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प्राचीन काव्य (आदिकाल एवं निर्गुण भक्तिकाव्य)

इकाई 1 · भारतीय साहित्य परंपरा और हिन्दी साहित्येतिहास

इस इकाई के दो खंड हैं। पहला खंड भारतीय साहित्य परंपरा है — वैदिक साहित्य, प्राकृत, पालि, लौकिक संस्कृत, अपभ्रंश और तमिल का संक्षिप्त परिचय। दूसरा खंड साहित्येतिहास है — साहित्य का इतिहास-दर्शन, हिन्दी साहित्येतिहास की लेखन-परंपरा, और उस लेखन की समस्याएँ। हिन्दी को अकेला विषय न मानकर वैदिक से तमिल तक की धारा में बैठाना है, फिर देखना है कि हिन्दी का इतिहास किन ग्रंथों से लिखा गया।

आधार डॉ. नगेन्द्र का भारतीय साहित्य का समेकित इतिहास; मूलचंद गौतम, श्रीभगवान सिंह और रामचभिल त्रिपाठी के भारतीय-साहित्य ग्रंथ; आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास; आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की हिन्दी साहित्य की भूमिका; डॉ. बच्चन सिंह का हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास; डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी का हिन्दी साहित्य एवं संवेदना का विकास।

सार: प्रत्येक शाखा पर भाषा, प्रमुख ग्रंथ और हिन्दी से संबंध। इतिहास-भाग में शुक्ल की प्रवृत्ति-विधि और द्विवेदी की चौड़ाई।

1 भारतीय साहित्य परंपरा — आशय

भारतीय साहित्य परंपरा का अर्थ किसी एक भाषा का इतिहास नहीं। वह उस पूरे रचना-संसार का नाम है जो वेद, श्रमण-वाङ्मय, लौकिक संस्कृत, प्राकृत-अपभ्रंश और द्रविड़ साहित्य में फैला है। भाषाएँ अलग हैं। लिपियाँ अलग हैं। राज्याश्रय अलग रहे। फिर भी कथा-सूत्र बार-बार मिलते हैं — राम, कृष्ण, पंचतंत्र-जातक, विरह-दूत, नीति और भक्ति। रस-विधान संस्कृत नाट्यशास्त्र से देशी काव्य तक चलता है। अहिंसा और करुणा श्रमण धारा से संत-काव्य तक पूछी जाती हैं। आचार्य नगेन्द्र इसी को समेकित भारतीय साहित्य कहते हैं। विस्तार कई नदियों का है; समुद्र एक है। श्रीभगवान सिंह इसे साहित्य की भारतीय परंपरा कहते हैं — एक परंपरा, कई वाणियाँ।

एकात्मता का अर्थ एकरूपता नहीं। तमिल संगम की तिणै और ऋग्वेद का सूक्त एक छंद में नहीं बँधे। जैन आगम और कालिदास एक रस में नहीं बैठते। एकात्मता कथा, मूल्य और काव्य-रीति के आदान-प्रदान में है। विविधता भाषा, प्रदेश और संप्रदाय में है। गलत वाक्य यह है कि भारतीय साहित्य केवल संस्कृत है। सही वाक्य यह है कि संस्कृत सांस्कृतिक केंद्र रही, पर पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और तमिल स्वतंत्र साहित्य हैं, टिप्पणी नहीं।

हिन्दी इसी महादेश की एक उत्तर-भारतीय धारा है। सांस्कृतिक जड़ वैदिक और लौकिक संस्कृत में है — विषय, मिथक, रस-शास्त्र। भाषा की निकटतम जड़ प्राकृत-अपभ्रंश में है — दोहा, चौपाई, लोक-शब्द। दक्षिण का तमिल संगम यह सिद्ध करता है कि भारतीय साहित्य केवल गंगा-यमुना का मैदान नहीं। नगेन्द्र हिन्दी को अकेले न पढ़ने का आग्रह करते हैं; मूलचंद गौतम भारतीय साहित्य को कई केंद्रों वाला बताते हैं। हिन्दी से पहले भारत का वाङ्मय यहीं बैठता है।

परिचय संक्षिप्त है, पूरे वेद या पूरे संगम का पाठ नहीं। प्रत्येक शाखा पर भाषा, दो-तीन ग्रंथ, एक शैली-लक्षण, और हिन्दी से संबंध पर्याप्त हैं।

शाखाभाषाहिन्दी से मुख्य संबंध
वैदिकवैदिक संस्कृतचिंतन और श्रुति-स्मृति का अंतर
प्राकृतमहाराष्ट्री, शौरसेनी, मागधी, अर्धमागधीलोक-भाषा का पुल
पालिथेरवाद की साहित्यिक पालिश्रमण संवेदना; भाषा-वंश समांतर
लौकिक संस्कृतलौकिक संस्कृतराम-कृष्ण कथा, रस-शास्त्र, महाकाव्य-नाटक
अपभ्रंशअपभ्रंशपुरानी हिन्दी का निकटतम रूप; दोहा-चौपाई
तमिलसंगम तमिलस्वतंत्र द्रविड़ केंद्र; भक्ति की अखिल भारतीय कड़ी