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आधुनिक काव्य

Guess paper sets — practise one set at a time.

सेट 1

सेट 1 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। खंड अ के दस प्रश्न अनिवार्य। खंड ब में प्रत्येक इकाई से आंतरिक विकल्प — पाँचों प्रश्न करने हैं। खंड स में पाँच दीर्घ में से कोई तीन।

Section A

Q. 1. आचार्य शुक्ल आधुनिक काल का आरंभ मुख्यतः किससे जोड़ते हैं?

शुक्ल आधुनिक काल गद्य से खोलते हैं; भारतेंदु सीमा-पुरुष हैं।

Q. 2. रश्मिरथी का निर्धारित प्रकाशक है —

लोकभारती, प्रयागराज; 1952; सात सर्ग; नायक कर्ण।

Q. 3. यशोधरा का प्रकाशन वर्ष है —

गुप्त; बुद्ध-गृहत्याग। साकेत 1931; भारत-भारती 1912।

Q. 4. कामायनी किस वर्ष प्रकाशित हुई?

प्रसाद, 1936। निर्धारित पाठ लहर के हैं, कामायनी शिखर-ग्रंथ है।

Q. 5. नागार्जुन का मैथिली नाम है —

वैद्यनाथ मिश्र; हिन्दी में नागार्जुन, मैथिली में यात्री।

Q. 6. तार सप्तक _____ ई. में प्रकाशित हुआ।

Answer: 1943 — अज्ञेय संपादक; सात कवि; प्रयोगवाद का आरंभ।

Q. 7. कर्ण की माता _____ हैं।

Answer: कुंती — सूर्यपुत्र; रंगभूमि के बाद जन्म-रहस्य कृष्ण खोलते हैं।

Q. 8. प्रिय प्रवास के रचयिता _____ हैं।

Answer: हरिऔध — अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’; खड़ी बोली महाकाव्य।

Q. 9. यामा का प्रकाशन वर्ष _____ है।

Answer: 1940 — महादेवी; दुख की बदली इसी संग्रह का गीत है। नीहार 1930।

Q. 10. नरेश मेहता को ज्ञानपीठ _____ में मिला।

Answer: 1992 — 1922–2000। संशय की एक रात निर्धारित नहीं।

Section B

Q. 1 (8 marks) · Unit 1

भारतेंदु युग और द्विवेदी युग में काव्य-भाषा का अंतर लिखिए।

Or: छायावाद के चार स्तंभों की काव्य-पहचान लिखिए।

Model answer

भारतेंदु युग लगभग 1850–1900 है। गद्य खड़ी बोली में स्थिर हुआ। कविता ब्रज-प्रधान रही। निज भाषा का आग्रह है, पर पद अभी ब्रज का है। पत्र कविवचनसुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन और बालबोधिनी हैं। निर्धारित पाठ निज भाषा उन्नति अहै और चूरन अमल वेद का भारी हैं। द्विवेदी युग लगभग 1900–1918 है। महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती से खड़ी बोली को कविता की भाषा बनाते हैं; संपादन प्रायः 1903–1920। गुप्त भारत-भारती और साकेत लिखते हैं। हरिऔध प्रिय प्रवास लिखते हैं — खड़ी बोली महाकाव्य। सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्रीय गीतकार हैं, सरस्वती-संपादक नहीं।

अंतर यह है कि भारतेंदु गद्य खड़ी बोली का देते हैं, कविता ब्रज की। द्विवेदी यह अंतर मिटाते हैं। कविता अब खड़ी बोली पर बैठती है। विशेषताएँ इतिवृत्त, आदर्श और भाषा-शुद्धि हैं। छायावाद बाद में कल्पना जोड़ता है, भाषा खड़ी बोली की लेता है। बिना इस सुधार के पल्लव और कामायनी की भाषा स्थिर नहीं होती। सीमा उपदेश और कठोर शुद्धि का बोझ है। शुक्ल द्विवेदी काल को गद्य का उत्कर्ष भी कहते हैं; कविता उसी अनुशासन की सहचरी है।

निष्कर्ष यह है कि भाषा-अंतर गद्य-कविता के विभाजन पर है; द्विवेदी उसे कविता तक ले जाते हैं।

Or

छायावाद लगभग 1918 से 1936 तक का काव्य-आंदोलन है। स्थूल इतिवृत्त के स्थान पर सूक्ष्म अनुभूति, कल्पना, लाक्षणिकता और प्रगीत प्रधान हैं। नाम के पीछे मुकुटधर पांडेय का लेख और आचार्य शुक्ल की आपत्ति दोनों याद रहें। शुक्ल रहस्यात्मकता और अस्पष्टता पर कठोर थे। नंददुलारे वाजपेयी, नगेन्द्र और नामवर सिंह ने इसे स्वच्छंदता, प्रगीत और कल्पना की शक्ति माना। चार स्तंभ जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा हैं। प्रसाद के झरना, आँसू, लहर और कामायनी हैं। निराला के परिमल, अनामिका, गीतिका हैं। पंत के पल्लव, गुंजन हैं। महादेवी के नीहार, नीरजा, यामा हैं।

विशेषताएँ प्रकृति-आलंबन, नारी की सूक्ष्म पीड़ा, प्रतीक-विधान, संगीत और रहस्य-जिज्ञासा हैं। दीप, बादल, झरना, तारा अर्थ की दूसरी पंक्ति खोलते हैं। कामायनी 1936 शिखर-ग्रंथ कही जाती है, निर्धारित अंश नहीं। सुभद्राकुमारी चौहान राष्ट्रीय गीत गाती हैं; चार स्तंभों में नहीं हैं। सीमा व्यक्ति-केंद्र और अस्पष्टता का आक्षेप है। प्रगतिवाद 1936 में यथार्थ से इसी पर चोट करता है।

निष्कर्ष यह है कि छायावाद सूक्ष्म अनुभूति, चार स्तंभ, प्रगीत और प्रतीक का आंदोलन है; काल 1918–1936 है।

Q. 2 (8 marks) · Unit 2

सप्तम सर्ग में पहिए का महत्त्व लिखिए।

Or: रश्मिरथी में रंगभूमि का सामाजिक प्रश्न लिखिए।

Model answer

सप्तम सर्ग रश्मिरथी का कर्ण-अर्जुन निर्णायक युद्ध है। कृति दिनकर की है, 1952, नायक कर्ण, खंडकाव्य। रथ का पहिया पंक में धँसता है। कर्ण पहिया निकालता है, शस्त्र नहीं संभालता। परशुराम का शाप पूरा होता है — विद्या संकट में साथ नहीं देती। कृष्ण अर्जुन को प्रहार कहते हैं। निःशस्त्र कर्ण पर बाण चलता है। अंत से पहले कर्ण अश्वसेन सर्प का सहयोग ठुकराता है — मनुज मनुज से लड़े। रस वीर से करुण हो जाता है। आलंबन कर्ण और अटकता रथ हैं। यह हुंकार की कृष्ण की चेतावनी नहीं।

महत्त्व यह है कि नाम रश्मिरथी रथ से बँधा है; अंत उसी रथ के रुकने पर है। जन्म का अपमान यहाँ कर्म के मैदान तक चला आता है। द्वितीय सर्ग का शाप बिना पहिए अधूरा रह जाता है। कवच गया, शक्ति घटोत्कच पर खर्च हुई, फिर पहिया धँसता है — दान और शाप दोनों यहाँ फलते हैं। द्रौपदी-प्रसंग का पश्चात्ताप भी यहीं छूता है। मूल्यांकन वंश से नहीं, आचरण से है। हल्दीघाटी का दूसरा सर्ग प्रताप का युद्ध है; यह कर्ण का अंत है।

निष्कर्ष यह है कि पहिया शाप, कर्म और अंत को एक सूत्र में बाँधता है; सर्ग सप्तम है, हुंकार का गीत नहीं।

Or

रंगभूमि-प्रसंग रामधारी सिंह दिनकर के रश्मिरथी का प्रथम सर्ग है। प्रकाशन 1952, नायक कर्ण। यह प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि नहीं; कथा हस्तिनापुर की शस्त्र-सभा की है। राजकुमार शस्त्र दिखाते हैं। अर्जुन की प्रशंसा चलती है। कर्ण चुनौती देता है — जो अर्जुन ने किया, वह वह भी दिखा सकता है। प्रश्न कौशल का नहीं, कुल का उठता है। कृपाचार्य जाति रटते हैं। कर्ण भुजदंड को जाति कहता है। दुर्योधन अंग का राज्य देकर मित्र बनाता है। वचन यहीं बँधता है। आगे कृष्ण-संवाद और कुंती-भेंट इसी मैत्री की कीमत पूछते हैं।

रस वीर है; करुण अपमान से चिपकता है। आलंबन कर्ण हैं। उद्दीपन सभा, अर्जुन का प्रदर्शन और जाति-प्रश्न हैं। शैली संवाद और ओज की है। सामाजिक पक्ष यह है कि व्यवस्था प्रतिभा नहीं, जन्म नापती है। दुर्योधन उस क्षण सम्मान का दाता भी है। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी वन-वापसी का गीत है; यह सर्ग वह गीत नहीं। हल्दीघाटी का दूसरा सर्ग प्रताप का युद्ध है; यह कर्ण की रंगभूमि है।

निष्कर्ष यह है कि रंगभूमि-प्रसंग जन्म बनाम कर्म का पहला सूत्र है और अंगराज-मैत्री यहीं जन्म लेती है।

Q. 3 (8 marks) · Unit 3

भारत-भारती का महत्त्व लिखिए।

Or: सोहनलाल द्विवेदी और महावीर प्रसाद द्विवेदी में अंतर स्पष्ट कीजिए।

Model answer

भारत-भारती मैथिलीशरण गुप्त की कृति है, प्रकाशन 1912। गुप्त 1886–1964, चिरगाँव, राष्ट्रकवि। द्विवेदी युग का जागरण-घोष है। विषय अतीत-गौरव, वर्तमान-ग्लानि और भविष्य का आह्वान है। भाषा खड़ी बोली है। रस वीर-जागरण और करुण मिला है। सरस्वती के अनुशासन में वाक्य स्थिर है। यह निर्धारित तीन पदों से अलग ग्रंथ है, पर गुप्त की पहचान का शिखर-नाम है। निर्धारित पाठ कैकेयी परिताप साकेत 1931 से, सखि वे मुझसे कहकर जाते यशोधरा 1932 से, दोनों ओर प्रेम पलता है मुक्तक हैं। भारत-भारती उन तीन का पर्याय नहीं, राष्ट्र का गीत है।

साकेत राम-कथा है, यशोधरा बुद्ध-गृहत्याग है; भारत-भारती राष्ट्र का गीत है। हरिऔध विरह देते हैं; गुप्त यहाँ जागरण देते हैं। भारतेंदु व्यंग्य और ब्रज रखते हैं; गुप्त खड़ी बोली आदर्श रखते हैं। सोहनलाल खादी-गीत गाते हैं; गुप्त ग्रंथ-घोष देते हैं। सीमा उपदेश और इतिवृत्त का बोझ है। गुण राष्ट्रीय स्मृति को खड़ी बोली काव्य में स्थिर करना है। बिना वर्ष और कवि-नाम के महत्त्व अधूरा रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि भारत-भारती द्विवेदी युग का राष्ट्रीय घोष है; महत्त्व खड़ी बोली आदर्श और जागरण से है।

Or

सोहनलाल द्विवेदी का जन्म 1906, निधन 1988। वे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी नहीं हैं; सरस्वती के संपादक नहीं, गाँधी-युग के राष्ट्रीय गीतकार हैं। संग्रहों में युगावतार गाँधी याद किया जाता है। निर्धारित तीन पाठ सरल गीत हैं — रे मन, खादी गीत, वंदना। रे मन चित्त को संबोधित करता है — हिम्मत, जागरण, अस्त से विहान। आलंबन मन है। रस वीर-जागरण है। शैली संबोधन की है। तुलसी मन को बावरा कहते हैं; सोहनलाल मन को राष्ट्र-कर्तव्य कहते हैं। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है।

खादी गीत स्वदेशी का गीत है। खादी नंगों-भुखों की आस और आहत आह का चिह्न है। आलंबन खादी है। उद्दीपन चरखा, गाँव, विदेशी वस्त्र हैं। वंदना नमन का गीत है — राष्ट्र या महापुरुष के प्रति। तीनों पाठ ओज के सरल रूप हैं, रश्मिरथी के संवाद-ओज नहीं। पांडे हल्दीघाटी में युद्ध गाते हैं; सोहनलाल खादी और मन गाते हैं। भारतेंदु व्यंग्य रखते हैं; ये गीत नमन रखते हैं।

निष्कर्ष यह है कि प्रतिपाद्य जागरण, स्वदेशी-खादी और वंदना हैं; कवि सोहनलाल द्विवेदी हैं, महावीर प्रसाद नहीं।

Q. 4 (8 marks) · Unit 4

लहर की तीन निर्धारित कविताओं का परिचय दीजिए।

Or: मैं नीर भरी दुख की बदली का भाव लिखिए।

Model answer

लहर जयशंकर प्रसाद का प्रगीत-संग्रह है। प्रसाद काशी, 1889–1937, छायावाद के संस्कृति-कवि। कामायनी 1936 शिखर है, निर्धारित अंश नहीं। निर्धारित तीन पाठ लहर से हैं। पेशोला की प्रतिध्वनि उदयपुर की पिछोला झील है, मराठा पेशवा नहीं। संध्या में अरुण बिंब, शांत उर्मियाँ, मौन दुन्दुभि; पुकार है — कौन लेगा भार? मेवाड़ की गूँज और मौन वर्तमान हैं। रस वीर-करुण। बीती विभावरी जाग री उषा का आह्वान है — अंबर पनघट, तारा-घट, ऊषा नागरी। रस जागरण और शृंगार मिला है। प्रलय की छाया कमला की कथा है — गुजरात की रूप-रानी, सुलतान, पद्मिनी-स्पर्धा, रूप का अभिशाप।

तीनों खड़ी बोली प्रगीत हैं, दिशा अलग है। एक संध्या की गूँज, एक उषा का संबोधन, एक नाट्य-विस्तार। पांडे हल्दीघाटी में युद्ध गाते हैं; प्रसाद झील पर युद्ध के बाद की खामोशी और पराजय की स्त्री-कथा गाते हैं। महादेवी वेदना गाती हैं; कमला रूप से लड़ती है। निराला की संध्या अवसान पर उतरती है; प्रसाद की ऊषा जगाती है। व्याख्या में तीन शीर्षक, संग्रह लहर और पिछोला का भेद लिखे जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि लहर के तीन पाठ पिछोला, जागरण और कमला-कथा से पहचाने जाते हैं; कामायनी निर्धारित अंश नहीं।

Or

प्रसंग महादेवी वर्मा, संग्रह यामा, 1940। महादेवी 1907–1987, फर्रुखाबाद-प्रयाग, आधुनिक मीरा। निर्धारित तीन गीतों में यह तीसरा है। वाचक बादल है। नीर दुख का है, बरसना स्वभाव है। आलंबन अनुपस्थित प्रिय और मेघ-रूप वाचक हैं। रस करुण और शांत। रूप प्रगीत है। पंत का एक तारा बाहर टिमटिमाता है; यह मेघ भीतर से बरसता है। जो तुम आ जाते एक बार नीहार दूरी माँगता है; तुम मुझमें प्रिय नीरजा अभेद है; यह गीत स्वभाव है। वेदना वाचक की है, केवल नायिका की नहीं। प्रिय आराध्य है, देह-नायक नहीं।

प्रसाद की कमला रूप से लड़ती है; महादेवी वेदना से पहचान बनाती हैं। सुभद्रा उल्लास और इसका रोना गाती हैं — वात्सल्य का उल्टा छोर। शुक्ल रहस्य पर आपत्ति करते रहे; वाजपेयी और नामवर इसे प्रगीत की शक्ति मानते हैं। सीमा एक स्वर का ठहराव है। गुण स्त्री का वाचक-अधिकार है। व्याख्या में संग्रह यामा, दुख का नीर और मेघ-बरसना लिखे जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि भाव दुख का नीर और मेघ का बरसना है; संग्रह यामा है, नीहार नहीं।

Q. 5 (8 marks) · Unit 5

वृक्षत्व कविता का नैतिक आशय लिखिए।

Or: कहीं नहीं बचे में प्रकृति का निषेध लिखिए।

Model answer

प्रसंग नरेश मेहता की निर्धारित कविता वृक्षत्व है। मेहता 1922–2000, ज्ञानपीठ 1992। संशय की एक रात, महाप्रस्थान, प्रवाद पर्व मिथक-ग्रंथ हैं; निर्धारित पाठ नहीं। निर्धारित तीन हैं — माँ, वृक्षत्व, किरण धेनुएँ। वृक्षत्व वृक्ष जैसे होने की अवस्था है — सुगंध देना, ठहराव, दूसरे तक पहुँच। आलंबन वृक्ष-अवस्था है। रस शांत और नैतिक। उपेक्षा किसी दीन के पास ठहरती है तो वृक्षत्व अधूरा रह जाता है। प्रत्येक का अपना वृक्षत्व है। यह वनस्पति-वर्णन मात्र नहीं। भाषा खड़ी बोली, बिंब ग्रामीण-वैदिक स्पर्श रखते हैं।

माँ आँगन-श्रम है; किरण धेनुएँ प्रभात का ग्वाला-बिंब हैं; यह पाठ नैतिक होना है। कागद का तपस्वी रूँख मरु का सूखा वृक्ष है; मेहता का वृक्षत्व आचरण का प्रश्न है। दोनों वृक्ष हैं, स्वर अलग है। पंत प्रकृति को चित्र देते हैं; मेहता प्रकृति को नैतिक अवस्था देते हैं। अज्ञेय व्यक्ति-द्वीप बाँधते हैं; मेहता वृक्ष-होना बाँधते हैं। व्याख्या में ज्ञानपीठ, तीन शीर्षक और मिथक-ग्रंथों का अभाव लिखे जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि नैतिक आशय वृक्ष-होना है — देना और न ठुकराना; संशय की एक रात यहाँ नहीं खुलती।

Or

प्रसंग भवानीप्रसाद मिश्र की कविता कहीं नहीं बचे है। मिश्र 1913–1985, गाँधी-सरल भाषा, नई कविता का सरल सिरा। निर्धारित दूसरा पाठ गीत फरोश है — बाजार में कविता की बिक्री; यह पाठ पर्यावरण का क्षय है। आलंबन लुप्त होती प्रकृति है — हरे वृक्ष, सागर, नदियाँ, पहाड़, झरने। कहीं ठीक-ठाक नहीं बचे। कंक्रीट और लालसा ने जगह ले ली है। सूरज-चाँद धुँधले पड़ते हैं। ऋतु का नियम टूटता है। रस करुण है; व्यंग्य मनुष्य के स्वार्थ पर है। रूप सरल कथन है, फैंटेसी नहीं।

गीत फरोश बाजार में कविता बेचता है; यह पाठ बचाव का हिसाब है। निषेध शीर्षक का कंकाल है। पंत का मौन निमंत्रण प्रकृति को बुलाता है; मिश्र कहते हैं वह बची ही नहीं। कागद मरु में जल माँगते हैं; मिश्र हरियाली के अभाव पर ठहरते हैं। दोनों पर्यावरण छूते हैं, भूमि अलग है — थार की प्यास और सर्वत्र का नहीं बचे। केवल प्रकृति-प्रेम लिखना अधूरा है; नहीं बचे का निषेध चाहिए।

निष्कर्ष यह है कि कहीं नहीं बचे पर्यावरण और मूल्य दोनों के क्षय का निषेध है; नई कविता का सरल सिरा यहीं है।

Section C

Q. 1 (20 marks) · Unit 1

प्रगतिवाद और प्रयोगवाद का साम्य-वैषम्य लिखिए।

Model answer

प्रगतिवाद 1936 के आसपास संगठित स्वर है। उसी वर्ष लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ बना; प्रेमचंद अध्यक्ष रहे। वैचारिक आधार मार्क्सवाद, वर्ग-संघर्ष और जन-यथार्थ है। कविता महल और रहस्य से खेत, कारखाना, ऋण और भूख की ओर मुड़ती है। प्रतिनिधि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, त्रिलोचन और रांगेय राघव हैं। रामविलास शर्मा आलोचना के स्तंभ हैं। पंत की ग्राम्या छायावाद से प्रगति की ओर पुल है। निराला में सामाजिक ओज पहले से था; यह आंदोलन उसे सिद्धांत देता है। नागार्जुन निर्धारित प्रगतिवादी हैं — प्रेत का बयान व्यंग्य है, दंतुरित मुस्कान वात्सल्य है। रस में रौद्र, करुण और व्यंग्य प्रधान हैं। दिनकर का राष्ट्रीय ओज इसका पर्याय नहीं; वह वीर और जागरण का अलग स्वर है।

प्रयोगवाद का घोषित द्वार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का तार सप्तक है, प्रकाशन 1943। सात कवि हैं — अज्ञेय, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा और गजानन माधव मुक्तिबोध। सभी एक विचार के नहीं। रामविलास और मुक्तिबोध सामाजिक-वैचारिक छोर रखते हैं। अज्ञेय व्यक्ति, क्षण और शिल्प के छोर रखते हैं। प्रयोग का अर्थ छंद तोड़ना मात्र नहीं। अर्थ नई अनुभूति के लिए नई भाषा, बिंब और मनोविज्ञान आजमाना है। फ्रायड, अस्तित्व-चिंता, युद्ध और नगर का अकेला मन यहाँ विषय बनते हैं। दूसरा सप्तक 1951, तीसरा 1959 — ये नई कविता की ओर खुलते हैं। अज्ञेय के नदी के द्वीप और कलगी बाजरे की निर्धारित पाठ हैं; उपन्यास नदी के द्वीप कविता नहीं।

साम्य दोनों छायावाद के रहस्य और द्विवेदी के इतिवृत्त से कटते हैं। दोनों खड़ी बोली और आधुनिक मनुष्य रखते हैं। रामविलास दोनों छोर छूते हैं। मुक्तिबोध सप्तक में रहकर सामाजिक फैंटेसी रखते हैं; इसलिए प्रयोगवाद को केवल अज्ञेय का पर्याय कहना अधूरा है। निराला का सामाजिक ओज प्रगति को भूमि देता है, प्रयोग को छंद-मुक्ति देता है। दोनों आधुनिक कविता के उत्तर-छायावादी मोड़ हैं, दो युग नहीं।

वैषम्य आलंबन पर है। प्रगतिवाद जन और वर्ग को नायक बनाता है। प्रयोगवाद व्यक्ति को प्रयोगशाला बनाता है। एक पेट, ऋण और भूख पूछता है, दूसरा क्षण, शिल्प और नया बिंब। आक्षेप भी उलटा है — सिद्धांत का बोझ बनाम दुरुहता और समाज-कटान। नागार्जुन निर्धारित प्रगतिवादी हैं; अज्ञेय निर्धारित प्रयोग के कवि हैं। नई कविता 1950 के दशक में दोनों से व्यापक हो जाती है — लघु मानव, बिंब, बोलचाल। मिश्र सरल सिरा हैं; वे सप्तक के दुर्बोध सिरे नहीं। बिना वर्ष, संघ और सप्तक के साम्य-वैषम्य अधूरा रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि साम्य छायावादोत्तर आधुनिक कविता पर है, वैषम्य जन बनाम व्यक्ति और 1936 बनाम 1943 पर है।

Q. 2 (20 marks) · Unit 2

रश्मिरथी में दान और प्रण का मूल्यांकन कीजिए।

Model answer

रश्मिरथी रामधारी सिंह दिनकर का खंडकाव्य है, प्रकाशन 1952, लोकभारती, सात सर्ग, नायक कर्ण। दान और प्रण चरित्र के दो स्तंभ हैं। जन्म अपमान देता है; कर्म इन्हीं दो से नायकत्व देता है। भाषा खड़ी बोली, रस वीर-करुण, गुण ओज, शैली संवाद। नाम रश्मिरथी सूर्य-किरण के रथी की पहचान है। कुरुक्षेत्र विचार का ग्रंथ है; यह कृति चरित्र का है। उर्वशी ज्ञानपीठ 1972 की कृति है, यह खंडकाव्य नहीं। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी वन-वापसी का गीत है; वह दान-प्रण का सर्ग नहीं। प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि यहाँ कथा नहीं; प्रथम सर्ग हस्तिनापुर की शस्त्र-रंगभूमि है जहाँ मैत्री बँधती है।

दान का बड़ा प्रसंग चतुर्थ सर्ग का कवच-कुंडल है। इंद्र ब्राह्मण बनकर आते हैं। माँग जन्म के साथ मिले रक्षक की है। कर्ण याचक को पहचान लेता है। जानता है कि दान युद्ध की ढाल उतार देगा। फिर भी खाली हाथ नहीं लौटाता। इंद्र शक्ति देकर कुछ चुकाते हैं; मूल बात कर्ण का प्रण है — माँगते ही देना। दान यश नहीं, स्वभाव है। षष्ठ सर्ग में शक्ति घटोत्कच पर खर्च होती है — दान का दूसरा रूप अस्त्र का त्याग भी है। आलंबन कर्ण हैं। उद्दीपन याचक-इंद्र हैं। वीर रस यहाँ त्याग से चमकता है। रंगभूमि में भुजा जाति बनी थी; यहाँ त्वचा की ढाल उतरती है।

प्रण मैत्री और पक्ष पर है। दुर्योधन रंगभूमि पर संकट में राज्य देता है। तृतीय सर्ग में कृष्ण जन्म-रहस्य और पांडव-प्रस्ताव खोलते हैं। कर्ण इंकार करता है। तर्क कृतज्ञता का है। कुंती पुत्र माँगती है; कर्ण अर्जुन छोड़ शेष भाइयों की रक्षा का वचन देता है, पक्ष नहीं बदलता। प्रण लाभ से बड़ा है। जन्म का अधिकार मैत्री के आगे झुकता है। यह धीरोदात्त का प्रण है, हठ भर नहीं। पहिए तक यही प्रण टिका रहता है।

मूल्यांकन दो छोर रखता है। दान कर्ण को ऊँचा करता है; द्रौपदी-प्रसंग का मौन मैत्री को दाग भी देता है। ओज कभी सूक्ष्म मनोविज्ञान दबा देता है। परिचय छिपाना असत्य कर्म है, जन्म-व्यवस्था के सामने। फिर भी खंडकाव्य का नैतिक केंद्र वचन है, वंश नहीं। अश्वसेन सर्प का सहयोग ठुकराना आधुनिक मनुष्यत्व है — मनुज मनुज से लड़े। हल्दीघाटी प्रताप का वीर-खंड है; नायक और प्रश्न अलग हैं। साधारणीकरण सभा के अपमान और दान के त्याग को सामान्य अनुभव बनाता है। बिना रंगभूमि के प्रण अधूरा रह जाता है; बिना दान के कर्ण केवल योद्धा रह जाते।

निष्कर्ष यह है कि दान कवच-कुंडल और शक्ति-त्याग है, प्रण मैत्री और पक्ष है; दोनों मिलकर कर्ण को जन्म-अपमान से ऊपर उठाते हैं।

Q. 3 (20 marks) · Unit 3

गुप्त की निर्धारित तीन रचनाओं का विवेचन कीजिए।

Model answer

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886, चिरगाँव। निधन 12 दिसंबर 1964। राष्ट्रकवि। भारत-भारती 1912 जागरण है। द्विवेदी युग के प्रतिनिधि हैं। भाषा खड़ी बोली। प्रवृत्ति इतिवृत्त, आदर्श और नैतिक करुण। निर्धारित तीन पाठ हैं — कैकेयी परिताप साकेत 1931 से, सखि वे मुझसे कहकर जाते यशोधरा 1932 से, दोनों ओर प्रेम पलता है स्वतंत्र मुक्तक। तीनों कथा एक नहीं। यशोधरा को साकेत कहना अधूरा उत्तर है। हरिऔध विरह-महाकाव्य देते हैं; गुप्त आदर्श और नारी-प्रश्न देते हैं। सोहनलाल खादी-गीत गाते हैं, सरस्वती-संपादक नहीं।

कैकेयी दो वर ले चुकी है। राम वन गए, दशरथ नहीं रहे, भरत राज नहीं लेते। परिताप पश्चात्ताप है, सफाई नहीं। आलंबन कैकेयी। उद्दीपन रिक्त सिंहासन, राम का वन, भरत का त्याग। गुप्त उसे केवल षड्यंत्रिणी पर नहीं छोड़ते; ग्लानि बोलती है। राज्य-लोभ कुटुंब तोड़ता है। रस करुण है। शैली आत्मालाप के निकट है। राम मर्यादा हैं; कैकेयी उस मर्यादा की तोड़। फिर भी कवि दंड के साथ करुण रखते हैं। साधारणीकरण लोभ के सामान्य फल से होता है।

यशोधरा सिद्धार्थ मौन त्याग करते हैं। यशोधरा सखी से पूछती है — क्या मैं पथ-बाधा हूँ? स्वाभिमान विलाप से बड़ा है। आलंबन यशोधरा। उद्दीपन रात्रि-त्याग, राहुल, मौन पति। रस करुण-वात्सल्य। यह साकेत की उर्मिला नहीं। वाचक स्त्री है, चुप प्रतिमा नहीं। द्विवेदी युग की माता-सती प्रतिमा से यह पद आगे है। सीमा आदर्श का दबाव है। गुण पौराणिक स्त्री को आधुनिक कंठ देना है। गुप्त बुद्ध को महापुरुष रखते हैं; पत्नी को मौन नहीं रखते।

दोनों ओर प्रेम पलता है उभय-पक्ष माँगता है। दीप-पतंग की रीति एकतरफा नहीं रहती। आलंबन प्रेम के दो छोर हैं। रस विप्रलंभ-शांत। रूप स्वतंत्र मुक्तक है, साकेत का सर्ग नहीं। कैकेयी में पक्ष टूटता है; यशोधरा में एक पक्ष मौन है; यह पद उत्तर-प्रेम माँगता है। हरिऔध की गोपी विरह का आलंबन अधिक है; गुप्त की स्त्री प्रश्न करती है। साम्य खड़ी बोली और नारी-करुण। वैषम्य पश्चात्ताप, स्वाभिमान और उभय-पक्ष पर है। भारत-भारती जागरण का घोष है; ये तीन पाठ गृह और प्रेम के कंठ हैं। सरस्वती का अनुशासन तीनों पर है। सोहनलाल खादी गाते हैं; पांडे युद्ध गाते हैं; गुप्त आदर्श और प्रश्न गाते हैं। बिना कृति-नाम के तीन पाठ एक कथा बन जाते हैं — यही भूल है। व्याख्या में साकेत, यशोधरा और मुक्तक अलग रखे जाते हैं। महादेवी वेदना गाती हैं; गुप्त मर्यादा गाते हैं। प्रसाद कमला रखते हैं; गुप्त कैकेयी-यशोधरा रखते हैं।

निष्कर्ष यह है कि तीन रचनाएँ पश्चात्ताप, स्वाभिमान और उभय-पक्ष प्रेम से पहचानी जाती हैं; केंद्र वाचक नारी और खड़ी बोली आदर्श है।

Q. 4 (20 marks) · Unit 4

निराला की निर्धारित तीन कविताओं का विवेचन कीजिए।

Model answer

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 21 फरवरी 1896 महिषादल-मेदिनीपुर, निधन 15 अक्टूबर 1961 प्रयाग। महाप्राण कहे जाते हैं। मुक्त छंद का विधान उनका बड़ा काम है। परिमल 1930, गीतिका 1936, अपरा। अन्य कृतियाँ अनामिका, राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, कुकुरमुत्ता। निर्धारित तीन पाठ हैं — कौन तुम शुभ्र-किरण वसना गीतिका से, जुही की कली परिमल से, संध्या सुंदरी अपरा से। पाठ्यक्रम संध्या सुंदरा लिखता है; प्रचलित शीर्षक सुंदरी है। तोड़ती पत्थर सामाजिक करुण है, निर्धारित नहीं। दोनों प्रकृति-कविताएँ प्रकृति को आकृति देती हैं, इतिवृत्त नहीं। भाषा खड़ी बोली, मुक्त छंद गति देता है।

जुही की कली परिमल की है। निर्जन वन-वल्लरी पर सुहागिन-सुकुमारी सोती है — कली। पहचान की पंक्ति है — विजन वन-वल्लरी पर / सोती थी सुहागिन सुकुमारी। मलय पवन नायक बनकर आता है। आलिंगन से कली जागती है, खिलती है। आलंबन जुही है। उद्दीपन रात्रि, वन-वल्लरी, पवन हैं। रस शृंगार है। फूल केवल वनस्पति नहीं रह जाता; प्रेम का शरीर बनता है। द्विवेदी युग फूल का नाम गिनता; निराला फूल को नायिका देते हैं। शुभ्र-किरण-वसना गीतिका का प्रश्न-गीत है — कौन तुम शुभ्र-किरण-वसना, सीखा केवल हँसना। जुही स्पर्श का दृश्य है; शुभ्र-किरण प्रश्न है।

संध्या सुंदरी अपरा की है। दिवसावसान पर वह मेघमय आसमान से उतरती है। पहचान की पंक्ति है — दिवसावसान का समय— / मेघमय आसमान से उतर रही है। मानवीकरण पूरा है — संध्या स्त्री है, चुप, कोमल, थके जीवों को सुलाती। आलंबन संध्या हैं। रस शांत; विप्रलंभ छूता है। जुही रात्रि-मिलन है; संध्या अवसान है। प्रसाद की ऊषा जगाती है — बीती विभावरी जाग री; निराला की संध्या सुलाती है। पंत मौन से बुलाते हैं; निराला स्पर्श और उतरने का चित्र देते हैं। महादेवी मेघ बनती हैं, संध्या नहीं। हरिऔध का दिवस का अवसान संध्या का महाकाव्य-चित्र है; निराला संध्या को नारी-आकृति देते हैं।

साम्य दोनों पर प्रकृति का मानवीकरण, खड़ी बोली और छायावादी लाक्षणिकता है। वैषम्य संग्रह और क्षण पर है — परिमल का खिलना, अपरा का अवसान। सीमा रहस्य की धुंध कभी नाम ढकती है। गुण इंद्रिय-चित्र और छंद-मुक्ति है। सुभद्रा चार स्तंभों में नहीं; निराला स्तंभ हैं। कामायनी प्रसाद का महाकाव्य है; ये छोटी प्रकृति-कविताएँ हैं। व्याख्या में परिमल और अपरा के नाम अलग रखे जाते हैं। बिना शीर्षक और संग्रह के उत्तर अधूरा रह जाता है। लंबी पंक्ति नहीं उतारी जाती; भाव और पहचान-पंक्ति पर्याप्त हैं।

निष्कर्ष यह है कि जुही परिमल का शृंगार-प्रकृति है, संध्या सुंदरी अपरा का मानवीकरण है। दोनों निराला की निर्धारित पहचान हैं। गीतिका का शुभ्र-किरण प्रश्न तीसरा पाठ है, इन दो का पर्याय नहीं।

Q. 5 (20 marks) · Unit 5

कागद की मरु-चेतना निर्धारित कविताओं के आधार पर लिखिए।

Model answer

ओम पुरोहित ‘कागद’ का जन्म 5 जुलाई 1957, केसरीसिंहपुर। निधन 12 अगस्त 2016। राजस्थानी और हिन्दी दोनों में लिखते हैं। निर्धारित पाँच पाठ समकालीन हैं — पूछती है बेकलू, तपस्वी रूँख, क्यों भटकती है, हरा कर देगी, बरसो जल। कुछ फ़ाइलों में बेक्यू लिखा मिलता है; शीर्षक बेकलू है, भोज्य पदार्थ नहीं। भाषा खड़ी बोली में लोक-स्पर्श है। रस करुण और शांत। आलंबन चिड़िया, वृक्ष, प्यास, मरु, जल हैं। वे रश्मिरथी के कर्ण या हल्दीघाटी के प्रताप नहीं; छोटे निर्धारित पाठ के समकालीन कवि हैं। धूमिल के सड़क-नारे नहीं; थार की प्रतीक्षा है। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पंक्ति नहीं उतारी जाती।

बेकलू खेत की चिड़िया है। वह पूछती है हल जोतने वाला कब आएगा, बीनणी कब आएगी, तपती देह पर शीतल बूँद कब गिरेगी। आलंबन चिड़िया और सूना खेत। रस करुण। प्रतीक्षा मरु की पहली परत है। रूप प्रश्न है, नारा नहीं। नागार्जुन गाँव की भूख रखते हैं; कागद खेत की प्रतीक्षा रखते हैं। मिश्र कहते हैं बचा नहीं; कागद आने वाले श्रम को पूछते हैं। बेक्यू शीर्षक नहीं।

तपस्वी रूँख में रूँख राजस्थानी में वृक्ष है। सूखे में खड़ा तपस्वी जैसा ठहराव है। मेहता का वृक्षत्व नैतिक सुगंध है; कागद का रूँख मरु का तप है। दोनों वृक्ष हैं, स्वर अलग है। क्यों भटकती है प्यास और धूल की खोज है। खाली पेट, चार दिशा, पृथ्वी कब तृप्त करे। आलंबन भटकती तृष्णा। रस करुण। यह अज्ञेय का व्यक्ति-द्वीप नहीं; यह प्यास का भटकना है।

हरा कर देगी में मरुधरा प्यासी है, आकाश का जल पीती है, फिर भी अंकुर की आशा बाँधे रहती है। बरसो जल थार को धारदार जल की प्रार्थना है। आज्ञार्थ है — जल बरस; बरसों जल काल-गणना नहीं। आलंबन मरु और जल। रस करुण-शांत। पाँच पाठ प्रतीक्षा, तप, भटकन, आशा, प्रार्थना हैं। साम्य मरु-चेतना और खड़ी बोली। वैषम्य चिड़िया, रूँख, प्यास, अंकुर, आह्वान पर है। पंत प्रकृति को चित्र देते हैं; कागद जल माँगते हैं। मिश्र कहते हैं बचा नहीं; कागद जल माँगते हैं। नागार्जुन गाँव की भूख रखते हैं; कागद थार की प्यास रखते हैं। मेहता का वृक्षत्व सुगंध है; रूँख मरु का तप है। बिना पाँच शीर्षकों के मरु-चेतना अधूरी रह जाती है। बेकलू चिड़िया है; बरसो जल प्रार्थना है, काल-गणना नहीं। समकालीन कविता की मरु-भूमि यहीं निर्धारित है। धूमिल सड़क गाते हैं; कागद थार गाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि कागद की मरु-चेतना बेकलू की प्रतीक्षा, रूँख का तप और जल की प्रार्थना से पहचानी जाती है; बेक्यू शीर्षक नहीं।

सेट 2

सेट 2 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। प्रश्न सेट 1 और इकाई टेस्ट से भिन्न हैं। खंड अ अनिवार्य। खंड ब आंतरिक विकल्प सहित पाँचों। खंड स में कोई तीन।

Section A

Q. 1. नई कविता का केंद्र-सूत्र माना जाता है —

1950 का दशक; बिंब; अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, रघुवीर सहाय।

Q. 2. रश्मिरथी का नायक है —

खंडकाव्य; सूर्यपुत्र; सात सर्ग।

Q. 3. चूरन अमल वेद का भारी के रचयिता हैं —

पाखंड-व्यंग्य; दूसरा निर्धारित पाठ निज भाषा उन्नति अहै है।

Q. 4. संध्या सुंदरी किस संग्रह की कविता है?

निराला; पाठ्यक्रम संध्या सुंदरा लिखता है। जुही परिमल में है।

Q. 5. गीत फरोश किस कवि की रचना है?

नई कविता का सरल सिरा; दूसरा निर्धारित पाठ कहीं नहीं बचे।

Q. 6. सरस्वती पत्रिका के प्रधान संपादक _____ थे।

Answer: महावीर प्रसाद द्विवेदी — प्रायः 1903–1920; खड़ी बोली कविता का अनुशासन।

Q. 7. उर्वशी पर दिनकर को ज्ञानपीठ _____ में मिला।

Answer: 1972 — उर्वशी निर्धारित नहीं; रश्मिरथी 1952 का खंडकाव्य है।

Q. 8. हल्दीघाटी का युद्ध _____ ई. के आसपास माना जाता है।

Answer: 1576 — प्रताप बनाम मानसिंह; निर्धारित दूसरा सर्ग।

Q. 9. जयशंकर प्रसाद का जन्म-स्थान _____ है।

Answer: काशी — 30 जनवरी 1889; निधन 15 जनवरी 1937, काशी।

Q. 10. भवानीप्रसाद मिश्र का निधन-वर्ष _____ है।

Answer: 1985 — जन्म 29 मार्च 1913; गाँधी-सरल भाषा।

Section B

Q. 1 (8 marks) · Unit 1

नई कविता में बिंब की प्रधानता क्यों मानी जाती है?

Or: दिव्यांग विमर्श काव्य में क्या पूछता है?

Model answer

नई कविता 1950 के दशक की धारा है। प्रयोगवाद का द्वार तार सप्तक 1943 है; दूसरा सप्तक 1951 नई कविता की ओर खुलता है। केंद्र लघु मानव है — न छायावाद का विराट रहस्य, न प्रगति का केवल वर्ग-नायक। वर्तमान की जटिलता, शहर, संबंध, अकेलापन और छोटी वस्तुएँ आलंबन बनती हैं। नामवर सिंह कविता के नए प्रतिमान में बिंब को शिल्प-सूत्र बाँधते हैं। अज्ञेय की बाजरे की कलगी नया ग्रामीण उपमान है, महल-गुलाब नहीं। शमशेर और केदारनाथ सिंह चित्र से अर्थ खोलते हैं। मुक्तिबोध की फैंटेसी बिंबों की शृंखला है।

बिंब इंद्रिय-ग्राह्य चित्र है। वह वर्णन की सूची नहीं, सघन दृश्य है। प्रतीक छायावाद में अधिक बोलते थे — दीप, बादल, झरना, तारा। यहाँ छोटी वस्तु इंद्रिय-चित्र बनती है। छंद मुक्त है, भाषा बोलचाल के निकट है। प्रतीक गौण हो जाते हैं, लुप्त नहीं। भवानीप्रसाद मिश्र सरल सिरा हैं। समकालीन कविता बाद में गवाही जोड़ती है। बिना बिंब के नई कविता अमूर्त उपदेश रह जाती है। द्विवेदी युग घटना-क्रम से चलता है; यह धारा चित्र से चलती है।

निष्कर्ष यह है कि बिंब की प्रधानता लघु मानव और वर्तमान के ठोस चित्र से है; नामवर के नए प्रतिमान यही सूत्र बाँधते हैं।

Or

दिव्यांग विमर्श आधुनिक काव्य का निर्धारित बिंदु है। अर्थ यह है कि शरीर की भिन्न क्षमता, पहुँच और अधिकार कविता में कैसे हैं। पुरानी कविता में अंधा, लंगड़ा, बाधिर प्रायः करुण या हास्य के उपकरण रहे। नया विमर्श उन्हें नागरिक और वाचक मानता है। सहानुभूति का दया-रूप स्वीकृत नहीं। स्त्री विमर्श वाचक-अधिकार पूछता है। दलित विमर्श जाति-गवाही पूछता है। तीन विमर्श तीन अलग प्रश्न हैं; एक अनुच्छेद में मिलाकर छोड़ देना अधूरा है। यह परत स्त्री और दलित जितनी विशाल नहीं; पाठ्यक्रम इसे आधुनिक संवेदना बनाता है।

समकालीन कविता पहचान की राजनीति रखती है। दया का चित्र आलंबन बना देता है; विमर्श वाचक माँगता है। साधारणीकरण यहाँ दया का नहीं, अधिकार-बोध का माँगता है। रस रद्द नहीं होता; आलंबन और वाचक बदलते हैं। नागार्जुन का जन-स्वर निकट का सामाजिक स्वर है, दिव्यांग विमर्श का पर्याय नहीं। बिना वाचक-प्रश्न के विमर्श केवल विषय-सूची रह जाता है।

निष्कर्ष यह है कि दिव्यांग विमर्श शरीर और अधिकार का प्रश्न है, दया का नहीं।

Q. 2 (8 marks) · Unit 2

घटोत्कच पर शक्ति खर्च होने का परिणाम लिखिए।

Or: कृपाचार्य का जाति-प्रश्न रश्मिरथी में क्यों महत्त्वपूर्ण है?

Model answer

प्रसंग रश्मिरथी के पंचम-षष्ठ सर्ग का युद्ध है। कृति दिनकर की है, 1952, नायक कर्ण। भीष्म और द्रोण के बाद सेनापति कर्ण होते हैं। कवच गया, शाप है, जन्म का सत्य मन में है। रात्रि-युद्ध में घटोत्कच कौरव-सेना तोड़ता है। कर्ण के पास इंद्र से जुड़ी शक्ति है। घटोत्कच पर वह खर्च हो जाती है। अर्जुन के लिए बचा अस्त्र कम पड़ जाता है। दान यहाँ मैदान की कीमत बनता है। रस वीर है; करुण परिणाम से चिपकता है। आलंबन कर्ण और भीमपुत्र हैं। यह हुंकार का गीत नहीं, युद्ध का अस्त्र-त्याग है।

परिणाम सप्तम सर्ग तक चला आता है। कवच गया, शाप है, शक्ति गई, पहिया धँसता है। विजय तात्कालिक है; अंतिम द्वंद्व कमजोर पड़ता है। दानवीरता विजय नहीं, वचन है। चतुर्थ सर्ग का कवच-दान और यह शक्ति-दान एक ही स्वभाव के दो रूप हैं। बिना षष्ठ सर्ग के पहिए का अंत अधूरा रह जाता है। हल्दीघाटी प्रताप का युद्ध है; यह कर्ण का अस्त्र-खर्च है।

निष्कर्ष यह है कि शक्ति-दान कर्ण के अंत की तैयारी है, केवल उदारता का दृश्य नहीं।

Or

रंगभूमि रश्मिरथी का प्रथम सर्ग है। प्रकाशन 1952, नायक कर्ण। यह प्रेमचंद का उपन्यास नहीं; कथा हस्तिनापुर की शस्त्र-सभा की है। अर्जुन का प्रदर्शन चलता है। कर्ण चुनौती देता है। कृपाचार्य कुल पूछते हैं। सूत कहकर शिक्षा और सम्मान दोनों रुकते हैं। कर्ण भुजदंड को जाति कहता है। दुर्योधन अंग का राज्य देकर मित्र बनता है। आलंबन कर्ण। रस वीर-करुण। उद्दीपन सभा, अर्जुन की प्रशंसा और जाति-प्रश्न हैं। शैली संवाद और ओज की है।

महत्त्व यह है कि जन्म का ताला यहीं दिखाई देता है। व्यवस्था प्रतिभा नहीं, वंश नापती है। परशुराम-आश्रम का छिपाव इसी अपमान की अगली कड़ी है। कृष्ण बाद में रहस्य खोलते हैं; पहला वार यहीं है। मैत्री का मूल यही क्षण है। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी वन-वापसी का गीत है; यह सर्ग वह गीत नहीं। हल्दीघाटी का दूसरा सर्ग प्रताप का युद्ध है; यह कर्ण की रंगभूमि है।

निष्कर्ष यह है कि कृपाचार्य का जाति-प्रश्न खंडकाव्य का सामाजिक कंकाल है; सर्ग प्रथम है, उपन्यास रंगभूमि नहीं।

Q. 3 (8 marks) · Unit 3

हरिऔध के विरह-चित्र की विशेषता लिखिए।

Or: हल्दीघाटी में चेतक की भूमिका लिखिए।

Model answer

हरिऔध का प्रिय प्रवास कृष्ण के मथुरा-प्रवास का खड़ी बोली महाकाव्य है, 1914 के आसपास। हरिऔध 1865–1947, अयोध्यासिंह उपाध्याय। निर्धारित अंश दिवस का अवसान, दुखिया के आँसू, एक बूँद हैं। रस विप्रलंभ और वात्सल्य। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली है। सूर ब्रज पद में विरह गाते हैं; यह ग्रंथ विस्तार देता है। आलंबन कृष्ण, यशोदा, गोपी हैं। साकेत राम-कथा है; यशोधरा बुद्ध-गृहत्याग है; यह कृष्ण-विरह है। द्विवेदी युग का भाषा-कार्य यहीं महाकाव्य तक सिद्ध होता है।

विशेषता तीन क्षण हैं — संध्या, अश्रु, बिंदु। दिवस का अवसान लोहित गगन का चित्र है। दुखिया के आँसू विरह का जल हैं। एक बूँद में पूरी नदी नहीं, एक आँसू में विरह सिमटता है। सीमा क्लिष्ट समास है। गुण यह है कि खड़ी बोली केवल निबंध नहीं रहती। भारतेंदु व्यंग्य गाते हैं; हरिऔध विरह गाते हैं। गुप्त कैकेयी और यशोधरा को वाचक बनाते हैं; हरिऔध गोपी-यशोदा को आलंबन बनाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि विरह-चित्र खड़ी बोली, कृष्ण-प्रवास और तीन क्षणों से पहचाना जाता है; ग्रंथ प्रिय प्रवास है, साकेत नहीं।

Or

श्यामनारायण पांडे के हल्दीघाटी का निर्धारित अंश दूसरा सर्ग है। पांडे 1907–1991। अन्य कृतियाँ जौहर और तुमुल हैं। नायक महाराणा प्रताप हैं। ऐतिहासिक लड़ाई 1576 के आसपास, मेवाड़, प्रताप बनाम मानसिंह। चेतक घोड़ा कथा का प्राण है। रस वीर; करुण घायल मेवाड़ और घोड़े पर है। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, शैली वर्णनात्मक। आलंबन प्रताप और मेवाड़-सेना हैं। उद्दीपन बाण, केसरिया, नगाड़ा, संकरी घाटी हैं।

रश्मिरथी कर्ण का खंड है — जन्म-कर्म, दान, मैत्री; यह प्रताप का खंड है — घाटी और स्वाधीनता। दोनों खंडकाव्य हैं, नायक और स्रोत अलग हैं। पेशोला झील की गूँज है, पेशवा नहीं; पांडे उसी मेवाड़ को मैदान पर गाते हैं। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी इस सर्ग का अंग नहीं। चेतक बिना सर्ग अधूरा है। सोहनलाल खादी गाते हैं; पांडे युद्ध गाते हैं। आलंबन प्रताप हैं, सह-आलंबन चेतक है। उद्दीपन नगाड़ा और केसरिया हैं। दूसरा सर्ग युद्ध का आरंभ है — प्रताप सुनते हैं, सेना सजती है।

निष्कर्ष यह है कि चेतक वीर रस का सह-आलंबन है, केवल पशु-वर्णन नहीं; सर्ग दूसरा है, रश्मिरथी नहीं।

Q. 4 (8 marks) · Unit 4

पल्लव और गुंजन के निर्धारित पाठों का अंतर लिखिए।

Or: सुभद्राकुमारी चौहान को छायावाद का स्तंभ क्यों नहीं माना जाता?

Model answer

पल्लव 1926 सुमित्रानंदन पंत का बड़ा छायावादी संग्रह है। पंत 1900–1977, कौसानी, प्रकृति के सुकुमार कवि। निर्धारित पाठ मौन निमंत्रण है। स्तब्ध ज्योत्स्ना में प्रकृति शब्द से नहीं, मौन से बुलाती है। आलंबन मौन संकेत है। रस शांत। गुंजन 1932। निर्धारित पाठ एक तारा और नौका विहार हैं। एक तारा सांध्य नभ का बिंदु है; नौका चाँदनी नदी की यात्रा है। ग्राम्या बाद की प्रगति-पुल है, निर्धारित नहीं। भाषा खड़ी बोली, गुण माधुर्य, शिल्प चित्रात्मकता।

अंतर संग्रह और आलंबन पर है। पल्लव मौन संकेत है। गुंजन बिंदु और प्रवाह है। तीनों प्रकृति के तीन छोर हैं — मौन, बिंदु, प्रवाह। प्रसाद इतिहास रखते हैं; निराला स्पर्श रखते हैं; पंत दृश्य रखते हैं। मौन निमंत्रण स्थल-ज्योत्स्ना है; नौका विहार जल-यात्रा है। सुभद्रा वात्सल्य गाती हैं, स्तंभ नहीं; पंत स्तंभ हैं। व्याख्या में पल्लव और गुंजन के नाम अलग रखे जाते हैं। ग्राम्या बाद की प्रगति-पुल है, ये तीन पाठ छायावादी चित्र के हैं।

निष्कर्ष यह है कि पल्लव का मौन और गुंजन का तारा-नौका पंत की निर्धारित प्रकृति के दो छोर हैं।

Or

सुभद्राकुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904, निहालपुर, इलाहाबाद। निधन 15 फरवरी 1948। संग्रह मुकुल। वे छायावाद के चार स्तंभों में नहीं। झाँसी की रानी उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता है; निर्धारित पाठ वह नहीं। निर्धारित चार पाठ हैं — जीवन फूल, कोयल, उल्लास, इसका रोना। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। रूप सरल गीत है। रहस्य पतला है; चित्र साफ है। स्वर राष्ट्रीय गीत के निकट वात्सल्य और हर्ष का है। प्रसाद मेवाड़ गाते हैं, महादेवी वेदना गाती हैं; सुभद्रा फूल, कोयल और शिशु गाती हैं।

जीवन फूल क्षणभंगुरता और अधूरी अभिलाषा है। कोयल वसंत की वाणी है। उल्लास मन के हर्ष का गीत है — महादेवी का उल्टा छोर। इसका रोना बच्चे का रोना है। कोई कहता है रोना नहीं सुहाता; वाचक कहती है इसी से अनुपम सुख छाता है। आलंबन शिशु हैं। रस वात्सल्य है। व्याख्या में चार शीर्षक, मुकुल-स्वर और झाँसी की रानी का अभाव लिखे जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि निर्धारित कविताएँ चार छोटे गीत हैं; पहचान मुकुल-स्वर और वात्सल्य से है, झाँसी की रानी से नहीं।

Q. 5 (8 marks) · Unit 5

प्रेत का बयान में व्यंग्य का लक्ष्य लिखिए।

Or: किरण धेनुएँ का प्रातः-बिंब स्पष्ट कीजिए।

Model answer

वैद्यनाथ मिश्र ‘नागार्जुन’ का जन्म 30 जून 1911, मिथिला। निधन 5 नवम्बर 1998। मैथिली में यात्री। प्रगतिशील लेखक संघ 1936 के बाद के जन-कवि हैं। दिनकर का राष्ट्रीय ओज उनका पर्याय नहीं। निर्धारित दो पाठ प्रेत का बयान और यह दंतुरित मुस्कान हैं। प्रेत का बयान व्यंग्य है। वाचक प्राथमिक पाठशाला का शिक्षक-प्रेत है। यम के सामने बयान चलता है। भूख आधिकारिक कारण नहीं बनने दी जाती; बीमारी का नाम कागज़ पर चढ़ता है। आलंबन वह शिक्षक-प्रेत है। रस हास्य-व्यंग्य और करुण। रूप गवाही है। यह दंतुरित मुस्कान वात्सल्य है। आलंबन शिशु की दाँत निकली मुस्कान है। धूल सना गात भी जीवन भर देता है। पंक्ति नहीं उतारी जाती।

दोनों एक कवि के दो सिरे हैं। पहला पेट और तंत्र पूछता है, दूसरा मुस्कान पूछती है। शीर्षक बदलकर एक नहीं कहे जाते। सुभद्रा का इसका रोना वात्सल्य-छोर है, स्वर नागार्जुन का अपना है। मिश्र गीत बेचते हैं; नागार्जुन प्रेत से बयान करवाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि प्रेत का बयान व्यंग्य है, दंतुरित मुस्कान वात्सल्य है; शीर्षक बदलकर एक नहीं कहे जाते।

Or

प्रसंग नरेश मेहता की किरण धेनुएँ है। मेहता 1922–2000, ज्ञानपीठ 1992। निर्धारित तीन पाठ माँ, वृक्षत्व, किरण धेनुएँ हैं। संशय की एक रात निर्धारित नहीं। प्रभात का ग्वाला किरणों को धेनुओं की तरह हाँकता है। आलोक दूध-सा फैलता है, अंधकार चर जाता है। आलंबन किरण और उषा हैं। रस शांत-अद्भुत। वैदिक गौ-बिंब आधुनिक प्रभात पर बैठता है। उद्दीपन प्रातः, आलोक, चरागाह-कल्पना हैं। भाषा खड़ी बोली, बिंब ग्रामीण-वैदिक।

माँ श्रम-वात्सल्य है, वृक्षत्व नैतिक होना है, यह पाठ प्रकाश है। प्रसाद की ऊषा जगाती है; मेहता की किरण धेनु बनती है। निराला की संध्या सुलाती है; यह प्रातः खोलता है। अज्ञेय बाजरे की कलगी से नया उपमान देते हैं; मेहता किरण को गौ बनाते हैं। व्याख्या में ज्ञानपीठ, ग्वाला-उषा और मिथक-ग्रंथ का अभाव लिखे जाते हैं। पंत तारे को बाहर देखते हैं; मेहता किरण को हाँकते हैं। अंधकार चर जाता है — यही बिंब का प्राण है।

निष्कर्ष यह है कि प्रातः-बिंब किरण-धेनु और ग्वाला-उषा से पहचाना जाता है; संशय की एक रात यहाँ नहीं खुलती।

Section C

Q. 1 (20 marks) · Unit 1

भारतेंदु युग से समकालीन कविता तक आलंबन कैसे बदला?

Model answer

आधुनिक हिन्दी कविता का आलंबन दरबारी नायिका-भेद से हटता है। भारतेंदु युग में आलंबन देश, दुर्दशा, पाखंड और निज भाषा हैं। कविता ब्रज है, विषय सार्वजनिक है। मंडल पत्र और नाटक से बँधा है। निर्धारित पाठ निज भाषा उन्नति अहै और चूरन अमल वेद का भारी हैं। शुक्ल आधुनिक काल को गद्य से खोलते हैं। रीतिकाल की नायिका यहाँ केंद्र नहीं रहती। रस करुण, हास्य-व्यंग्य, वीर-जागरण हैं। आलंबन देश और समाज हैं।

द्विवेदी युग आलंबन को इतिवृत्त, नीति और राष्ट्र बनाता है। काल लगभग 1900–1918, सरस्वती, महावीर प्रसाद द्विवेदी। गुप्त भारत-भारती और साकेत लिखते हैं; यशोधरा बुद्ध-गृहत्याग है। नारी माता-सती-जागृति की प्रतिमा है, फिर भी कैकेयी और यशोधरा वाचक हैं। हरिऔध प्रिय प्रवास में विरह का आलंबन रखते हैं। छायावाद आलंबन को आत्मा, प्रकृति और अनुपस्थित प्रिय बनाता है। चार स्तंभ प्रगीत देते हैं — प्रसाद लहर, निराला गीतिका-परिमल-अपरा, पंत पल्लव-गुंजन, महादेवी नीहार-नीरजा-यामा। सुभद्रा निर्धारित हैं, स्तंभ नहीं।

प्रगतिवाद आलंबन को खेत, ऋण, भूख और जन बनाता है। 1936 प्रगतिशील लेखक संघ, प्रेमचंद अध्यक्ष। नागार्जुन प्रतिनिधि हैं — प्रेत का बयान, दंतुरित मुस्कान। दिनकर का ओज इसका पर्याय नहीं। प्रयोगवाद व्यक्ति, क्षण और नगर बनाता है। तार सप्तक 1943, अज्ञेय केंद्र-नाम हैं, अकेले मालिक नहीं। नदी के द्वीप व्यक्ति-समाज का प्रतीक है; उपन्यास अलग कृति है। कलगी बाजरे की नया उपमान है। मुक्तिबोध सप्तक में सामाजिक फैंटेसी रखते हैं।

नई कविता लघु मानव और छोटी वस्तु रखती है — 1950 का दशक, बिंब, बोलचाल। नामवर के नए प्रतिमान यहीं हैं। समकालीन कविता 1970 के बाद सड़क, पहचान, स्त्री-दलित-दिव्यांग विमर्श और मरु रखती है। धूमिल की संसद से सड़क तक मोड़ की पहचान है। कागद थार की प्यास रखते हैं — बेकलू, रूँख, बरसो जल। मिश्र गीत फरोश में बाजार रखते हैं। साम्य खड़ी बोली की ओर बढ़ना है। वैषम्य आलंबन की जगह पर है। बिना युग-नाम और प्रतिनिधि के उत्तर अधूरा रह जाता है। नागार्जुन पेट रखते हैं; अज्ञेय द्वीप रखते हैं; मेहता आँगन रखते हैं। दिव्यांग विमर्श शरीर और अधिकार पूछता है, दया नहीं। प्रत्येक मोड़ पिछले आलंबन का निषेध और ग्रहण दोनों है। शुक्ल गद्य से आधुनिक काल खोलते हैं; नामवर बिंब से नई कविता बाँधते हैं। भारतेंदु देश रखते हैं; द्विवेदी राष्ट्र रखते हैं; छायावाद आत्मा रखते हैं। प्रगतिवाद जन रखता है; प्रयोग क्षण रखता है। सुभद्रा वात्सल्य रखती हैं, स्तंभ नहीं।

निष्कर्ष यह है कि आलंबन देश से आदर्श, आत्मा, वर्ग, क्षण, जटिल व्यक्ति और पहचान तक बदला; प्रत्येक मोड़ पिछले का निषेध और ग्रहण दोनों है।

Q. 2 (20 marks) · Unit 2

रश्मिरथी में कृष्ण, कुंती और दुर्योधन की भूमिका लिखिए।

Model answer

तीन पात्र कर्ण के तीन दर्पण हैं। दुर्योधन संकट का दाता है। कृष्ण रहस्य और प्रस्ताव के वाचक हैं। कुंती जन्म की माँग हैं। नायक कर्ण इन्हीं तीन के बीच वचन चुनता है। खंडकाव्य रश्मिरथी 1952, सात सर्ग, लोकभारती, दिनकर। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, रस वीर-करुण। हुंकार की कृष्ण की चेतावनी वन-वापसी का गीत है; वह रश्मिरथी का सर्ग नहीं। प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि यहाँ कथा नहीं; प्रथम सर्ग हस्तिनापुर की शस्त्र-रंगभूमि है। हल्दीघाटी प्रताप का खंड है; ये तीन पात्र कर्ण को घेरते हैं, प्रताप को नहीं।

दुर्योधन रंगभूमि पर अंग का राज्य देता है। कृपाचार्य जाति पूछते हैं; कर्ण भुजदंड को जाति कहता है। मैत्री अपमान में मिला सम्मान है। कर्ण जीवन भर चुकाता है। पांडव-दृष्टि में वह अधर्म का साथी भी है। कपट और सम्मान एक ही व्यक्ति में हैं। दिनकर कर्ण को ऊँचा करते हैं; दुर्योधन का कपट नरम पड़ सकता है — यही सीमा है। द्रौपदी-प्रसंग का मौन मैत्री को दाग भी देता है। बिना इस दाता के प्रण का अर्थ पतला पड़ जाता है।

कृष्ण तृतीय सर्ग में जन्म का सत्य खोलते हैं — ज्येष्ठ पांडव, राज्य, सम्मान। कर्ण इंकार करता है। तर्क कृतज्ञता का है। दो दृष्टि आमने-सामने हैं। कृष्ण धर्म, न्याय और युद्ध की दिशा देखते हैं। कर्ण कृतज्ञता और प्रण देखते हैं। सरल खाँचा — धर्म बनाम अधर्म — टूटता है। रस वीर; नैतिक द्वंद्व यहाँ सबसे घना है। दिनकर कृष्ण को कायर नहीं कहते; वे कर्ण की ऊँचाई के सामने कृष्ण की राजनीति को तराजू पर रखते हैं। अंतिम क्षण में कृष्ण अर्जुन को प्रहार कहते हैं।

कुंती चतुर्थ सर्ग में पुत्र माँगती है। माता जन्म बताती है — सूर्य और कुंती, कवच-कुंडल, नदी पर त्याग। कर्ण का विक्षोभ फूटता है — उपेक्षा, सूत का नाम, रंगभूमि का अपमान। फिर भी जननी पर नेह है। कर्ण अर्जुन छोड़ भाइयों की रक्षा का वचन देता है, पक्ष नहीं बदलता। मातृत्व और मित्रता एक तराजू पर हैं। रस करुण। आलंबन कर्ण और कुंती। यह यशोधरा का गृहत्याग नहीं, साकेत का कैकेयी-परिताप भी नहीं। बिना इन तीन के दान और पहिया अधूरे रह जाते। इंद्र कवच माँगते हैं; कर्ण ढाल उतार देता है, पक्ष नहीं। राधा-अधिरथ पालन के मौन आधार हैं। अर्जुन प्रतिद्वंद्वी हैं — रंगभूमि से सप्तम सर्ग तक। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, शैली संवाद। साधारणीकरण सभा के अपमान को सामान्य अन्याय बनाता है।

निष्कर्ष यह है कि दुर्योधन मैत्री देता है, कृष्ण प्रस्ताव, कुंती जन्म; कर्ण तीनों में वचन को राज्य से बड़ा ठहराता है।

Q. 3 (20 marks) · Unit 3

सोहनलाल द्विवेदी के निर्धारित गीतों में राष्ट्रीय स्वर लिखिए।

Model answer

सोहनलाल द्विवेदी महावीर प्रसाद द्विवेदी नहीं हैं। जन्म 1906, निधन 1988। वे गाँधी-युग के गीतकार हैं, सरस्वती के संपादक नहीं। संग्रहों में युगावतार गाँधी याद किया जाता है। निर्धारित तीन पाठ रे मन, खादी गीत, वंदना हैं। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली है। रूप सरल गीत है। ओज रश्मिरथी के संवाद का नहीं, जागरण का है। आलंबन मन, खादी और नमन हैं। भारतेंदु व्यंग्य रखते हैं; गुप्त आदर्श रखते हैं; यह गीत सार्वजनिक सरलता रखते हैं। नाम-साम्य से दोनों द्विवेदी एक नहीं।

रे मन श्रोता को जगाता है। आलंबन मन है। उद्दीपन सोई हुई चेतना, हिम्मत, अस्त से विहान हैं। रस वीर-जागरण के निकट है। शैली संबोधन की है। तुलसी मन को बावरा कहते हैं; सोहनलाल मन को राष्ट्र-कर्तव्य कहते हैं। यह कैकेयी का परिताप नहीं, यशोधरा का प्रश्न नहीं; यह स्वयं को संबोधन है। साकेत और यशोधरा गुप्त की कृतियाँ हैं; यह गीत वह कथा नहीं।

खादी गीत स्वदेशी का गीत है। खादी नंगों-भुखों की आस और आहत आह का चिह्न है। आलंबन खादी। उद्दीपन चरखा, गाँव, विदेशी वस्त्र हैं। राष्ट्र यहाँ वस्त्र और श्रम से पहचाना जाता है, केवल शस्त्र से नहीं। पांडे घाटी गाते हैं; सोहनलाल चरखे का गीत गाते हैं। मिश्र बाद में खादी को फेरी के माल में गिनते हैं — स्वर उलटा है। सोहनलाल खादी को स्वदेशी का चिह्न बनाते हैं, दुकान नहीं।

वंदना नमन का गीत है — राष्ट्र या महापुरुष के प्रति। तीनों पाठ एक स्वर के तीन रूप हैं — जागो, पहनो, नमो। साम्य सरल खड़ी बोली और सार्वजनिक जागरण। वैषम्य मन, वस्त्र, नमन पर है। भारतेंदु चूरन से जगाते हैं; गुप्त भारत-भारती से जगाते हैं; दिनकर कर्ण से जगाते हैं; सोहनलाल गीत से जगाते हैं। सीमा सरलता कभी उपदेश रह जाती है। गुण गाँधी-युग को हिन्दी गीत में स्थिर करना है। बिना तीन शीर्षकों और नाम-भेद के उत्तर अधूरा रह जाता है। पांडे हल्दीघाटी में युद्ध गाते हैं; यह गीत चरखा गाता है। मिश्र बाद में खादी को फेरी के माल में गिनते हैं; सोहनलाल उसे आस बनाते हैं। व्याख्या में रे मन, खादी गीत, वंदना और महावीर प्रसाद से अंतर लिखे जाते हैं। सरस्वती का भाषा-सुधार दूसरा व्यक्ति है; यह गाँधी-गीत है। हरिऔध विरह गाते हैं; सोहनलाल जागरण गाते हैं। यशोधरा प्रश्न करती है; रे मन स्वयं को जगाता है। प्रसाद मेवाड़ गाते हैं; सोहनलाल खादी गाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि राष्ट्रीय स्वर मन के जागरण, खादी और वंदना से पहचाना जाता है; कवि सोहनलाल द्विवेदी हैं, सरस्वती-संपादक नहीं।

Q. 4 (20 marks) · Unit 4

महादेवी की प्रगीत-कला का मूल्यांकन कीजिए।

Model answer

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 फर्रुखाबाद, निधन 11 सितंबर 1987 प्रयाग। आधुनिक मीरा कही जाती हैं। नीहार 1930, रश्मि 1932, नीरजा 1935 के आसपास, सांध्यगीत, यामा 1940। यामा पर मंगलाप्रसाद पुरस्कार याद किया जाता है। गद्य में श्रृंखला की कड़ियाँ। भाषा खड़ी बोली, रूप प्रगीत, रस करुण और शांत। प्रिय आराध्य है, देह-नायक नहीं। वेदना वाचक की है, केवल नायिका की नहीं। छायावाद के चार स्तंभों में वेदना उनका हिस्सा है। निर्धारित तीन गीत तीन संग्रहों से हैं — जो तुम आ जाते एक बार नीहार से, तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय नीरजा से, मैं नीर भरी दुख की बदली यामा से। लंबी पंक्ति नहीं उतारी जाती; भाव, प्रसंग और संग्रह-नाम लिखे जाते हैं।

जो तुम आ जाते एक बार नीहार का गीत है। शर्त एक आगमन की है। आलंबन अनुपस्थित प्रिय हैं। उद्दीपन प्रतीक्षा, रात्रि, अधूरी भेंट हैं। रस विप्रलंभ और करुण हैं। प्रसाद की उषा आकर जगाती है — बीती विभावरी जाग री; महादेवी का प्रिय आता नहीं। गुप्त की यशोधरा पति के जाने पर प्रश्न करती है; महादेवी आने की एक कल्पना से पूरा गीत भरती हैं। यशोधरा साकेत नहीं; यह गीत यशोधरा भी नहीं — आराध्य-प्रगीत है, बुद्ध-गृहत्याग नहीं। व्याख्या में संग्रह नीहार, एक बार का आगमन और वाचक-वेदना लिखे जाते हैं।

तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय नीरजा का गीत है। प्रिय बाहर का अतिथि नहीं; भीतर बसता है। परिचय की रीति टूटती है। आलंबन अंतर्वर्ती प्रिय हैं। रस शांत और भक्ति-शृंगार मिला है। रहस्य यहाँ अंधकार नहीं, अभेद है। पहला गीत दूरी माँगता है; यह गीत दूरी मिटाता है। दोनों एक कवयित्री के दो छोर हैं — प्रतीक्षा और तादात्म्य। शुक्ल रहस्य पर आपत्ति करते रहे; वाजपेयी और नामवर इसे प्रगीत की शक्ति मानते हैं। अभेद मीरा की भक्ति-पंक्ति का आधुनिक रूप है, देह-शृंगार नहीं।

मैं नीर भरी दुख की बदली यामा का गीत है। वाचक अपने को बादल कहती है — नीर दुख का है, बरसना स्वभाव है। आलंबन कवयित्री स्वयं हैं। उद्दीपन मेघ, जल, वेदना हैं। रस करुण है। पंत का एक तारा बाहर टिमटिमाता है; महादेवी का मेघ भीतर से बरसता है। प्रसाद की कमला रूप से लड़ती है; महादेवी वेदना से पहचान बनाती हैं। सुभद्रा उल्लास और इसका रोना गाती हैं — वात्सल्य का उल्टा छोर। साम्य तीन गीतों पर प्रगीत, खड़ी बोली, वाचक स्त्री। वैषम्य दूरी, अभेद और मेघ पर है। सीमा एक स्वर का ठहराव है। गुण स्त्री का वाचक-अधिकार है। स्त्री विमर्श महादेवी को केवल रहस्य-कवि नहीं रहने देता।

निष्कर्ष यह है कि तीन गीत नीहार, नीरजा, यामा से हैं। केंद्र एक आगमन, अंतर्वर्ती प्रिय और दुख की बदली है। वेदना वाचक की है; प्रिय देह-नायक नहीं।

Q. 5 (20 marks) · Unit 5

नागार्जुन के निर्धारित पाठ प्रगतिवाद को कैसे सिद्ध करते हैं?

Model answer

वैद्यनाथ मिश्र ‘नागार्जुन’ का जन्म 30 जून 1911 मिथिला-दरभंगा-मधुबनी क्षेत्र, निधन 5 नवम्बर 1998। हिन्दी नाम नागार्जुन, मैथिली नाम यात्री। प्रगतिशील लेखक संघ 1936 के बाद के जन-कवि हैं। विषय भूख, ऋण, नेता, गाँव, शासन की विडंबना। भाषा बोलचाल की खड़ी बोली, व्यंग्य तेज, रूप गवाही। दिनकर का राष्ट्रीय ओज प्रगतिवाद का पर्याय नहीं; नागार्जुन जन-यथार्थ के प्रतिनिधि हैं। निर्धारित पाठ प्रेत का बयान और यह दंतुरित मुस्कान हैं। पहला व्यंग्य है, दूसरा वात्सल्य। दोनों एक कवि के दो सिरे हैं; एक को दूसरे पर चढ़ाना अधूरा है। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पंक्ति नहीं उतारी जाती।

व्यंग्य प्रेत का बयान में बैठता है। वाचक प्राथमिक पाठशाला का शिक्षक-प्रेत है। यम के सामने बयान चलता है। वह भूख या अकाल को मृत्यु का आधिकारिक कारण नहीं बनने देता; पेचिश जैसी बीमारी का नाम लेता है। आशय यह है कि स्वाधीन देश में भूख छिपती है, कागज़ पर कारण बदल जाता है। आलंबन वह शिक्षक-प्रेत है। उद्दीपन दरिद्रता, तंत्र और मृत्यु हैं। रस हास्य-व्यंग्य और करुण मिला है। रूप गवाही है, शोक-गीत नहीं। दलित विमर्श का पर्याय यह पाठ नहीं, निकट का सामाजिक स्वर है — पेट और तंत्र पूछता है।

वात्सल्य यह दंतुरित मुस्कान में बैठता है। आलंबन छोटे बच्चे की दाँत निकली मुस्कान है। धूल सने गात कमल जैसे लगते हैं। मुस्कान मृतप्राय मन में भी जान डालती है। कवि माँ के माध्यम बिना बच्चे को पूरा नहीं पहचान पाता — वात्सल्य कुटुंब से बँधा है। रस वात्सल्य प्रधान है। सुभद्रा के इसका रोना जैसा वात्सल्य-छोर है, स्वर नागार्जुन का अपना है। मेहता की माँ श्रम है; नागार्जुन का शिशु मुस्कान है। प्रेत शासन और पेट पूछता है; मुस्कान जीवन का बचाव पूछती है। शीर्षक बदलकर एक कह देना अधूरा है।

साम्य बोलचाल की खड़ी बोली और जन-संवेदना। वैषम्य एक ओर तंत्र-भूख है, दूसरी ओर दाँत निकली हँसी। मिश्र गीत बेचते हैं; नागार्जुन प्रेत से बयान करवाते हैं। अज्ञेय द्वीप सोचते हैं; नागार्जुन पेट और गोद सोचते हैं। कागद थार की प्यास रखते हैं; नागार्जुन गाँव की भूख रखते हैं। सीमा सिद्धांत और नारे का बोझ कभी कहा गया। गुण करुण और हास्य का साथ है। प्रगतिवाद खेत, कारखाना, ऋण और भूख की ओर मुड़ा; ये दो पाठ उसी यथार्थ के दो चेहरे हैं। व्याख्या में यात्री, मिथिला, 1911–1998 और दो शीर्षकों का अंतर लिखे जाते हैं।

निष्कर्ष यह है कि नागार्जुन का व्यंग्य प्रेत की गवाही में है, वात्सल्य दंतुरित मुस्कान में है। दोनों निर्धारित पाठ एक कवि के दो स्वर हैं। दिनकर का ओज इनका पर्याय नहीं।

सेट 3

सेट 3 · नियमित विद्यार्थी · लिखित 120 अंक। प्रश्न सेट 1–2 से भिन्न हैं। खंड अ अनिवार्य। खंड ब आंतरिक विकल्प सहित पाँचों। खंड स में कोई तीन।

Section A

Q. 1. कविता के नए प्रतिमान किस आलोचक की पुस्तक है?

नई कविता के शिल्प-सूत्र; बिंब और लघु मानव।

Q. 2. रश्मिरथी की कथा-भूमि मुख्यतः किस ग्रंथ से आई है?

दृष्टि आधुनिक है — जन्म बनाम कर्म; स्रोत महाभारत।

Q. 3. दोनों ओर प्रेम पलता है किस कवि का मुक्तक है?

उभय-पक्ष प्रेम; कैकेयी साकेत से, यशोधरा अलग कृति है।

Q. 4. गीतिका का प्रकाशन वर्ष है —

निराला; शुभ्र-किरण-वसना गीतिका में। परिमल 1930।

Q. 5. पूछती है बेकलू किस कवि की कविता है?

खेत की चिड़िया; कुछ फ़ाइलों में बेक्यू; शीर्षक बेकलू।

Q. 6. कामायनी _____ की कृति है।

Answer: जयशंकर प्रसाद — 1936; निर्धारित पाठ लहर के हैं।

Q. 7. निराला का निधन _____ ई. में हुआ।

Answer: 1961 — 15 अक्टूबर 1961, प्रयाग; जन्म 1896।

Q. 8. हल्दीघाटी के नायक _____ हैं।

Answer: महाराणा प्रताप — पांडे; दूसरा सर्ग; चेतक सहयोगी।

Q. 9. दूसरा सप्तक _____ ई. में आया।

Answer: 1951 — तार सप्तक 1943; तीसरा 1959; नई कविता का पुल।

Q. 10. अज्ञेय का निधन-वर्ष _____ है।

Answer: 1987 — 4 अप्रैल 1987; जन्म 7 मार्च 1911।

Section B

Q. 1 (8 marks) · Unit 1

प्रगतिशील लेखक संघ का महत्त्व लिखिए।

Or: समकालीन कविता की दो पहचान लिखिए।

Model answer

प्रगतिवाद 1936 के आसपास संगठित स्वर है। उसी वर्ष लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। प्रेमचंद अध्यक्ष रहे। वैचारिक आधार मार्क्सवाद, वर्ग-संघर्ष और जन-यथार्थ है। कविता महल और रहस्य से खेत, कारखाना, ऋण और भूख की ओर मुड़ती है। प्रतिनिधि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, त्रिलोचन और रांगेय राघव हैं। रामविलास शर्मा आलोचना के स्तंभ हैं। पंत की ग्राम्या और युगांत छायावाद से प्रगति की ओर पुल हैं। निराला में सामाजिक ओज पहले से था; यह आंदोलन उसे सिद्धांत देता है। नागार्जुन आगे निर्धारित कवि हैं — प्रेत का बयान और यह दंतुरित मुस्कान उनके पाठ हैं।

प्रवृत्ति यथार्थ वर्णन, शोषण-विरोध, किसान-मजदूर का नायकत्व, व्यंग्य और सरल जन-भाषा है। रस में रौद्र, वीर, करुण और हास्य-व्यंग्य प्रधान हो जाते हैं। रामधारी सिंह दिनकर का राष्ट्रीय ओज प्रगतिवाद का पर्याय नहीं; वह वीर और जागरण का अलग स्वर है। प्रयोगवाद व्यक्ति और शिल्प से इस जन-स्वर का वैषम्य रखता है। सीमा यह है कि सिद्धांत कभी कविता पर सवार हो जाता है।

निष्कर्ष यह है कि प्रगतिवाद 1936, प्रगतिशील लेखक संघ, जन-यथार्थ और नागार्जुन-केदार-सुमन से पहचाना जाता है।

Or

समकालीन कविता 1970 के आसपास से उस समय को विषय बनाती है जो नई कविता के बाद आता है। नई कविता 1950 का दशक लघु मानव और बिंब पर बैठती है। समकालीन आपातकाल, सड़क का जन-स्वर, स्त्री-आंदोलन, दलित-आंदोलन, बाजार और हिंसा को दबाव बनाती है। पहली पहचान सड़क और गवाही है — धूमिल की संसद से सड़क तक। दूसरी पहचान विमर्श है — स्त्री, दलित, दिव्यांग। कागद राजस्थान के निर्धारित समकालीन कवि हैं — बेकलू, रूँख, बरसो जल। लीलाधर जगूड़ी, विनोद कुमार शुक्ल, राजेश जोशी आगे की पंक्ति हैं।

नई कविता जटिल व्यक्ति देखती है; समकालीन उसे भीड़ और राज्य के बीच रखती है। नई कविता में व्यंग्य सभ्य है; समकालीन में गवाही और नारा तेज हैं। मिश्र सादगी से नई कविता के सरल सिरे छूते हैं। कागद थार की प्यास से समकालीन समय छूते हैं। सीमा यह आक्षेप है कि विमर्श कविता पर सवार हो जाता है। गुण समय और पहचान को विषय बनाना है।

निष्कर्ष यह है कि दो पहचान सड़क-गवाही और पहचान-विमर्श हैं; नई कविता का लघु मानव इनका पर्याय नहीं।

Q. 2 (8 marks) · Unit 2

अर्जुन के सामने कर्ण का प्रण क्यों टिकता है?

Or: रश्मिरथी को आधुनिक पुनर्पाठ क्यों कहते हैं?

Model answer

कुंती-कर्ण संवाद रश्मिरथी के चतुर्थ सर्ग की भेंट है। कृति दिनकर की है, 1952, नायक कर्ण। युद्ध से पहले कुंती आती है। माता जन्म बताती है — सूर्य और कुंती, कवच-कुंडल, नदी पर त्याग। पक्ष बदलने को कहती है। कर्ण का विक्षोभ फूटता है — उपेक्षा का जीवन, सूत का नाम, रंगभूमि का अपमान। फिर भी जननी पर नेह है। वचन यह है कि अर्जुन को छोड़ शेष पांडवों की रक्षा होगी; दुर्योधन का साथ नहीं छूटेगा। तृतीय सर्ग में कृष्ण पहले जन्म-रहस्य खोल चुके हैं; कुंती वही सत्य माँ बनकर लौटाती है। कर्ण दोनों जगह मित्र-धर्म चुनता है।

कृष्ण राज्य देते हैं; कर्ण मैत्री नहीं तोड़ता। पहिए तक यही प्रण टिका रहता है। कुंती माँगती है पुत्र; कर्ण देता है वचन, पक्ष नहीं। मातृत्व और मित्रता एक तराजू पर हैं। रस करुण है; वीर प्रण साथ है। आलंबन कर्ण और कुंती हैं। यह यशोधरा का गृहत्याग नहीं। हुंकार की कृष्ण-चेतावनी यहाँ नहीं गूँजती। प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि यह भेंट नहीं।

निष्कर्ष यह है कि प्रण अर्जुन के सामने इसलिए टिकता है कि वचन जन्म-रहस्य से बड़ा है।

Or

पुनर्पाठ का अर्थ पुरानी कथा को नए प्रश्न से पढ़ना है। रश्मिरथी महाभारत से कर्ण चुनती है। प्रकाशन 1952, रूप खंडकाव्य, सात सर्ग, लोकभारती, नायक सूर्यपुत्र कर्ण। दिनकर राष्ट्रकवि हैं, प्रगतिवादी पर्याय नहीं। दृष्टि आधुनिक है — जाति, अपमान, प्रतिभा, मित्रता। दिनकर कर्ण-चरित्र का उद्धार नई मानवता कहते हैं। खंडकाव्य एक नायक पर सिमटता है; महाकाव्य अनेक नायकों पर फैलता है। कामायनी और साकेत महाकाव्य हैं; यह कर्ण का खंड है।

पौराणिक कथा समता का प्रश्न बनती है। रंगभूमि पर जाति पूछी जाती है। परशुराम-आश्रम में शिक्षा का ताला है। कृष्ण राज्य देते हैं; कर्ण वचन नहीं तोड़ता। यह हुंकार नहीं — कृष्ण की चेतावनी वन-वापसी का गीत है, रश्मिरथी का सर्ग नहीं। कुरुक्षेत्र विचार का ग्रंथ है; रश्मिरथी चरित्र का। प्रेमचंद का रंगभूमि उपन्यास यहाँ स्रोत नहीं। दान और मैत्री आधुनिक प्रश्न हैं, केवल कथा-दोहराव नहीं। पहिए तक कर्म नापा जाता है, वंश नहीं।

निष्कर्ष यह है कि पुनर्पाठ जन्म बनाम कर्म के प्रश्न से है, केवल कथा-दोहराव से नहीं।

Q. 3 (8 marks) · Unit 3

भारतेंदु मंडल सार्वजनिक लेखन क्यों कहलाता है?

Or: चूरन कविता में व्यंग्य का आलंबन लिखिए।

Model answer

भारतेंदु मंडल काशी-केंद्रित लेखकों का समूह है। स्वयं भारतेंदु सीमा-पुरुष हैं — 1850–1885, कविवचनसुधा, भारत दुर्दशा, निज भाषा। प्रतापनारायण मिश्र, प्रेमघन, जगमोहन सिंह, अंबिकादत्त व्यास, राधाचरण गोस्वामी नाम हैं। बालकृष्ण भट्ट गद्य-आलोचना से पास हैं। निर्धारित पाठ निज भाषा उन्नति अहै और चूरन अमल वेद का भारी हैं। नाटक अंधेर नगरी गद्य में वही सार्वजनिक व्यंग्य चलाती है। शुक्ल भारतेंदु को आधुनिक हिन्दी का केंद्र-पुरुष कहते हैं।

यह दरबारी रीति-मंडल नहीं। कर्म-क्षेत्र पत्र और नाटक हैं। विषय दुर्दशा, सुधार, स्वदेशी, स्त्री-दशा, पाखंड हैं। आलंबन देश और समाज हैं, रीति की नायिका नहीं। कविता ब्रज-प्रधान रही; गद्य खड़ी बोली का अभ्यास यहीं से चला। द्विवेदी युग उसी भाषा-कार्य को कविता तक ले जाता है। सार्वजनिक का अर्थ दरबार की जगह प्रेस और रंगमंच है। शुक्ल गद्य के आविर्भाव से आधुनिक काल खोलते हैं; मंडल उसका पहला लेखक-समूह है। निर्धारित पाठ निज भाषा और चूरन उसी सार्वजनिक स्वर के दो हाथ हैं।

निष्कर्ष यह है कि मंडल सार्वजनिक इसलिए है कि पत्र-नाटक और देश-स्वर उसका केंद्र हैं, नायिका-शास्त्र नहीं।

Or

प्रसंग भारतेंदु हरिश्चंद्र का दूसरा निर्धारित पाठ है। कवि काशी, 1850–1885। चूरन बाजार का चूर्ण है, अमल स्वाद या नशा, वेद शास्त्र का भार। अन्वय यह है — पाखंडी पुरोहित-वैद्य वेद को चूरन बनाकर बेचते हैं। आलंबन पाखंड है। उद्दीपन बाजार, जड़ी-बूटी और शास्त्र-नाम हैं। रस हास्य-व्यंग्य है; करुण समाज की ठगी से चिपकता है। रूप होली-मुकरी और सार्वजनिक गीत है, महाकाव्य नहीं। यह नास्तिकता नहीं; शास्त्र की दुकानदारी का खंडन है। निज भाषा उन्नति अहै ज्ञान माँगती है; यह पद अज्ञान बेचता दिखाता है।

भाव सुधार का है। रीतिकाल शृंगार बेचता था; भारतेंदु पाखंड दिखाते हैं। नाटक अंधेर नगरी गद्य में वही ठगी है। पत्र कविवचनसुधा सुधार का गद्य चलाते हैं; यह गीत उसी सुधार का काव्य है। आलंबन व्यक्ति नहीं, ठगी की रीति है। सहृदय हँसकर भी ठगी पहचानता है — यही साधारणीकरण है। व्याख्या में प्रसंग भारतेंदु युग, अन्वय चूरन-व्यापार, सौंदर्य व्यंग्य लिखे जाते हैं। गुप्त का आदर्श और हरिऔध का विरह यहाँ नहीं; व्यंग्य का हाथ यही पाठ है।

निष्कर्ष यह है कि व्याख्या का केंद्र वेद-चूरन, व्यंग्य और सामाजिक ठगी है।

Q. 4 (8 marks) · Unit 4

प्रलय की छाया में कमला का स्वाभिमान लिखिए।

Or: जुही की कली में प्रकृति कैसे नायिका बनती है?

Model answer

प्रसंग जयशंकर प्रसाद, लहर, प्रलय की छाया। प्रसाद काशी, 1889–1937। कामायनी निर्धारित अंश नहीं। वाचक कमला हैं — गुजरात की रूप-रानी। सुलतान के आक्रमण में देश जलता है। पति युद्ध में आगे बढ़ते हैं, कमला बंदी होती है। वह पद्मिनी की गाथा से अपनी तुलना करती है — स्वयं जलने से अधिक सुलतान को जलाना चाहती है। आलंबन कमला। उद्दीपन पराजय, रूप, लोभ। रस शृंगार, वीर, करुण। भाषा संस्कृत-गर्भित खड़ी बोली। रूप संवाद और आत्म-कथा है, छोटा प्रगीत नहीं।

स्वाभिमान रूप को पिंजरा नहीं बनने देता। रंगमहल सुवर्ण पिंजरा बनता है। रूप विजय भी है, अभिशाप भी। बीती विभावरी जागरण है; पेशोला पिछोला की मौन गूँज है, पेशवा नहीं; यहाँ नारी इतिहास के भीतर बोलती है। महादेवी वेदना से पहचान बनाती हैं; कमला रूप से लड़ती है। गुप्त की यशोधरा प्रश्न करती है; कमला कथा कहती है। स्त्री विमर्श का वाचक-प्रश्न यहीं टिक सकता है।

निष्कर्ष यह है कि कमला का स्वाभिमान पद्मिनी-स्पर्धा और रूप के अभिशाप से पहचाना जाता है; संग्रह लहर है।

Or

प्रसंग निराला, परिमल 1930, जुही की कली। निराला 1896–1961, मुक्त छंद, महाप्राण। निर्जन वन-वल्लरी पर कली सुहागिन-सुकुमारी की तरह सोती है। पहचान की पंक्ति है — विजन वन-वल्लरी पर / सोती थी सुहागिन सुकुमारी। मलय पवन नायक बनकर आता है। आलिंगन से कली जागती है, खिलती है। आलंबन जुही। उद्दीपन रात्रि, वन-वल्लरी, पवन। रस शृंगार। मुक्त छंद गति देता है। शुभ्र-किरण-वसना गीतिका का प्रश्न है; संध्या सुंदरी अपरा का अवसान है।

द्विवेदी युग फूल का नाम गिनता; निराला फूल को प्रेम का शरीर देते हैं। फूल केवल वनस्पति नहीं रह जाता। संध्या अवसान की स्त्री है; जुही रात्रि-मिलन है। प्रसाद की ऊषा जगाती है; यह कली स्पर्श से खिलती है। पंत मौन से बुलाते हैं; निराला स्पर्श देते हैं। तोड़ती पत्थर निर्धारित नहीं। व्याख्या में संग्रह परिमल, कली-नायिका और पवन-नायक लिखे जाते हैं। शुभ्र-किरण प्रश्न है; जुही दृश्य है। महादेवी मेघ बनती हैं, कली नहीं।

निष्कर्ष यह है कि प्रकृति नायिका इसलिए बनती है कि कली आलंबन नहीं, प्रेम का शरीर है; संग्रह परिमल है।

Q. 5 (8 marks) · Unit 5

हरा कर देगी और बरसो जल का संबंध लिखिए।

Or: माँ कविता में माँ का श्रम-चित्र लिखिए।

Model answer

दोनों ओम पुरोहित ‘कागद’ की निर्धारित कविताएँ हैं। कागद 1957–2016, केसरीसिंहपुर। निर्धारित पाँच पाठ पूछती है बेकलू, तपस्वी रूँख, क्यों भटकती है, हरा कर देगी, बरसो जल हैं। हरा कर देगी में मरुधरा प्यासी है, आकाश का जल पीती है, फिर भी अंकुर की आशा बाँधे रहती है। बरसो जल थार को धारदार जल की प्रार्थना है। आज्ञार्थ है — जल बरस; बरसों जल काल-गणना नहीं। आलंबन मरु और जल। रस करुण-शांत। बेकलू चिड़िया है, बेक्यू नहीं।

एक आशा का चित्र है, दूसरा प्रार्थना का स्वर। बेकलू प्रतीक्षा है, रूँख तप है, क्यों भटकती है प्यास है; ये दो पाठ हरियाली की माँग हैं। मिश्र कहते हैं बचा नहीं; कागद जल माँगते हैं। मेहता का वृक्षत्व सुगंध है; कागद की हरियाली मरु की माँग है। पंत प्रकृति को चित्र देते हैं; कागद जल से चित्र माँगते हैं। संबंध प्यास और अंकुर का है।

निष्कर्ष यह है कि संबंध प्यास और हरियाली का है — एक प्रतीक्षा, एक आह्वान; दोनों कागद के मरु-पाठ हैं।

Or

प्रसंग नरेश मेहता की माँ है। मेहता 1922–2000, ज्ञानपीठ 1992। निर्धारित तीन पाठ माँ, वृक्षत्व, किरण धेनुएँ हैं। संशय की एक रात निर्धारित नहीं। वाचक माँ को एक मुखाकृति में बंद नहीं करता। माँ उन स्त्रियों में है जो आँगन लीपती हैं, अल्पना रचती हैं, रसोई का श्रम करती हैं, चिंता की आँखों से पथ निहारती हैं। आलंबन कर्म है, केवल ममता का शब्द नहीं। रस वात्सल्य-करुण। भाषा खड़ी बोली, बिंब ग्रामीण।

यह महादेवी की आराध्य-वेदना नहीं। यह गुप्त की यशोधरा-प्रश्न भी नहीं; यशोधरा साकेत नहीं, और माँ वह पद नहीं। यह रोज के काम से बनी माँ है। सुभद्रा का इसका रोना शिशु-वात्सल्य है; मेहता का पाठ श्रम-वात्सल्य है। वृक्षत्व नैतिक होना है; किरण धेनुएँ प्रकाश हैं; माँ श्रम है। व्याख्या में आँगन, अल्पना, रसोई और ज्ञानपीठ लिखे जाते हैं। अज्ञेय व्यक्ति-द्वीप बाँधते हैं; मेहता आँगन-श्रम बाँधते हैं। नागार्जुन गोद रखते हैं; मेहता लीपती स्त्री रखते हैं।

निष्कर्ष यह है कि श्रम-चित्र आँगन, अल्पना और प्रतीक्षा से पहचाना जाता है; मिथक-ग्रंथ इसकी जगह नहीं लेते।

Section C

Q. 1 (20 marks) · Unit 1

प्रयोगवाद तार सप्तक तक सीमित नहीं — विवेचन कीजिए।

Model answer

तार सप्तक 1943 प्रयोगवाद का घोषित आरंभ है, पूरी सीमा नहीं। संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ हैं। सात कवि हैं — अज्ञेय, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा, गजानन माधव मुक्तिबोध। सात कवि एक विचार के नहीं। मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा सामाजिक छोर रखते हैं। अज्ञेय व्यक्ति, क्षण और शिल्प के छोर रखते हैं। प्रयोग का अर्थ छंद तोड़ना मात्र नहीं; नई अनुभूति के लिए नई भाषा, बिंब और मनोविज्ञान आजमाना है। निर्धारित पाठ नदी के द्वीप और कलगी बाजरे की हैं। उपन्यास नदी के द्वीप कविता नहीं। इत्यलम् और बावरा अहेरी स्मरण हैं, निर्धारित पाठ नहीं।

दूसरा सप्तक 1951 और तीसरा 1959 प्रयोग को नई कविता में खोलते हैं। नई कविता 1950 का दशक लघु मानव और बिंब पर बैठती है। अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण इसी चौड़े घेरे में हैं। नामवर के कविता के नए प्रतिमान शिल्प को यहीं बाँधते हैं। केंद्र न छायावाद का विराट रहस्य है, न प्रगति का केवल वर्ग-नायक, न प्रयोग का केवल दुर्बोध व्यक्ति। वर्तमान की जटिलता, शहर, संबंध और छोटी वस्तुएँ आलंबन बनती हैं।

भवानीप्रसाद मिश्र निर्धारित कवि हैं — गीत फरोश, कहीं नहीं बचे। वे सप्तक के दुर्बोध सिरे नहीं, सरल भाषा के सिरे हैं। फिर भी नई कविता के घेरे में गिने जाते हैं। नरेश मेहता माँ-वृक्ष-किरण रखते हैं; वे भी नई दृष्टि के निकट हैं, सप्तक के सात में नहीं। प्रयोग शिल्प-आंदोलन अधिक है; नई कविता संवेदना का आंदोलन अधिक है। आक्षेप दुरुहता का रहा; बचाव यह रहा कि बिना शिल्प-विवेक के यथार्थ भी नारा रह जाता है।

सीमा यह कहना कि प्रयोग केवल अज्ञेय हैं। सात कवि और दो बाद के सप्तक बिना प्रयोग अधूरा है। समकालीन कविता 1970 के बाद सड़क, विमर्श और मरु खोलती है — धूमिल, कागद; वह अगला घेरा है, पर प्रयोग की चिंगारी तार सप्तक से चलती है। प्रगतिवाद 1936 जन को नायक बनाता है; प्रयोग व्यक्ति को प्रयोगशाला बनाता है। दोनों छायावादोत्तर हैं, एक नहीं। बिना दूसरे-तीसरे सप्तक के तार सप्तक को पूरी सीमा कहना भूल है। नई कविता लघु मानव पर बैठती है; प्रयोग उसका द्वार है, पर्याय नहीं। नागार्जुन पेट रखते हैं; अज्ञेय द्वीप और कलगी रखते हैं। मुक्तिबोध दोनों छोर जोड़ते हैं। मिश्र सरल सिरा हैं; वे दुर्बोध प्रयोग नहीं। उपन्यास नदी के द्वीप कविता पर नहीं चढ़ता। नामवर बिंब से नई कविता बाँधते हैं।

निष्कर्ष यह है कि तार सप्तक पूरा घेरा नहीं, आरंभ है; प्रयोग दूसरे-तीसरे सप्तक और नई कविता तक फैलता है।

Q. 2 (20 marks) · Unit 2

रश्मिरथी आधुनिक पुनर्पाठ है — युक्ति सहित लिखिए।

Model answer

जन्म और कर्म का द्वंद्व रश्मिरथी का मूल सूत्र है। कृति दिनकर की है, 1952, खंडकाव्य, नायक कर्ण। जन्म सूर्य और कुंती का है; समाज सूत का नाम चिपकाता है। कवच-कुंडल जन्म के चिह्न हैं; पालन अधिरथ-राधा का कर्म है। कुंती-त्याग जन्म की घटना है; कर्ण का धनुष कर्म है। नाम रश्मिरथी वंश का प्रकाश और कर्म का रथ दोनों बाँधता है। कवि जन्म को काटते नहीं; उसे कर्म से तौलते हैं। यह हल्दीघाटी का स्वाधीनता-द्वंद्व नहीं। यहाँ प्रश्न जाति और प्रतिभा का है, घाटी और केसरिया का नहीं।

रंगभूमि पर द्वंद्व सार्वजनिक होता है। अर्जुन का कौशल स्वीकृत है क्योंकि कुल ज्ञात है। कर्ण का कौशल संदिग्ध है क्योंकि जाति अज्ञात है। कृपाचार्य जन्म पूछते हैं। कर्ण भुजदंड को जाति कहता है। दुर्योधन कर्म-सम्मान देता है — अंग का राज्य। मैत्री इसी तराजू से बँधती है। द्रोण सूत को शिष्य नहीं लेते — जन्म का द्वार बंद। परशुराम के आश्रम में कर्ण परिचय छिपाता है — यह असत्य कर्म, जन्म-व्यवस्था के सामने। शाप वही जन्म-दंड बनकर अंतिम युद्ध में विद्या छीनता है।

कृष्ण जन्म का रहस्य खोलते हैं — ज्येष्ठ पांडव, राज और सम्मान। कर्ण कर्म का पक्ष चुनता है — मित्र का वचन। कुंती जन्म लौटाती है; कर्ण कर्म नहीं तोड़ता, केवल अर्जुन छोड़ भाइयों की रक्षा का वचन देता है। दान जन्म की ढाल उतारता है। कवच-कुंडल जन्म-रक्षा थे; देना कर्म है। इंद्र याचक बनकर आते हैं; कर्ण जानकर भी देता है। घटोत्कच पर शक्ति चलाना भी कर्म है — दान का दूसरा रूप अस्त्र का खर्च। पहिए का धँसना नियति भी है, शाप का कर्म-फल भी। निःशस्त्र वध जन्म के सूर्यपुत्र को नहीं बचाता; आचरण की प्रभा बचाता है।

दिनकर मूल्यांकन वंश से नहीं, आचरण से चाहते हैं। कर्ण-चरित्र का उद्धार वे नई मानवता की स्थापना कहते हैं। सीमाएँ साथ हैं — परिचय छिपाना, द्रौपदी-प्रसंग का मौन। नायक देवता नहीं, मनुष्य है। रस वीर प्रधान है; करुण अपमान पर है। भाषा खड़ी बोली, गुण ओज, शैली संवाद। सात सर्ग इसी द्वंद्व को बाँधते हैं — रंगभूमि से पहिया तक। हुंकार की कृष्ण-चेतावनी इस द्वंद्व का सर्ग नहीं। गुप्त की कैकेयी लोभ का पश्चात्ताप है; कर्ण अपमान का स्वाभिमान है। दोनों खड़ी बोली हैं, प्रश्न अलग हैं। साधारणीकरण सभा के अपमान को सामान्य अन्याय बनाता है। बिना दान और मैत्री के कर्म-पक्ष अधूरा रह जाता है। भाषा खड़ी बोली का ओज इस द्वंद्व को सार्वजनिक बनाता है।

निष्कर्ष यह है कि जन्म अपमान और रहस्य देता है, कर्म दान-मैत्री-प्रण देता है। रश्मिरथी कर्म को जन्म से बड़ा ठहराती है। नायक कर्ण हैं, प्रताप नहीं।

Q. 3 (20 marks) · Unit 3

गुप्त के आदर्शवाद के गुण और सीमाएँ लिखिए।

Model answer

गुप्त द्विवेदी युग के प्रतिनिधि हैं — 1886–1964, चिरगाँव, राष्ट्रकवि। भारत-भारती 1912 जागरण है। साकेत 1931 राम-कथा है। यशोधरा 1932 बुद्ध-गृहत्याग है। निर्धारित पाठ कैकेयी परिताप, सखि वे मुझसे कहकर जाते, दोनों ओर प्रेम पलता है हैं। भाषा खड़ी बोली। प्रवृत्ति इतिवृत्त और नैतिक आदर्श। सरस्वती का अनुशासन वाक्य स्थिर करता है। छायावाद का रहस्य उनका मार्ग नहीं। हरिऔध प्रिय प्रवास देते हैं; गुप्त साकेत और यशोधरा देते हैं। सोहनलाल खादी-गीत के कवि हैं, सरस्वती-संपादक नहीं; नाम-साम्य से मिलाया नहीं जाता।

गुण यह है कि नारी केवल प्रतिमा नहीं रहती। कैकेयी ग्लानि बोलती है — दो वर, राम का वन, भरत का त्याग, पश्चात्ताप। यशोधरा पथ-बाधा का प्रश्न करती है — सखी-संबोधन, गृहत्याग, स्वाभिमान। उभय-पक्ष प्रेम दीप-पतंग से एकतरफा भक्ति नहीं रहने देता। आदर्श यहाँ चुप नहीं, वाचक है। द्विवेदी युग की माता-सती प्रतिमा से ये पाठ आगे हैं। स्त्री विमर्श का वाचक-प्रश्न यहीं टिक सकता है। यशोधरा साकेत नहीं; कथा बुद्ध-गृहत्याग की है।

दूसरा गुण खड़ी बोली महाकाव्य-मार्ग है। भारतेंदु कविता में ब्रज रखते हैं; गुप्त कविता में खड़ी बोली रखते हैं। राष्ट्रकवि का स्वर जागरण और मर्यादा दोनों रखता है। भारत-भारती अतीत-गौरव और वर्तमान-ग्लानि का घोष है। साकेत में उर्मिला-प्रसंग नई दृष्टि है; निर्धारित पाठ कैकेयी है। रस करुण और नैतिक है। आचार्य शुक्ल गद्य-अनुशासन को इसी युग से जोड़ते हैं; गुप्त उसी अनुशासन की काव्य-परीक्षा हैं।

सीमा उपदेश और घटना-क्रम का बोझ है। लाक्षणिकता छायावाद जितनी नहीं। आदर्श कभी अनुभव दबा देता है। यशोधरा को साकेत कहना पाठक की भूल है; गुप्त की सीमा कृति-नाम मिला देना नहीं, आदर्श का एक स्वर है। हरिऔध विरह में अधिक भीगते हैं; पांडे ओज में अधिक चमकते हैं; महादेवी वेदना गाती हैं; गुप्त मर्यादा गाते हैं। सीमा क्लिष्टता हरिऔध पर अधिक है; गुप्त पर उपदेश का आक्षेप अधिक है। फिर भी बिना गुप्त के द्विवेदी युग का नारी-कंठ अधूरा रह जाता है। निर्धारित तीन पाठ इन्हीं गुण-दोष से पढ़े जाते हैं। भारतेंदु व्यंग्य रखते हैं; गुप्त प्रश्न रखते हैं। सोहनलाल गीत गाते हैं; गुप्त महाकाव्य-खंड गाते हैं। कैकेयी परिताप पश्चात्ताप है; यशोधरा स्वाभिमान है; मुक्तक उभय-पक्ष है। शुक्ल गद्य-अनुशासन को इसी युग से जोड़ते हैं। राष्ट्रकवि का स्वर जागरण और ग्लानि दोनों रखता है। साकेत राम-कथा है; यशोधरा बुद्ध-गृहत्याग है; दोनों मिलाए नहीं जाते। प्रिय प्रवास विरह है; ये तीन निर्धारित पाठ आदर्श हैं।

निष्कर्ष यह है कि गुण वाचक नारी और खड़ी बोली आदर्श हैं, सीमा उपदेश का बोझ है; निर्धारित तीन पाठ इन्हीं गुण-दोष से पढ़े जाते हैं।

Q. 4 (20 marks) · Unit 4

सुभद्रा के वात्सल्य और महादेवी की वेदना का वैषम्य लिखिए।

Model answer

दोनों खड़ी बोली की कवयित्री हैं। महादेवी छायावाद के चार स्तंभों में हैं। सुभद्रा निर्धारित हैं, स्तंभ नहीं। महादेवी 1907–1987, फर्रुखाबाद-प्रयाग, नीहार-नीरजा-यामा। सुभद्रा 1904–1948, निहालपुर, संग्रह मुकुल। झाँसी की रानी प्रसिद्ध है, निर्धारित नहीं। निर्धारित सुभद्रा-पाठ जीवन फूल, कोयल, उल्लास, इसका रोना हैं। महादेवी के निर्धारित गीत जो तुम आ जाते एक बार, तुम मुझमें प्रिय फिर क्या परिचय, मैं नीर भरी दुख की बदली हैं। भाषा महादेवी की प्रगीत-खड़ी बोली है, सुभद्रा की बोलचाल की खड़ी बोली है।

महादेवी का प्रिय आराध्य है, आता नहीं। जो तुम आ जाते एक बार नीहार का आगमन की कल्पना है। आलंबन अनुपस्थित प्रिय। रस विप्रलंभ-करुण। तुम मुझमें प्रिय नीरजा का अभेद है; परिचय की रीति टूटती है। दुख की बदली यामा का मेघ-स्वभाव है — नीर दुख का है, बरसना स्वभाव है। रस करुण-शांत। वेदना वाचक की अपनी है, केवल नायिका की नहीं। प्रसाद की ऊषा आकर जगाती है; महादेवी का प्रिय आता नहीं। आधुनिक मीरा का अर्थ आराध्य-प्रगीत है, देह-नायक नहीं।

सुभद्रा का इसका रोना बच्चे का रोना है। कोई कहता है रोना नहीं सुहाता; वाचक कहती है इसी से अनुपम सुख छाता है। आलंबन शिशु। रस वात्सल्य। जीवन फूल क्षणभंगुरता है, कोयल वसंत है, उल्लास हर्ष है — महादेवी का उल्टा छोर। भाषा बोलचाल की है, रहस्य पतला है, चित्र साफ है। स्वर राष्ट्रीय गीत के निकट वात्सल्य और हर्ष का है। प्रसाद मेवाड़ गाते हैं; सुभद्रा फूल, कोयल और शिशु गाती हैं। नागार्जुन की दंतुरित मुस्कान भी वात्सल्य है, स्वर अपना है।

वैषम्य आलंबन पर है। एक अनुपस्थित प्रिय, दूसरी गोद का शिशु। एक प्रगीत-रहस्य, दूसरी सरल गीत। एक स्तंभ हैं, दूसरी मुकुल-गीत की वाचक हैं। प्रसाद की कमला इतिहास से बोलती है; निराला की कली आकृति है; ये दो स्त्री-स्वर वेदना और वात्सल्य बाँटते हैं। साम्य खड़ी बोली और वाचक-स्त्री पर है। शुक्ल महादेवी के रहस्य पर आपत्ति करते हैं; सुभद्रा पर वह आक्षेप नहीं लगता। सीमा महादेवी में एक स्वर का ठहराव, सुभद्रा में सरलता का बोझ है। गुण दोनों में स्त्री का कंठ है। झाँसी की रानी को निर्धारित कहना अधूरा है; चार स्तंभों में सुभद्रा लिखना भूल है। नागार्जुन की दंतुरित मुस्कान वात्सल्य है, स्वर अपना है। मेहता की माँ श्रम है; सुभद्रा का रोना शिशु है। प्रसाद की ऊषा जगाती है; महादेवी का प्रिय आता नहीं। उल्लास हर्ष है; बदली दुख है।

निष्कर्ष यह है कि वैषम्य महादेवी की वेदना और सुभद्रा के वात्सल्य पर है; एक स्तंभ हैं, दूसरी मुकुल-गीत की वाचक हैं।

Q. 5 (20 marks) · Unit 5

गीत फरोश और प्रेत का बयान में आधुनिक विडंबना लिखिए।

Model answer

दो निर्धारित कविताएँ दो कवियों की हैं। गीत फरोश भवानीप्रसाद मिश्र की है — जन्म 29 मार्च 1913 होशंगाबाद-नर्मदापुरम क्षेत्र, निधन 20 फ़रवरी 1985, गाँधी-सरल भाषा, नई कविता का सरल सिरा। प्रेत का बयान नागार्जुन की है — वैद्यनाथ मिश्र, 1911–1998, मैथिली में यात्री, प्रगतिवाद। दोनों खड़ी बोली में आधुनिक लोभ और तंत्र को छूते हैं। दिनकर का ओज इनका पर्याय नहीं। भाव और प्रसंग लिखे जाते हैं, पंक्ति नहीं उतारी जाती। कहीं नहीं बचे मिश्र का दूसरा निर्धारित पाठ है; दंतुरित मुस्कान नागार्जुन का दूसरा सिरा है।

गीत फरोश में वाचक गीत बेचने वाला है। फेरी पर सुबह, ग़ज़ल, पहाड़ी, दवा, प्रेम; छंद और बे-छंद; रेशमी और खादी। कलम और कंधा दोनों लगते हैं। मजबूरी में गीत बिकते हैं — पाप जैसा लगता है, फिर भी पेट माँगता है। आलंबन कवि-फेरीवाला। रस व्यंग्य-करुण। विडंबना बाजार की है। छायावाद का प्रगीत बिकने नहीं आता था; यहाँ गीत दुकान बन जाता है। सोहनलाल खादी को स्वदेशी का गीत बनाते हैं; मिश्र खादी को फेरी के माल में गिनते हैं — स्वर उलटा है।

प्रेत का बयान में शिक्षक-प्रेत यम के सामने बोलता है। भूख छिपती है, बीमारी का नाम आधिकारिक कारण बनता है। आशय यह है कि स्वाधीन देश में भूख छिपती है, कागज़ पर कारण बदल जाता है। आलंबन प्रेत-शिक्षक। उद्दीपन दरिद्रता, तंत्र, मृत्यु। रस व्यंग्य-करुण। रूप गवाही है, शोक-गीत नहीं। विडंबना स्वाधीन देश के कागज़ की है। दलित विमर्श का पर्याय यह पाठ नहीं, निकट का सामाजिक स्वर है — पेट और तंत्र पूछता है।

साम्य व्यंग्य और जन-संवेदना। वैषम्य एक ओर कविता की बिक्री है, दूसरी ओर पेट की गवाही। अज्ञेय द्वीप सोचते हैं; कागद थार पूछते हैं; ये दो पाठ शहर के बाजार और तंत्र के प्रेत हैं। दंतुरित मुस्कान नागार्जुन का वात्सल्य-सिरा है; कहीं नहीं बचे मिश्र का पर्यावरण-सिरा है। प्रगतिवाद खेत और भूख की ओर मुड़ा; नई कविता बाजार और सरल कथन भी रखती है। सीमा मिश्र में सरलता का कथन-भर हो जाना, नागार्जुन में नारे का बोझ है। गुण सादगी और गवाही से समय को छूना है। बिना दो शीर्षकों और दो कवियों के विडंबना अधूरी रह जाती है। सोहनलाल खादी को आस बनाते हैं; मिश्र उसे माल बनाते हैं। दिनकर ओज गाते हैं; ये दो व्यंग्य गाते हैं। पंत प्रकृति बुलाते हैं; मिश्र कहते हैं बची नहीं। यम के सामने बयान प्रगति का पेट-प्रश्न है।

निष्कर्ष यह है कि आधुनिक विडंबना गीत फरोश में बाजार है, प्रेत का बयान में छिपी भूख है; दोनों निर्धारित व्यंग्य-पाठ हैं।