हिन्दी भाषा, व्याकरण एवं संप्रेषण
इकाई 3: वाक्य रचना, वाक्य शुद्धि एवं शब्द शुद्धि
HINDI 4.5AECT21 • BA Semester 2 (AEC)
इकाई 3 · वाक्य रचना, वाक्य शुद्धि, शब्द शुद्धि, समानार्थक, समश्रुत भिन्नार्थक, विलोम, मुहावरे और लोकोक्तियाँ
इकाई 1 ने भाषा और शब्द पहचाने। इकाई 2 ने शब्द जोड़े। यह इकाई व्यवहार की शुद्धि है — वाक्य कैसे बनता है, कहाँ बिगड़ता है, शब्द कहाँ गलत लिखा या गलत बैठाया जाता है, और लोक की रूढ़ भाषा मुहावरा-लोकोक्ति कैसे चलती है। आधिकारिक सूची सात काम देती है। वाक्य रचना। वाक्य शुद्धि। शब्द शुद्धि। समानार्थक शब्द। समश्रुत भिन्नार्थक शब्द। विलोम शब्द। मुहावरे और लोकोक्तियाँ। गुरु और बाहरी व्यावहारिक रचना इन्हीं पर टिकती है। संप्रेषण यहीं जाँचा जाता है। गलत लिंग, गलत परसर्ग, गलत वर्तनी, गलत मुहावरा — चारों से अर्थ या तो मुड़ जाता है या हँसी पैदा करता है। पत्र शुद्ध पहुँच माँगता है, केवल बड़ा शब्द नहीं।
इस इकाई का तरीका जोड़ा है — अशुद्ध रूप, फिर शुद्ध रूप, फिर एक पंक्ति में दोष का नाम। केवल शुद्ध वाक्य लिखना अधूरा है। केवल नियम लिखना भी अधूरा है। जो विद्यार्थी “अनेकों लोग” को अनेक लोग बनाता है और बताता है कि अनेक स्वयं बहुवचन है इसलिए ओं नहीं लगता, उसने अवधारणा समझी। जो केवल जोड़ी रटता है, अगला नया वाक्य नहीं सुधार पाता। मुहावरा और लोकोक्ति पर अर्थ के बिना नाम रटना शॉर्टकट है; अर्थ और एक प्रयोग-वाक्य दोनों चाहिए।
1 वाक्य — अर्थ, अंग और पद-क्रम
वाक्य सार्थक पदों का वह क्रम है जिससे पूरा भाव निकले। गुरु वाक्य को विचार की पूर्ण अभिव्यक्ति कहते हैं। शब्द अकेला अर्थ देता है — “पुस्तक”। वाक्य पूरा विचार देता है — “पुस्तक मेज़ पर रखी है।” बिना पूर्ण भाव के पद-समूह वाक्य नहीं — “यदि वह आए” अधूरा है, आश्रित खंड है। वाक्य की पहचान शब्द-संख्या नहीं, पूर्ण अर्थ है। एक शब्द भी कभी वाक्य होता है — “चलो।” “वर्षा।” संदर्भ पूरा कर दे तो एक शब्द विधेय या उद्गार बन जाता है।
अंग दो हैं। उद्देश्य वह है जिसके विषय में कुछ कहा जाए। विधेय वह है जो उद्देश्य के विषय में कहा जाए। “बालक सोता है” — बालक उद्देश्य, सोता है विधेय। उद्देश्य प्रायः कर्ता होता है, पर हमेशा संज्ञा का एक शब्द नहीं। “राम का छोटा भाई कल आया” में पूरा “राम का छोटा भाई” उद्देश्य है। विधेय में क्रिया केंद्र है। पूरक विधेय को पूरा करता है। “राम विद्यार्थी है” — है अकेला अर्थ नहीं देता; विद्यार्थी पूरक है। “वे थके लगते हैं” — थके पूरक। पूरक को कर्म मत समझो। कर्म सकर्मक क्रिया माँगता है — “राम पत्र लिखता है”, पत्र कर्म है। पूरक “है / लगना / बनना” जैसी क्रियाओं के साथ गुण या जाति पूरी करता है।
पद-क्रम हिन्दी में प्रायः कर्ता, कर्म, क्रिया है — “राम पत्र लिखता है।” सहायक क्रिया काल जोड़ती है — लिख रहा है, लिख चुका। विशेषण विशेष्य से पहले — काला घोड़ा। क्रिया-विशेषण क्रिया के निकट — धीरे बोलता है। प्रश्न में प्रश्नवाचक आगे आ सकता है — “क्या राम आया?” “राम कहाँ गया?” संबोधन वाक्य के किनारे रहता है, अंग नहीं बनता — “हे मित्र, आओ।” बिना क्रिया के बहुत से विधान अधूरे रह जाते हैं। विज्ञापन और कविता क्रम तोड़ सकती हैं; मानक गद्य क्रम बचाता है। इकाई 1 का कर्ता–कर्म–क्रिया यहीं वाक्य का शरीर बनता है।
2 वाक्य के भेद — अर्थ और रचना
भेद दो दृष्टियों से होते हैं। उन्हें एक सूची मत बनाओ। अर्थ की दृष्टि बताती है वाक्य क्या काम कर रहा है। रचना की दृष्टि बताती है वाक्य कैसे बना है। अर्थ की दृष्टि से पाँच भेद प्रचलित हैं। विधानार्थक बात को हाँ में कहता है — सूर्य पूर्व से निकलता है। निषेधार्थक नकारता है — वह आज नहीं आया। प्रश्नार्थक पूछता है — तुम कहाँ जा रहे हो? आज्ञार्थक आदेश, अनुमति या प्रार्थना है — बैठो। कृपया द्वार खोलिए। विस्मयादिबोधक आश्चर्य, शोक या उत्साह की तीव्रता है — वाह, क्या दृश्य है! कभी इच्छार्थक अलग गिना जाता है — ईश्वर करे तुम स्वस्थ रहो। अर्थ-भेद भाव बताते हैं। एक ही रचना कई अर्थ-भेद ले सकती है।
रचना की दृष्टि से तीन भेद हैं। सरल वाक्य में एक उद्देश्य और एक विधेय होता है — पक्षी उड़ता है। भीतर विशेषण और कर्म हो सकते हैं, पर क्रिया-सूत्र एक रहता है — “छोटा पक्षी नीले आकाश में उड़ता है” अभी सरल है। संयुक्त वाक्य दो या अधिक स्वतंत्र उपवाक्यों को और, किंतु, या, तथा से जोड़ता है — राम आया और श्याम गया। दोनों खंड अपने आप पूरे हैं। मिश्र वाक्य में एक मुख्य उपवाक्य और एक या अधिक आश्रित उपवाक्य होते हैं — जो परिश्रम करेगा, वह सफल होगा। “जो परिश्रम करेगा” अकेला अधूरा है, इसलिए आश्रित है। आश्रित कारण, काल, शर्त, संबंध बता सकता है — क्योंकि वर्षा हुई, इसलिए खेत भीगे; जब सूरज ढला, तब पक्षी लौटे; यदि परिश्रम करोगे, तो सफल होगे।
दो दृष्टियाँ एक साथ बैठ सकती हैं। “जो परिश्रम करेगा, वह सफल होगा” रचना से मिश्र है, अर्थ से विधानार्थक है। “क्या तुम नहीं आओगे?” रचना से सरल, अर्थ से प्रश्न और निषेध का मिश्र स्वर। उत्तर में पहले दृष्टि का नाम लिखो, फिर भेद। “वाक्य पाँच प्रकार के होते हैं” अधूरा वाक्य है — किस दृष्टि से पाँच? अर्थ से पाँच, रचना से तीन। यही वाक्य इस पाठ की कुंजी है।
| दृष्टि | भेद | उदाहरण |
|---|---|---|
| अर्थ | विधान · निषेध · प्रश्न · आज्ञा · विस्मय | सूर्य निकला · वह नहीं आया · कहाँ हो · बैठो · वाह! |
| रचना | सरल · संयुक्त · मिश्र | पक्षी उड़ा · राम आया और श्याम गया · जो पढ़ेगा वह जीतेगा |
3 वाक्य शुद्धि — लिंग, वचन, कारक
वाक्य शुद्धि अशुद्ध वाक्य को मानक व्याकरण पर लाना है। दोष वाक्य के समझौते में होता है — लिंग, वचन, पुरुष, कारक, क्रम, अन्वय, पुनरुक्ति। शब्द शुद्धि अलग पाठ है; वह वर्तनी और शब्द-चुनाव काटती है। यहाँ वाक्य का ढाँचा सुधरता है। पहला बड़ा क्षेत्र लिंग है। विशेषण और क्रिया विशेष्य-कर्ता के लिंग से बँधते हैं। अशुद्ध — यह लड़की अच्छा गाती है। शुद्ध — यह लड़की अच्छी गाती है। अच्छा पुल्लिंग है, लड़की स्त्रीलिंग; विशेषण लड़की से बँधे। अशुद्ध — मेरी बहन आया। शुद्ध — मेरी बहन आई। आया पुल्लिंग भूत है; बहन स्त्रीलिंग माँगती है — आई। अशुद्ध — उसका पत्नी आया। शुद्ध — उसकी पत्नी आई। संबंध का रूप भी लिंग से बदलता है — उसका पुत्र, उसकी पुत्री।
दूसरा क्षेत्र वचन है। एक और अनेक का समझौता क्रिया तक जाना चाहिए। अशुद्ध — अनेकों लोग आए। शुद्ध — अनेक लोग आए। अनेक स्वयं बहुवचन अर्थ देता है; ओं लगाने से वचन दो बार चिह्नित होता है। अशुद्ध — प्राण निकल गया। शुद्ध — प्राण निकल गए। प्राण हिन्दी में बहुवचन चलता है। अशुद्ध — दर्शक उत्साहित था। यदि भीड़ बहुवचन मानी जाए — दर्शक उत्साहित थे। अशुद्ध — प्रत्येक छात्रों ने लिखा। शुद्ध — प्रत्येक छात्र ने लिखा। प्रत्येक एक-एक पर जाता है, बहुवचन संज्ञा नहीं लेता। अशुद्ध — दोनों लड़का आया। शुद्ध — दोनों लड़के आए।
तीसरा क्षेत्र कारक और परसर्ग है। इकाई 1 ने ने, को, से सिखाए। अशुद्धि उन्हें गलत जगह बैठाती है। अशुद्ध — राम ने जाता है। शुद्ध — राम जाता है। वर्तमान सामान्य में कर्ता पर ने नहीं लगता। ने भूतकाल की सकर्मक पूर्ण क्रिया पर आता है — राम ने पत्र लिखा। अशुद्ध — उसे को बुलाओ। शुद्ध — उसे बुलाओ। उसे पहले से कर्म रूप है; को दोहराना दोष है। अशुद्ध — मैंने को जाना है। शुद्ध — मुझे जाना है। अशुद्ध — पेड़ पर से पत्ता गिरा, यदि केवल अपादान अभिप्रेत हो — पेड़ से पत्ता गिरा। अधिकरण और अपादान मिलाओ मत। अशुद्ध — उसके को पुस्तक दो। शुद्ध — उसे पुस्तक दो / उसको पुस्तक दो। एक कर्म-चिह्न काफी है।
| अशुद्ध | शुद्ध | दोष |
|---|---|---|
| लड़की अच्छा गाती है | लड़की अच्छी गाती है | लिंग |
| मेरी बहन आया | मेरी बहन आई | लिंग |
| अनेकों लोग | अनेक लोग | वचन का दोहरा चिह्न |
| प्राण निकल गया | प्राण निकल गए | बहुवचन संज्ञा |
| प्रत्येक छात्रों ने | प्रत्येक छात्र ने | प्रत्येक + एकवचन |
| राम ने जाता है | राम जाता है | ने का गलत काल |
| उसे को बुलाओ | उसे बुलाओ | परसर्ग की पुनरुक्ति |
4 वाक्य शुद्धि — अन्वय, क्रम, पुनरुक्ति, उपयुक्त शब्द
अन्वय का अर्थ कर्ता, कर्म और क्रिया का मेल है — पुरुष और वचन क्रिया तक पहुँचें। अशुद्ध — तुम जाता है। शुद्ध — तुम जाते हो। तुम मध्यम पुरुष बहुवचन जैसा व्यवहार करता है; जाता है अन्य पुरुष एकवचन है। अशुद्ध — हम पढ़ता हूँ। शुद्ध — हम पढ़ते हैं। हम उत्तम बहुवचन है; हूँ एकवचन है, पढ़ता पुल्लिंग एक का रूप है। अशुद्ध — मैं लड़की जाता हूँ। शुद्ध — मैं लड़की जाती हूँ / मैं जाती हूँ। अशुद्ध — वे आता है। आदर में वे बहुवचन क्रिया माँगते हैं — वे आते हैं। अन्वय टूटे तो वाक्य व्याकरण से अधूरा है, अर्थ अनुमान से चलता है। संप्रेषण अनुमान पर नहीं टिकना चाहिए।
क्रम हिन्दी में कर्ता-कर्म-क्रिया है। अशुद्ध — लिखता है पत्र राम। शुद्ध — राम पत्र लिखता है। काव्य क्रम तोड़ सकता है; गद्य परीक्षा का गद्य क्रम बचाता है। प्रश्नवाचक आगे आ सकता है — क्या राम आया? विशेषण विशेष्य के पास रहे — अशुद्ध: उसने लाल खरीदी साड़ी; शुद्ध: उसने लाल साड़ी खरीदी। पुनरुक्ति एक अर्थ को दो बार कहती है। अशुद्ध — वह वापस लौट आया। लौटना स्वयं वापस आना है। शुद्ध — वह लौट आया / वह वापस आया। अशुद्ध — नया नवीन प्रयोग। शुद्ध — नया प्रयोग। अशुद्ध — कृपया करके बैठिए। कृपया और करके एक काम दो बार। शुद्ध — कृपया बैठिए। अशुद्ध — यह सबसे उत्तमतम है। तम स्वयं उत्तम है; सबसे और तम एक साथ भारी। शुद्ध — यह सबसे उत्तम है / यह उत्तमतम है।
उपयुक्त शब्द का चुनाव भी वाक्य शुद्धि है, यद्यपि वह शब्द शुद्धि से मिलता है। अशुद्ध — मैं आपका आभार हूँ। आभार संज्ञा है; व्यक्ति आभारी होता है। शुद्ध — मैं आपका आभारी हूँ / मैं आपका आभार मानता हूँ। अशुद्ध — वर्षा हो रही है इसलिए मैदान गीला हो गया है का कारण है — चक्र और भारीपन। शुद्ध — वर्षा के कारण मैदान गीला हो गया। अशुद्ध — उसने मुझसे कहा कि कि वह आएगा। कि दो बार। शुद्ध — उसने मुझसे कहा कि वह आएगा। सुधार लिखते समय तीन कदम चलाओ। दोष का नाम। अशुद्ध वाक्य। शुद्ध वाक्य। बिना नाम के जोड़ी रटना अगला नया वाक्य नहीं सुधारता।
5 शब्द शुद्धि — वर्तनी
शब्द शुद्धि शब्द के मानक रूप को स्थिर करती है। वाक्य सही हो और शब्द गलत हो तो संप्रेषण फिर भी दागदार रहता है। वर्तनी की अशुद्धि प्रायः उच्चारण या देखने की जल्दी से आती है। अत्यधिक शुद्ध है; अत्याधिक अशुद्ध है। अति + अधिक में इ + अ मिलकर य् होते हैं — यही यण है, इसलिए अत्यधिक। बीच में अतिरिक्त आ मत डालो, नहीं तो अत्याधिक बन जाता है। उज्ज्वल में ज् + व् है; उज्जवल व् गिरा देता है। चिह्न मानक है; चिन्ह प्रचलित है, पर निर्धारित व्याकरण उसे वर्तनी-दोष गिनता है। सदुपदेश शुद्ध है — सत् + उपदेश; त् स्वर से पहले द् हो जाता है, यह व्यंजन संधि है, गुण संधि नहीं। सदोपदेश ओ गलत बैठाता है। अनुशंसा में श् है, ष नहीं। परिश्रम में श्र है, स्र नहीं। ब्रह्मांड में ण्ड है। महत्त्व में त् + व्; महत्व प्रचलित है, पर त् का द्वित्व मानक माना जाता है। आशीर्वाद में र् है; आशिर्वाद मात्रा तोड़ता है। शृंगार शुद्ध है — श् + ऋ; श्रृंगार में र दो बार घुस जाता है, इसलिए अशुद्ध।
संयुक्त व्यंजन तीन जगह भ्रम पैदा करते हैं — क्ष, त्र, ज्ञ। क्षमा, क्षेत्र, परीक्षा। त्रिभुवन, त्रुटि। ज्ञानी, विज्ञान, आज्ञा। इन्हें कस, तर, ग्य लिखना बोलचाल का चित्र है, मानक देवनागरी नहीं। विश्वविद्यालय एक शब्द है; विस्वविद्यालय स और व गड्डमड्ड करता है। अध्यापक में ध्य है; अधयापक अधूरा है। अनुस्वार और पंचम वर्ण — गंगा में ङ्ग या गं; दोनों स्वीकृत धाराएँ हैं, एक उत्तर में एक नीति रखो।
शब्द शुद्धि का उत्तर जोड़ी के बिना अधूरा है। पहले अशुद्ध रूप, फिर शुद्ध रूप, फिर एक पंक्ति — दोष कहाँ था। अत्यधिक में य क्यों है — क्योंकि अति + अधिक में यण चलती है; अतिरिक्त आ क्यों नहीं — क्योंकि कोई दीर्घ नहीं जुड़ा। उज्ज्वल में व् क्यों — क्योंकि ज्वल धातु में व है। चिह्न में ह् क्यों — ह्न का संयुक्त रूप। शृंगार में एक ऋ क्यों — शृ मूल है, श्रृ दोहरा र है। जोड़ी रटो, पर कारण की एक पंक्ति जोड़ो। वही गहराई है। केवल बीस जोड़ी बिना कारण के शॉर्टकट हैं; नया शब्द आने पर काम नहीं आते।
| अशुद्ध | शुद्ध | याद रखने की बात |
|---|---|---|
| अत्याधिक | अत्यधिक | अति + अधिक |
| उज्जवल | उज्ज्वल | ज् + व् |
| चिन्ह | चिह्न | ह्न संयुक्त |
| सदोपदेश | सदुपदेश | सत् + उपदेश |
| विस्वविद्यालय | विश्वविद्यालय | श्व · विद्यालय |
| अधयापक | अध्यापक | ध्य |
| अनुसंशा | अनुशंसा | श् |
| परिस्रम | परिश्रम | श्र |
| श्रृंगार | शृंगार | श् + ऋ, दोहरा र नहीं |
6 शब्द शुद्धि — प्रयोग
कुछ शब्द वर्तनी से सही दिखते हैं, प्रयोग से गलत हो जाते हैं। आभार संज्ञा है; आभारी विशेषण है। अशुद्ध — मैं आभार हूँ। शुद्ध — मैं आभारी हूँ। कृपा संज्ञा है; कृपया अव्यय है। अशुद्ध — मुझे कृपा कीजिए और क्षमा कीजिए दोनों ठूँसना। शुद्ध — कृपया क्षमा करें। द्वार और दरवाजा — दोनों चलते हैं; मानक गद्य द्वार अधिक औपचारिक मानता है, दोष नहीं। अशुद्ध वह है जब शब्द वर्ग बदल जाए — “कृपा बैठिए” नहीं, कृपया बैठिए।
उपसर्ग और तीव्रता का दोहराव प्रयोग बिगाड़ता है। अशुद्ध — वह अत्यंत अधिक थका। अत्यंत और अधिक एक काम। शुद्ध — वह अत्यंत थका / वह बहुत थका। अशुद्ध — ज्यादातर सभी सहमत थे। ज्यादातर और सभी एक साथ नहीं। शुद्ध — प्रायः सभी सहमत थे / अधिकांश सहमत थे। अशुद्ध — मैंने जाना चाहा कि वह आए। शुद्ध — मैं जानना चाहता था कि वह आएगा। जाना यहाँ धातु-संज्ञा और काल दोनों उलझे। अशुद्ध — आपके अच्छे सुझाव के लिए धन्यवाद दें — वाक्य अधूरा कर्ता खोता है। शुद्ध — आपके अच्छे सुझाव के लिए धन्यवाद। प्रयोग की शुद्धि अर्थ से तय होती है, केवल अक्षर से नहीं। वाक्य शुद्धि ढाँचा सुधारती है। शब्द शुद्धि शब्द चुनती है। दोनों मिलकर संप्रेषण साफ करते हैं।
7 समानार्थक शब्द
समानार्थक या पर्यायवाची वे शब्द हैं जिनका अर्थ एक-सा या अत्यंत निकट है। पूरी एकरूपता दुर्लभ है। “अग्नि” यज्ञ और शास्त्र का रंग रखती है; “आग” घर और खेत का। फिर भी कक्षा इन्हें एक अर्थ-परिवार मानती है। प्रचलित जोड़े स्थिर रखो, चार-चार नाम याद रखो, पर एक पंक्ति यह भी लिखो कि प्रयोग का स्तर अलग हो सकता है। अग्नि — आग, अनल, ज्वाला, पावक, वह्नि। कमल — पंकज, जलज, सरोज, नीरज, अरविंद। सूर्य — रवि, भानु, दिवाकर, आदित्य, भास्कर। जल — नीर, वारि, पानी, तोय, अंबु। आकाश — गगन, नभ, अंबर, व्योम, अनंत। पृथ्वी — धरा, वसुधा, भूमि, धरती, अवनि।
पवन — वायु, अनिल, समीर, वात। चंद्र — शशि, इंदु, मयंक, निशाकर, विधु। मनुष्य — मानव, नर, जन, मानव-मात्र। राजा — नृप, भूप, नरेश, अवनीश। रात्रि — निशा, रजनी, यामिनी, क्षणदा। घोड़ा — अश्व, हय, तुरंग। हाथी — गज, हस्ती, करी। प्रत्येक परिवार में तत्सम अधिक, तद्भव एक-दो। बोलचाल पानी, आग, फूल चाहती है। कविता नीर, अनल, पुष्प चाह सकती है। पर्याय अर्थ की निकटता है, शब्द की पूर्ण एकता नहीं। “कमल और पंकज एक वस्तु हैं” सही है। “दोनों हर वाक्य में बदले जा सकते हैं” हमेशा सही नहीं — बच्चे की किताब में पंकज भारी पड़ सकता है।
उत्तर में पाँच परिवार, प्रत्येक के तीन-चार पर्याय, और एक पंक्ति प्रयोग-भेद की लिखो। केवल बीस नाम की नंगी सूची शॉर्टकट है। परिवार से बाँधोगे तो नया शब्द भी उसी घर में बैठेगा।
| शब्द | पर्याय |
|---|---|
| अग्नि | आग, अनल, ज्वाला, पावक |
| कमल | पंकज, जलज, सरोज, नीरज |
| सूर्य | रवि, भानु, दिवाकर, आदित्य |
| जल | नीर, वारि, पानी, तोय |
| आकाश | गगन, नभ, अंबर, व्योम |
| पृथ्वी | धरा, वसुधा, भूमि, धरती |
8 समश्रुत भिन्नार्थक शब्द
समश्रुत भिन्नार्थक वे शब्द हैं जो सुनने में निकट लगें, अर्थ में अलग हों। इन्हें युग्म-शब्द भी कहते हैं। समानार्थक एक अर्थ के कई शरीर हैं। समश्रुत एक जैसे शरीर के दो अर्थ हैं। कुल वंश है — उसके कुल में विद्वान् थे। कूल किनारा है — नदी का कूल टूट गया। दिन दिवस है। दीन गरीब है। अन्न अनाज है। अन्य दूसरा है। ओर दिशा है — इस ओर आओ। और समुच्चयबोधक है — राम और श्याम। पत्र चिट्ठी या पत्ता है। पात्र बर्तन या अधिकारी है — पात्र व्यक्ति। नीर जल है। नीड़ घोंसला है।
और जोड़े स्थिर रखो। शर बाण है; सर तालाब है; स्वर ध्वनि है — तीनों कान में निकट। कृपण कंजूस है; कृपाण तलवार है। चिर स्थायी है; चीर वस्त्र है। आदि आरंभ है; आदी अभ्यस्त है। अवलंब सहारा है; अविलंब बिना देर। जलधि समुद्र है; जलाधिप वरुण या स्वामी-अर्थ। तरणि सूर्य है; तरणी नाव है। दोनों अर्थ एक-एक वाक्य में खोलो। जोड़ी अकेले नाम की सूची अधूरी है। “कुल-कूल लिखिए” पर दो वाक्य चाहिए — कुल का एक, कूल का एक। बिना वाक्य के अर्थ अनुमान रह जाता है।
ये जोड़े संप्रेषण इसलिए तोड़ते हैं कि सुनने वाला दूसरा अर्थ पकड़ ले। “उसका कुल अच्छा है” वंश है। “नाव कूल से बँधी” किनारा है। वर्तनी का एक मात्रा-भेद अर्थ का पूरा संसार बदल देता है। शब्द शुद्धि यहाँ वर्तनी से जाकर अर्थ तक पहुँचती है।
| जोड़ी | अर्थ |
|---|---|
| कुल / कूल | वंश / किनारा |
| दिन / दीन | दिवस / गरीब |
| अन्न / अन्य | अनाज / दूसरा |
| ओर / और | दिशा / समुच्चय |
| पत्र / पात्र | चिट्ठी या पत्ता / बर्तन या अधिकारी |
| नीर / नीड़ | जल / घोंसला |
| कृपण / कृपाण | कंजूस / तलवार |
| आदि / आदी | आरंभ / अभ्यस्त |
| अवलंब / अविलंब | सहारा / तुरंत |
9 विलोम शब्द
विलोम विपरीत अर्थ का शब्द है। जोड़ा दोनों ओर से चलता है — सुख का विलोम दुःख, दुःख का सुख। ज्ञान-अज्ञान, उदय-अस्त, जीवन-मरण, राग-द्वेष, आयात-निर्यात, उत्थान-पतन, सरल-जटिल, आस्तिक-नास्तिक, स्वदेश-विदेश, लाभ-हानि, जय-पराजय, शीत-उष्ण, दिन-रात, प्रकाश-अंधकार। विलोम अर्थ का उलटा है, शब्द के आगे अ लगाना मात्र नहीं। छोटा का विलोम बड़ा है, अछोटा नहीं। मित्र का विलोम शत्रु है, अमित्र कभी साहित्यिक चलता है पर कक्षा का स्थिर जोड़ा शत्रु अधिक साफ है।
कुछ विलोम उपसर्ग से बनते हैं — अ, अन, नि, निर्, कु, दुर्, अप। ज्ञान-अज्ञान, आदर-अनादर, न्याय-अन्याय, गुण-अवगुण, जन-निर्जन, वास-निर्वास, बल-दुर्बल, यश-अपयश। कुछ स्वतंत्र शब्द हैं — दिन-रात, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु। अशुद्ध जोड़ा वह है जो केवल व्याकरणिक नकार हो, अर्थ का उलटा न हो। “पढ़ना” का विलोम “न पढ़ना” वाक्यांश है, शब्द नहीं। विलोम शब्द चाहिए। “आना” का जाना। “देना” का लेना। क्रियाओं के भी जोड़े हैं। विशेषणों के जोड़े अधिक पूछे जाते हैं।
उत्तर में दस स्थिर जोड़े, उपसर्ग से बने तीन, स्वतंत्र तीन, और एक पंक्ति — विलोम अर्थ का उलटा है, यांत्रिक अ नहीं। समानार्थक एक दिशा के कई नाम हैं। विलोम उलटी दिशा का एक नाम है। समश्रुत सुनने की निकटता है। तीनों को एक परिवार मत बनाओ।
| शब्द | विलोम |
|---|---|
| सुख | दुःख |
| उदय | अस्त |
| आयात | निर्यात |
| ज्ञान | अज्ञान |
| उत्थान | पतन |
| आस्तिक | नास्तिक |
| सरल | जटिल |
| स्वदेश | विदेश |
10 मुहावरे
मुहावरा रूढ़ पद-समूह है जिसका अर्थ शब्दों के अलग-अलग अर्थ से नहीं निकलता। आँख दिखाना क्रोध से डाँटना है, नेत्र प्रस्तुत करना नहीं। यदि कोई शब्दशः अनुवाद करे — “उसने आँखें दिखाई” विदेशी पाठक आँख की बीमारी समझ सकता है। हिन्दी समाज अर्थ बाँध चुका है, इसलिए मुहावरा यादृच्छिक सामाजिक प्रतीक है — इकाई 1 की परिभाषा यहाँ जीवित मिलती है। मुहावरा वाक्य का अंश बनता है। उसे कर्ता, काल, वचन चाहिए — शिक्षक ने आँख दिखाई। आँख दिखाना अपने आप पूरा वाक्य नहीं। पूरा नीति-वाक्य लोकोक्ति है। दोनों को एक मत कहना इस पाठ का बड़ा भ्रम है।
स्थिर मुहावरे अर्थ और वाक्य के साथ रखो। आँख दिखाना — क्रोध से डाँटना — अध्यापक ने देर से आने पर आँख दिखाई। नाक कटना — प्रतिष्ठा जाना — झूठ पकड़े जाने पर उसकी नाक कट गई। कान भरना — चुगली करना — उसने अधिकारी के कान भर दिए। पीठ पीछे — अनुपस्थिति में निंदा — पीठ पीछे बात मत बनाओ। कमर कसना — तैयार होना — परीक्षा से पहले विद्यार्थी कमर कसें। दाँत पीसना — क्रोध — वह दाँत पीसता रह गया। हाथ मलना — पछताना — अवसर जाने पर हाथ मलता रहा। रंग में भंग होना — आनंद टूटना। सिर चढ़ना — अत्यधिक प्रभाव। होश उड़ना — घबरा जाना। मुँह की खाना — हारना, अपमानित होना। तेल निकालना — अधिक परिश्रम लेना। ठंडी साँस लेना — चैन मानना। आँखों में धूल झोंकना — धोखा देना। दाल में काला होना — संदेह रहना। ग़ुबार निकालना — रोष उतारना।
मुहावरा बनाते समय लिंग-वचन क्रिया तक ले जाओ। “नाक कट गया” अशुद्ध; नाक स्त्रीलिंग — नाक कट गई। “आँख दिखाया” अशुद्ध यदि कर्ता स्त्रीलिंग हो — माँ ने आँख दिखाई। अर्थ के बिना मुहावरा शब्द-समूह रह जाता है। प्रयोग-वाक्य के बिना अर्थ अधूरा रह जाता है। तीनों — मुहावरा, अर्थ, वाक्य — साथ लिखो। यही पूरा उत्तर है।
| मुहावरा | अर्थ | वाक्य |
|---|---|---|
| आँख दिखाना | क्रोध से डाँटना | शिक्षक ने आँख दिखाई |
| नाक कटना | प्रतिष्ठा जाना | हार कर उसकी नाक कट गई |
| कान भरना | चुगली करना | उसने प्राचार्य के कान भर दिए |
| कमर कसना | तैयार होना | विद्यार्थी ने कमर कस ली |
| हाथ मलना | पछताना | अवसर जाने पर हाथ मला |
| मुँह की खाना | हारना | वाद-विवाद में मुँह की खाई |
| दाल में काला होना | संदेह रहना | इस सौदे में दाल में काला लगता है |
11 लोकोक्तियाँ
लोकोक्ति लोक में प्रचलित पूर्ण कथन है। यह नीति, अनुभव या व्यंग्य को एक पूरे वाक्य में बाँधती है। मुहावरा टुकड़ा है। लोकोक्ति पूरी बात है। अधजल गगरी छलकत जाय — थोड़ा ज्ञान अधिक अहंकार पैदा करता है। एक अनार सौ बीमार — वस्तु थोड़ी, चाहने वाले बहुत। अंधों में काना राजा — गुणहीनों में थोड़ा गुण वाला बड़ा लगना। दूर के ढोल सुहावने — दूर की वस्तु अच्छी लगना, निकट की परीक्षा कठिन। जैसा देश वैसा भेष — परिस्थिति के अनुसार आचरण। नौ नकद न तेरह उधार — हाथ की नकदी उधार के बड़े वादे से बड़ी। होनहार बिरवान के होत चीकने पात — योग्य का लक्षण बचपन से दीखता है। ऊँची दुकान फीका पकवान — दिखावा बड़ा, सार कम। भागते भूत की लंगोटी सही — हानि होते हुए थोड़ा बचाना भी लाभ है। अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत — अवसर जाने पर पछतावा व्यर्थ।
लोकोक्ति अपने आप अर्थ देती है। कर्ता जोड़ने की आवश्यकता नहीं। “अधजल गगरी छलकत जाय” कह दो, नीति पहुँच गई। मुहावरा “आँख दिखाना” कहो, वाक्य अधूरा है — किसने दिखाई? लोकोक्ति का पल्लवन इकाई 5 में होगा। यहाँ अर्थ और एक प्रसंग काफी है। प्रसंग लिखो — नया विद्यार्थी दो शब्द सीखकर कक्षा में डींग हाँकता है; यही अधजल गगरी है। बिना प्रसंग के लोकोक्ति सूखी पंक्ति रह जाती है।
| लोकोक्ति | अर्थ |
|---|---|
| अधजल गगरी छलकत जाय | थोड़े ज्ञान का अहंकार |
| एक अनार सौ बीमार | माँग अधिक, वस्तु थोड़ी |
| अंधों में काना राजा | हीन समाज में थोड़ा गुण बड़ा |
| ऊँची दुकान फीका पकवान | दिखावा, सारहीनता |
| दूर के ढोल सुहावने | दूर की वस्तु मोहक लगना |
| नौ नकद न तेरह उधार | हाथ की नकदी बड़ी |
| होनहार बिरवान के होत चीकने पात | योग्य का लक्षण बचपन से |
12 मुहावरा और लोकोक्ति — अंतर; इकाई का बाँध
अंतर चार बिंदुओं पर बाँधो। रूप — मुहावरा अंश है, लोकोक्ति पूरा कथन है। प्रयोग — मुहावरा वाक्य के भीतर बैठता है, लोकोक्ति स्वतंत्र चलती है। अर्थ — मुहावरा रूढ़ क्रिया या दशा है, लोकोक्ति नीति या लोक-अनुभव है। उदाहरण — नाक कटना बनाम एक अनार सौ बीमार। दोनों लोकभाषा की संपत्ति हैं। दोनों को पर्याय कहना भ्रम है। दोनों को समानार्थक मत बनाओ। समानार्थक एकल शब्द हैं। ये समूह हैं।
पूरी इकाई एक दृष्टि में यह है। वाक्य उद्देश्य और विधेय से बनता है; अर्थ से पाँच, रचना से तीन भेद। शुद्धि लिंग-वचन-कारक-अन्वय-क्रम-पुनरुक्ति सुधारती है। शब्द शुद्धि वर्तनी और प्रयोग सुधारती है। समानार्थक एक अर्थ, समश्रुत दो अर्थ निकट ध्वनि के, विलोम उलटा अर्थ। मुहावरा टुकड़ा, लोकोक्ति पूरी बात। इकाई 4 इन्हीं शुद्ध वाक्यों को पत्र और प्रारूप के साँचे में ढालेगी। अशुद्ध वाक्य से शासकीय पत्र विश्वास नहीं जीतता। इसलिए यह इकाई संप्रेषण का व्यावहारिक द्वार है, केवल व्याकरण का पिछला कमरा नहीं।
