Noteclass 9 10

निपात

Lesson 31 of 71

अंग 2 · शब्द विचार

पाठ 2.20

विषय शुरू · निपात

अव्यय वाले विषय में अटल घर खुला — धीरे, के सामने, और, वाह। आज वह पड़ोसी जो वाक्य का बल दे। कार्ड के 4: ही, भी, तो, तक। यह 9वाँ विकार नहीं। ढंग नहीं, रिश्ता नहीं, पुल नहीं, झटका नहीं। रूप नहीं घुमाते; अव्यय के पास बैठते हैं, 4 कुर्सियों में नहीं घुलते। पुरुष-मेल आगे। आज बल।

1. कुर्सी — वाक्य का बल

परिभाषा सीधी रखो: जो शब्द किसी पद या वाक्य पर बल दे — सिर्फ़, साथ, सीमा, जोर — और लिंग-वचन-कारक से न मुड़े, वह निपात है। निपात = गिरना / पड़ना: बात पर जोर पड़ता है, नई कुर्सी नहीं बनती। हटाओ — अर्थ का ढाँचा रह सकता है, जोर जाता रहे।

राम ही आया। — सिर्फ़ राम / जोर राम पर।

राम भी आया। — राम के साथ और कोई; राम शामिल।

मैं तो जाऊँगा। — जोर मैं पर; पुल नहीं।

बच्चे तक समझ गए। — यहाँ तक / यहाँ तक कि बच्चे।

प्रश्न: शब्द हटाओ। काम और जोड़ बचे? सिर्फ़ जोर गया? गया — निपात सोचो। जोड़ टूटा? समुच्चयबोधक। ढंग गया? क्रिया विशेषण। झटका गया? विस्मयादिबोधक।

जाँच: बल? आज। पुल? और/लेकिन, अव्यय वाले विषय में। नहीं काटा? निषेध, क्रिया विशेषण वाले विषय में।

2. 4 कार्ड एक नज़र में

एक ही रटकर भी-तो-तक गायब मत करो। 4 जोर, 4 रंग।

निपात रंग उदाहरण
ही पक्का, सिर्फ़, जोर राम ही आया। मैं ही करूँगा।
भी साथ, शामिल राम भी आया। तुम भी चलो।
तो जोर, विरोध-सा बल मैं तो जाऊँगा। बात तो सच है।
तक सीमा का जोर — यहाँ तक कि बच्चे तक रो पड़े। गाँधी तक चुप रहे।

चंद्रबिंदु गाँधी में। रंग वाक्य से बँधता है, सूची से पक्का नहीं। तो पुल भी हो सकता है — आगे की दीवार। तक सीमा का रिश्ता भी छू सकता है — दीवार वहाँ।

जाँच: सिर्फ़? ही। साथ? भी। अकेला जोर, पुल नहीं? तो सोचो। यहाँ तक कि? तक।

3. 8 के बाहर, अव्यय के पास

संज्ञा से विस्मयादिबोधक तक 8 कुर्सियाँ। निपात 9वीं नहीं। अव्यय वाले विषय में 4 अटल कुर्सियाँ थीं; निपात पड़ोसी — अटल भी, घर अलग।

तह काम विषय
8 विकार वाक्य में पद का काम संज्ञा से विस्मयादिबोधक
अव्यय 4 अटल कुर्सियों का नाम अव्यय वाले विषय में
निपात बल, जोर आज

कुछ किताबें ही-भी को अव्यय की सूची में घोल देती हैं। इस घर की दीवार: अव्यय = ढंग/रिश्ता/पुल/झटका; निपात = बल। दोनों न मुड़ें तो भी काम पूछो। उपसर्ग सिर पर चढ़ता है, निपात वाक्य में अलग पद है।

जाँच: 9वाँ विकार? नहीं। धीरे? अव्यय। ही? आज। अ? उपसर्ग।

4. ही — सिर्फ़ और जोर

कार्ड का पहला। बात को नुकीला करता है: यही, सिर्फ़ यही, जोर यहीं।

गाँधी ही बोले। — जोर गाँधी पर; चंद्रबिंदु।

मैं ही करूँगा। — सिर्फ़ मैं।

अभी ही आया। — समय पर जोर।

हटाओ — गाँधी बोले रह सकता है; नुकीलापन गया। ही संज्ञा नहीं, क्रिया नहीं। ही ≠ ई। गर्मी की ई प्रत्यय, प्रत्यय वाले विषय में। लड़की की ई लिंग, रूप विचार में। 3 छोटे खंड, 3 कुर्सियाँ।

आप ही आ गए — आप निज, सर्वनाम के भेद वाले विषय में; ही आज का बल। आप बैठिए में ही नहीं भी आदर रह सकता है।

जाँच: जोर/सिर्फ़? ही। गर्मी? प्रत्यय। लड़की? लिंग। आप ही? निज + बल।

5. भी — साथ

कार्ड का दूसरा। और किसी के साथ यह भी। ही सिर्फ़ बाँधे; भी घेरा बढ़ाए।

राम आया। श्याम भी आया।

तुम भी चलो।

गाँधी भी चुप रहे। — चंद्रबिंदु।

हटाओ — श्याम आया रह सकता है; “साथ” का रंग गया। भी पुल और नहीं है। राम और श्याम — और जोड़, अव्यय। राम भी — निपात। दो अटल, दो काम।

जाँच: साथ/और कोई? भी। दो नाम जोड़े? और, समुच्चय। सिर्फ़? ही, भी नहीं।

6. तो — बल; पुल अलग

कार्ड का तीसरा। अकेला तो अक्सर जोर है। यदि…तो वाला तो जोड़ है — समुच्चयबोधक वाले विषय में। दो कुर्सियाँ, एक लिखा रूप।

वाक्य तो कौन
मैं तो जाऊँगा। निपात — बल आज
बात तो सच है। निपात — जोर बात पर
यदि बारिश हुई तो मत निकलो। समुच्चय — शर्त का जोड़ा, पुल

तो वाह नहीं। तो विस्मयादिबोधक नहीं। जाँच: यदि/जब साथ? पुल सोचो। अकेला, हटाओ तो जोर जाए? आज। पूरा मिश्र वाक्य वाक्य भेद वाले विषय में; आज बल वाली कुर्सी।

जाँच: यदि…तो? जोड़। मैं तो? निपात। दोनों को एक मत लिखो।

7. तक — जोर वाली सीमा

कार्ड का चौथा। यहाँ तक कि / यहाँ तक — जोर की सीमा। शाम तक रहा — समय की सीमा, कुर्सी सरक सकती है।

वाक्य तक कौन
बच्चे तक समझ गए। निपात — यहाँ तक कि बच्चे
गाँधी तक चुप रहे। निपात — जोर की सीमा; चंद्रबिंदु
शाम तक रुको। समय की सीमा — क्रिया विशेषण / संबंध छू सकता है

के बिना संबंधबोधक वाले विषय में। तक कार्ड आज बल का है। वाक्य पूछो: “यहाँ तक कि” बैठे? निपात। “किस समय तक”? सीमा, आज की 4 में जबरदस्ती मत ठोको। सूची रटकर हर तक निपात नहीं।

जाँच: यहाँ तक कि? आज। शाम तक? समय, कुर्सी पूछो। के बिना? संबंधबोधक।

8. नहीं, हाँ, मत — दीवार

नहीं काम काटता है — निषेध, क्रिया विशेषण वाले विषय में। हाँ स्वीकृति, विस्मयादिबोधक वाले विषय में। मत आज्ञा के साथ निषेध। ये कार्ड के 4 नहीं।

शब्द काम घर
नहीं / मत / न काम काटना क्रिया विशेषण
हाँ स्वीकृति विस्मयादिबोधक वाले विषय में
ही भी तो तक बल आज

वह नहीं जाता — नहीं काट; जाता क्रिया रहती है। वह ही जाता — ही जोर, काट नहीं। दोनों अटल; काम उलटा।

जाँच: काम कटा? नहीं। काम वैसा, जोर बढ़ा? ही/भी। हाँ? स्वीकृति, आज नहीं।

9. दीवारें — ई, जी, क्या

दिखा कुर्सी उदाहरण
ही बल निपात आज राम ही
ई भाव / ई लिंग प्रत्यय / रूप गर्मी; लड़की
जी आदर साथी, सर्वनाम नहीं राम जी — आप-तुम वाले विषय में
क्या नाम की जगह सर्वनाम क्या लाए? — सर्वनाम के भेद वाले विषय में
क्या वाक्य के आगे प्रश्न का ढंग क्या तुम चलोगे? — निपात-सूची में जबरदस्ती मत

बहुत सुंदर — बहुत बल विशेषण पर; क्रिया विशेषण वाले विषय में झलक थी। आज कार्ड ही-भी-तो-तक; बहुत को 5वाँ मत चढ़ाओ बिना वाक्य के।

जाँच: ही? आज। ई? प्रत्यय या लिंग। जी? साथी। क्या? वाक्य पूछो।

10. एक वाक्य — एक काम

ही और भी एक साथ रंग उलटा सकते हैं: मैं ही नहीं, तुम भी आओ — ही सिर्फ़, भी साथ; नहीं काट। गिनो, एक बोरी मत करो।

तुम तो आइए। — तो बल + आप वाली आज्ञा मिलावट; सीढ़ी आप-तुम वाले विषय में। तुम आओ / आप आइए। तो अलग पद।

यदि तुम आओ तो मैं भी चलूँगा। — पहला तो पुल; भी निपात।

पुरुष-मेल क्रिया पर — पुरुष वाले विषय में। निपात क्रिया का रूप नहीं घुमाता: मैं ही जाता हूँ, तुम ही जाते हो — ही एक, क्रिया पुरुष से मुड़ी।

जाँच: निपात अटल। क्रिया मुड़ी तो पुरुष/रूप विचार में। तो पुल या बल? यदि पूछो।

11. पद रहता है

निपात वाक्य में पद है — शब्द और वाक्य वाले विषय में। रूप न बदले तो भी बैठा हुआ शब्द पद है। पद परिचय वाक्य विचार में लेखा माँगेगा: ही — निपात। और — समुच्चय अव्यय। आज: बल का नाम पद से नहीं हटता।

गाँधी ही धीरे बोले, और सब भी चुप।

गाँधी संज्ञा; ही निपात; धीरे अव्यय; बोले क्रिया; और अव्यय; भी निपात। चंद्रबिंदु।

12. वाक्य में सब कुर्सियाँ

अरे! गाँधी ही आए, तुम भी रुको; मैं तो नहीं बोलूँगा, बच्चे तक चुप।

  • अरे — विस्मयादिबोधक अव्यय
  • गाँधी — संज्ञा; चंद्रबिंदु
  • ही — निपात, सिर्फ़/जोर
  • आए — क्रिया
  • तुम — सर्वनाम
  • भी — निपात, साथ
  • रुको — क्रिया
  • मैं तो — तो निपात, बल
  • नहीं — निषेध, क्रिया विशेषण
  • बच्चे तक — तक निपात, जोर की सीमा

यदि बारिश हुई तो मत निकलो। — तो पुल, समुच्चय; मत निषेध। आज का तो बल वाला नहीं।

13. शब्द तोड़कर पूरा

ही

सिर्फ़, जोर। ई प्रत्यय/लिंग अलग। आप ही निज + बल।

भी

साथ, शामिल। और पुल अलग।

तो

अकेला बल। यदि…तो पुल।

तक

यहाँ तक कि — आज। शाम तक — समय, कुर्सी पूछो।

नहीं / हाँ / मत

निषेध / स्वीकृति। कार्ड नहीं।

धीरे / और / वाह

अव्यय वाले विषय में। बल नहीं।

जी

आदर साथी। निपात नहीं।

गाँधी ही नहीं, बच्चे भी समझे, मैं तो चुप। — ही, भी, तो 3 निपात; नहीं काट; गाँधी संज्ञा। चंद्रबिंदु।

14. आम गलतियाँ

  • निपात को 9वाँ विकार बनाना। तह अलग।
  • ही-भी को अव्यय की 5वीं कुर्सी लिखना। पड़ोसी, घर अलग।
  • ही को ई प्रत्यय या लड़की की ई लिखना।
  • तो को हमेशा निपात लिखना। यदि…तो जोड़।
  • तो को हमेशा जोड़ लिखना। मैं तो बल।
  • हर तक निपात। शाम तक समय छू सकता है।
  • नहीं को निपात लिखना। निषेध क्रिया विशेषण।
  • हाँ को निपात लिखना। स्वीकृति विस्मयादिबोधक वाले विषय में।
  • जी को निपात लिखना। राम जी साथी।
  • आप ही को सिर्फ़ आदर लिखना। निज + ही बल।
  • भी और और एक। भी बल, और पुल।
  • निपात को पद न मानना। रूप न बदले, पद रहता है।

जाँच: (1) जोर, ढाँचा बचा? निपात। (2) ही सिर्फ़, भी साथ, तो अकेला जोर, तक यहाँ तक कि। (3) यदि…तो पुल। (4) नहीं काट, हाँ स्वीकृति। (5) 9वाँ विकार नहीं।

15. इस विषय का सार

  • निपात वाक्य का बल है — ही, भी, तो, तक।
  • 9वाँ विकार नहीं। अव्यय के पड़ोसी; 4 कुर्सियों में नहीं।
  • ही सिर्फ़/जोर। भी साथ। तो अकेला जोर; यदि…तो पुल। तक जोर की सीमा; शाम तक अलग पूछो।
  • नहीं निषेध। हाँ स्वीकृति। ही ≠ ई। आप ही निज + बल।
  • निपात भी पद है। पुरुष-मेल आगे।

आगे पुरुष — उत्तम, मध्यम, अन्य है।

अभ्यास

नीचे लिखकर या मन में उत्तर दो। फिर उत्तर खोलकर मिलाओ।

1. निपात क्या है? कार्ड के 4 लिखो। यह 9वाँ विकार है?

उत्तर

जो शब्द पद या वाक्य पर बल दे और रूप न बदले। ही, भी, तो, तक। नहीं — 8 के बाहर, अव्यय का पड़ोसी।

2. “मैं तो जाऊँगा” और “यदि बारिश हुई तो मत निकलो” — तो एक कुर्सी? ही और गर्मी की ई एक हैं?

उत्तर

नहीं — पहला तो निपात (बल); दूसरा तो पुल, समुच्चयबोधक वाले विषय में। नहीं — ही निपात; ई प्रत्यय गर्मी में, प्रत्यय वाले विषय में।

3. नहीं निपात है? भी और और एक हैं?

उत्तर

नहीं — नहीं निषेध, क्रिया विशेषण वाले विषय में। नहीं — भी साथ आज; और पुल, अव्यय वाले विषय में।

4. “आप ही आ गए” सिर्फ़ आदर है? “शाम तक रुको” और “बच्चे तक समझ गए” एक तक हैं?

उत्तर

नहीं — आप निज, सर्वनाम के भेद वाले विषय में; ही बल आज। नहीं — शाम तक समय की सीमा; बच्चे तक जोर की सीमा, निपात।

5. हाँ निपात है? ही-भी अव्यय की 5वीं कुर्सी हैं?

उत्तर

नहीं — हाँ स्वीकृति, विस्मयादिबोधक वाले विषय में। नहीं — अव्यय 4 कुर्सियाँ; निपात पड़ोसी, घर अलग।

विषय समाप्त · निपात