इस विषय में क्या आता है
परीक्षा पूछती है — हिंदी में स्वर कितने हैं, व्यंजन कितने हैं, अं–अः क्या हैं, ज कहाँ से बोलते हैं, ह कण्ठ्य है या तालव्य, क्ष / ज्ञ टूटकर क्या बनते हैं, इ की मात्रा कहाँ लगती है, हंस और हँस में क्या अंतर है। यह आवाज़ और लिपि की नींव है।
यहाँ पढ़ना है
11 स्वर, 33 व्यंजन, 2 अयोगवाह। ह्रस्व–दीर्घ। पाँच वर्ग। स्थान (कण्ठ से ओष्ठ)। अल्पप्राण–महाप्राण, घोष–अघोष। अनुनासिक, अनुस्वार, चंद्रबिंदु। मात्रा, हलंत, क में छिपा अ। क्ष त्र ज्ञ श्र। रेफ और पदेन। ड़ ढ़।
यहाँ नहीं घुसाना
सत् + जन = सज्जन — यह संधि है (अगला विषय)। समास, उपसर्ग, कारक, काल, अलंकार, छंद — अपने पृष्ठों पर। राजस्थानी मेला–किला सामान्य ज्ञान में। अंग्रेज़ी ध्वनि-चिह्न यहाँ नहीं।
एक पंक्ति: वर्ण = सबसे छोटी ध्वनि। अक्षर = जो एक साथ बोला जाए। दोनों को एक मत गिनो।
पाँच इकाइयाँ — ध्वनि से वाक्य तक
बोलने में एक सीढ़ी है। हर सीढ़ी बड़ी होती है। प्रश्न इन्हें मिला देता है, इसलिए पहले डिब्बे अलग करो।
| इकाई | क्या है | उदाहरण |
|---|---|---|
| ध्वनि | कान में आने वाली आवाज़। अभी व्याकरण का नाम नहीं मिला। | मुँह से निकलता «क्» का धक्का। |
| वर्ण | उस आवाज़ का व्याकरण वाला नाम और स्थान। भाषा की सबसे छोटी इकाई। | क्, अ, म् |
| अक्षर | जो एक साँस / एक धक्के में बोला जाए। स्वर अक्षर की जान है — बिना स्वर के अक्षर नहीं। | क (= क्+अ), का, त्रि |
| शब्द | अर्थ वाला अक्षरों का जोड़। | कमल, राम |
| वाक्य | पूरी बात। यहाँ नहीं — वाक्य-भेद अलग विषय है। | राम जाता है। |
लिपि अलग चीज़ है — आवाज़ को कागज़ पर लिखने का ढंग। हिंदी की लिपि देवनागरी है — सिरोरेखा, बाएँ से दाएँ, हर व्यंजन के अंदर अ छिपा रहता है। लिपि भाषा नहीं है: संस्कृत, हिंदी, मराठी एक लिपि बाँट सकती हैं।
कमल में अक्षर 3 हैं (क + म + ल)। अगर पूछे «टूटकर कितने वर्ण?» तो हर व्यंजन से अ अलग: क्+अ + म्+अ + ल्+अ = 6 वर्ण। स्कूल के प्रश्न अक्सर «अक्षर» माँगते हैं। प्रश्न का शब्द ध्यान से पढ़ो। विद्यालय में कितने अक्षर हैं?
हल
- स्वर ढूँढो
हर अक्षर में एक स्वर (या उसकी मात्रा) होता है।
वि= व्+इ,द्या= द्+य्+आ (संयुक्त + आ),ल= ल्+अ,य= य्+अ। - जोड़ो
वि · द्या · ल · य = 4 अक्षर। «विद् + यालय» समास सोचना गलत — वह अगला अध्याय है।
वर्णमाला — गिनती का झगड़ा
कक्षा-10 की हिंदी वर्णमाला देवनागरी के उन चिह्नों की सूची है जो व्याकरण रटवाता है। संस्कृत की पूरी सूची (ॠ ऌ ॡ) यहाँ तभी, जब विकल्प में «संस्कृत» लिखा हो।
याद: 11 + 2 + 33 = 46। इसके ऊपर क्ष त्र ज्ञ और ड़ ढ़ जोड़ सकते हो — मूल गिनती नहीं।
| प्रश्न का शब्द | उत्तर |
|---|---|
| हिंदी में स्वर कितने? | 11 — अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ |
| स्वर + अयोगवाह? | 13 — ऊपर वाले 11 + अं + अः |
| मूल व्यंजन? | 33 — पाँच वर्ग (25) + अन्तस्थ 4 + ऊष्म 4 |
| पूरी वर्णमाला 46? | 11 + 2 + 33। बहुत पुस्तकें यही लिखती हैं। |
| 52 / 44 / 35 दिखे? | किसी ने क्ष त्र ज्ञ + ड़ ढ़ जोड़ दिए, किसी ने अयोगवाह हटा दिए। विकल्प पढ़कर चुनो, अंधे 11 मत। |
अयोगवाह नाम क्यों? अं और अः अकेले पूरा अक्षर नहीं बनते — उन्हें एक स्वर (अ) का सहारा चाहिए। इसलिए «अ-योग-वाह»: स्वर के योग से वाहित। स्वर की तरह मुँह खोलकर नहीं; व्यंजन की तरह स्पर्श भी नहीं। अलग डिब्बा।
स्वर — मुँह खुला, गले से होंठ तक
स्वर वह ध्वनि है जिसे बोलते समय साँस का रास्ता रुकता नहीं — जीभ का धक्का नहीं लगता। इसलिए स्वर विवृत (खुले) कहलाते हैं। हर अक्षर की जान स्वर है: क् अकेला अधूरा; क = क् + अ।
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ
ह्रस्व और दीर्घ — समय
बोलने का काल (यहाँ अवधि; छंद वाला मात्रा-गणन अलग विषय है):
| प्रकार | काल | कौन | कितने |
|---|---|---|---|
| ह्रस्व | 1 मात्रा | अ इ उ ऋ | 4 |
| दीर्घ | 2 मात्रा | आ ई ऊ ए ऐ ओ औ | 7 |
| प्लुत | 3 मात्रा | संस्कृत अ३ — हिंदी के 11 में नहीं | यहाँ 0 |
जोड़ी याद रखो: अ–आ, इ–ई, उ–ऊ। ऋ का दीर्घ ॠ संस्कृत में है; हिंदी के 11 में ऋ ह्रस्व अकेला बैठा है। ए ऐ ओ औ की ह्रस्व जोड़ी नहीं — ये पहले से दीर्घ / संध्यक्षर हैं।
मूल स्वर और संध्यक्षर
पहले तीन मूल (असली छोटे): अ इ उ। इन्हीं से बाकी खुलते हैं।
ए= अ + इ (कण्ठ + तालु मिलकर)ऐ= अ + ईओ= अ + उऔ= अ + ऊ
इन्हें संध्यक्षर / संयुक्त स्वर कहते हैं। प्रश्न: «ए किसके योग से?» उत्तर अ+इ। पूरा संधि-नियम (गुण/वृद्धि) अगले विषय पर — यहाँ केवल ये चार जोड़।
स्वर का उच्चारण स्थान
| स्थान | स्वर | क्यों |
|---|---|---|
| कण्ठ्य (गला) | अ आ | जीभ नीचे, आवाज़ गले से |
| तालव्य (तालु) | इ ई | जीभ तालु के पास |
| मूर्धन्य (मूर्धा, उलटी जीभ) | ऋ (ॠ) | जीभ तालु के पीछे मूर्धा पर |
| ओष्ठ्य (होंठ) | उ ऊ | होंठ गोल |
| कण्ठतालव्य | ए ऐ | गला + तालु — इसलिए संध्यक्षर |
| कण्ठोष्ठ्य | ओ औ | गला + होंठ |
र नहीं। दोनों मूर्धन्य हैं, इसलिए मिल जाते हैं। र = अन्तस्थ व्यंजन; ऋ = ह्रस्व स्वर। कृष्ण में ृ = ऋ की मात्रा, र नहीं। अयोगवाह, अनुस्वार, चंद्रबिंदु, विसर्ग — चार अलग काम
यहीं सबसे अधिक गलती होती है, क्योंकि तीन चिह्न पास-पास दिखते हैं: ं ँ ः, और पाँच व्यंजन ङ ञ ण न म भी नाक से बोलते हैं।
| नाम | चिह्न | क्या करता है | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| अनुनासिक व्यंजन | ङ ञ ण न म | वर्ग का पाँचवाँ — नाक + अपना स्थान। ये वर्ण हैं, चिह्न नहीं। | नग, अङ्क (टूटकर) |
| अनुस्वार | ं ऊपर बिंदु | अयोगवाह। अगला व्यंजन जिस वर्ग का, अनुस्वार उसी वर्ग के पाँचवें जैसा बोला जाता है। | अंक = अङ्क; चंचल = चञ्चल |
| चंद्रबिंदु | ँ | स्वर को नाक से रंगना। अगला व्यंजन «वर्ग का पाँचवाँ» नहीं बनाना — केवल नासिक्य स्वर। | हँस, चाँद, माँ |
| विसर्ग | ः दो बिंदु | अयोगवाह। स्वर के बाद हल्की «ह» जैसी ध्वनि। कण्ठ्य। | दुःख, अतः, प्रायः |
अनुस्वार कौन-सा पाँचवाँ बनेगा?
नियम: अनुस्वार के तुरंत बाद जो व्यंजन हो, उसी वर्ग का पंचम।
- अं + क वर्ग → ङ
अंक= अङ्क,गंगा= गङ्गा - अं + च वर्ग → ञ
पंच= पञ्च,कंचन= कञ्चन - अं + ट वर्ग → ण
कंठ= कण्ठ - अं + त वर्ग → न
अंत= अन्त - अं + प वर्ग → म
कंप= कम्प
यदि बाद में श ष स ह य र ल व आएँ तो पुस्तकें अक्सर अनुस्वार को न/म या हल्का नासिक्य रखती हैं — परीक्षा के लिए वर्ग वाले पाँच नियम काफी हैं। विसर्ग संधि अगले विषय पर है।
हंस (बिंदु, अनुस्वार) = पक्षी। हँस (चंद्रबिंदु) = हँसना। एक गोल बिंदु, दूसरा चाँद। «दोनों एक» गलत। चंद्रबिंदु अयोगवाह की 2-गिनती में नहीं — केवल अं और अः। व्यंजन — 33, पाँच वर्ग के बाद 8
व्यंजन बोलते समय रास्ता रुकता या घिसता है। 33 = 25 स्पर्श (5×5 वर्ग) + 4 अन्तस्थ + 4 ऊष्म।
हर वर्ग की पंक्ति में पाँच: 1 अघोष अल्पप्राण, 2 अघोष महाप्राण, 3 घोष अल्पप्राण, 4 घोष महाप्राण, 5 घोष अल्पप्राण अनुनासिक। यही पाँच का ढाँचा हर प्रश्न की रीढ़ है — रटना नहीं, समझना।
| वर्ग / स्थान | 1 अल्प · अघोष | 2 महा · अघोष | 3 अल्प · घोष | 4 महा · घोष | 5 अनुनासिक |
|---|---|---|---|---|---|
| कण्ठ्य | क | ख | ग | घ | ङ |
| तालव्य | च | छ | ज | झ | ञ |
| मूर्धन्य | ट | ठ | ड | ढ | ण |
| दन्त्य | त | थ | द | ध | न |
| ओष्ठ्य | प | फ | ब | भ | म |
अन्तस्थ — «बीच के»
स्पर्श जितना धक्का नहीं, ऊष्म जितना घिसाव नहीं। स्वर और व्यंजन के बीच। चारों अल्पप्राण + घोष।
| वर्ण | स्थान | याद |
|---|---|---|
| य | तालव्य | इ/ई के घर, पर व्यंजन |
| र | मूर्धन्य | ऋ के घर; ऋ स्वर, र व्यंजन |
| ल | दन्त्य | जीभ दाँतों पर |
| व | दन्तोष्ठ्य | दाँत + होंठ। ओष्ठ्य मत लिखना — प वर्ग ओष्ठ्य है, व नहीं |
ऊष्म — घिसाव, हवा
हवा रगड़ के साथ निकलती है। चारों महाप्राण। घोष केवल ह; श ष स अघोष।
| वर्ण | स्थान | घोष? |
|---|---|---|
| श | तालव्य | अघोष |
| ष | मूर्धन्य | अघोष — उलटी जीभ वाला «ष» |
| स | दन्त्य | अघोष |
| ह | कण्ठ्य | घोष — सबसे बड़ी भूल यहीं |
विशेष में श + ष दोनों। ह को तालव्य मत बनाओ क्योंकि श वहाँ है — ह गले से, ऊष्म, घोष, महाप्राण। ड़ ढ़ और नुक्ता
ड़ ढ़हिंदी की अपनी ध्वनि — ड ढ के नीचे बिंदी, जीभ टपककर। मूल 33 की संस्कृत-सूची में अलग नाम से नहीं; हिंदी पुस्तकें इन्हें विशेष व्यंजन लिखती हैं।पेड़, पढ़।- फ़ारसी-अरबी नुक्ता:
क़ ख़ ग़ ज़ फ़(क़लम, ख़त, ग़ज़ल, ज़रा, फ़र्क)। देवनागरी में लिखे जाते हैं; 33 की गिनती में मत जोड़ो।
उच्चारण स्थान — कहाँ से बोलते हैं
स्थान = आवाज़ मुँह के किस हिस्से से निकलती है। चित्र मत देखो। पाँच शब्द बोलो — कमल, चम्मच, टोपी, ताला, पंखा — और उँगली से महसूस करो कि धक्का कहाँ लगा। वही पाँच स्थान हैं।
आईने वाला प्रयोग
आईने के सामने धीरे-धीरे सिर्फ़ पहला अक्षर दोहराओ। जगह हाथ से पकड़नी है, चित्र से नहीं।
- कमल — कण्ठ (गला)।
क क कबोलो। उँगली गले पर रखो — हल्का धक्का अंदर, होंठ लगभग नहीं हिलते।अ आ, क ख ग घ ङ, हयहीं से। जैसे खांसी गले से निकलती है, वैसेहभी गले से — तालु से नहीं। - चम्मच — तालु (मुँह की छत)।
च च च। जीभ की पीठ छत से चिपकती है, होंठ मुसकुराते से फैलते हैं।इ ई, च छ ज झ ञ, य, शयहीं। छत = तालु। - टोपी — मूर्धा (जीभ उलटी)।
ट ट ट। जीभ की नोक दाँतों पर नहीं, उलटकर छत के पिछले हिस्से से टकराती है।ऋ, ट ठ ड ढ ण, र, ष। परीक्षा का जाल:टऔरतएक नहीं। - ताला — दन्त (दाँत)।
त त त। जीभ की नोक ऊपरी दाँतों के पीछे लगती है, उलटी नहीं।त थ द ध न, ल, स।टमूर्धन्य है,तदन्त्य — दोनों एक नहीं। - पंखा — ओष्ठ (होंठ)।
प प प। दोनों होंठ बंद होकर खुलते हैं, जीभ आराम पर।उ ऊ, प फ ब भ म। मोमबत्ती के सामने बोलो — हवा होंठ से बाहर।
दो जगह से निकलने वाले
ए ऐ— गला + छत = कण्ठतालव्य। मुँहअजितना खुला नहीं, जीभ तालु की तरफ़ उठी। शब्द:एक, ऐनक।ओ औ— गला + होंठ = कण्ठोष्ठ्य। गले की आवाज़, होंठ गोल। शब्द:ओस, और।व— दाँत + होंठ = दन्तोष्ठ्य। ऊपरी दाँत निचले होंठ से छूते हैं।पदोनों होंठ;वदाँत+होंठ। शब्द:वन, हवा।
टमाटरvsतमाशा— पहला अक्षर उलटी जीभ (टमूर्धा) और दाँत (तदन्त)। लिखने में पास लगते हैं, बोलने में जगह अलग।शहर, षड्यंत्र, सड़क— तीन «स» जैसी आवाज़:शछत,षउलटी जीभ,सदाँत।हवाकाहगला;विशेषकाशछत। दोनों घिसकर (ऊष्म) निकलते हैं, जगह एक नहीं।
| स्थान | स्वर | व्यंजन |
|---|---|---|
| कण्ठ्य | अ आ | क ख ग घ ङ, ह, विसर्ग |
| तालव्य | इ ई | च छ ज झ ञ, य, श |
| मूर्धन्य | ऋ | ट ठ ड ढ ण, र, ष |
| दन्त्य | — | त थ द ध न, ल, स |
| ओष्ठ्य | उ ऊ | प फ ब भ म |
| कण्ठतालव्य | ए ऐ | — |
| कण्ठोष्ठ्य | ओ औ | — |
| दन्तोष्ठ्य | — | व |
ह और श दोनों ऊष्म हैं। स्थान एक है?
हल
- ऊष्म ≠ स्थान
प्रयत्न (कैसे बोलें) एक हो सकता है, स्थान (कहाँ) अलग है। ऊष्म = घिसाव। स्थान अलग तालिका।
- याद
ह = कण्ठ्य। श = तालव्य। ष = मूर्धन्य। स = दन्त्य। «सब तालु से» गलत।
प्रयत्न — कैसे बोलें (स्थान के बाद)
स्थान = कहाँ। प्रयत्न = कितनी मेहनत / कैसा धक्का। दो परतें: भीतर (आभ्यंतर — मुँह खुला या बंद) और बाहर (बाह्य — स्पर्श / ऊष्म / अन्तस्थ)।
आभ्यंतर
- विवृत — मुँह अधिक खुला: स्वर।
- संवृत — रास्ता बंद / कसा: व्यंजन।
- अन्तस्थ को पुस्तकें कभी-कभी अर्धविवृत कहती हैं — परीक्षा में अन्तस्थ नाम काफी है।
बाह्य — तीन कोश
| प्रयत्न | कौन | कितने |
|---|---|---|
| स्पर्श | पाँचों वर्ग पूरे (क से म) | 25 |
| अन्तस्थ | य र ल व | 4 |
| ऊष्म | श ष स ह | 4 |
25 + 4 + 4 = 33। अनुनासिक ङ ञ ण न म स्पर्श के अंदर हैं (वर्ग का पाँचवाँ), अलग 34वाँ कोश नहीं।
अल्पप्राण / महाप्राण — साँस
अल्पप्राण = कम हवा। महाप्राण = अधिक हवा (साथ में «ह» की झलक)।
- हर वर्ग: 1 और 3 अल्पप्राण; 2 और 4 महाप्राण; 5वाँ (अनुनासिक) अल्पप्राण।
- इसलिए क वर्ग अल्पप्राण =
क ग ङ। महाप्राण =ख घ। - अन्तस्थ चारों अल्पप्राण।
- ऊष्म चारों महाप्राण (श ष स ह)।
घोष / अघोष — गले का कंपन
घोष = स्वर-यंत्र काँपते हैं। अघोष = नहीं काँपते।
- वर्ग 1–2 अघोष; 3–4–5 घोष।
- क ख अघोष; ग घ ङ घोष। यही क्रम हर वर्ग में।
- य र ल व ह = घोष। श ष स = अघोष।
घ = कण्ठ्य + स्पर्श + महाप्राण + घोष। न = दन्त्य + स्पर्श + अल्पप्राण + घोष + अनुनासिक। व = दन्तोष्ठ्य + अन्तस्थ + अल्पप्राण + घोष। प्रश्न एक गुण पूछता है, तुम चार सोचकर विकल्प काटो। ख की सही छाप?
हल
- वर्ग का दूसरा
क वर्ग, दूसरा। स्थान कण्ठ्य। दूसरा = महाप्राण + अघोष।
- नहीं
घोष 3–4–5 होता (ग घ ङ)। अनुनासिक केवल ङ। ऊष्म नहीं — स्पर्श है।
मात्रा, हलंत, छिपा हुआ अ
देवनागरी में पूरा व्यंजन-चिह्न क पहले से क्+अ है। अलग से अ की मात्रा नहीं लगती। दूसरे स्वर मात्रा बनकर चिपकते हैं।
इ की मात्रा बाएँ लगती है, पर बोलते समय इ बाद में आता है: कि = क् + इ, «इक्» नहीं।
| स्वर | मात्रा | क + मात्रा | जगह |
|---|---|---|---|
| अ | — (कोई नहीं) | क | अंदर छिपी |
| आ | ा | का | दाएँ |
| इ | ि | कि | बाएँ / पहले — सबसे प्रसिद्ध भूल |
| ई | ी | की | दाएँ, पूरी खड़ी |
| उ ऊ | ु ू | कु कू | नीचे |
| ऋ | ृ | कृ | नीचे, आँख जैसी |
| ए ऐ | े ै | के कै | ऊपर |
| ओ औ | ो ौ | को कौ | ऊपर + दाएँ ा |
| अं अः | ं ः | कं कः | ऊपर बिंदु / बाद दो बिंदु |
हलंत / विराम ् छिपे अ को निकाल देता है: क्। संयुक्त तब बनता है जब दो व्यंजन के बीच स्वर न हो: क्+त = क्त (रक्त)।
अक्षर गिनना: जितनी बार स्वर (मात्रा या छिपा अ) उच्चारण में आए, उतने अक्षर। हलंत वाला टुकड़ा अगले स्वर से चिपककर एक अक्षर।
- राम = रा + म = 2
- आकाश = आ + का + श = 3
- कृष्ण = कृ + ष्ण = 2
- स्त्री = 1 (स्+त्+र्+ई — एक ही स्वर ई)
- विद्यालय = 4 (ऊपर का उदाहरण)
ि लिखने में व्यंजन से पहले, बोलने में बाद में। कि = क्+इ। बच्चे उलटा पढ़ते हैं। ई की मात्रा ी दाएँ — दोनों मत मिलाओ। संयुक्ताक्षर, क्ष त्र ज्ञ श्र, रेफ
जो पुस्तक वर्णमाला के अंत में क्ष त्र ज्ञ छापती है, वे नए वर्ण नहीं — दो-दो व्यंजन का चिपकना।
| दिखता | टूटकर | गलत तोड़ |
|---|---|---|
| क्ष | क् + ष | क्+श — श तालव्य, ष मूर्धन्य; क्ष में ष है |
| त्र | त् + र | ट्+र — त दन्त्य, ट मूर्धन्य |
| ज्ञ | ज् + ञ | «ग्य» / ग्+य — बोलचाल; व्याकरण ज्+ञ |
| श्र | श् + र | ष्+र मत — श तालव्य; श्रम, आश्रम, शृंगार में शृ अलग मात्रा |
इन्हें 33 के ऊपर अतिरिक्त संयुक्त गिनो तो गिनती बढ़ जाएगी — प्रश्न यदि मूल व्यंजन पूछे तो 33, इन्हें बाहर रखो।
र के दो रूप
र समूह में पहले आए या बाद — लिखाई बदलती है।
कर्म में र का रेफ म पर; क्रम में क्+र = क्र। अर्थ भी अलग (काम / क्रम)।
इस पृष्ठ के बाद क्या आता है
दो वर्ण मिलकर नया रूप (सत्+जन, देव+इंद्र) = संधि — अगला विषय। यहाँ केवल एक शब्द के अंदर के वर्ण। समास दो शब्दों का जोड़ — उससे भी अलग।
प्रश्न-बैंक
हिंदी (कक्षा-10) में मूल स्वर कितने हैं?
- 13, क्योंकि अं अः भी स्वर हैं
- 11 — अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ
- 33
- 4, केवल अ इ उ ऋ
हल
- गिनती
ह्रस्व 4 + दीर्घ 7 = 11। अं अः अयोगवाह हैं, स्वर की 11 में नहीं। 13 तब, जब प्रश्न «अयोगवाह मिलाकर» कहे।
- 33 / 4
33 व्यंजन हैं। 4 केवल ह्रस्व — पूरी स्वर-सूची नहीं।
अं और अः को व्याकरण क्या कहता है?
- ऊष्म व्यंजन
- अयोगवाह
- संध्यक्षर
- अन्तस्थ
हल
- नाम
स्वर के योग से चलते हैं, इसलिए अयोगवाह। अनुस्वार + विसर्ग।
- नहीं
ऊष्म = श ष स ह। संध्यक्षर = ए ऐ ओ औ। अन्तस्थ = य र ल व।
ज का उच्चारण स्थान?
- कण्ठ्य, जैसे क
- तालव्य (च वर्ग)
- मूर्धन्य (ट वर्ग)
- दन्तोष्ठ्य, जैसे व
हल
- वर्ग
च छ ज झ ञ = तालव्य स्पर्श। ज तीसरा है, इसलिए घोष अल्पप्राण भी — पर प्रश्न स्थान माँगता है।
- मिलान
क वर्ग कण्ठ। ट मूर्धा। व अन्तस्थ दन्तोष्ठ्य, ज नहीं।
ट ठ ड ढ ण किस स्थान के हैं?
- दन्त्य — जीभ दाँत पर
- मूर्धन्य — जीभ तालु के मूर्धा पर
- तालव्य — च वर्ग
- ओष्ठ्य — प वर्ग
हल
- उलटी जीभ
मूर्धा = कठोर तालु का पिछला भाग। ट वर्ग यहीं। त वर्ग दन्त्य (सीधी जीभ दाँत पर)।
- साथ
इस स्थान पर र और ष भी। ट ≠ त — सबसे आम लिपि-भूल।
ह की सही छाप?
- तालव्य ऊष्म, जैसे श
- कण्ठ्य, ऊष्म, महाप्राण, घोष
- ओष्ठ्य स्पर्श, जैसे प
- अयोगवाह, जैसे अं
हल
- गला
ह कण्ठ से। ऊष्म = घिसाव। महाप्राण। घोष (श ष स अघोष हैं, ह नहीं)।
- काटो
श तालव्य। प स्पर्श ओष्ठ्य। अं अयोगवाह चिह्न है, व्यंजन-वर्ण नहीं।
व का स्थान?
- ओष्ठ्य, प वर्ग जैसा
- दन्तोष्ठ्य (दाँत + होंठ), अन्तस्थ
- तालव्य, य जैसा
- कण्ठ्य
हल
- दो स्थान
होंठ + ऊपर के दाँत। इसलिए दन्तोष्ठ्य। अन्तस्थ चार में चौथा।
- प ≠ व
प फ ब भ म शुद्ध ओष्ठ्य स्पर्श। य तालव्य अन्तस्थ। व को ओष्ठ्य लिखना आधी भूल।
क्ष टूटकर क्या है?
- क् + श
- क् + ष
- ख् + स
- मूल 34वाँ व्यंजन, टूटता नहीं
हल
- मूर्धा वाला ष
क्ष = क्+ष। ष मूर्धन्य ऊष्म। श तालव्य — गलत जोड़ी।
- गिनती
संयुक्त है, 33 के अंदर नया वर्ण नहीं। चौथा विकल्प «मूल» गलत।
ज्ञ व्याकरण में क्या है?
- ग् + य (ग्य)
- ज् + ञ
- ज् + न
- तालव्य मूल स्वर
हल
- नियम
ज् (तालव्य स्पर्श) + ञ (उसी वर्ग का अनुनासिक)। दोनों तालव्य — इसलिए एक चिह्न ज्ञ।
- बोलचाल
«ग्य» सुनाई देता है, इसलिए ग्+य लिख देते हैं। प्रश्न व्याकरण माँगता है: ज्+ञ। न दन्त्य, ञ तालव्य।
क वर्ग के महाप्राण कौन हैं?
- क ग ङ
- ख घ
- क ख
- ग घ ङ
हल
- दूसरा और चौथा
महाप्राण = अधिक साँस = वर्ग का दूसरा और चौथा: ख घ।
- दूसरी धारी
क ग ङ = अल्पप्राण। क ख = अघोष (1–2), दोनों महाप्राण नहीं। ग घ ङ = घोष।
हँसना में नाक वाला चिह्न क्या है? सत्+जन इस अध्याय में?
- अनुस्वार ं ; और हाँ, संयुक्त यहीं पढ़ना
- चंद्रबिंदु ँ ; सत्+जन संधि है, अगला विषय
- विसर्ग ः ; समास यहीं
- अनुनासिक व्यंजन ङ
हल
- हँसना
हँस = चंद्रबिंदु, स्वर नासिक्य। हंस (बिंदु) = पक्षी। ङ अलग वर्ण, यहाँ नहीं लिखा।
- सीमा
सत्+जन = सज्जन — व्यंजन/विसर्ग संधि, अगला विषय। समास दो शब्द। इस पृष्ठ पर केवल चिह्न-पहचान।
अभ्यास
ए और ऐ का स्थान?
- कण्ठ्य, अ आ जैसा
- कण्ठतालव्य (संध्यक्षर)
- ओष्ठ्य
- मूर्धन्य, ऋ जैसा
हल
- जोड़
ए = अ+इ (कण्ठ+तालु)। ऐ = अ+ई। इसलिए कण्ठतालव्य। ओ औ कण्ठोष्ठ्य।
ङ की सही बात?
- कण्ठ्य, स्पर्श, अनुनासिक, अल्पप्राण, घोष
- तालव्य अनुनासिक — वह ञ है
- अयोगवाह अं
- ऊष्म महाप्राण
हल
- वर्ग का पाँचवाँ
क वर्ग पंचम। स्थान कण्ठ। पाँचवाँ = अनुनासिक + अल्पप्राण + घोष + स्पर्श।
- अगला
ञ च वर्ग। अं चिह्न है, ङ वर्ण। ऊष्म नहीं।
ष कहाँ से?
- तालव्य, श जैसा
- मूर्धन्य ऊष्म, अघोष, महाप्राण
- दन्त्य, स जैसा
- कण्ठ्य, ह जैसा
हल
- तीन श-जैसी
श तालु, ष मूर्धा, स दाँत। ष = मूर्धन्य + ऊष्म + अघोष + महाप्राण। ह घोष कण्ठ्य।
इ की मात्रा ि कहाँ लगती है?
- व्यंजन से पहले (बाएँ); बोलने में इ बाद में (क्+इ = कि)
- हमेशा दाएँ, ई जैसी
- नीचे, उ जैसी
- हलंत की जगह
हल
- लिखाई ≠ बोलना
कि = क् + इ। मात्रा-चिह्न बाएँ, ध्वनि बाद में। ी दाएँ = ई। ु नीचे = उ। हलंत अ हटाता है, इ नहीं लगाता।
धर्म में र का रूप?
- पदेन — ध्+र = ध्र, जैसे क्रम
- रेफ — र् पहले, म के ऊपर
- हलंत-रहित पूरा र अक्षर अलग
- विसर्ग
हल
- ऊपर दंड
धर्म = ध + र्म। र् म से पहले, रेफ म पर। क्रम में र बाद में (क्+र) = पदेन।
मूल व्यंजन गिनती, क्ष को मिलाकर?
- 34, क्योंकि क्ष वर्णमाला में छपता है
- 33; क्ष संयुक्त (क्+ष), गिनती में नहीं
- 25, केवल वर्ग
- 11
हल
- 33
25 स्पर्श + 4 अन्तस्थ + 4 ऊष्म। क्ष त्र ज्ञ छपावट अतिरिक्त। 25 अधूरा। 11 स्वर।
अ की सही छाप?
- दीर्घ, कण्ठतालव्य
- ह्रस्व, कण्ठ्य, विवृत स्वर; क के अंदर यही छिपा
- व्यंजन स्पर्श
- अयोगवाह
हल
- छोटा गला
अ ह्रस्व (1 मात्रा) + कण्ठ्य। दीर्घ जोड़ी आ। क में छिपा। अयोगवाह अं/अः। स्पर्श व्यंजन का काम।
ऋ क्या है?
- ह्रस्व स्वर, मूर्धन्य (र व्यंजन नहीं)
- अन्तस्थ व्यंजन, र का ही दूसरा नाम
- दीर्घ स्वर ॠ, हिंदी 11 का हिस्सा
- दन्त्य ऊष्म
हल
- स्वर
ऋ 11 में, ह्रस्व, मूर्धन्य। र अन्तस्थ व्यंजन — एक घर, अलग कोश। ॠ संस्कृत दीर्घ, हिंदी 11 में नहीं। ऊष्म नहीं।
गंगा में अनुस्वार असल में कौन-सा वर्ण?
- ङ — क वर्ग के बाद, गङ्गा
- ञ — च वर्ग
- न — त वर्ग
- चंद्रबिंदु, हँस जैसा
हल
- अगला वर्ग
ं के बाद ग = क वर्ग → पंचम ङ। गङ्गा। ञ तभी जब च छ ज झ। चंद्रबिंदु अलग चिह्न, यहाँ बिंदु है।
«कमल + नयन = कमलनयन» और «इ+आ = ई» — इस पृष्ठ पर?
- हाँ, दोनों संयुक्त व्यंजन
- नहीं — पहला समास, दूसरा संधि; यहाँ वर्ण-स्थान-मात्रा
- हाँ, दोनों अयोगवाह
- हाँ, दोनों मूर्धन्य
हल
- सीमा
दो शब्द जोड़ = समास। दो वर्ण मिलकर बदलें = संधि (अगला विषय)। संयुक्त = एक शब्द के अंदर हलंत-चिपक (क्ष, त्र)। मत मिलाओ।
