इस विषय में क्या आता है
परीक्षा पूछती है — अंधों में काना राजा का भाव क्या, अब पछताए होत क्या के बाद क्या आता है, यह पद लोकोक्ति है या मुहावरा, इस घटना पर कौन-सी कहावत बैठेगी, ऊँची दुकान फीके पकवान दिखावे के निकट है क्या। पूछ पूरे वाक्य का लोक-सत्य है। आँख–नाक के पदबंध मुहावरे पर रह गए।
यहाँ पढ़ना है
लोकोक्ति क्या है। कहावत से कितना फर्क। दोहे/सुभाषित कब ठप्पा ले लेते हैं। अधूरी कहावत पूरी करना। कर्म, एकता, दिखावा, स्वभाव, न्याय, समय के परिवार। निकट अर्थ वाली दो कहावतें। उल्टी जोड़ी (दूर के ढोल / घर की मुर्गी)। स्थिति देखकर सही उक्ति। पाँच जाल।
यहाँ नहीं घुसाना
कमर कसना, आँख का तारा, नाक में दम — मुहावरे (क्रिया मोड़कर वाक्य में बैठते हैं)। वर्तनी/वाक्य शुद्धि — अशुद्धि-शोधन। ने-रचना — काल। उपमा-रूपक — अलंकार। कमल = पंकज — पर्याय। हरि के कई अर्थ — अनेकार्थक। अग्नि–आग — तत्सम। रस-छंद मात्राएँ अपने पृष्ठ पर।
एक पंक्ति: लोकोक्ति वाक्य के बाहर ज्यों-की-त्यों रखी जाती है — «जैसा कहा जाता है…»। मुहावरा वाक्य के अंदर घुलता है।
लोक + उक्ति — लोगों की कही पूरी बात
लोकोक्ति = लोक + उक्ति। पीढ़ियों ने अनुभव को एक पूरे वाक्य में बाँध दिया। यह किसी एक आदमी का चित्र नहीं, समाज का नियम या चेतावनी है। शब्दशः पशु-पक्षी चित्र मत बनाना; भाव पकड़ना।
| लोकोक्ति | शब्दशः (गलत घर) | लोक-भाव (सही) |
|---|---|---|
| अंधों में काना राजा | नेत्रहीनों का चुनाव | अयोग्यों के बीच थोड़ा-सा योग्य भी बड़ा लगना |
| अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता | चना और तंदूर | एक व्यक्ति से बड़ा काम नहीं होता; एकता चाहिए |
| धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का | धोबी के कुत्ते की जीवनी | दो जगह का होकर कहीं का न रहना |
| ऊँची दुकान फीके पकवान | दुकान की रसोई का स्वाद | दिखावा बड़ा, असलियत खोखली |
| खोदा पहाड़ निकली चुहिया | पहाड़ की खुदाई | बहुत परिश्रम, नतीजा नगण्य |
प्रयोग का ढाँचा प्रायः यह रहता है: पहले घटना, फिर उक्ति। «देर हो गई, अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।» उक्ति के शब्दों को भूत-भविष्य में मत तोड़ो — «चिड़ियों ने खेत चुग लिया था इसलिए पछताया» व्याख्या है, लोकोक्ति का रूप नहीं।
यह मुहावरा-पृष्ठ नहीं है
फर्क की तीन कसौटी मुहावरे पर रेखा बन चुकी। यहाँ उल्टी दिशा से याद रखो — कहावत को पदबंध मत बना देना।
| जाँच | लोकोक्ति रहेगी | मुहावरा हो जाएगा — मत तोड़ो |
|---|---|---|
| पूरा वाक्य? | अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। | «चना फोड़ना» बनाकर वाक्य में घुसाना |
| सीख / सत्य? | जैसी करनी वैसी भरनी। | हाथ मलना — पछतावे का चित्र, नियम नहीं |
| «उसने ___ किया»? | नहीं बैठती | उसने कमर कसी / नाक में दम कर दिया — हाँ |
यहाँ का घर
अंधों में काना राजा। नाच न जाने आँगन टेढ़ा। जैसी करनी वैसी भरनी। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।
पिछला घर
आँखें दिखाना, नौ-दो-ग्यारह होना, अपना उल्लू सीधा करना, दाल न गलना — अर्थ रूढ़ है पर आकार अधूरा। सूची मुहावरे पर है, यहाँ नकल नहीं।
कहावत, सुभाषित, दोहा — ठप्पा कहाँ
कक्षा-10 में कहावत और लोकोक्ति प्रायः एक ही थैला हैं: लोक की पूरी उक्ति। झगड़ा मत खड़ा करना।
सुभाषित / दोहा / साखी कवि की पंक्ति है — कबीर, रहीम, तुलसी। रस-छंद और अलंकार उनके अपने पृष्ठों पर। यहाँ केवल इतना: प्रश्न «निम्न लोकोक्ति है» लिखे और विकल्प में «काल करे सो आज कर» हो, तो बहुत पत्र इसे लोकोक्ति मान लेते हैं — क्योंकि पूरा नीति-वाक्य है। मात्रा गिनना यहाँ नहीं।
| पंक्ति | परीक्षा में अक्सर | यहाँ मत खोलना |
|---|---|---|
| काल करे सो आज कर, आज करे सो अब | लोकोक्ति / कहावत का भाव: काम टालो मत | दोहा का छंद-भेद, मात्रा |
| पर उपदेश कुशल बहुतेरे | दूसरों को सीख देना आसान, खुद करना कठिन | रहीम का पूरा दोहा याद करना अनिवार्य नहीं; भाव पक्का |
| मन के हारे हार है मन के जीते जीत | आत्मविश्वास का सत्य | रस का स्थायी भाव |
अशुद्ध वर्तनी («अन्धो मे काना राजा» मात्रा टूटी) — अशुद्धि-शोधन। यहाँ उक्ति का भाव पूछा जाता है।
अधूरी उक्ति — दूसरा टुकड़ा रटो
लिपिक और कक्षा-10 दोनों में पहला टुकड़ा देकर पूछते हैं: आगे क्या? पूरा वाक्य ही लोकोक्ति है; आधा छोड़ोगे तो मुहावरे जैसा अधूरा पद लग सकता है।
| पहला टुकड़ा | पूरा रूप |
|---|---|
| अब पछताए होत क्या | अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत |
| धोबी का कुत्ता | धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का |
| अकेला चना | अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता |
| नाच न जाने | नाच न जाने आँगन टेढ़ा |
| ऊँची दुकान | ऊँची दुकान फीके पकवान |
| खोदा पहाड़ | खोदा पहाड़ निकली चुहिया |
| दूध का जला | दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है |
| डूबते को | डूबते को तिनके का सहारा |
| न रहेगा बाँस | न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी |
| हाथ कंगन को | हाथ कंगन को आरसी क्या |
| जाके पाँव न फटी बिवाई | जाके पाँव न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई |
| हाथी के दाँत | हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और |
| का वर्षा जब | का वर्षा जब कृषि सुखाने |
| भैंस के आगे | भैंस के आगे बीन बजाना |
| एक तो चोरी | एक तो चोरी दूसरी सीनाजोरी |
रटने का ढंग: पहला टुकड़ा सुनते ही जीभ पर दूसरा आना चाहिए। अर्थ पीछे से चिपकाओ, पहले पूरा वाक्य स्थिर करो।
कर्म, फल, प्रयास
| लोकोक्ति | भाव | कब मुख पर आए |
|---|---|---|
| जैसी करनी वैसी भरनी | कर्म का फल वैसा ही मिलता है | बुरा किया, बुरा पाया / अच्छा किया, अच्छा पाया |
| बोए पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होय | जैसा बोओगे वैसा काटोगे | बुरा बीज, मीठा फल की उम्मीद व्यर्थ |
| कर भला हो भला | भलाई का फल भलाई | नेकी का उत्साह |
| नेकी कर दरिया में डाल | भलाई चुपचाप, प्रशंसा की चाह बिना | उपकार का ढिंढोरा न पीटो |
| खोदा पहाड़ निकली चुहिया | मेहनत बड़ी, लाभ छोटा | शोर-शराबे के बाद मामूली नतीजा |
| अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता | एक से बड़ा काम नहीं | मदद माँगने / टीम की ज़रूरत |
| एक पंथ दो काज | एक काम से दो लाभ | एक यात्रा, दो काम निपटे |
| जहाँ चाह वहाँ राह | इच्छा दृढ़ हो तो रास्ता निकलता है | हिम्मत दिखाने पर |
| मन के हारे हार है मन के जीते जीत | हार-जीत पहले मन में | हिम्मत टूटी / हिम्मत बँधी |
एकता, अवसर, संकट, देर
| लोकोक्ति | भाव | कब मुख पर आए |
|---|---|---|
| अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता | एकता में शक्ति — एक कम | अकेले बोझ |
| अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत | समय निकलने पर पछतावा व्यर्थ | मौका जा चुका |
| का वर्षा जब कृषि सुखाने | मदद तब आए जब काम बिगड़ चुका | बहुत देर से सहायता |
| डूबते को तिनके का सहारा | संकट में छोटी मदद भी बड़ी | थोड़ी राहत भी स्वीकार |
| भागते भूत की लंगोटी सही | बुरी हालत में जो मिले वही गनीमत | कम पर राजी होना |
| जब तक साँस तब तक आस | आशा अंत तक | निराश मत हो |
| इधर कुआँ उधर खाई | दोनों ओर संकट | कोई रास्ता सुरक्षित नहीं |
| न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी | जड़ कट जाए तो झगड़ा/कारण खत्म | मूल कारण मिटाने पर |
| मरता क्या न करता | संकट में कुछ भी कर बैठना | मजबूरी के कदम |
पछतावे का चित्र मुहावरा «हाथ मलना» भी है — वाक्य के अंदर। पूरी सीख «अब पछताए…» है — यह पृष्ठ। प्रश्न «मुहावरा» लिखे तो हाथ मलना; «लोकोक्ति / कहावत» लिखे तो चिड़िया वाली उक्ति।
दिखावा, अज्ञान, खोखला शोर
| लोकोक्ति | भाव | कब मुख पर आए |
|---|---|---|
| ऊँची दुकान फीके पकवान | बाहरी तड़क, अंदर खोखला | बड़ा बोर्ड, खराब माल |
| नाम बड़े और दर्शन छोटे | प्रसिद्धि अधिक, असल कम | सुनकर बड़ा, देखकर निराश |
| थोथा चना बाजे घना | खोखला आदमी ज्यादा बोलता है | ज्ञान कम, शोर ज्यादा |
| अधजल गगरी छलकत जाए | अधूरा ज्ञान सबसे अधिक इतराता है | थोड़ा पढ़कर उपदेशक बना |
| तन पर नहीं लत्ता, पान खाए अलबत्ता | गरीबी पर भी दिखावा | फैशन, जेब खाली |
| बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद | अज्ञानी गुण नहीं पहचानता | कला/विद्या पर अनजान की राय |
| भैंस के आगे बीन बजाना | मूर्ख को समझाना व्यर्थ | समझाते-समझाते थक जाना |
| काला अक्षर भैंस बराबर | निरक्षर के लिए लिखा कुछ काम नहीं | पढ़ न सके तो कागज व्यर्थ |
| नीम हकीम खतरा-ए-जान | अधकचरा ज्ञान जानलेवा | थोड़ा-सा इलाज/सलाह घातक |
| यह मुँह और मसूर की दाल | योग्यता से बड़ा दावा | हैसियत छोटी, माँग बड़ी |
स्वभाव, दोष मढ़ना, दो जगह का न रहना
| लोकोक्ति | भाव | कब मुख पर आए |
|---|---|---|
| नाच न जाने आँगन टेढ़ा | अपनी अयोग्यता का दोष दूसरों पर | हारकर मैदान को कोसना |
| उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे | दोषी निर्दोष पर आरोप | गलती अपनी, शोर तुम्हारी |
| एक तो चोरी दूसरी सीनाजोरी | अपराध पर धृष्टता | गलती + अकड़ |
| धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का | दो जगह बँधकर कहीं का न रहना | न नौकरी निभाई न घर |
| रस्सी जल गई पर ऐंठन न गई | हानि हो चुकी, स्वभाव/घमंड बाकी | सीख नहीं सकता पुराना टेढ़ा |
| जैसा देश वैसा भेष | परिस्थिति के अनुसार चलना | नए स्थान की रीत अपनाना |
| चोर-चोर मौसेरे भाई | दुर्जन आपस में मिल जाते हैं | दो दोषियों की सांठगांठ |
| मियाँ की जूती मियाँ के सिर | अपनी युक्ति से स्वयं को चोट | जाल अपने पैर में |
| जिस डाली पर बैठे उसी को काते | अपने सहारे को हानि | रोज़ी देने वाले से बैर |
| जल में रहकर मगर से बैर | जिस पर निर्भर उसी से दुश्मनी मूर्खता | मालिक/आश्रय से टकराना |
«लकीर का फकीर» रूढ़ि का गुलाम — प्रायः मुहावरा, पूरा नीति-वाक्य नहीं। इस तालिका में कुंजी मत बनाना।
न्याय, सत्य, धन, शक्ति
| लोकोक्ति | भाव | कब मुख पर आए |
|---|---|---|
| साँच को आँच नहीं | सत्य को डर नहीं | ईमानदारी पर दबाव |
| हाथ कंगन को आरसी क्या | प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रूरत नहीं | आँखों देखा हाल |
| जिसकी लाठी उसकी भैंस | बलवान का राज, न्याय नहीं | ताकतवर जीता |
| सौ सुनार की एक लोहार की | एक मज़बूत कई कमज़ोरों पर भारी | एक करारा वार / एक समर्थ व्यक्ति |
| अंधों में काना राजा | अयोग्यों में थोड़ा योग्य भी सिरमौर | कम पढ़े समाज का «विद्वान» |
| एक अनार सौ बीमार | चीज़ कम, चाहने वाले ज्यादा | एक पद, भीड़ आवेदकों की |
| आँख के अंधे गाँठ के पूरे | विवेकहीन कंजूस / धन हो समझ न हो | पैसा है, सोच नहीं |
| कंगाली में आटा गीला | विपत्ति पर विपत्ति | गरीबी में और नुकसान |
| बिल्ली के भाग से छींका टूटना | अचानक, बिना प्रयास के लाभ | संयोग की रोटी |
| होनहार बिरवान के होत चीकने पात | योग्य का बचपन से संकेत | बच्चे में आगे की चमक |
| हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और | कथन और करनी अलग; द्विगुण चेहरा | बाहरी नैतिकता, अंदर और |
समय, आदत, अति, छोटा-बड़ा
| लोकोक्ति | भाव | कब मुख पर आए |
|---|---|---|
| अंत भला तो सब भला | परिणाम अच्छा तो बीच का कष्ट भूल जाते | नतीजा ठीक निकला |
| चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात | सुख थोड़े दिन का | अस्थायी चमक |
| नया नौ दिन पुराना सौ दिन | नया आकर्षण जल्दी उतर जाता है | शौक ठंडा पड़ना |
| सस्ता रोए बार-बार, महँगा रोए एक बार | सस्ती चीज़ बार-बार खराब; अच्छा एक बार मोल | गुण बनाम दाम |
| दूर के ढोल सुहावने | दूर की चीज़/व्यक्ति अधिक सुंदर लगते हैं | परदेस की तारीफ, घर की अनदेखी |
| घर की मुर्गी दाल बराबर | अपने घर की वस्तु का मूल्य कम आँकना | घरवाले की प्रतिभा न देखना |
| चिराग तले अँधेरा | अपने पास / अपने घर की कमी नज़र न आए | दूसरों को सुधार, खुद अंधेरा |
| पर उपदेश कुशल बहुतेरे | सीख दूसरों को देना आसान | उपदेशक, अमल शून्य |
| जाके पाँव न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई | दुख वही समझे जिसे हुआ हो | दूसरे के दर्द पर हल्की राय |
| बिना रोए माँ भी दूध नहीं देती | माँगे / प्रयास किए बिना नहीं मिलता | चुप बैठे रहना |
| अंधा बाँटे रेवड़ी, आपस में तौ तौ | अयोग्य के बाँटने में पक्षपात / हुड़दंग | न्याय बिना बँटवारा |
निकट जोड़ी और उल्टी जोड़ी
परीक्षा «समान भाव» या «विपरीत लोक-दृष्टि» पूछती है। पर्याय-पृष्ठ का कमल-समूह यहाँ मत घुसेड़ना — यहाँ दो पूरी उक्तियाँ हैं।
भाव लगभग एक
| एक | दूसरी | फर्क इतना |
|---|---|---|
| जैसी करनी वैसी भरनी | बोए पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होय | पहली फल सामान्य; दूसरी «बुरा बीज तो आम असंभव» |
| अब पछताए होत क्या… | का वर्षा जब कृषि सुखाने | दोनों देर; पहली पछतावा, दूसरी बेमौके मदद |
| ऊँची दुकान फीके पकवान | नाम बड़े और दर्शन छोटे | दुकान = माल; नाम = प्रसिद्धि |
| थोथा चना बाजे घना | अधजल गगरी छलकत जाए | शोर बनाम छलकना/इतराना |
| अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता | एकता में बल — नारा हो तो लोकोक्ति कम, भाव निकट | उक्ति रटो चना वाली; नारा मत लिखना जब पूरा वाक्य माँगा हो |
लोक की दो उल्टी आँखें
| उक्ति | नज़र |
|---|---|
| दूर के ढोल सुहावने | दूर अच्छा लगता है |
| घर की मुर्गी दाल बराबर | अपना तुच्छ लगता है — वही सिक्के का दूसरा पलड़ा |
| डूबते को तिनके का सहारा | थोड़ी मदद भी अनमोल |
| ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती | नाकाफी उपाय से काम नहीं — तिनका हमेशा काफी नहीं |
प्रश्न «विलोम लोकोक्ति» दुर्लभ है; अधिक «सही भाव चुनो»। घर की मुर्गी को दूर के ढोल का विलोम मत लिख देना जब विकल्प में अर्थ पूछा हो — दोनों अलग उक्तियाँ हैं, विलोम-पृष्ठ का जोड़ा नहीं। विलोम शब्द विलोम पर।
स्थिति देखो, उक्ति चुनो
यह इस पृष्ठ का अपना खेल है। मुहावरा-पृष्ठ अंग-परिवार रटाता है; यहाँ घटना रटाते हैं।
| घटना | बैठेगी | नहीं बैठेगी |
|---|---|---|
| परीक्षा निकल गई, अब रोता है | अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत | कमर कसना — वह तैयारी का मुहावरा, देर के बाद नहीं |
| गायक बुरा, मंच को दोष | नाच न जाने आँगन टेढ़ा | आँखें दिखाना — धमकी |
| बड़ा होटल, खाना फीका | ऊँची दुकान फीके पकवान | चार चाँद लगाना — शोभा बढ़ना, उल्टा |
| दो दफ़्तरों में नाम, दोनों बिगड़े | धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का | नौ-दो-ग्यारह होना — भागना |
| चोर पकड़ा गया, पुलिस पर शोर | उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे | कान भरना — चुगली का मुहावरा |
| मजदूर अकेला गोदाम नहीं खाली कर सका | अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता | ऊँट के मुँह में जीरा — वह मुहावरा, मात्रा कम |
| आँखों के सामने गड़बड़ | हाथ कंगन को आरसी क्या | आँख का तारा — प्रिय व्यक्ति |
विद्यार्थी पढ़ा नहीं, प्रश्नपत्र को «बहुत कठिन» कहकर कोसता है। लोकोक्ति?
हल
- दोष कहाँ
कमजोरी अपनी, आरोप बाहर — नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
- पड़ोस
उल्टा चोर कोतवाल = अपराधी आरोप मढ़े। यहाँ अपराध नहीं, अयोग्यता है। चिड़िया चुग गई = मौका गया, कोसना नहीं।
जाल — यहीं कटते हैं
1. मुहावरे को लोकोक्ति लिख देना
आँख का तारा, कमर कसना, हाथ मलना, अपना उल्लू सीधा करना — अधूरे पद, क्रिया बदलती है। लोकोक्ति नहीं। उल्टा: अंधों में काना राजा को «उसने काना राजा किया» मत बनाना।
2. आधा वाक्य
«धोबी का कुत्ता» अधूरा। पूरा: न घर का न घाट का। «अब पछताए होत क्या» अधूरा बिना खेत वाली पंक्ति के — बहुत पत्र दूसरा टुकड़ा माँगते हैं।
3. शब्दशः चित्र
चना-भाड़ रसोई नहीं। चुहिया-पहाड़ भूगोल नहीं। बाँस-बाँसुरी संगीत-प्रश्न नहीं — कारण मिटना है।
4. निकट उक्ति का गलत घर
थोथा चना ≠ अधजल गगरी (शोर ≠ छलक)। ऊँची दुकान ≠ नाम बड़े दर्शन छोटे (माल ≠ प्रसिद्धि) — निकट हैं, एक नहीं। जैसी करनी ≠ अब पछताए (फल ≠ देर)।
5. अलंकार या पर्याय समझना
«मुख कमल के समान» उपमा। «कमल = पंकज» पर्याय। लोकोक्ति तभी जब लोक का पूरा नीति-वाक्य हो।
धोबी का कुत्ता… — मुहावरा, लोकोक्ति, या पशु-विज्ञान?
हल
- आकार
पूरा वाक्य बनता है: न घर का न घाट का।
- काम
सीख/चित्र समाज का: दो स्थान, कोई अपना नहीं।
- ठप्पा
लोकोक्ति। पशु-पद वाला मुहावरा «अपना उल्लू सीधा करना» पीछे पृष्ठ पर।
परीक्षा में पाँच कदम
- पूछा क्या? अर्थ, दूसरा टुकड़ा, लोकोक्ति बनाम मुहावरा, या स्थिति पर उक्ति।
- पूरा वाक्य + सीख? हाँ → यहीं। अधूरा + क्रिया मोड़ → मुहावरे।
- शब्दशः चित्र काटो। चना, कुत्ता, पहाड़, बाँस भाव के वाहन हैं।
- निकट जोड़ी का फर्क एक शब्द में। दुकान/नाम, चना/गगरी, करनी/पछतावा।
- स्थिति में दोष किसका? अपनी अयोग्यता = आँगन टेढ़ा। देर = चिड़िया। दिखावा = फीके पकवान।
प्रश्न 1–10
लोकोक्ति किसे कहते हैं?
- रूढ़ पदबंध जो वाक्य में क्रिया बदलकर बैठे — वह मुहावरा है
- लोक की पूरी उक्ति जो सीख या सामान्य सत्य कहे और ज्यों-की-त्यों उद्धृत हो
- एक शब्द का दूसरा नाम — पर्याय
- मुख कमल के समान — उपमा
हल
- आकार
पूरा वाक्य। अधूरा पद मुहावरा।
- काम
नीति/सत्य/चेतावनी। पर्याय और अलंकार अपने पृष्ठ।
«अंधों में काना राजा» का भाव?
- अत्यंत प्रिय व्यक्ति — आँख का तारा
- अयोग्यों के बीच थोड़ा-सा योग्य भी श्रेष्ठ माना जाना
- नेत्रहीनों का राजा बनना — शब्दशः
- धमकाना — आँखें दिखाना
हल
- व्यंग्य
काना यहाँ नेत्र-रोग नहीं, «थोड़ी योग्यता» का चित्र है।
- मुहावरा काटो
तारा और दिखाना पिछला पृष्ठ।
«अब पछताए होत क्या» का पूरा रूप?
- अब पछताए होत क्या, हाथ मलना चाहिए — हाथ मलना मुहावरा है, जोड़ नहीं
- अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत
- अब पछताए होत क्या, कमर कस लो — उल्टा समय
- का वर्षा जब कृषि सुखाने — निकट भाव, यह पूरा रूप नहीं
हल
- दूसरा टुकड़ा
चिड़िया + खेत पक्का। वर्षा-कृषि अलग उक्ति है, पर्याय नहीं।
कौन-सी लोकोक्ति है, मुहावरा नहीं?
- कमर कसना
- अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता
- नाक में दम करना
- नौ-दो-ग्यारह होना
हल
- घुलना
A, C, D पर «उसने / वह हो गया» चलता है।
- उद्धरण
B पूरा वाक्य है, सीख है। «उसने चना फोड़ा» तोड़ है।
«धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का»?
- भूख लगना — पेट में चूहे
- दो जगह का होकर किसी जगह का न रहना
- भाग जाना — नौ-दो-ग्यारह
- स्वार्थ सिद्ध — उल्लू सीधा
हल
- दो किनारे
घर और घाट दोनों अधूरे — न इधर न उधर। पशु-मुहावरे अलग अर्थ के हैं।
अपनी हार का दोष मैदान पर मढ़ना?
- उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे — वह अपराध + आरोप
- नाच न जाने आँगन टेढ़ा
- आँखें फेरना — उपेक्षा का मुहावरा
- जैसी करनी वैसी भरनी — फल, दोष-मढ़ना नहीं
हल
- अयोग्यता
नाच नहीं आता, आँगन टेढ़ा ठहराया। चोर वाली उक्ति तब जब गुनहगार खुद दूसरों को डाँटे।
«ऊँची दुकान फीके पकवान»?
- शोभा बढ़ाना — चार चाँद लगाना
- दिखावा बड़ा, असलियत कमजोर
- दुर्लभ दर्शन — ईद का चाँद
- अच्छे पर अच्छा — सोने पर सुहागा
हल
- तड़क बनाम स्वाद
बोर्ड ऊँचा, पकवान फीके। मुहावरे शोभा/दुर्लभता/लाभ के हैं, खोखले दिखावे के नहीं।
एक बार दूध से मुँह जला, अब छाछ भी फूँककर — लोकोक्ति?
- अब पछताए होत क्या… — पछतावा व्यर्थ, सावधानी नहीं
- दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है
- आग बबूला होना — क्रोध का मुहावरा
- पानी-पानी होना — लज्जा
हल
- सबक
एक धोखा → आगे अति-सावधानी। चिड़िया वाली उक्ति मौका जा चुका; यह उक्ति भविष्य की खबरदारी है।
शहर गए, रिश्तेदार भी मिल लिए — एक काम दो लाभ। लोकोक्ति?
- खोदा पहाड़ निकली चुहिया — मेहनत बनाम नगण्य फल
- एक पंथ दो काज
- सोने पर सुहागा — मुहावरा, अच्छे पर अच्छा; आकार अधूरा
- अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता
हल
- दो काज
एक पंथ। सुहागा निकट भाव लग सकता है पर मुहावरा है। पहाड़-चुहिया उल्टा (मेहनत ज्यादा, फल कम)।
आँखों देखा अन्याय, सबको पता — प्रमाण की क्या ज़रूरत?
- साँच को आँच नहीं — सत्य निर्भय, यहाँ «प्रत्यक्ष» पूछा है
- हाथ कंगन को आरसी क्या
- आँख का तारा — प्रिय
- आँखें खुलना — होश का मुहावरा
हल
- प्रत्यक्ष
कंगन हाथ में हो तो दर्पण क्यों। साँच-आँच अलग घर: डर नहीं, प्रमाण-प्रश्न नहीं।
अभ्यास
ये दस अलग कोण हैं — ऊपर वाले दस की नकल नहीं। टुकड़ा, स्थिति, निकट जोड़ी, मुहावरा-सीमा।
परदेस की नौकरी सुनकर सब ललचाए, घर की अच्छी नौकरी फीकी लगी। उक्ति?
- घर की मुर्गी दाल बराबर — निकट, पर यहाँ «दूर सुहावना» प्रधान है
- दूर के ढोल सुहावने
- ईद का चाँद होना — मुहावरा, दुर्लभ दर्शन
- चिराग तले अँधेरा — पास की कमी, दूर की तारीफ नहीं
हल
- दूर सुंदर
दूर के ढोल। मुर्गी तब जब घर की वस्तु को जान-बूझकर तुच्छ ठहराएँ बिना दूर की तुलना के। दोनों पलड़े हैं; इस स्थिति में दूर वाला ढोल।
संगीत की महफ़िल में अनजान व्यक्ति राग को «शोर» कहे। उक्ति?
- भैंस के आगे बीन बजाना — निकट: मूर्ख पर व्यर्थ मेहनत; यहाँ «गुण न पहचानना» पूछा
- बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद
- कान पर जूँ न रेंगना — मुहावरा, असर नहीं
- नाच न जाने आँगन टेढ़ा
हल
- अज्ञान
अदरक = गुण। बंदर नहीं पहचानता। बीन-भैंस तब जब तुम समझाते-समझाते थक जाओ। जूँ मुहावरा है।
साल भर योजना, नतीजा एक छोटी सूचना। उक्ति?
- एक पंथ दो काज — लाभ दो, यहाँ लाभ नगण्य
- खोदा पहाड़ निकली चुहिया
- लोहे के चने चबाना — मुहावरा, कठिन काम
- जहाँ चाह वहाँ राह
हल
- मेहनत ≠ फल
पहाड़ खोदा, चुहिया निकली। चने चबाना कठिनाई बताता है, नतीजे की तुच्छता नहीं।
नौकरी गई, उसी हफ्ते छत चूने लगी। उक्ति?
- डूबते को तिनके का सहारा — मदद, यहाँ और विपत्ति
- कंगाली में आटा गीला
- हाथ धोना — मुहावरा, खो देना मात्र
- अंत भला तो सब भला
हल
- दोहरे दुर्दिन
कंगाली में आटा गीला। तिनका राहत है, उल्टा भाव।
«न रहेगा बाँस…» पूरा और भाव?
- न रहेगा बाँस न बजेगी ढोल — गलत टुकड़ा
- न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी — कारण मिटे तो झगड़ा/काम बंद
- आसमान सिर पर उठाना — हंगामा का मुहावरा
- एक तो चोरी दूसरी सीनाजोरी
हल
- बाँसुरी
बाँस गया तो बाँसुरी कहाँ। जड़ काटो। ढोल मत घुसेड़ना।
थोड़ा-सा पढ़ा वैद्य खतरनाक दवा दे। उक्ति?
- अधजल गगरी छलकत जाए — इतराना, जान का खतरा नहीं
- नीम हकीम खतरा-ए-जान
- पेट में चूहे दौड़ना — भूख
- का वर्षा जब कृषि सुखाने
हल
- अधकचरा इलाज
नीम हकीम। गगरी दिखावे की है। दोनों अधूरे ज्ञान के परिवार, घर अलग: छलकना बनाम जान का खतरा।
संकट में छोटे मित्र ने दस रुपये उधार दिए — बड़ी राहत। उक्ति?
- ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती — नाकाफी उपाय, यहाँ राहत मानी गई
- डूबते को तिनके का सहारा
- ऊँट के मुँह में जीरा — मुहावरा, बहुत कम; ठप्पा मुहावरे का
- भागते भूत की लंगोटी सही — निकट भाव, शास्त्रीय जोड़ा तिनका है
हल
- तिनका
डूबते को तिनके का सहारा। लंगोटी गनीमत का दूसरा चित्र है; प्रश्न संकट+छोटी मदद का शास्त्रीय जोड़ा माँगता है। जीरा मुहावरा-पृष्ठ।
थोथा चना बाजे घना — अधजल गगरी छलकत जाए। फर्क?
- दोनों एकदम एक अर्थ, कोई फर्क नहीं
- चना: खोखला शोर। गगरी: अधूरा ज्ञान इतराकर छलकता है
- दोनों मुहावरे हैं
- चना लोकोक्ति नहीं
हल
- निकट, एक नहीं
बाजे = शोर। छलकत = इतराना/उफनना। दोनों लोकोक्ति। परीक्षा एक माँगे तो चित्र देखो।
दोहरी पंक्ति पूरी करो: जाके पाँव न फटी बिवाई, ____।
- सो आँख का तारा कहलाए
- सो का जाने पीर पराई
- सो कमर कस ले
- न घर का न घाट का
हल
- दूसरे का दर्द
बिवाई न फटी हो तो दूसरों की पीर क्या जाने। कुत्ता-घाट दूसरी उक्ति का टुकड़ा है, चिपकाना मना।
बेमेल छाँटो: अंधों में काना राजा · जैसी करनी वैसी भरनी · आँख का तारा · नाच न जाने आँगन टेढ़ा
- अंधों में काना राजा
- आँख का तारा — मुहावरा, शेष लोकोक्तियाँ
- जैसी करनी वैसी भरनी
- नाच न जाने आँगन टेढ़ा
हल
- आकार
तीन पूरे नीति-वाक्य। तारा अधूरा प्रिय-पद — मुहावरे।
- वर्तनी यहाँ नहीं
मात्रा-शुद्धि अशुद्धि-शोधन पर; बेमेल का यह खेल यहीं का है।
