इकाई 1 · सगुण भक्ति, रामभक्ति और कृष्णभक्ति
इस इकाई के तीन अंग हैं। पहला अंग सगुण भक्ति काव्य है — पृष्ठभूमि, प्रतिष्ठापक आचार्य, सगुण-निर्गुण का साम्य-वैषम्य, और सगुण का वैशिष्ट्य। दूसरा अंग रामभक्ति काव्य है — पृष्ठभूमि, कवि और प्रमुख रचनाएँ, प्रवृत्तियाँ, रामचरितमानस का महत्त्व। तीसरा अंग कृष्णभक्ति काव्य है — पृष्ठभूमि, कवि और प्रमुख रचनाएँ, पुष्टिमार्ग, अष्टछाप, काव्य-प्रवृत्तियाँ। निर्गुण निराकार नाम पर टिकता है। सगुण विग्रह, लीला और कथा पर। राम मर्यादा देते हैं, कृष्ण माधुर्य।
आधार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास; डॉ. नगेन्द्र का हिन्दी साहित्य का इतिहास; विश्वनाथ त्रिपाठी का लोकवादी तुलसीदास; उदयभानु सिंह की तुलसी काव्य मीमांसा; ब्रजेश्वर वर्मा का सूरदास; डॉ. मनमोहन गौतम की सूर की काव्यकला। यहाँ धारा, आचार्य, मानस और पुष्टि-अष्टछाप का परिचय है।
1 सगुण भक्ति — आशय और वैशिष्ट्य
सगुण भक्ति उस साधना का नाम है जिसमें ईश्वर गुणों और रूप वाला माना जाता है। आराध्य राम हैं, कृष्ण हैं, कभी सीता और राधा के साथ। भक्त नाम जपता है, कथा सुनता है, सेवा करता है और पद गाता है। लीला इतिहास की नकल नहीं, प्रेम का दृश्य है। उसमें जन्म, वन, युद्ध, रास और वात्सल्य आते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल भक्तिकाल को निर्गुण और सगुण में बाँटते हैं। निर्गुण निराकार राम पर टिकता है। सगुण साकार संबंध पर। दोनों भक्ति हैं, दो युग नहीं।
शुक्ल सगुण को दो शाखाओं में रखते हैं। राम-शाखा मर्यादा, लोकसंग्रह और राम-राज्य की है। कृष्ण-शाखा माधुर्य, वात्सल्य और लीला की है। वैशिष्ट्य चार बिंदुओं पर खुलता है। पहला साकार विग्रह — मूर्ति सहारा हो सकती है, मूल अर्थ रूप और गुण वाला ईश्वर है। दूसरा लीला-कथा — पुराण-स्मृति की कथा लोकभाषा में घर करती है। तीसरा आचार्य-संप्रदाय — रामानुज-रामानंद राम की ओर, वल्लभ कृष्ण की ओर। चौथा देशी भाषा — अवधी मानस की, ब्रज सूर की। गलत वाक्य: सगुण केवल मंदिर की मूर्ति है। सही वाक्य: सगुण साकार संबंध है — मर्यादा का राम, वात्सल्य का कृष्ण।
डॉ. नगेन्द्र सगुण को भक्तिकाल का लोक-प्रसार मानते हैं — कथा और गान जनता तक जाते हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी तुलसी को लोकवादी कहते हैं, क्योंकि राम केवल दरबार का देव नहीं रह जाते। उदयभानु सिंह मानस को काव्य-मीमांसा से पढ़ते हैं — छंद, रस और मर्यादा एक साथ। ब्रजेश्वर वर्मा और मनमोहन गौतम सूर को वात्सल्य और काव्यकला से खोलते हैं। सगुण का आशय इन्हीं सूत्रों से पूरा होता है: साकार ईश्वर, दो शाखाएँ, आचार्य की भूमि, लोकभाषा का गान।
मीरा कृष्ण-भक्ति में हैं; उनकी वाणी गिरधर-एकनिष्ठा गाती है, अष्टछाप की सेवा नहीं। रसखान भी कृष्ण-भक्त हैं, पंथ-छाप के बाहर। तुलसी रामभक्ति के शिखर हैं। सूर पुष्टि और अष्टछाप के शिखर हैं। चारों सगुण हैं। अंतर आराध्य और स्वर का है, भक्ति-युग का नहीं।
