अंग 1 · वर्ण विचार
पाठ 1.5
विषय शुरू · अनुस्वार, चंद्रबिंदु, विसर्ग
मात्राएँ स्वर का रूप हैं। अब तीन चिह्न जो मात्रा नहीं, पर देवनागरी में रोज़ बैठते हैं: अनुस्वार ं, चंद्रबिंदु ँ, विसर्ग ः। इनके बिना हैं / हँस, गंगा / गाँव, अतः जैसे शब्द शुद्ध नहीं लिखे जाते।
1. तीन चिह्न एक नज़र में
| नाम | चिह्न | काम | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| अनुस्वार | ं | बिंदु — नाक से जुड़ी ध्वनि | गंगा, संसार, हिंदी, हैं |
| चंद्रबिंदु / अनुनासिक | ँ | स्वर ही नाक से निकलता है | माँ, हँस, आँगन, ऊँट |
| विसर्ग | ः | स्वर के बाद हल्की ह जैसी फूंक | अतः, प्रातः, दुःख, छः |
तीनों अक्षर के ऊपर या बाद लगते हैं, व्यंजन की मात्रा-पंक्ति से अलग। इन्हें का-कि-की में मत गिनो।
2. अनुस्वार क्या है
अनुस्वार शिरोरेखा (सिर की लकीर) के ऊपर का बिंदु ं है। यह बताता है कि उस जगह हवा नाक से निकली। लिखने में एक बिंदु काफी है; बोलने में वह बिंदु अक्सर अगले व्यंजन के वर्ग के पाँचवें वर्ण जैसा लगता है।
अं जब अयोगवाह की गिनती में आता है, तब यही अनुस्वार उसका चिह्न है। अयोगवाह नाम आगे खुलेगा; बिंदु का नियम यहीं पूरा है।
गंगा, रंग, अंक, संबंध, अंत, हिंदी, संसार, चंचल, कंप, लंबा।
बिंदु है = अनुस्वार। मात्रा ा ि ी अलग चीज़ है।
3. अनुस्वार का बोल — पाँचवें वर्ण वाला नियम
अनुस्वार के बाद जो व्यंजन आए, उसी वर्ग का पाँचवाँ वर्ण बोलो। लिखने में ं रह सकता है; पढ़ने में ङ ञ ण न म सुनो।
| बाद वाला वर्ग | पाँचवें जैसा बोल | लिखा | जैसे बोला |
|---|---|---|---|
| कवर्ग — क ख ग घ | ङ | गंगा, अंक, पंकज | गङ्गा, अङ्क, पङ्कज |
| चवर्ग — च छ ज झ | ञ | चंचल, पंचम, संजय | चञ्चल, पञ्चम, सञ्जय |
| टवर्ग — ट ठ ड ढ | ण | खंड, कंठ, दंड | खण्ड, कण्ठ, दण्ड |
| तवर्ग — त थ द ध | न | अंत, संतान, मंद | अन्त, सन्तान, मन्द |
| पवर्ग — प फ ब भ | म | कंप, संबंध, लंबा | कम्प, सम्बन्ध, लम्बा |
दोनों लिखे रूप चलते हैं: गंगा और गङ्गा। आज की हिंदी में बिंदु ं अधिक चलता है। अर्थ एक है।
य र ल व श ष स ह के पहले
इन व्यंजनों का अपना पाँचवाँ वर्ण नहीं। अनुस्वार तब अक्सर म जैसा लगता है: संयोग, संवाद, संशय। सिंह अलग याद रखो — बोल में ङ + ह जैसा भी सिखाया जाता है। पाँच वर्गों वाला नियम सबसे साफ़ है; ये आठ व्यंजन उसके बाहर हैं।
4. चंद्रबिंदु / अनुनासिक क्या है
अनुनासिक वह स्वर है जो मुँह और नाक दोनों से निकले। उसका चिह्न चंद्रबिंदु ँ है — चाँद जैसा घुमाव और बिंदु।
अनुस्वार में नाक वाली ध्वनि अलग जुड़ती है (ङ ञ ण न म जैसी)। चंद्रबिंदु में वही स्वर नाक से निकलता है। न या म अलग वर्ण के रूप में नहीं जुड़ता।
माँ — आ नाक से है, मान नहीं।
हँस — अ नाक से; ह + नाक वाला अ + स।
आँगन, पाँच, पूँछ, ऊँट, गाँव, सँजोना।
कुछ शब्द दोनों तरह मिलते हैं, पर शुद्ध रूप एक होता है: हँसना चंद्रबिंदु से, हंस (पक्षी) अनुस्वार से — अर्थ अलग। यह जोड़ा याद रखने लायक है।
5. हैं और हँस — रोज की दीवार
| शब्द | चिह्न | काम |
|---|---|---|
| हैं | अनुस्वार ं (ऐ की मात्रा के साथ) | क्रिया — वे हैं, हम हैं |
| हँस / हँसना / हँसी | चंद्रबिंदु ँ | हँसी वाली क्रिया या भाव |
| हंस | अनुस्वार | पक्षी |
सांस / साँस एक ही साँस के दो लिखे रूप हैं, अर्थ अलग नहीं। याद रखने वाला जोड़ा यही है: हैं, हँस, हंस।
ध्यान दें: हैं = होना क्रिया। हँस = हँसी। हंस = पक्षी। तीनों अलग।
6. जब चंद्रबिंदु की जगह अनुस्वार लिख देते हैं
ए ऐ ओ औ की मात्राएँ े ै ो ौ पहले से ऊपर बैठती हैं। चंद्रबिंदु के लिए जगह नहीं बचती। तब अनुस्वार ं लिखकर वही नाक वाला स्वर दिखाया जाता है।
| लिखा | क्यों बिंदु | उच्चारण |
|---|---|---|
| मैं | ै ऊपर है, ँ नहीं समाता | नाक से निकला ऐ |
| में | े ऊपर है | नाक से निकला ए — मतलब जगह (किताब में) |
| हैं | ै + बिंदु | क्रिया |
यह छूट जगह की है, अर्थ की नहीं। मैं चंद्रबिंदु वाला अनुनासिक ही है, गंगा वाला पाँचवें-जैसा अनुस्वार नहीं। पढ़ते समय स्वर नाक से रखें; मैन या मेन अलग व्यंजन न जोड़ें।
7. अनुस्वार और चंद्रबिंदु — फर्क एक जगह
| अनुस्वार ं | चंद्रबिंदु ँ | |
|---|---|---|
| नाम | अनुस्वार | अनुनासिक चिह्न |
| आकृति | केवल बिंदु | चाँद + बिंदु |
| ध्वनि | अक्सर वर्ग के पाँचवें जैसी अलग नाक-ध्वनि | वही स्वर नाक से |
| उदाहरण | गंगा, अंत, संबंध | माँ, आँगन, हँस |
गाँव — चंद्रबिंदु, आ नाक से।
गंगा — अनुस्वार, ङ जैसा।
पाँच — अनुनासिक (चाँद या जगह न हो तो बिंदु)। पंचम — अनुस्वार + चवर्ग।
8. विसर्ग क्या है
विसर्ग ः दो बिंदु, अक्षर के बाद। बोल में स्वर के बाद हल्की ह जैसी फूंक — अः। संस्कृत से आए शब्दों में अधिक है; रोज़ की हिंदी में कम।
| शब्द | विसर्ग कहाँ |
|---|---|
| अतः, प्रातः, स्वतः, अंततः | शब्द के अंत में |
| दुःख, निःसंदेह, दुःसाहस, निःशब्द | शब्द के बीच |
| छः | संख्या — छह का एक रूप |
| नमः, हरिः — पूजा वाले पद | अंत में |
विसर्ग को ह से पूरा बदलकर दुख लिखना बोलचाल में चलता है, पर शुद्ध रूप दुःख में विसर्ग रहता है। अतः को अतह न लिखें।
विसर्ग संधि — इतना जान लें
विसर्ग के आगे स्वर या व्यंजन आए तो रूप बदल सकता है: मनः + हर = मनोहर, निः + चल = निश्चल। पूरे भेद विसर्ग संधि वाले विषय में खुलेंगे। इस विषय का काम चिह्न पहचानना और शुद्ध लिखना है।
9. अं और अः वर्णमाला में
वर्णमाला के अंत में अं अः छपे मिलते हैं। ये 11 स्वर नहीं। अं = अ + अनुस्वार। अः = अ + विसर्ग। वर्गीकरण में ये अयोगवाह कहलाते हैं — न पूरे स्वर, न पूरे व्यंजन। नाम अयोगवाह वाले विषय में; चिह्न और शब्द यहीं पूरे इस्तेमाल करें।
10. मात्रा, हल, नाक वाला चिह्न, विसर्ग — चार काम
एक व्यंजन पर चार अलग चिह्न लग सकते हैं। मिलाना नहीं।
| रूप | चिह्न | काम |
|---|---|---|
| का | ा मात्रा | आ स्वर जुड़ा |
| कं | ं अनुस्वार | नाक वाली ध्वनि — अंक, कंठ |
| कः | ः विसर्ग | ह जैसी फूंक |
| क् | ् हल | अ हटा — हलंत वाले विषय में |
काँ — आ की मात्रा + चंद्रबिंदु: काँटा, काँपना। मात्रा और चंद्रबिंदु साथ रह सकते हैं।
11. शब्द तोड़कर
हिंदी
हि + द् + ई। अनुस्वार द से पहले, तवर्ग आने पर न जैसा: हिन् + दी। लिखा हिंदी, बिंदु से।
माँ
म् + आ नाक से। चंद्रबिंदु आ पर। मान नहीं, माम नहीं।
दुःख
दु + विसर्ग + ख। विसर्ग ह जैसा; ख अलग व्यंजन है (फूंक वाली)।
अतः
अ + त् + अ + विसर्ग। अंत में ः। इसलिए / अतः मिलते-जुलते लगें, चिह्न अलग: इसलिए में विसर्ग नहीं।
संबंध = सम् + बंध — पवर्ग के पहले म।
आँगन = आ नाक से + गन।
प्रातः = प्रात + विसर्ग।
12. आम गलतियाँ
- हैं और हँस एक लिखना।
- माँ को मान या मां कर देना — आ नाक से निकलता है, चंद्रबिंदु चाहिए।
- गंगा को गाँगा लिखना — यहाँ अनुस्वार है (ङ जैसा), माँ वाला चंद्रबिंदु नहीं।
- अनुस्वार को मात्रा समझना। ं स्वर आ इ उ नहीं बदलता, नाक वाली ध्वनि जोड़ता है।
- विसर्ग छोड़कर दुख / अतः को अतह लिखना।
- मैं / में को मैन / मेन पढ़ना — यहाँ बिंदु अनुनासिक स्वर है, न् नहीं।
- चंद्रबिंदु और अनुस्वार की आकृति एक समझना। चाँद वाला ँ अलग है, बिंदु ं अलग।
जाँच: बिंदु के बाद क च ट त प वाला वर्ग है? अनुस्वार — उस वर्ग का पाँचवाँ जैसा बोलो। स्वर खुद नाक से जा रहा है और चाँद दिखता है? अनुनासिक। दो बिंदु बाद में? विसर्ग।
13. इस विषय का सार
- अनुस्वार ं — नाक वाली ध्वनि; बाद वाले वर्ग का पाँचवाँ जैसा बोल।
- चंद्रबिंदु ँ — स्वर अनुनासिक; माँ, हँस, आँगन।
- जगह न हो (े ै ो ौ) तो अनुनासिक भी ं से लिखा जाता है — मैं, में, हैं।
- हैं क्रिया, हँस हँसी, हंस पक्षी।
- विसर्ग ः — ह जैसी फूंक; अतः, दुःख, प्रातः। संधि आगे।
- ये तीनों मात्रा नहीं। अं अः अयोगवाह की गिनती में आते हैं।
अभ्यास
नीचे लिखकर या मन में उत्तर दो। फिर उत्तर खोलकर मिलाओ।
1. खाली जगह भरो।
ं ________ है। ँ ________ है। ः ________ है। ये तीनों ________ नहीं हैं।
उत्तर
अनुस्वार। चंद्रबिंदु / अनुनासिक। विसर्ग। मात्रा।
2. गंगा और गाँव में कौन-सा चिह्न है? ध्वनि का फर्क बताओ।
उत्तर
गंगा में अनुस्वार — ङ जैसा (कवर्ग का पाँचवाँ)। गाँव में चंद्रबिंदु — आ नाक से।
3. हैं, हँस, हंस — तीनों का काम अलग बताओ।
उत्तर
हैं = होना क्रिया। हँस = हँसी। हंस = पक्षी।
4. मैं में चंद्रबिंदु क्यों नहीं लिखा जाता?
उत्तर
ै पहले से ऊपर है, ँ नहीं समाता। बिंदु से वही नाक वाला ऐ दिखाया जाता है।
5. दुःख में ः क्या है? क्या दुख लिखना शुद्ध है?
उत्तर
विसर्ग। बोलचाल में दुख चलता है; शुद्ध रूप दुःख है।
विषय समाप्त · अनुस्वार, चंद्रबिंदु, विसर्ग
