इकाई 1 · आधुनिक कविता की धाराएँ, काव्यशास्त्र और विमर्श
आधुनिक काव्य रीतिकाल के बाद की हिन्दी कविता है। तीन विषय हैं। पहला — युग-धाराएँ: भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, नई कविता, समकालीन कविता। कालक्रम में प्रगतिवाद 1936 है, प्रयोगवाद तार सप्तक 1943 से पहचाना जाता है। दूसरा — काव्यरूप, बिंब, प्रतीक, रस का स्वरूप, निष्पत्ति और साधारणीकरण। तीसरा — स्त्री, दलित और दिव्यांग विमर्श। आचार्य रामचंद्र शुक्ल आधुनिक काल को गद्य के आविर्भाव से जोड़ते हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र सीमा-पुरुष हैं। कविता कुछ काल ब्रज में चली; द्विवेदी युग ने उसे खड़ी बोली पर बैठाया।
आधार डॉ. नगेन्द्र का हिन्दी साहित्य का इतिहास; रामस्वरूप चतुर्वेदी का हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास; डॉ. बच्चन सिंह का हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास; द्वारकाप्रसाद सक्सेना के हिन्दी के प्रतिनिधि आधुनिक कवि; मोहन अवस्थी का आधुनिक हिन्दी काव्यशिल्प; नामवर सिंह की कविता के नए प्रतिमान, आधुनिक काव्य की प्रवृत्तियाँ और छायावाद; हरदयाल की आधुनिक हिन्दी कविता; वेदप्रकाश अमिताभ की हिन्दी कविता आधुनिक और समकालीन; बलदेवप्रसाद उपाध्याय का भारतीय काव्यशास्त्र। यहाँ धारा, शिल्प और दृष्टि का ढाँचा है।
1 आधुनिक हिन्दी कविता — आशय
आधुनिक हिन्दी कविता रीतिकाल के दरबारी शृंगार के बाद की काव्य-धारा है। उसके साथ प्रेस, नवजागरण और राष्ट्र-चेतना आते हैं। शुक्ल आधुनिक काल का आरंभ गद्य से मानते हैं। गद्य पहले खड़ी बोली में स्थिर हुआ। कविता भारतेंदु तक ब्रज-प्रधान रही। द्विवेदी युग ने कविता को भी खड़ी बोली दी। विषय बदल गए — देश की दुर्दशा, आदर्श, आत्मा, वर्ग, व्यक्ति का क्षण, फिर सड़क और पहचान। रूप भी बदले — गीत, प्रगीत, महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्त छंद, गद्य-कविता। नगेन्द्र इतिहास का ढाँचा देते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी संवेदना के विकास से पढ़ते हैं। बच्चन सिंह शुक्ल-केंद्र की समीक्षा करते हैं। नामवर सिंह छायावाद और नई कविता के प्रतिमान बाँधते हैं।
सात धाराएँ एक सीधी रेखा हैं, पर प्रत्येक अगली पिछली का निषेध और ग्रहण दोनों है। भारतेंदु सार्वजनिक नवजागरण देते हैं। द्विवेदी खड़ी बोली और इतिवृत्त देते हैं। छायावाद कल्पना, प्रगीत और प्रतीक देते हैं। प्रगतिवाद जन-यथार्थ देता है। प्रयोगवाद व्यक्ति और शिल्प देता है। नई कविता लघु मानव और बिंब देती है। समकालीन कविता सड़क और विमर्श देती है। साम्य खड़ी बोली की ओर बढ़ना और आधुनिक मनुष्य का विषय है। वैषम्य आलंबन पर है — देश, आदर्श, आत्मा, वर्ग, क्षण, जटिल व्यक्ति, पहचान।
नगेन्द्र कालक्रम और प्रतिनिधि से इतिहास बाँधते हैं। चतुर्वेदी संवेदना का रूप देखते हैं — विषय के साथ अनुभव का रंग भी बदलता है। बच्चन सिंह शुक्ल के गद्य-केंद्र को काटते हैं, ताकि कविता स्वतंत्र अध्याय रहे। नामवर आंदोलन और प्रतिमान पूछते हैं। सक्सेना कवि-परिचय देते हैं। अवस्थी शिल्प देखते हैं। गलत वाक्य: आधुनिक कविता केवल छायावाद है। सही वाक्य: आधुनिक कविता भारतेंदु से समकालीन तक सात धाराओं वाली खड़ी बोली परंपरा है; छायावाद उसका एक शिखर है, पूरा नाम नहीं।
| धारा | काल (लगभग) | पहचान |
|---|---|---|
| भारतेंदु युग | 1850–1900 | नवजागरण; गद्य खड़ी बोली, कविता ब्रज |
| द्विवेदी युग | 1900–1918 | सरस्वती; खड़ी बोली कविता; इतिवृत्त |
| छायावाद | 1918–1936 | प्रसाद-निराला-पंत-महादेवी; प्रगीत |
| प्रगतिवाद | 1936 | प्रगतिशील लेखक संघ; जन-यथार्थ |
| प्रयोगवाद | 1943 | तार सप्तक; व्यक्ति-शिल्प |
| नई कविता | 1950 के बाद | लघु मानव; बिंब |
| समकालीन | 1970 के बाद | सड़क, पहचान, विमर्श |
