इकाई 2: संधि, समास, उपसर्ग, प्रत्यय — एक नज़र में
इस इकाई में हम शब्द-रचना के चार प्रमुख प्रकरणों का अध्ययन करेंगे। संधि में ध्वनियों का मेल, समास में पदों का संक्षेपण, उपसर्ग में शब्द के पूर्व जुड़ने वाले अवयव और प्रत्यय में शब्द के अंत में जुड़ने वाले अवयव — इन चारों से ही हिन्दी का शब्द भंडार निरंतर समृद्ध होता है।
- संधि: परिभाषा, 3 भेद (स्वर, व्यंजन, विसर्ग) — नियमों और 10+ उदाहरणों सहित
- समास: परिभाषा, 6 भेद (अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व, बहुव्रीहि)
- उपसर्ग: परिभाषा, प्रमुख उपसर्ग और शब्द-रचना
- प्रत्यय: परिभाषा, कृत् और तद्धित प्रत्यय
1. संधि
परिभाषा: दो वर्णों या ध्वनियों के परस्पर मेल से होने वाले परिवर्तन (विकार) को संधि कहते हैं। जैसे — विद्या + आलय = विद्यालय, देव + इंद्र = देवेंद्र।
संधि के तीन भेद होते हैं: (1) स्वर संधि, (2) व्यंजन संधि, (3) विसर्ग संधि।
1.1 स्वर संधि
जब दो स्वरों का मेल होता है और उनमें परिवर्तन होता है, तो उसे स्वर संधि कहते हैं। इसके 5 उपभेद हैं —
(क) दीर्घ संधि: ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ के बाद समान स्वर आने पर दोनों मिलकर दीर्घ हो जाते हैं।
| नियम | उदाहरण |
|---|---|
| अ + अ = आ | धर्म + अर्थ = धर्मार्थ |
| अ + आ = आ | हिम + आलय = हिमालय |
| आ + अ = आ | विद्या + अर्थी = विद्यार्थी |
| आ + आ = आ | महा + आत्मा = महात्मा |
| इ + इ = ई | कवि + इंद्र = कवींद्र |
| इ + ई = ई | मुनि + ईश्वर = मुनीश्वर |
| ई + इ = ई | नारी + इंद्र = नारींद्र |
| उ + उ = ऊ | सु + उक्ति = सूक्ति |
| उ + ऊ = ऊ | लघु + ऊर्मि = लघूर्मि |
| ऊ + उ = ऊ | वधू + उत्सव = वधूत्सव |
| ऋ + ऋ = ॠ | पितृ + ऋण = पितॄण |
(ख) गुण संधि: अ/आ के बाद इ/ई, उ/ऊ, ऋ आने पर क्रमशः ए, ओ, अर् हो जाता है।
| नियम | उदाहरण |
|---|---|
| अ + इ = ए | देव + इंद्र = देवेंद्र |
| अ + ई = ए | गण + ईश = गणेश |
| आ + इ = ए | महा + इंद्र = महेंद्र |
| अ + उ = ओ | चंद्र + उदय = चंद्रोदय |
| अ + ऊ = ओ | समुद्र + ऊर्मि = समुद्रोर्मि |
| आ + उ = ओ | महा + उत्सव = महोत्सव |
| अ + ऋ = अर् | सप्त + ऋषि = सप्तर्षि |
| आ + ऋ = अर् | महा + ऋषि = महर्षि |
| अ + ए = ऐ (वृद्धि) | एक + एक = एकैक |
| अ + ओ = औ (वृद्धि) | जल + ओघ = जलौघ |
(ग) यण् संधि: इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद भिन्न स्वर आने पर क्रमशः य्, व्, र् हो जाता है।
| नियम | उदाहरण |
|---|---|
| इ + अ = य | अति + अंत = अत्यंत |
| इ + आ = या | इति + आदि = इत्यादि |
| ई + अ = य | नदी + अर्पण = नद्यर्पण |
| उ + अ = व | सु + अच्छ = स्वच्छ |
| उ + आ = वा | सु + आगत = स्वागत |
| ऊ + अ = व | वधू + अर्थ = वध्वर्थ |
| ऋ + अ = र | पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा |
| इ + उ = यु | प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर |
| इ + ओ = यो | अति + ओज = अत्योज |
| उ + इ = वि | अनु + इति = अन्विति |
(घ) अयादि संधि: ए, ऐ, ओ, औ के बाद भिन्न स्वर आने पर क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् हो जाता है।
| नियम | उदाहरण |
|---|---|
| ए + अ = अय | ने + अन = नयन |
| ऐ + अ = आय | गै + अक = गायक |
| ओ + अ = अव | पो + अन = पवन |
| औ + अ = आव | नौ + इक = नाविक |
| ए + इ = अयि | शे + इत = शयित |
| ओ + इ = अवि | पो + इत्र = पवित्र |
| ऐ + इ = आयि | रै + इक = रायिक |
| औ + इ = आवि | धौ + इक = धाविक |
| ए + आ = अया | जे + आस = जयास |
| ओ + आ = अवा | गो + आस = गवास |
(ङ) पूर्वरूप संधि: ए/ओ के बाद अ आने पर अ का लोप हो जाता है और पूर्व रूप बना रहता है (अवग्रह ऽ चिह्न लगता है)।
| उदाहरण | विच्छेद |
|---|---|
| शर्मोऽपि | शर्मो + अपि |
| तेऽपि | ते + अपि |
| कोऽपि | को + अपि |
| सोऽहम् | सो + अहम् |
| विष्णोऽव | विष्णो + अव |
परीक्षा टिप: स्वर संधि के 5 उपभेद और उनके सूत्र (अ+इ=ए, इ+अ=य, ए+अ=अय) कंठस्थ करें। संधि-विच्छेद के प्रश्नों में पहले दोनों पदों की सीमा पहचानें, फिर नियम लगाएँ। दीर्घ और गुण संधि के उदाहरण सबसे अधिक पूछे जाते हैं।
1.2 व्यंजन संधि
जब व्यंजन का व्यंजन या स्वर से मेल होता है और परिवर्तन होता है, तो उसे व्यंजन संधि कहते हैं।
| नियम | उदाहरण |
|---|---|
| वर्ग का पहला वर्ण + स्वर/तीसरा/चौथा वर्ण आने पर पहला वर्ण तीसरे में बदलता है | वाक् + ईश = वागीश; जगत् + ईश = जगदीश |
| त्/द् + च/छ = च्च | उत् + चारण = उच्चारण; सत् + चित् = सच्चित् |
| त्/द् + ज/झ = ज्ज | सत् + जन = सज्जन; उत् + ज्वल = उज्ज्वल |
| त्/द् + ट/ठ = ट्ट | तत् + टीका = तट्टीका |
| त्/द् + ल = ल्ल | उत् + लेख = उल्लेख; तत् + लीन = तल्लीन |
| त्/द् + ह = द्ध | उत् + हार = उद्धार; तत् + हित = तद्धित |
| त्/द् + श = च्छ | उत् + श्वास = उच्छ्वास |
| स्वर + छ = च्छ | वि + छेद = विच्छेद; अनु + छेद = अनुच्छेद |
| म् + स्पर्श वर्ण = अनुस्वार (ं) | सम् + कर = संकर; सम् + तोष = संतोष |
| म् + य, र, ल, व, श, ष, स, ह = म् बना रहता है | सम् + योग = संयोग; सम् + हार = संहार |
| न् + च/छ/ज/झ = ञ् | धन् + जय = धनंजय |
| त्/द् + न = न्न | उत् + नति = उन्नति; जगत् + नाथ = जगन्नाथ |
अतिरिक्त महत्वपूर्ण उदाहरण:
- दिक् + गज = दिग्गज
- षट् + आनन = षडानन
- तत् + मय = तन्मय
- सम् + गम = संगम
- सम् + कल्प = संकल्प
- किम् + चित् = किंचित्
- सम् + योग = संयोग
- उत् + नयन = उन्नयन
1.3 विसर्ग संधि
जब विसर्ग (:) का स्वर या व्यंजन से मेल होता है, तो उसे विसर्ग संधि कहते हैं।
| नियम | उदाहरण |
|---|---|
| अः + अ = ओऽ | मनः + अनुकूल = मनोऽनुकूल |
| अः + घोष वर्ण (ग, ज, ड, द, ब, य, र, ल, व, ह) = ओ | मनः + रथ = मनोरथ; यशः + धरा = यशोधरा |
| इः/उः + स्वर/घोष व्यंजन = र् | निः + धन = निर्धन; दुः + जन = दुर्जन |
| विसर्ग + च/छ = श् | निः + छल = निश्छल; दुः + चरित्र = दुश्चरित्र |
| विसर्ग + ट/ठ = ष् | धनुः + टंकार = धनुष्टंकार |
| विसर्ग + त/थ = स् | निः + तेज = निस्तेज; मनः + ताप = मनस्ताप |
| विसर्ग + क/ख/प/फ = विसर्ग बना रहता है | प्रातः + काल = प्रातःकाल; निः + कपट = निष्कपट |
| अः + घोष वर्ण = ओ | यशः + गान = यशोगान; तपः + वन = तपोवन |
| निः + आ = निरा | निः + आशा = निराशा |
| दुः + स = दुस् | दुः + साहस = दुस्साहस |
अतिरिक्त महत्वपूर्ण उदाहरण:
- निः + रोग = निरोग
- मनः + कामना = मनोकामना
- पयः + पान = पयःपान
- अंतः + करण = अंतःकरण
- पुनः + जन्म = पुनर्जन्म
- निः + शब्द = निःशब्द
- निः + श्वास = निःश्वास
- दुः + ख = दुःख
परीक्षा टिप: विसर्ग संधि में "निः + " वाले शब्द (निर्धन, निराशा, निश्छल, निस्तेज) और "मनः/यशः + " वाले शब्द (मनोरथ, यशोगान) सबसे अधिक पूछे जाते हैं। विसर्ग के बाद क, ख, प, फ आने पर विसर्ग बना रहता है — यह अपवाद अवश्य याद रखें।
2. समास
परिभाषा: दो या दो से अधिक पदों के मेल से बनने वाले संक्षिप्त रूप को समास कहते हैं। समास में विभक्ति चिह्नों का लोप हो जाता है। जैसे — राजा का पुत्र = राजपुत्र, नील है जो कमल = नीलकमल।
समास-विग्रह: समस्त पद को अलग-अलग करके उसका अर्थ स्पष्ट करना समास-विग्रह कहलाता है। जैसे — राजपुत्र का विग्रह "राजा का पुत्र" है।
2.1 अव्ययीभाव समास
जिस समास में पहला पद अव्यय (प्रधान) हो और समस्त पद अव्यय बन जाए, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार |
| प्रतिदिन | प्रत्येक दिन |
| आजीवन | जीवन भर |
| भरपेट | पेट भरकर |
| यथासंभव | जैसा संभव हो |
| निर्विघ्न | बिना विघ्न के |
| प्रत्येक | एक-एक |
| अनुरूप | रूप के अनुसार |
2.2 तत्पुरुष समास
जिस समास में दूसरा पद (उत्तर पद) प्रधान हो और पहले पद की विभक्ति का लोप हो, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। विभक्ति के आधार पर इसके 6 उपभेद हैं —
| उपभेद | समस्त पद | विग्रह |
|---|---|---|
| द्वितीया (को) | गृहागत | गृह को आगत |
| तृतीया (से/द्वारा) | तुलसीकृत | तुलसी द्वारा कृत |
| चतुर्थी (के लिए) | भिक्षाटन | भिक्षा के लिए अटन |
| पंचमी (से) | पदच्युत | पद से च्युत |
| षष्ठी (का/के/की) | राजपुत्र | राजा का पुत्र |
| सप्तमी (में/पर) | कविराज | कवियों में राजा |
अन्य उदाहरण: धर्मशाला (धर्म के लिए शाला), देवालय (देव के लिए आलय), गंगातट (गंगा का तट), विद्यालय (विद्या के लिए आलय), शरणागत (शरण को आगत), दयाहीन (दया से हीन)
2.3 कर्मधारय समास
जिस समास में दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध हो, उसे कर्मधारय समास कहते हैं। यह तत्पुरुष का ही एक भेद है।
| समस्त पद | विग्रह | संबंध |
|---|---|---|
| नीलकमल | नीला है जो कमल | विशेषण-विशेष्य |
| महात्मा | महान है जो आत्मा | विशेषण-विशेष्य |
| पीतांबर | पीत है जो अंबर (वस्त्र) | विशेषण-विशेष्य |
| चंद्रमुख | चंद्र के समान मुख | उपमान-उपमेय |
| कमलनयन | कमल के समान नयन | उपमान-उपमेय |
| देहलता | देह रूपी लता | रूपक |
| मुखचंद्र | मुख रूपी चंद्र | रूपक |
| सज्जन | सत् है जो जन | विशेषण-विशेष्य |
2.4 द्विगु समास
जिस समास में पहला पद संख्यावाचक हो और समस्त पद समूह का बोध कराए, उसे द्विगु समास कहते हैं।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| त्रिभुवन | तीन भुवनों का समूह |
| चौराहा | चार राहों का समूह |
| नवरात्रि | नौ रात्रियों का समूह |
| सप्ताह | सात दिनों का समूह |
| पंचवटी | पाँच वटों (वृक्षों) का समूह |
| दोपहर | दो पहरों का समूह |
| त्रिलोक | तीन लोकों का समूह |
| शताब्दी | सौ वर्षों का समूह |
2.5 द्वंद्व समास
जिस समास में दोनों पद प्रधान हों और विग्रह में "और" अथवा "या" का प्रयोग हो, उसे द्वंद्व समास कहते हैं।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| माता-पिता | माता और पिता |
| राम-लक्ष्मण | राम और लक्ष्मण |
| अन्न-जल | अन्न और जल |
| सुख-दुःख | सुख और दुःख |
| पाप-पुण्य | पाप और पुण्य |
| रात-दिन | रात और दिन |
| धर्म-अधर्म | धर्म और अधर्म |
| लेन-देन | लेना और देना |
2.6 बहुव्रीहि समास
जिस समास में दोनों पदों में से कोई भी प्रधान न हो, बल्कि समस्त पद किसी तीसरे पद (अन्य) की ओर संकेत करे, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।
| समस्त पद | विग्रह | तीसरा पद (संकेत) |
|---|---|---|
| दशानन | दस हैं आनन जिसके | रावण |
| चतुर्भुज | चार हैं भुजाएँ जिसकी | विष्णु |
| पीतांबर | पीत है अंबर जिसका | कृष्ण |
| त्रिनेत्र | तीन हैं नेत्र जिसके | शिव |
| लंबोदर | लंबा है उदर जिसका | गणेश |
| नीलकंठ | नीला है कंठ जिसका | शिव |
| चक्रधर | चक्र धारण किया है जिसने | विष्णु/कृष्ण |
| वीणापाणि | वीणा है पाणि (हाथ) में जिसके | सरस्वती |
परीक्षा टिप: कर्मधारय और बहुव्रीहि में भ्रम होता है — "पीतांबर" दोनों में आता है! अंतर: कर्मधारय में विग्रह "पीत है जो अंबर (वस्त्र)" होगा (वस्त्र प्रधान), बहुव्रीहि में "पीत है अंबर जिसका" (कृष्ण प्रधान)। बहुव्रीहि की पहचान = विग्रह में "जिसका/जिसके/जिसने" आए और तीसरा पद (देवता/व्यक्ति) प्रधान हो।
3. उपसर्ग
परिभाषा: जो अव्यय शब्दों के पूर्व (पहले) जुड़कर उनके अर्थ में विशेषता या परिवर्तन लाते हैं, उन्हें उपसर्ग कहते हैं। जैसे — हार + प्र = प्रहार, हार + आ = आहार, हार + उप = उपहार।
एक ही मूल शब्द में भिन्न-भिन्न उपसर्ग जुड़ने से भिन्न-भिन्न अर्थ वाले शब्द बनते हैं। हिन्दी में संस्कृत के 22 उपसर्ग प्रमुख हैं।
प्रमुख उपसर्ग और शब्द-रचना
| उपसर्ग | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| अ | निषेध/अभाव | अधर्म, अन्याय, अज्ञान |
| अन् | निषेध | अनर्थ, अनादर, अनेक |
| सु | अच्छा/सुंदर | सुपुत्र, सुकर्म, सुगम |
| दुर्/दुस् | बुरा/कठिन | दुर्जन, दुर्गम, दुष्कर्म |
| नि | भीतर/निषेध | निवास, निबंध, निरोध |
| निर्/निस् | बिना/रहित | निर्धन, निर्भय, निश्छल |
| वि | विशेष/विपरीत | विज्ञान, विदेश, वियोग |
| आ | तक/सहित | आगमन, आजीवन, आहार |
| प्र | अधिक/आगे | प्रगति, प्रहार, प्रकाश |
| परा | विपरीत/पीछे | पराजय, पराक्रम, पराभव |
| सम् | साथ/पूर्ण | संगम, संयोग, सम्मान |
| अति | अधिक | अत्याचार, अतिथि, अत्यंत |
| अधि | ऊपर/श्रेष्ठ | अधिकार, अधिपति, अध्ययन |
| अनु | पीछे/समान | अनुचर, अनुकरण, अनुशासन |
| अप | बुरा/हीन | अपमान, अपयश, अपहरण |
| अभि | सामने/ओर | अभियान, अभिमान, अभिनंदन |
| उत्/उद् | ऊपर/उन्नत | उन्नति, उत्थान, उद्गम |
| उप | समीप/सहायक | उपहार, उपमंत्री, उपवन |
| दु | कठिन/बुरा | दुर्लभ, दुर्गति, दुर्बल |
| कु | बुरा | कुपुत्र, कुकर्म, कुमति |
परीक्षा टिप: उपसर्ग की पहचान के लिए शब्द से उपसर्ग हटाकर देखें — शेष मूल शब्द सार्थक होना चाहिए। जैसे "प्रकाश" से "प्र" हटाने पर "काश" (मूल शब्द) बचता है। "सु/दुर्/निर्" वाले शब्द (सुपुत्र/दुर्जन/निर्धन) और "प्र/परा/सम्/वि" वाले शब्द परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं।
4. प्रत्यय
परिभाषा: जो अव्यय शब्दों के अंत (पीछे) में जुड़कर उनके अर्थ में परिवर्तन लाते हैं या नए शब्द बनाते हैं, उन्हें प्रत्यय कहते हैं। जैसे — पढ़ + आई = पढ़ाई, मीठा + आस = मिठास।
प्रत्यय के दो भेद होते हैं: (1) कृत् प्रत्यय, (2) तद्धित प्रत्यय।
4.1 कृत् प्रत्यय
जो प्रत्यय क्रिया (धातु) के अंत में जुड़कर संज्ञा या विशेषण बनाते हैं, उन्हें कृत् प्रत्यय कहते हैं। कृत् प्रत्यय से बने शब्द कृदंत कहलाते हैं।
| प्रत्यय | धातु + प्रत्यय | बना शब्द |
|---|---|---|
| आई | पढ़ + आई | पढ़ाई |
| आवट | लिख + आवट | लिखावट |
| आहट | घबरा + आहट | घबराहट |
| अन | मंथ + अन | मंथन |
| अक्कड़ | भूल + अक्कड़ | भुलक्कड़ |
| आक | तैर + आक | तैराक |
| आलू | झगड़ + आलू | झगड़ालू |
| इया | बढ़ + इया | बढ़िया |
| ऊ | कमा + ऊ | कमाऊ |
| एरा | लूट + एरा | लुटेरा |
| वाला | पढ़ + वाला | पढ़नेवाला |
| न | बेल + न | बेलन |
4.2 तद्धित प्रत्यय
जो प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण के अंत में जुड़कर नए शब्द बनाते हैं, उन्हें तद्धित प्रत्यय कहते हैं। तद्धित प्रत्यय से बने शब्द तद्धितांत कहलाते हैं।
| प्रत्यय | शब्द + प्रत्यय | बना शब्द |
|---|---|---|
| ता | मनुष्य + ता | मनुष्यता |
| त्व | गुरु + त्व | गुरुत्व |
| पन | बच्चा + पन | बचपन |
| ई | खेत + ई | खेती |
| आस | मीठा + आस | मिठास |
| इक | धर्म + इक | धार्मिक |
| इत | फल + इत | फलित |
| इमा | लाल + इमा | लालिमा |
| वान् | धन + वान् | धनवान् |
| शाली | प्रतिभा + शाली | प्रतिभाशाली |
| मय | जल + मय | जलमय |
| दार | दुकान + दार | दुकानदार |
कृत् बनाम तद्धित — पहचान की तरकीब: प्रत्यय हटाने पर यदि मूल शब्द क्रिया/धातु (पढ़, लिख, खेल) बचे तो कृत् प्रत्यय; यदि मूल शब्द संज्ञा/विशेषण (बच्चा, मीठा, धन) बचे तो तद्धित प्रत्यय। जैसे — पढ़ाई (पढ़ = धातु → कृत्), मिठास (मीठा = विशेषण → तद्धित)।
परीक्षा टिप: "उपसर्ग और प्रत्यय में अंतर" पर लघु उत्तरीय प्रश्न अक्सर पूछा जाता है — उपसर्ग शब्द के पूर्व जुड़ता है (प्र + हार = प्रहार), प्रत्यय शब्द के अंत में जुड़ता है (पढ़ + आई = पढ़ाई)। कृत्/तद्धित की पहचान वाली तरकीब से वस्तुनिष्ठ प्रश्न आसानी से हल होंगे।
इकाई 2: सारांश — परीक्षा से पहले दोहराएँ
- संधि = दो वर्णों के मेल से परिवर्तन; 3 भेद — स्वर संधि (5 उपभेद: दीर्घ, गुण, यण्, अयादि, पूर्वरूप), व्यंजन संधि, विसर्ग संधि
- स्वर संधि सूत्र: अ+अ=आ (दीर्घ), अ+इ=ए (गुण), इ+अ=य (यण्), ए+अ=अय (अयादि)
- समास = पदों का संक्षिप्त मेल; 6 भेद — अव्ययीभाव (पहला पद प्रधान), तत्पुरुष (दूसरा पद प्रधान), कर्मधारय (विशेषण-विशेष्य), द्विगु (संख्यावाची पहला पद), द्वंद्व (दोनों पद प्रधान), बहुव्रीहि (तीसरा पद प्रधान)
- उपसर्ग = शब्द के पूर्व जुड़ने वाला अवयव (प्र, परा, सम्, वि, नि, सु, दुर्, अ, अन् आदि)
- प्रत्यय = शब्द के अंत में जुड़ने वाला अवयव; कृत् (धातु में) और तद्धित (संज्ञा/विशेषण में)
