पहला — रैक्व का बचपन: माता जन्म पर नहीं, पिता वेद का अंश देकर चल बसते हैं। दूसरा — तूफान: वायु ज्ञान का प्रश्न बनती है, बिखरी बैलगाड़ी मिलती है। तीसरा — जाबाला-मिलन: घायल राजकन्या संसार है; प्रेम ज्ञान का पहला सोपान कहा जाता है, अंतिम नहीं। चौथा — समाज-परीक्षा: जनश्रुति का अहं, दान, भेंट; रैक्व का पहला इंकार ज्ञान को मोल नहीं बनने देता। अरुंधति गृहस्थ-रेखा खोलती हैं। जिजीविषा जीने की इच्छा ज्ञान से कटती नहीं। सत्यकाम जाबाल का प्रसंग गोत्र और सत्य का है; माता जाबाला दासी/अज्ञात गोत्र, सत्य कहने वाली। वह यह उपन्यास की नायिका नहीं। नाम का साम्य भ्रम पैदा करता है। केंद्र अलग है। मिलाए बिना संबंध गलत हो जाता है।
बाणभट्ट की आत्मकथा हर्ष-काल को आत्मकथा बनाती है। पुनर्नवा बुद्ध-काल छूती है। यह उपनिषद्-काल को आख्यान बनाती है। दोनों संस्कृति पढ़ते हैं, स्रोत अलग हैं। वर्मा तिथि और युद्ध चाहते हैं; द्विवेदी मानस चाहते हैं। रंगभूमि समाज का टकराव है, शास्त्र-स्रोत नहीं। त्यागपत्र मन का द्वंद्व है। महाभोज चुनाव है। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण ज्ञान की चाह है, संयोग नहीं। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; दृष्टि संकलक और साधक दो आँखें हैं। नामवर दूसरी परंपरा यहीं से पढ़ते हैं — शास्त्र को मनुष्य-हित से। शुक्ल गद्य को आधुनिक चिह्न कहते हैं; द्विवेदी उसी गद्य में प्राचीन मानस उतारते हैं। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भ — संबंध भाषा में भी दिखता है, केवल कथा-सूचना में नहीं।
सीमा यह कि पाठक उपन्यास को केवल व्याख्या पढ़ ले। गुण यह कि शास्त्र मनुष्य तक उतरता है। बिना स्रोत लिखे प्रसंग अधूरा है। बिना जोड़ के स्रोत नकल है। व्यवस्था नहीं टूटती, दृष्टि बदलती है। ज्ञान गोत्र और पद से नहीं बँधता — यही शास्त्र और उपन्यास का साझा प्रश्न है। उपन्यास उसे नेह और समाज से तौलता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस संबंध के लेखक नहीं। पूरी कथा पढ़नी है; सार सूत्र और विस्तार याद रखने के लिए है, ग्रंथ की जगह नहीं। लंबे उद्धरण नहीं; प्रसंग-भाव पर्याप्त है।
निष्कर्ष यह है कि संक्षेप घटना-सूची है, उपन्यास मनुष्य की जिजीविषा है; जोड़ बिना नकल है, स्रोत बिना प्रसंग अधूरा है।
Q. 5 (20 marks) · Unit 5
महाभोज में दलित हक और दलित वोट में फर्क लिखिए।
Model answer
महाभोज में बिसेसर उर्फ़ बिसू हक माँगता है। वह मजदूरी और सबूत दोनों पूछता है। दूसरे गाँव की हत्या पर गवाही दिल्ली ले जाना चाहता है। शिक्षित दलित है। पिता हीरा। मृत्यु कथा के आरंभ में है; उपस्थिति पूरी कथा में है। लाश उसके बाद भी बोलती है। सूरदास सार्वजनिक इंकार है, भक्त-कवि नहीं। मृणाल नैतिक इंकार है। रैक्व ज्ञान का इंकार है। बिसू हक का इंकार है — चुप न रहना। वोट सत्ता की भाषा है। सुकुल संवेदना दिखाते हैं। दा साहब तंत्र चलाते हैं। लखनसिंह प्रत्याशी हैं। जाति समीकरण है। पहले हरिजन बस्ती में आगजनी हो चुकी है। जोरावर का हित उसी आग से जुड़ा है। संवेदना शक्ति चाहती है, न्याय नहीं। फर्क यहीं है — हक सबूत माँगता है, वोट लाश को सीट बनाता है।
तुलना से चरित्र स्थिर होता है। सूरदास सार्वजनिक इंकार है — ज़मीन, अहिंसा, गोली; भक्त-कवि यह नहीं। मृणाल नैतिक इंकार है — सत्य, दावा न पकड़ना। रैक्व ज्ञान का इंकार है — राजा का मोल न लेना। प्रमोद देर का प्रायश्चित्त है। होरी ऋण का किसान है। बिसू हक का इंकार है — चुप न रहना। अनामदास वाचक है, यह पुरुष नहीं। दा साहब विलोम हैं — सादगी का मुखौटा, संरक्षण का कर्म। जॉन सेवक लोभ का पूँजीपति है; यह चुनावी तंत्र का शिकार है। बिना बिंदा के प्रतिरोध अधूरा है। बिंदेश्वरी साथी है, नगर-शिक्षा और हठ रखता है; बिसू की इच्छा पूरी करना चाहता है; झूठा आरोप पाता है। रुक्मा सबूत आगे ले जाती हैं। हीरा पिता का नाम है, कथा का गौण शोक। तीनों बिना बिसू के सूची रह जाते हैं; बिसू उन्हें अर्थ देता है।
जाति वोट-बैंक है, न्याय नहीं। बिसू हक माँगता है। सुकुल और दा साहब दोनों दलित-दुख से शक्ति चाहते हैं, हक नहीं। बच्चन सिंह गठजोड़ देखते हैं। आलोचना अपराध के राजनीतिकरण की बात करती है। बेलछी प्रेरणा है, अध्याय नहीं; चरित्र रिपोर्ट का नाम नहीं। जूठन अनुभव-गवाही है; यह कथा तंत्र की है। प्रश्न सत्ता का है। फिर भी चरित्र दलित हक को वोट से अलग करता है। शिक्षा उसे नौकर नहीं, साक्षी बनाती है। दिल्ली की आशा पतली रह सकती है; माँग वहीं तक जाती है। लाश चुप नहीं रहती — यही चरित्र की दूसरी आयु है। शहीद-नाम पर्याप्त नहीं; सबूत और इच्छा बचते हैं।
शिल्प घटना-ढाँचा है। वाचक सर्वज्ञ है। बिसू मन की लंबी परत नहीं पाता, त्यागपत्र की मृणाल जैसी; उपस्थिति घटनाओं में है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; दृष्टि कई कमरे हैं — बस्ती, थाना, सभा। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण सबूत और चुनाव है। सीमा सपाट शहीद बन जाने की है। गुण यह कि मृत्यु कथा बंद नहीं करती। बिना जोरावर के हिंसा का कारण पतला है। बिना दा साहब के सार्वजनिक अर्थ पतला है।
निष्कर्ष यह है कि हक सबूत और न्याय माँगता है, वोट लाश को सीट बनाता है; महाभोज दोनों को अलग-अलग तराजू पर रखता है।
सेट 3
सेट 3 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। प्रश्न सेट 1–2 से भिन्न हैं। खंड अ अनिवार्य। खंड ब आंतरिक विकल्प सहित पाँचों। खंड स में कोई तीन।
Section A
Q. 1. बलचनमा के लेखक हैं —
1952; मिथिला-किसान। रेणु मैला आँचल; शुक्ल राग दरबारी; साहनी तमस।
Q. 2. तमस का केंद्रीय प्रश्न है —
भीष्म साहनी, 1973। राग दरबारी व्यंग्य; गोदान ऋण; पोथा संस्कृति।
Q. 3. कल्याणी किस वर्ष की कृति है?
जैनेन्द्र। परख 1929; सुनीता 1935; त्यागपत्र 1937; पाजेब 1942 कहानी।
Q. 4. हजारीप्रसाद द्विवेदी का निधन-वर्ष है —
19 मई 1979, दिल्ली। जन्म 1907, बलिया। जैनेन्द्र 1988; मन्नू 2021।
Q. 5. मन्नू भंडारी का निधन-स्थान है —
15 नवंबर 2021। जन्म भानपुरा; लमही प्रेमचंद; कौड़ियागंज जैनेन्द्र।
Q. 6. सेवासदन _____ ई. में प्रकाशित हुई।
Answer: 1918 — प्रेमचंद; नायिका सुमन। रंगभूमि 1925 निर्धारित है।
Q. 7. कुंवर भरत सिंह के पुत्र _____ हैं।
Answer: विनय सिंह — पुत्री इंदु। जान्हवी पत्नी। विनय अंत में आत्महत्या करते हैं।
Q. 8. पाजेब _____ ई. की कहानी है।
Answer: 1942 — जैनेन्द्र; कहानी, उपन्यास नहीं। सेम 6 का पत्र अलग है।
Q. 9. 1950 में द्विवेदी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी के _____ बने।
Answer: विभागाध्यक्ष — 1968–70 रेक्टर भी। बचपन वैद्यनाथ; पिता अनमोल।
Q. 10. बिंदा का पूरा नाम _____ है।
Answer: बिंदेश्वरी — बिसू का साथी। रुक्मा उनकी पत्नी। दा साहब मुख्यमंत्री हैं, यह नहीं।
Section B
Q. 1 (8 marks) · Unit 1
रेणु का मेरीगंज प्रेमचंद के गाँव से क्यों अलग है?
Or: यशपाल झूठा सच में क्या दस्तावेज रखते हैं?
Model answer
आंचलिक उपन्यास किसी अंचल की बोली, रीति, प्रकृति और राजनीति को कथा बनाता है। फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आँचल 1954 शिखर है। मेरीगंज नाम और बोली वाला आंचल है। गीत, रोग, चुनाव, नेता एक साथ चलते हैं। प्रेमचंद का गाँव सामान्य गाँव है — होरी का ऋण, सूरदास की बस्ती। दोनों ग्रामीण हैं; शिल्प अलग है। आंचल विश्व का नमूना बनता है, संग्रहालय नहीं रहना चाहिए। नागार्जुन का बलचनमा 1952 मिथिला-किसान है। नागर बूँद और समुद्र में नगर-संस्कृति फैलाते हैं। पांडेपुर रंगभूमि की बस्ती है, रेणु का आंचल नहीं। सरोहा महाभोज का चुनाव-कस्बा है, आंचल-धारा नहीं। गोपाल राय इतिहास में रेणु को आंचल-जन के सोपान पर रखते हैं।
शिल्प कई सूत्र साथ चलाता है — गीत, रोग, चुनाव, नेता। आंचलिकता लोक-रंग भरना मात्र नहीं; वह आंचल को विश्व का नमूना बनाती है। सीमा यह कि आंचल कभी संग्रहालय रह जाता है। गुण यह कि हिन्दी उपन्यास महानगर के कमरे से निकलता है। गोपाल राय इतिहास में रेणु को आंचल-जन के सोपान पर रखते हैं। बिना नाम-बोली-रीति के आंचल सामान्य ग्राम-चित्र रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि मेरीगंज बोली और आंचल का नाम है, प्रेमचंद का गाँव सामान्य यथार्थ है; अंतर शिल्प पर है।
Or
यशपाल झूठा सच में विभाजन का दस्तावेज रखते हैं। धारा ऐतिहासिक-राजनीतिक है। प्रेमचंदोत्तर सोपान 1936 के बाद मन और इतिहास दोनों खोलता है। जैनेन्द्र मन देते हैं — त्यागपत्र 1937। अज्ञेय व्यक्ति देते हैं — शेखर एक जीवनी। द्विवेदी संस्कृति की स्मृति देते हैं — बाणभट्ट से पोथा। यशपाल राज्य की चोट देते हैं। तमस 1973 साम्प्रदायिकता है, यह कृति अलग है। रंगभूमि कारखाना है। महाभोज चुनाव है। झूठा सच विभाजन की चोट है। दस्तावेज का अर्थ तिथि-सूची नहीं, मनुष्य पर पड़ी चोट है। गोपाल राय इतिहास में यशपाल को राजनीतिक-ऐतिहासिक सोपान पर रखते हैं।
सीमा इतिहास का बोझ कथा दबा सकता है। गुण यह कि उपन्यास स्मृति का गवाह बनता है। आंचल रेणु का है, यह नहीं। तिलिस्म खत्री का है, यह नहीं। गोदान ऋण है, यह नहीं। बिना मनुष्य की चोट के दस्तावेज रिपोर्ट रह जाता है। निर्धारित चार में यशपाल नहीं; तुलना इतिहास की परत दिखाती है।
निष्कर्ष यह है कि झूठा सच विभाजन का राजनीतिक-ऐतिहासिक दस्तावेज है, आंचल या तिलिस्म नहीं।
Q. 2 (8 marks) · Unit 2
सूरदास का अहिंसा-मार्ग गाँधी-चरित क्यों नहीं है?
Or: इंदु पति से क्यों मतभेद रखती हैं?
Model answer
आलोचना सूरदास में गाँधी की छाया पढ़ती है — सत्य, अहिंसा, प्रलोभन का इंकार, जन-सत्याग्रह, मृत्यु के बाद संगठन। देश 1920 के दशक में असहयोग देख चुका था। उपन्यास उसी हवा में है। सूरदास हिंसा नहीं चलाता। आंदोलन अर्जी नहीं, जन-शक्ति है। फिर भी कृति गाँधी-चरित नहीं। गाँधी-स्पर्श सूरदास के सूत्र पर है, पूरे ग्रंथ पर नहीं। नायक पांडेपुर का अंधा भिखारी है, भक्त-कवि सूरदास नहीं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है, यह अहिंसा-मार्ग नहीं। विनय भीड़ को रोकते हैं, फिर स्वयं हिंसा अपने ऊपर कर लेते हैं — यह गाँधी नहीं, आहत स्वाभिमान है। सोफिया का अंत प्रेम की तृप्ति है।
सीमा आदर्शीकरण की है — नायक कभी राष्ट्रपिता की छाया तक चला जाता है। गुण यह कि नायक साधारण है। कर्मभूमि 1932 अलग आंदोलन-कृति है। गोदान ऋण की शृंखला है। राष्ट्रनायक कहने का अर्थ नेतापद नहीं, नैतिक केंद्र है। बिना इंकार के सत्य भाषण रह जाता है।
निष्कर्ष यह है कि अहिंसा सूरदास का मार्ग है, पूरा उपन्यास गाँधी-जीवन नहीं।
Or
इंदु जान्हवी की पुत्री हैं, राजा महेंद्र कुमार सिंह की पत्नी। प्रजा और सूरदास के पक्ष में पति से मतभेद रखती हैं। आंदोलन में सहयोग करती हैं। राजा अंग्रेज़ और कारखाने से तालमेल रखते हैं। स्त्री यहाँ केवल सेवा का आभूषण नहीं, विद्रोह का स्वर भी है। सोफिया पूँजीपति की पुत्री है जो धर्म बदलती है; इंदु सामंत-कुल से टकराती हैं। गोल वही पात्र हैं जो निर्णय बदलते हैं। सहायक सपाट रह जाएँ तो सूची बनते हैं। नायक सूरदास हैं, भक्त-कवि नहीं। जान्हवी सेवा और जाति के बीच बँटती हैं। इंदु प्रजा-पक्ष खोलती हैं। बिना इंदु के रियासत का विरोध पतला रह जाता है।
सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। मृणाल इंकार है। रुक्मा साक्षी है। जाबाला नेह है। इंदु रियासत के भीतर का मतभेद है। रश्मिरथी का सर्ग यह नारी नहीं। सीमा यह कि कुछ सहायक स्त्री-नाम सूची रह सकते हैं। गुण यह कि प्रजा-पक्ष स्त्री-वाणी से आता है।
निष्कर्ष यह है कि इंदु मतभेद इसलिए रखती हैं कि रियासत का तालमेल बस्ती के सत्य से नहीं मिलता।
Q. 3 (8 marks) · Unit 3
जैनेन्द्र प्रेमचंद के विलोम क्यों नहीं, पूरक हैं?
Or: सुनीता आकर्षण का दूसरा प्रयोग क्यों कही जाती है?
Model answer
प्रेमचंद बाहर का कारण दिखाते हैं — ऋण, कारखाना, गोली। जैनेन्द्र भीतर का कारण दिखाते हैं — दृष्टि, द्वंद्व, इंकार। वाचक सर्वज्ञ बनाम उत्तम पुरुष। नायक सूरदास सार्वजनिक है, भक्त-कवि नहीं; मृणाल निजी सत्य सार्वजनिक दंड पाती है। रंगभूमि दीर्घ है; त्यागपत्र लघु है। गोदान किसान है; यह नगर-परिवार की नैतिकता है। साम्य खड़ी बोली, आधुनिक मनुष्य, तिलिस्म से कटान है। विलोम कहना शत्रु बनाना है। पूरक कहना दो आँखें मानना है। जैनेन्द्र 1905–1988, कौड़ियागंज; पद्म भूषण 1971। भाषा की तराश अज्ञेय के गद्य को आगे संभव करती है। सीमा दुरुहता और समाज-कटान का आक्षेप है। गुण चरित्र का गहरा होना है।
विशेषताएँ चार हैं — अंतर्मन, सीमित या उत्तम दृष्टि, गोल चरित्र, नैतिक द्वंद्व। रंगभूमि सर्वज्ञ सामाजिक चित्र है, यह धारा नहीं। सीमा यह कि मनोविज्ञान कभी समाज से कट जाता है; दुरुहता पाठक काट सकती है। गुण यह कि चरित्र गहरा होता है। नामवर नए उपन्यास के शिल्प को इसी मोड़ से पढ़ते हैं। पाजेब कहानी है, यह रूप नहीं।
निष्कर्ष यह है कि जैनेन्द्र विलोम नहीं, भीतर की परत हैं; प्रेमचंद बाहर की परत हैं।
Or
सुनीता 1935 जैनेन्द्र का उपन्यास है। नायिका सुनीता है, मृणाल नहीं। प्रश्न आकर्षण, दांपत्य और निर्णय का दूसरा प्रयोग है। त्यागपत्र 1937 मृणाल-प्रमोद और पद-त्याग है। परख 1929 पहला बड़ा उपन्यास है। कल्याणी 1939 आगे है। पाजेब 1942 कहानी है। मुक्तिबोध कवि गजानन माधव हैं; जैनेन्द्र का उपन्यास मुक्तिबोध निर्धारित नहीं। निर्धारित पत्र में त्यागपत्र है। दूसरा प्रयोग कहना यह है कि एक लेखक एक नारी-प्रश्न कई कृतियों में दोहराता नहीं, कोण बदलता है। मिलाए बिना मूल्यांकन अधूरा है। एक कहकर भी अधूरा है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है, यह आकर्षण-प्रयोग नहीं।
साम्य जैनेन्द्र, खड़ी बोली, अंतर्मन और नारी-केंद्र है। वैषम्य वर्ष, नायिका, वाचक और शीर्षक-अर्थ पर है। रंगभूमि से अंतर और भी बड़ा है — सर्वज्ञ समाज बनाम मैं-स्मृति। बिना नायिका लिखे नाम-भ्रम रह जाता है। बिना वर्ष लिखे क्रम उलझ जाता है। गोपाल राय इतिहास में त्यागपत्र को शिखर-नाम कहते हैं, सुनीता को उसी पंक्ति का दूसरा प्रयोग। मिलाए बिना मूल्यांकन अधूरा है, एक कहकर भी अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि सुनीता 1935 का अलग आकर्षण-प्रयोग है, त्यागपत्र 1937 की निर्धारित कृति है।
Q. 4 (8 marks) · Unit 4
वर्मा घटना लिखते हैं, द्विवेदी मानस — स्पष्ट कीजिए।
Or: चारु चंद्रलेख द्विवेदी-पंक्ति में कहाँ बैठती है?
Model answer
वृंदावनलाल वर्मा झाँसी की रानी, मृगनयनी लिखते हैं — घटना और इतिहास-पुरुष। युद्ध, राज्य, तिथि कथा चलाते हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी घटना कम, मानस अधिक रखते हैं। बाणभट्ट की आत्मकथा हर्ष-काल का मन है। अनामदास का पोथा उपनिषद्-काल का मन है। पुनर्नवा बुद्ध-काल छूती है। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान है। रंगभूमि समाज का टकराव है। त्यागपत्र मन का द्वंद्व है। यह संस्कृति का आख्यान है। महावीर प्रसाद द्विवेदी भाषा-शुद्धि के आचार्य हैं, यह उपन्यासकार नहीं। बचपन का नाम वैद्यनाथ लेखक का है। पिता अनमोल द्विवेदी हैं। नामवर दूसरी परंपरा कहते हैं। निर्धारित नाम पोथा 1976 है।
निर्धारित कृति अंतिम उपन्यास है, पहला नहीं। दृष्टि मानव और संस्कृति का समन्वय है। भाषा खड़ी बोली, संस्कृत-गर्भ। सीमा दुरुहता का आक्षेप है। गुण युग के मन को कथा बनाना है। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्विवेदी युग के आचार्य हैं, भाषा-शुद्धि के; यह उपन्यासकार नहीं। वृंदावनलाल वर्मा घटना-इतिहास लिखते हैं; द्विवेदी मानस लिखते हैं।
निष्कर्ष यह है कि वर्मा घटना-इतिहास हैं, द्विवेदी युग के मन की कथा हैं; निर्धारित नाम पोथा 1976 है।
Or
द्विवेदी की उपन्यास-पंक्ति चार नामों से बैठती है। बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 आत्मकथा-मैं, हर्ष-काल का मानस। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-काल का स्पर्श। अनामदास का पोथा 1976 अंतिम, पोथा-ढाँचा, रैक्व-जाबाला, पत्र की निर्धारित कृति। चारु चंद्रलेख पंक्ति का मध्य आख्यान है, 1963 वाली निर्धारित नहीं। साम्य संस्कृति, खड़ी बोली, मानव। वैषम्य ढाँचा और आख्यान-पुरुष पर है। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस पंक्ति के लेखक नहीं। वर्मा घटना चाहते हैं; द्विवेदी मानस चाहते हैं। बिना वर्ष के पंक्ति कमजोर है। मिलाए बिना इतिहास अधूरा है।
साम्य द्विवेदी, खड़ी बोली, संस्कृति और मानव है। वैषम्य वर्ष, ढाँचा और आख्यान-पुरुष पर है। वृंदावनलाल वर्मा झाँसी की रानी में घटना चाहते हैं; द्विवेदी दोनों कृतियों में मानस चाहते हैं, युद्ध नहीं। रंगभूमि समाज का टकराव है। त्यागपत्र मन का द्वंद्व है। यह संस्कृति का आख्यान है, पर दो अलग शरीरों में। बिना वर्ष के अंतर नाम-भ्रम रह जाता है। नामवर दूसरी परंपरा दोनों से पढ़ते हैं, एक नहीं करते।
निष्कर्ष यह है कि चारु चंद्रलेख पंक्ति का मध्य आख्यान है, पत्र की निर्धारित कृति पोथा है।
Q. 5 (8 marks) · Unit 5
लखनसिंह और जोरावर में काम का अंतर लिखिए।
Or: अकेली महाभोज क्यों नहीं है?
Model answer
लखनसिंह महाभोज में सत्ता के प्रत्याशी हैं, दा साहब के विश्वासपात्र। काम चुनाव जीतना है। जोरावर स्थानीय बाहुबली है। काम हिंसा और संरक्षण है। बस्ती की आग और बिसेसर उर्फ़ बिसू की मृत्यु से जोरावर का हित जुड़ा है। खलनायक-दैत्य नहीं, नवसामंत का पुरुष है। बिना जोरावर के हिंसा अधूरी है। बिना लखनसिंह के सीट का चेहरा अधूरा है। सदाशिव अत्रे पार्टी अध्यक्ष हैं — संगठन का नाम। दा साहब इशारा करते हैं, हाथ नहीं। तीनों एक गठजोड़ हैं, एक पात्र नहीं। बच्चन सिंह अपराध और राजनीति का गठजोड़ देखते हैं। नाम भोज उसी मेज का व्यंग्य है।
जॉन सेवक लोभ का पूँजीपति है; क्लार्क गोली का अंग्रेज़ है। यह चुनावी तंत्र के दो काम हैं, कारखाना-गोली नहीं। सुकुल प्रतिपक्ष हैं; दुख बाँटने आते हैं। आपका बंटी इस अंतर की कृति नहीं। अकेली कहानी है। सीमा सपाट चेहरा बन जाने की है। गुण यह कि काम अलग दिखते हैं, हित एक हैं।
निष्कर्ष यह है कि लखनसिंह वोट का चेहरा हैं, जोरावर हिंसा का हाथ हैं; काम अलग हैं, हित एक हैं।
Or
अकेली मन्नू भंडारी की कहानी है। महाभोज 1979 का राजनीतिक उपन्यास है। देशकाल सरोहा है। केंद्र बिसेसर उर्फ़ बिसू की लाश और चुनाव है। आपका बंटी 1971 बच्चे का प्रश्न है। एक इंच मुस्कान 1962 सह-लेखन राजेंद्र यादव के साथ है। यही सच है से रजनीगंधा बनी, यह उपन्यास नहीं। सारा आकाश यादव का है। नाटक-रूपांतर लगभग 1982 अलग विधा है। निर्धारित विधा उपन्यास है। नाम की सूची एक कृति नहीं। जमुना बहन दा साहब की पत्नी हैं, कहानी की नायिका नहीं। रुक्मा तंत्र की साक्षी है। बिना वर्ष के अंतर नाम-भ्रम रह जाता है।
दृष्टि बंटी में मध्यवर्ग की स्त्री और बच्चे तक है; महाभोज में सत्ता, जाति और फाइल तक जाती है। गोपाल राय दोनों को मन्नू की पंक्ति में रखते हैं, पर्याय नहीं। राग दरबारी कार्यालय-व्यंग्य है, बंटी नहीं। रंगभूमि कारखाना है। बिना वर्ष के अंतर नाम-भ्रम रह जाता है। बिना बच्चे और लाश लिखे शीर्षक एक हो जाते हैं।
निष्कर्ष यह है कि अकेली कहानी है, महाभोज सरोहा का राजनीतिक उपन्यास है; मिलाया नहीं जाता।
Section C
Q. 1 (20 marks) · Unit 1
1936 के बाद हिन्दी उपन्यास का आलंबन कैसे बदला?
Model answer
1936 दो चिह्न साथ लाता है। गोदान शिखर है — होरी, ऋण, किसान। प्रेमचंद का निधन उसी वर्ष। प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष प्रेमचंद रहे। प्रगतिवाद का वर्ग-सूत्र पूरा उनका पर्याय नहीं। इसके बाद सोपान प्रेमचंदोत्तर कहलाता है। सामाजिक यथार्थ रहता है, मन और शिल्प आगे आते हैं। गोपाल राय इतिहास इन्हीं सोपानों से बाँधते हैं। जैनेन्द्र 1905–1988 भीतर का निर्णय देते हैं — त्यागपत्र 1937, मृणाल। अज्ञेय शेखर एक जीवनी 1941–44, नदी के द्वीप उपन्यास 1952; कविता अलग कृति है। इलाचंद्र जोशी मनोविज्ञान के निकट हैं। आलंबन खेत से मन और व्यक्ति की ओर खिसकता है। यह मोड़ प्रेमचंद का निषेध नहीं, उसकी अगली परत है।
साम्य चार बिंदुओं पर है। पहला — आधुनिक मनुष्य और तिलिस्म से कटान। दूसरा — खड़ी बोली गद्य। तीसरा — उपन्यास को जीवन का माध्यम मानना, केवल कौतुक नहीं। चौथा — साधारण नायक की संभावना। गोदान का होरी और त्यागपत्र की मृणाल दोनों गोल चरित्र हैं, मार्ग अलग हैं। रंगभूमि का सूरदास सामाजिक टकराव है; महाभोज का बिसू राजनीतिक टकराव है — दोनों श्रम और हक के पुरुष हैं। नगेन्द्र व्यापक जीवन-चित्र कहते हैं; प्रेमचंद चौड़ाई देते हैं, बाद वाले नया आलंबन देते हैं। सेवासदन नारी-नैतिकता छूता है; त्यागपत्र नारी-निर्णय छूता है।
वैषम्य आलंबन और दृष्टि पर है। प्रेमचंद बाहर का समाज और कारण दिखाते हैं — ऋण, कारखाना, गोली, खेत। जैनेन्द्र भीतर का निर्णय दिखाते हैं — दृष्टि, इंकार, पद-त्याग। अज्ञेय चेतना और व्यक्ति दिखाते हैं। द्विवेदी संस्कृति की स्मृति दिखाते हैं। रेणु आंचल दिखाते हैं — प्रेमचंद का गाँव सामान्य गाँव है, रेणु का गाँव नाम-बोली वाला आंचल है। मन्नू सत्ता की घटना दिखाती हैं। यशपाल इतिहास की चोट दिखाते हैं। श्रीलाल शुक्ल तंत्र की हँसी दिखाते हैं। शिल्प प्रेमचंद में वर्णन-संवाद-टिप्पणी है; बाद में उत्तम पुरुष और पोथा-ढाँचा तेज होते हैं। गोपाल राय सोपान बाँधते हैं, एक को रद्द नहीं करते।
सीमा दोनों ओर लिखी जाती है। प्रेमचंद पर आदर्श और उपदेश का आक्षेप है; कभी चित्र पर सवार हो जाता है। रंगभूमि में मज़दूर-संगठन गोदान के किसान जितना नहीं फैलता। प्रेमचंदोत्तर पर समाज-कटान या शिल्प-बोझ का आक्षेप है। जैनेन्द्र दुरुह कहे जाते हैं। द्विवेदी संस्कृत-भार रखते हैं। रेणु आंचल को संग्रहालय बना सकते हैं। मन्नू में दा साहब का आकर्षण पीड़ा को ढक सकता है। रेणु और यशपाल समाज वापस लाते हैं, पर प्रेमचंद का सादा वाचक नहीं रखते। मूल्यांकन एक को रद्द करके नहीं होता। निर्धारित चार में एक प्रेमचंद, तीन बाद — यही पत्र का संतुलन है। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कविता है, यह युग-तुलना नहीं। बिना इन अंतरों के साम्य-वैषम्य अधूरा है।
निष्कर्ष यह है कि 1936 के बाद आलंबन किसान से मन, स्मृति, आंचल, व्यंग्य, दंगा और सत्ता तक फैला; प्रेमचंद का निषेध नहीं, अगली परत है।
Q. 2 (20 marks) · Unit 2
रंगभूमि में तीन मौतों का अलग-अलग अर्थ लिखिए।
Model answer
रंगभूमि का अंत तीन मौतों तक जाता है। सूरदास। विनय। सोफिया। कथा यहीं बंद होती है। कारखाना जीतता दिखाई देता है; स्मृति सूरदास की रहती है। रूप सामाजिक उपन्यास है। वर्ष 1925। देशकाल पांडेपुर। नायक अंधा भिखारी है, भक्त-कवि नहीं। रश्मिरथी का रंगभूमि सर्ग कर्ण की सभा है, ये तीन मौतें नहीं। सूरदास की मृत्यु गोली की है। क्लार्क अंग्रेज़ अफसर है। घाव कंधे पर लगता है। अस्पताल में प्राण जाते हैं। अर्थ शहादत का है। जहाँ झोपड़ी थी, मूर्ति बैठती है। जान्हवी चरणों पर सिर रखती हैं। राष्ट्रनायक कहने का अर्थ नेता नहीं, नैतिक केंद्र है। गाँधी-स्पर्श इसी सूत्र पर है, पूरा चरित नहीं। विनय की मृत्यु आत्महत्या है — आहत स्वाभिमान। सोफिया विनय के बाद गंगा में उतरती है — प्रेम की तृप्ति।
दूसरा सूत्र प्रेम का है। सोफिया जॉन सेवक की पुत्री है। धर्म पर विश्वास रखती है, अंधश्रद्धा पर नहीं। विनय सिंह कुंवर भरत सिंह और रानी जान्हवी के पुत्र हैं। जाति और धर्म प्रेम को रोकते हैं। माता-पिता विवाह क्लार्क से चाहते हैं। हृदय विनय के पास रहता है। विनय जाति-सेवा में गिरफ्तार होते हैं। सोफिया जेल तक पहुँचती है। लौटकर सेवा भवन जाती है। जान्हवी अंत में विवाह मानती है। इंदु राजा महेंद्र की पत्नी हैं; प्रजा और सूरदास के पक्ष में पति से मतभेद रखती हैं। यह सूत्र कारखाने से अलग लगता है; बाद में एक हो जाता है।
मध्य में दोनों सिरे बेदखली पर मिलते हैं। विनय, सोफिया और इंदु आंदोलन में सूरदास का साथ देते हैं। सिपाही बस्ती उजाड़ते हैं। क्लार्क सूरदास पर पिस्तौल चलाता है। गोली कंधे पर लगती है। सोफिया घायल को अस्पताल ले जाती है। भीड़ विनय को रईस का बेटा कहकर अपमानित करती है। विनय पिस्तौल से स्वयं को मारते हैं। सूरदास अस्पताल में मरता है। शहीद का दर्जा सूरदास को मिलता है। सोफिया विनय के बाद गंगा में उतरती है। जहाँ झोपड़ी थी, वहाँ मूर्ति बैठती है। रानी जान्हवी चरणों पर सिर रखती है।
फॉर्स्टर कथा को क्रम और कथानक को कारण कहते हैं। क्रम घटनाओं का है। कारण पूँजी और राज्य हैं; प्रेम उपकथा नहीं, उसी समाज की दूसरी साँस है। गोदान में होरी की मृत्यु ऋण की शृंखला है। यहाँ मृत्यु गोली, आत्महत्या और गंगा तीन रूपों में है। कर्मभूमि 1932 अलग कृति है; नायक सूरदास नहीं। वाचक सर्वज्ञ है; टिप्पणी सूरदास-पक्ष में झुकती है। सीमा दो सूत्रों का आरंभ में ढीला लगना है। गुण यह कि उद्योग, जाति, प्रेम और मृत्यु एक शरीर में आते हैं।
निष्कर्ष यह है कि तीन मौतें एक दबाव की हैं पर अर्थ अलग हैं — शहादत, आवेश, प्रेम-तृप्ति; नायक सूरदास रहते हैं।
Q. 3 (20 marks) · Unit 3
मृणाल कर्ता है, केवल करुण दृश्य नहीं — युक्ति सहित लिखिए।
Model answer
त्यागपत्र में नारी-प्रश्न पूछता है कि स्त्री वस्तु है या कर्ता। घटनाएँ वस्तु जैसी हैं — पालन भाई-भाभी के यहाँ, दंड, अनचाहा विवाह, निष्कासन, व्यापारी का साथ और छूटना, कन्या का जन्म और मृत्यु, रोग, बस्ती। युक्ति घटना की सूची नहीं, निर्णय की है। पहली युक्ति सत्य है। पति से पूर्व-प्रेम कहना दावा है, चाल नहीं। दूसरी युक्ति इंकार है। प्रमोद ले जाना चाहता है; वह हाथ नहीं पकड़ती। सहानुभूति वस्तु बनाती। तीसरी युक्ति दावा न रखना है। मायके और ससुराल दोनों से कटकर वह वापस लेने का नाटक नहीं करती। शीर्षक का दूसरा अर्थ यहीं है। वाचक पुरुष है; अनुभव स्त्री का है। यह तनाव शिल्प का अंग है। दिव्यांग विमर्श सूरदास का है, यह कृति नहीं। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता है। सोफिया धर्म-संकर प्रेम है। सुनीता आकर्षण का दूसरा प्रयोग है।
कर्म तीन स्तरों पर पहचाने जाते हैं। पहला — पूर्व-प्रेम कहना; सत्य का दावा दंड बनता है। दूसरा — कोयला-व्यापारी के अनुरक्ति-रक्षा के बाद भी दावा न पकड़ना; साथ छिनने पर वापस लेने का हाथ नहीं फैलता। तीसरा — प्रमोद का हाथ ठुकराना; सहानुभूति लेती नहीं, ले जाना अस्वीकृत करती है। अस्पताल में कन्या जन्म लेती है, कुछ मास बाद मर जाती है। निम्न बस्ती में बच्चों को पढ़ाती भी है। रोग और कष्ट अंत तक रहते हैं। मृत्यु पीड़ा में होती है। आलोचना आत्मदान में मुक्ति पढ़ती है। सीमा यह कि पीड़ा विद्रोह का नारा नहीं बनती; व्यवस्था ज्यों की त्यों रहती है। व्यक्ति टूटता है, ढाँचा नहीं। गुण यह कि नारी दया का उपकरण नहीं, निर्णय की कर्ता है। कर्ता के कर्म हैं — सत्य, इंकार, न लौटना।
तुलना बिना चरित्र अधूरा रह जाता है। सेवासदन की सुमन नगर-नैतिकता और इज्जत का प्रश्न है। रंगभूमि की सोफिया धर्म-संकर प्रेम चुनती है, अंत गंगा है। सुनीता 1935 आकर्षण का दूसरा प्रयोग है; नायिका सुनीता है, यह जीवन नहीं। मृणाल मन और मर्यादा के बीच है। सूरदास सार्वजनिक इंकार है। प्रमोद देर का प्रायश्चित्त है। मृणाल नैतिक इंकार है। जैनेन्द्र 1937 में पुरुष-वाचक से स्त्री-केंद्र चलाते हैं — सीमा भी है, प्रयोग भी है।
प्रमोद करुण है, रक्षक बन नहीं पाता। नेह और डर उसके द्वंद्व हैं। न्यायाधीश कानून चलाता है; बुआ के सामने कानून अधूरा पड़ जाता है। त्यागपत्र उसी अधूरे न्याय का पत्र है। बिना समाज की दृष्टि के चरित्र सपाट दंड-कथा रह जाता है। बिना इंकार के आत्मदान नारा रह जाता है। सहायक शीला, पति, व्यापारी, भाभी कथा मोड़ते हैं, गहराई नहीं। देशकाल मध्यवर्गीय परिवार और तिरस्कृत बस्ती है। गोदान का गाँव नहीं। पांडेपुर उद्योग की बस्ती नहीं। नारी-प्रश्न आलंबन का अधिकार भी है, केवल लेखिका होना नहीं। पहचान यही है — मृणाल कर्ता है, केवल करुण दृश्य नहीं। दुरुहता शैली की है, चरित्र की अस्पष्टता नहीं।
निष्कर्ष यह है कि कर्ता सत्य, इंकार और न लौटने से सिद्ध होती है; करुण दृश्य घटना है, निर्णय चरित्र है।
Q. 4 (20 marks) · Unit 4
द्विवेदी की संस्कृति-कथा वर्मा के इतिहास-उपन्यास से क्यों अलग है?
Model answer
दोनों अतीत को वर्तमान से पढ़ते हैं। अंतर आलंबन और ढाँचे पर है। वृंदावनलाल वर्मा झाँसी की रानी, मृगनयनी में युद्ध, राज्य, इतिहास-पुरुष चलाते हैं। घटना कथा का इंजन है। हजारीप्रसाद द्विवेदी 1907–1979, दुबे का छपरा, बलिया, वैद्यनाथ। शांतिनिकेतन, फिर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। संस्कृति, लोक और मानव का समन्वय पहचान है। नामवर दूसरी परंपरा कहते हैं। बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 आत्मकथा-मैं, हर्ष-काल का मानस। चारु चंद्रलेख 1963। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-काल का स्पर्श। अनामदास का पोथा 1976 उपनिषद्-मानस, पांडुलिपि-ढाँचा। निर्धारित कृति अंतिम है। संस्कृति-कथा पूछती है युग क्या सोचता था, राजा क्या जीता था नहीं। रैक्व शकट के नीचे है, जनश्रुति दान से बड़ा नहीं। जाबाला नेह है, वस्तु नहीं। महावीर प्रसाद द्विवेदी यह पंक्ति नहीं।
गुण तीन हैं। पहला — उपनिषद् का मनुष्य-रूप; छान्दोग्य संक्षेप है, उपन्यास मानस है। दूसरा — वाचक का पांडुलिपि-ढाँचा। तीसरा — नारी को केवल भेंट न रहने देना; जाबाला कर्ता है। बाणभट्ट की आत्मकथा 1946 आत्मकथा-मैं और हर्ष-मानस है। चारु चंद्रलेख 1963 अलग आख्यान है। पुनर्नवा 1973 बुद्ध-स्पर्श है। यह उपनिषद्-मानस है। तीनों एक लेखक हैं, प्रश्न अलग हैं। वर्मा घटना-इतिहास लिखते हैं। रंगभूमि समाज का टकराव है। त्यागपत्र मन का द्वंद्व है। महाभोज तंत्र है। यह संस्कृति का आख्यान है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; दो आँखें संकलक और साधक हैं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण ज्ञान की चाह है। गोपाल राय इतिहास में द्विवेदी को संस्कृति-कथा पर रखते हैं।
सीमाएँ साफ हैं। आकार और उलझाव। दुरुहता। संस्कृत-भार। प्रेम-सूत्र को रमानी पढ़ लेना। सत्यकाम-माता से नाम-भ्रम — वहाँ जाबाला माता हैं, यहाँ राजकन्या। महावीर प्रसाद द्विवेदी से नाम-भ्रम — वे भाषा-शुद्धि के आचार्य हैं। व्यवस्था नहीं टूटती, दृष्टि बदलती है। शैली अध्यापकीय कही जाती है; उपदेश का ढेर दोष हो तो उत्तर में लिखा जाता है। गुण पारदर्शिता का नया वाक्य-क्रम नहीं, संस्कृति का घन है। राष्ट्रीय आंदोलन केंद्र नहीं — कुछ इसे समाज-कटान कह सकते हैं; बचाव यह है कि संस्कृति का सत्य केंद्र है। बिना जाबाला के मूल्यांकन अधूरा है। बिना जनश्रुति के सार्वजनिक अर्थ पतला है।
पहचान निषेध से पूरी होती है। बाणभट्ट अलग उपन्यास है। चारु चंद्रलेख और पुनर्नवा अलग हैं। सत्यकाम-प्रसंग गोत्र का है, यहाँ केंद्र नहीं। झाँसी की रानी वर्मा की है। शेखर उत्तम पुरुष है, यह पोथा है। पाजेब कहानी है। आपका बंटी परिवार है। मूल्यांकन इन्हीं अंतरों के बिना अधूरा है। पूरी कथा पढ़नी है; सार रैक्व, जाबाला, जनश्रुति, 1976, पोथा याद रखने के लिए है, ग्रंथ की जगह नहीं। सीमाओं के बावजूद निर्धारित कृति टिकती है। जिजीविषा ज्ञान का विरोध नहीं, उसका अंग है।
निष्कर्ष यह है कि वर्मा घटना-इतिहास लिखते हैं, द्विवेदी मानस लिखते हैं; अंतर तिथि-पुरुष बनाम संस्कृति-मनुष्य पर है।
Q. 5 (20 marks) · Unit 5
महाभोज बेलछी की रिपोर्ट क्यों नहीं कही जाती?
Model answer
बेलछी 1977 का दलित-हत्याकांड प्रेरणा कहा जाता है। महाभोज 1979 है। देशकाल सरोहा है, बेलछी की नकल नहीं। रूप राजनीतिक-यथार्थ है, दस्तावेज नहीं। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण सत्ता-रक्षा और चुनाव है। रिपोर्ट घटना दोहराती है। उपन्यास तंत्र का चक्र बनाता है। पात्र गोल और सपाट दोनों हैं। बिसेसर उर्फ़ बिसू, बिंदा, दा साहब गोल के निकट हैं। दा साहब गीता-दरी का मुखौटा रखते हैं। सुकुल संवेदना को सभा बनाते हैं। सक्सेना और सिंहा दो रपटें हैं। दत्ता बाबू शब्द मोड़ते हैं। रिपोर्ट इतने कमरों को शिल्प नहीं देती। शीर्षक व्यंग्य है। भोज उत्सव है; उत्सव लाश पर सत्ता का है। वाचक सर्वज्ञ-घटना है, गवाह-रिपोर्टर नहीं। भाषा सरल खड़ी बोली है। आलोचना शिल्पहीनता कहती है — अर्थ यह कि वर्णन सीधा है, प्रयोग का बोझ नहीं। नाटक बाद का रूपांतर है; पत्र की विधा गद्य-कथा है।
गुण तीन हैं। पहला — लाश को राजनीतिक प्रश्न बनाना; नाम व्यंग्य है, उत्सव मृतक की पूँजी पर। दूसरा — पुलिस-प्रेस-नेता का एक चक्र दिखाना — सक्सेना, सिंहा, दत्ता, दा साहब, सुकुल। तीसरा — दलित हक को वोट से अलग करना; बिसू हक माँगता है, दल संवेदना माँगते हैं। आपका बंटी बच्चे और विच्छेद का है। राग दरबारी कार्यालय है। तमस दंगा है। रंगभूमि कारखाना है। त्यागपत्र मर्यादा है। अनामदास का पोथा संस्कृति है। यह चुनाव और लाश है। तीनों यथार्थ हैं, प्रश्न अलग हैं। बच्चन सिंह गठजोड़ देखते हैं। आलोचना अपराध का राजनीतिकरण कहती है। फॉर्स्टर कारण कहते हैं; कारण सत्ता-रक्षा है। लुबॉक दृष्टि कहते हैं; कई कमरे हैं। बेलछी प्रेरणा है, रिपोर्ट नहीं।
सीमाएँ साफ हैं। दा साहब का आकर्षण पीड़ा को ढक सकता है। कुछ पात्र सपाट। नाटक से विधा-भ्रम — रूपांतर लगभग 1982, निर्धारित विधा उपन्यास। अकेली और बंटी से नाम-भ्रम। सारा आकाश यादव का है। व्यवस्था अटूट। ईमानदार अफसर आशा का स्पर्श दे सकता है। आलोचना शिल्पहीनता कहती है — वर्णन सीधा है; यह सीमा भी कही जाती है, गुण भी। नारी-केंद्र बंटी जितना नहीं। विकास बिसू में घटना-कम है, मृत्यु जल्दी है। गुण यह कि लाश चुप नहीं रहती। बिंदा और रुक्मा प्रतिरोध बचाते हैं।
पहचान निषेध से पूरी होती है। रंगभूमि सूरदास है, गोली और कारखाना। त्यागपत्र मृणाल है, पद-त्याग। अनामदास का पोथा रैक्व है, शकट। गोदान होरी है। मूल्यांकन इन्हीं अंतरों के बिना अधूरा है। पूरी कथा पढ़नी है; सार बिसू, बिंदा, दा साहब, 1979, सरोहा याद रखने के लिए है, ग्रंथ की जगह नहीं। सीमाओं के बावजूद निर्धारित कृति टिकती है। 1979 में यह कृति समकालीन राजनीति को उपन्यास का विषय बनाती है। बिना लाश के मूल्यांकन खाली है। बिना गठजोड़ के राजनीतिक शिखर-नाम पतला है।
निष्कर्ष यह है कि बेलछी प्रेरणा है, सरोहा कथा है; रिपोर्ट घटना दोहराती, उपन्यास भोज का चक्र रचता है।
