हिन्दी भाषा, व्याकरण एवं संप्रेषण
इकाई 2: संधि, समास, उपसर्ग और प्रत्यय
HINDI 4.5AECT21 • BA Semester 2 (AEC)
इकाई 2 · संधि, समास, उपसर्ग और प्रत्यय
इकाई 1 ने शब्द पहचाने — कहाँ से आए, विकारी हैं या नहीं। यह इकाई शब्द को जोड़ने का शास्त्र है। आधिकारिक शीर्षक चार नाम देता है — संधि, समास, उपसर्ग, प्रत्यय। चारों से नया शब्द बनता है, पर चारों का काम एक नहीं। संधि दो वर्णों के पास आने से होने वाला ध्वनि-विकार है। समास दो या अधिक पदों का अर्थ-संक्षेप है। उपसर्ग सार्थक शब्द के आगे लगकर अर्थ मोड़ता है। प्रत्यय शब्द के पीछे लगकर नया शब्द, प्रायः नया वर्ग, बनाता है। गुरु इन्हें शब्द-साधन कहते हैं। बाहरी इन्हें व्यावहारिक रचना का औजार कहते हैं। परीक्षा में सबसे बड़ी गलती चारों को एक कह देना है। “विद्यालय” संधि है — विद्या + आलय में आ + आ मिलकर आ हुए। “राजपुत्र” समास है — राजा का पुत्र, दो पद एक शब्द। “प्रहार” उपसर्ग है — प्र + हार। “पढ़ाई” प्रत्यय है — पढ़् + आई। एक शब्द में कभी दो नियम साथ भी चलते हैं, पर नियम अलग रहते हैं।
इस इकाई का तरीका रटी हुई तालिका नहीं, विच्छेद और विग्रह है। संधि का विच्छेद दो वर्ण-खंड लौटाता है — देवेंद्र = देव + इंद्र। समास का विग्रह वाक्यांश लौटाता है — राजपुत्र = राजा का पुत्र। उपसर्ग और प्रत्यय काटने से मूल शब्द बचता है — अनुभव = अनु + भव; लेखक = लिख् + अक। जो विद्यार्थी केवल “दीर्घ, गुण, वृद्धि” के नाम रटता है और उदाहरण नहीं घुमाता, वह पहला प्रश्न चूक जाता है। जो नाम के साथ एक जोड़ा उदाहरण और एक पंक्ति का “क्यों” लिखता है, वह इकाई पार कर लेता है।
1 संधि — अर्थ, आवश्यकता और तीन भेद
संधि शब्द का सामान्य अर्थ मेल है। व्याकरण में संधि दो वर्णों के पास आने से होने वाला निश्चित विकार है। पहला वर्ण पूर्व कहलाता है, दूसरा पर। मेल के बाद जो रूप बनता है वह संधि-पद है। मूल खंड दिखाना संधि-विच्छेद है। विद्यालय का विच्छेद विद्या + आलय है। हिमालय का हिम + आलय। संधि उच्चारण को सरल करती है। दो स्वर आमने-सामने हों तो मुख एक झटके में दोनों को अलग रखना कठिन मानता है, इसलिए नियम से एक नया स्वर या व्यंजन बन जाता है। यह अर्थ का संक्षेप नहीं है। अर्थ का संक्षेप समास का काम है। दोनों को एक कहना इस इकाई का पहला भ्रम है।
संधि की आवश्यकता तीन जगह दिखती है। तत्सम शब्द जोड़ते समय — देव + इंद्र = देवेंद्र। उपसर्ग जोड़ते समय — सम् + तोष = संतोष। समास के अंदर भी वर्ण-मेल हो सकता है, पर तब भी संधि का नियम ध्वनि का रहता है, पद का नहीं। हिन्दी बोलचाल बहुत जगह संधि तोड़कर चलती है — “विद्या आलय” कोई नहीं कहता, पर “अच्छा आदमी” संधि नहीं बनता। पत्र में संधि मुख्यतः तत्सम और अर्ध-तत्सम जोड़ पर पूछी जाती है। भेद तीन हैं। स्वर संधि — स्वर के बाद स्वर। व्यंजन संधि — व्यंजन के बाद व्यंजन या स्वर, और पूर्व व्यंजन बदलता है। विसर्ग संधि — विसर्ग (:) के बाद स्वर या व्यंजन। गुरु इन्हीं तीन नामों को स्थिर रखते हैं। प्रत्येक भेद के अंदर उपभेद हैं। स्वर संधि के पाँच नाम सबसे अधिक पूछे जाते हैं — दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण, अयादि।
पहचान की सरल सीढ़ी यह है। दोनों ओर स्वर दिखें — स्वर संधि सोचो। पूर्व में विसर्ग दिखे — विसर्ग संधि सोचो। पूर्व में व्यंजन और पर में कोई वर्ण — व्यंजन संधि सोचो। फिर विच्छेद करो और नियम लगाओ। बिना विच्छेद के नाम बताना अनुमान है। नाम के बाद हमेशा विच्छेद लिखो। यही परीक्षा की भाषा है।
| भेद | क्या मिलता है | उदाहरण | विच्छेद |
|---|---|---|---|
| स्वर संधि | स्वर + स्वर | देवेंद्र, हिमालय | देव + इंद्र · हिम + आलय |
| व्यंजन संधि | व्यंजन + वर्ण | सज्जन, उल्लास | सत् + जन · उत् + लास |
| विसर्ग संधि | विसर्ग + वर्ण | निश्चल, मनोरथ | निः + चल · मनः + रथ |
2 दीर्घ संधि और गुण संधि
दीर्घ संधि सबसे सीधी स्वर संधि है। नियम यह है — समान स्वर पास आएँ तो दोनों मिलकर उसी स्वर का दीर्घ रूप बन जाते हैं। अ या आ के बाद अ या आ आने पर आ बनता है। हिम + आलय = हिमालय। विद्या + आलय = विद्यालय। महा + आत्मा = महात्मा। परम + अर्थ = परमार्थ। इ या ई के बाद इ या ई आने पर ई बनता है। कवि + इंद्र = कवींद्र। गिरि + ईश = गिरीश। मुनि + ईश = मुनीश। उ या ऊ के बाद उ या ऊ आने पर ऊ बनता है। भानु + उदय = भानूदय। लघु + ऊर्मि = लघूर्मि। सूत्र याद रखने योग्य है — अकः सवर्णे दीर्घः। सरल भाषा में — समान परिवार के स्वर मिलकर लंबे हो जाते हैं। “समान” का अर्थ ह्रस्व-दीर्घ दोनों एक परिवार हैं। अ और आ एक परिवार। इ और ई एक। उ और ऊ एक। अ के बाद इ आए तो दीर्घ नहीं चलेगी — वह गुण का क्षेत्र है।
गुण संधि तब चलती है जब अ या आ के बाद भिन्न स्वर इ, ई, उ, ऊ या ऋ आए। अ या आ + इ या ई = ए। देव + इंद्र = देवेंद्र। नर + इंद्र = नरेंद्र। महा + इंद्र = महेंद्र। अ या आ + उ या ऊ = ओ। सूर्य + उदय = सूर्योदय। महा + उत्सव = महोत्सव। गंगा + उदक = गंगोदक। अ या आ + ऋ = अर्। महा + ऋषि = महर्षि। देव + ऋषि = देवर्षि। सूत्र — आद् गुणः। गुण का अर्थ व्याकरण में ए, ओ, अर् जैसा मध्यम परिणाम है। दीर्घ समान को लंबा करती है। गुण अ-आ को इ-उ-ऋ से मिलाकर एक नया मध्यम स्वर बनाती है। दोनों का अंतर उदाहरण से बैठता है। विद्यालय में आ + आ = आ, इसलिए दीर्घ। देवेंद्र में अ + इ = ए, इसलिए गुण। महर्षि में आ + ऋ = अर्, इसलिए गुण। यदि कोई महर्षि को दीर्घ कहे, उसने परिवार मिला दिया।
दोनों संधियों को घुमाकर देखो। विच्छेद करते समय दीर्घ स्वर को तोड़ना होता है। हिमालय का आ किसका है — हिम का अ और आलय का आ, दोनों मिलकर एक आ। देवेंद्र का ए देव के अ और इंद्र के इ से बना। महर्षि का र्षि ऋषि से आया, महा का आ अर् में घुल गया। बिना इस “कहाँ गया कौन-सा स्वर” के संधि रटी हुई जादू रहती है। उत्तर में नियम एक वाक्य, सूत्र यदि याद हो, दो उदाहरण, और एक विच्छेद लिखो।
| संधि | नियम | उदाहरण |
|---|---|---|
| दीर्घ | समान स्वर → दीर्घ | हिमालय, विद्यालय, कवींद्र, भानूदय |
| गुण | अ/आ + इ/ई = ए; + उ/ऊ = ओ; + ऋ = अर् | देवेंद्र, सूर्योदय, महर्षि |
3 वृद्धि, यण और अयादि संधि
वृद्धि संधि गुण से एक सीढ़ी ऊपर है। अ या आ के बाद ए या ऐ आने पर ऐ बनता है। एक + एक = एकैक। सदा + एव = सदैव। मत + ऐक्य = मतैक्य। अ या आ के बाद ओ या औ आने पर औ बनता है। वन + औषधि = वनौषधि। महा + औषध = महौषध। परम + औषध = परमौषध। सूत्र — वृद्धिरेचि। वृद्धि के परिणाम ऐ और औ हैं। गुण के परिणाम ए और ओ हैं। यही अंतर याद रखने योग्य है। देवेंद्र गुण है क्योंकि इ आया, ए बना। सदैव वृद्धि है क्योंकि ए आया, ऐ बना। जो विद्यार्थी दोनों को “अ के बाद कुछ तो ए-ऐ” कहकर मिला देता है, वह सीढ़ी खो देता है।
यण संधि तब चलती है जब इ, ई, उ, ऊ या ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए। इ या ई व्यंजन य् बन जाते हैं। इति + आदि = इत्यादि। अति + आचार = अत्याचार। यदि + अपि = यद्यपि। उ या ऊ व् बन जाते हैं। सु + आगत = स्वागत। अनु + एषण = अन्वेषण। ऋ र् बन जाता है। पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा। सूत्र — इको यणचि। सरल भाषा में — छोटे स्वर अपने से अलग स्वर के सामने लौट कर व्यंजन बन जाते हैं, ताकि दोनों स्वर आमने-सामने न रह जाएँ। यदि बाद वाला स्वर समान हो तो यण नहीं, दीर्घ चलेगी — मुनि + ईश = मुनीश, यण नहीं। यही जाँच है।
अयादि संधि ए, ऐ, ओ, औ को खोलती है जब उनके बाद कोई स्वर आए। ए से अय् बनता है — ने + अन = नयन। ऐ से आय् — नै + अक = नायक। ओ से अव् — पो + अन = पवन। औ से आव् — पौ + अक = पावक। सूत्र — एचोऽयवायावः। यण इ-उ-ऋ को व्यंजन बनाती है। अयादि ए-ऐ-ओ-औ को दो टुकड़ों में खोलती है। नयन को यदि कोई यण कहे, उसने इ और ए मिला दिए। पवन यहाँ “पवन देवता” का तत्सम योग है — पो + अन; सामान्य तद्भव “पवन” शब्द-भंडार का उदाहरण अलग है। परीक्षा अयादि पर नयन, नायक, पवन, पावक चार नाम बहुत पूछती है। चारों का विच्छेद लिखना उत्तर को पूरा करता है।
| संधि | परिणाम | उदाहरण | विच्छेद |
|---|---|---|---|
| वृद्धि | ऐ / औ | सदैव, एकैक, वनौषधि | सदा + एव · वन + औषधि |
| यण | य् / व् / र् | इत्यादि, स्वागत, पित्राज्ञा | इति + आदि · सु + आगत · पितृ + आज्ञा |
| अयादि | अय् आय् अव् आव् | नयन, नायक, पवन, पावक | ने + अन · नै + अक · पो + अन · पौ + अक |
4 व्यंजन संधि
व्यंजन संधि में पूर्व व्यंजन पर वाले वर्ण के प्रभाव से बदलता है। स्वर संधि स्वर को स्वर से मिलाती है। यहाँ व्यंजन स्वयं रूप बदलता है। सबसे अधिक पूछे जाने वाले मेल त् और द् वाले हैं, क्योंकि “सत्”, “उत्”, “तत्” जैसे पूर्व पद बार-बार आते हैं। त् के बाद च या छ आने पर त् च् हो जाता है, फिर द्वित्व बनता है — सत् + चित् = सच्चित्; उत् + चारण = उच्चारण; सत् + चरित्र = सच्चरित्र। त् के बाद ज या झ आने पर ज्ज / ज्झ — सत् + जन = सज्जन; उत् + ज्वल = उज्ज्वल। त् के बाद ट-वर्ग आने पर ट् — उत् + डयन = उड्डयन। त् के बाद ल आने पर ल्ल — उत् + लास = उल्लास; उत् + लेख = उल्लेख। त् या द् के बाद ह आने पर प्रायः द्ध — उत् + हार = उद्धार; सत् + धर्म = सद्धर्म। ये मेल याद की मनमानी नहीं। पर व्यंजन पूर्व व्यंजन को अपने वर्ग या अपने घोष की ओर खींचता है, ताकि उच्चारण एक धारा में बहे।
कुछ और स्थिर नियम हैं। क् के बाद स्वर या घोष आने पर कभी ग् हो जाता है — वाक् + ईश = वागीश; दिक् + अंबर = दिगंबर; दिक् + गज = दिग्गज। म् शब्द के अंत में पर व्यंजन से पहले प्रायः अनुस्वार बनता है — सम् + तोष = संतोष; सम् + कृति = संस्कृति; सम् + गम = संगम। इसे अनुस्वार संधि भी कहा जाता है, पर परिवार व्यंजन संधि का है। वाक् + दान = वाग्दान — क् घोष के पहले ग् हो गया। पत्र में संस्कृत नियम-नाम कम, मेल और उदाहरण अधिक पूछे जाते हैं। इसलिए नियम को “त् + च = च्च” जैसी जोड़ी में लिखो, केवल “व्यंजन संधि होती है” मत लिखो।
विच्छेद करते समय बदला हुआ व्यंजन मूल पर लौटाओ। सज्जन का ज्ज सत् के त् और जन के ज से बना; मूल सत् + जन है, सज + जन नहीं। उद्धार का द्ध उत् + हार है, उद + धार की मनमानी मत गढ़ो जब प्रश्न संधि माँगे। संस्कृति सम् + कृति है; सं + कृति लिखना अधूरा है क्योंकि अनुस्वार म् से बना है। व्यंजन संधि का उत्तर तभी पूरा है जब मेल, परिणाम और विच्छेद तीनों दिखें।
| मेल | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
| त् + च / छ | च्च / च्छ | सच्चित्, उच्चारण |
| त् + ज | ज्ज | सज्जन |
| त् + ट / ड | ट्ट / ड्ड | उड्डयन |
| त् + ल | ल्ल | उल्लास, उल्लेख |
| त् / द् + ह | द्ध | उद्धार, सद्धर्म |
| क् + स्वर / घोष | ग् | वागीश, दिगंबर |
| म् + व्यंजन | अनुस्वार | संतोष, संस्कृति, संगम |
5 विसर्ग संधि
विसर्ग वह दो बिंदुक वाला चिह्न है — अः, निः, दुः, मनः, यशः, तपः। विसर्ग संधि में यही चिह्न पर वाले वर्ण से श्, ष्, स्, ओ या र् बन जाता है। पहला झुंड — विसर्ग श्, ष् या स् बन जाता है। विसर्ग के बाद च या छ आने पर श् — निः + चल = निश्चल; निः + छल = निश्छल। विसर्ग के बाद ट या ठ आने पर ष् — धनुः + टंकार = धनुष्टंकार; चतुः + टय = चतुष्टय। विसर्ग के बाद त या थ आने पर स् — निः + तेज = निस्तेज; निः + सार = निस्सार; दुः + तर = दुस्तर। विसर्ग के बाद क या ख आने पर ष् — दुः + कर्म = दुष्कर्म; निः + कपट = निष्कपट; निः + फल = निष्फल। याद रखने की कुंजी पर व्यंजन का वर्ग है। च-वर्ग के पास श, ट-वर्ग के पास ष, त-वर्ग के पास स, क-वर्ग के पास ष — उच्चारण-स्थान की ओर विसर्ग खिंचता है।
दूसरा झुंड — अः के बाद घोष व्यंजन आने पर विसर्ग प्रायः ओ बन जाता है। मनः + रथ = मनोरथ। तपः + वन = तपोवन। यशः + दा = यशोदा। मनः + अनुकूल = मनोनुकूल। अः + अ पर भी ओ आता है — कः + अपि = कोपि / कोऽपि। यह ओ-आदेश है। तीसरा झुंड — इः या उः के बाद स्वर या घोष आने पर विसर्ग र बन जाता है। निः + आकार = निराकार। दुः + आत्मा = दुरात्मा। निः + आहार = निराहार। यहाँ विसर्ग लुप्त नहीं हुआ, र हो गया; फिर स्वर मिल गए। तीन स्थितियाँ याद रखो — श्/ष्/स्, ओ-आदेश, र-आदेश। विच्छेद में विसर्ग वापस दिखाना आवश्यक है। निश्चल = निः + चल, निश + चल नहीं। निराकार = निः + आकार, निर + आकार केवल बीच की सीढ़ी है। मनोरथ = मनः + रथ, मनो + रथ केवल उच्चारण का टुकड़ा है, मूल विसर्ग वाला पद है।
विसर्ग संधि स्वर संधि से इसलिए अलग है कि पूर्व में स्वर नहीं, विसर्ग है। व्यंजन संधि से इसलिए अलग है कि पूर्व पूर्ण वर्ग-व्यंजन नहीं, अयोगवाह विसर्ग है। इकाई 1 ने अयोगवाह नाम सिखाया था — अं और अः। वही अः यहाँ काम पर है। उत्तर में तीन झुंड, प्रत्येक का एक उदाहरण, और एक विच्छेद लिखो। केवल “विसर्ग बदल जाता है” अधूरा है।
| स्थिति | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|
| ः + च / छ | श् | निश्चल, निश्छल |
| ः + त / थ | स् | निस्तेज, निस्सार |
| ः + क / ख | ष् | दुष्कर्म, निष्कपट |
| ः + ट / ठ | ष् | धनुष्टंकार, चतुष्टय |
| अः + घोष व्यंजन | ओ | मनोरथ, तपोवन, यशोदा |
| इः / उः + स्वर | र् | निराकार, दुरात्मा, निराहार |
6 समास — अर्थ, विग्रह और पहचान
समास का अर्थ संक्षेप है। दो या अधिक पद मिलकर एक समस्त पद बनते हैं। बीच के कारक-चिह्न, योजक और कभी विभक्ति लुप्त हो जाते हैं। मूल अर्थ खोलना विग्रह है। राजपुत्र का विग्रह “राजा का पुत्र” है। गंगाजल का “गंगा का जल”। नीलकमल का “नीला है जो कमल”। समास पदों का योग है। संधि वर्णों का योग है। विद्यालय में विद्या और आलय के स्वर मिले — संधि। राजपुत्र में राजा और पुत्र दो पद एक शब्द बने — समास। यौगिक शब्द प्रायः समास या उपसर्ग-प्रत्यय से बनते हैं। समास बिना अर्थ-संबंध के नहीं होता। दो शब्द पास रख देने मात्र से समास नहीं बनता।
पहचान प्रधान पद से होती है। जो अर्थ सबसे आगे रहे, वही प्रधान। अव्ययीभाव में पूर्व पद प्रधान है, और समस्त पद अव्यय की तरह चलता है। तत्पुरुष में उत्तर पद प्रधान है। कर्मधारय तत्पुरुष का वह भेद है जहाँ पूर्व विशेषण है, उत्तर विशेष्य; उत्तर प्रधान रहता है। द्विगु में पूर्व पद संख्या है, समाहार प्रधान है। द्वंद्व में दोनों प्रधान हैं। बहुव्रीहि में समस्त पद किसी तीसरे अर्थ का वाचक है — दोनों पद किसी और के लक्षण हैं। छह नाम अपने विग्रह से पहचाने जाते हैं, रंगीन शीर्षक से नहीं। विधि यह है: पहले विग्रह लिखो। विग्रह में “के अनुसार / तक” हो तो अव्ययीभाव सोचो। “का, के, से, में, को” लौटे और उत्तर संज्ञा हो तो तत्पुरुष। “जो है” लौटे तो कर्मधारय। संख्या पहले हो तो द्विगु। “और” लौटे तो द्वंद्व। “जिसका / जिसके” लौटे और अर्थ किसी व्यक्ति या वस्तु पर जाए तो बहुव्रीहि।
समास और संधि एक शब्द में साथ भी रह सकते हैं, पर प्रश्न अलग रहते हैं। यदि पूछा जाए संधि-विच्छेद, ध्वनि तोड़ो। यदि पूछा जाए समास, अर्थ तोड़ो। हिमालय को कोई हिम + आलय संधि बताए — सही। उसे पर्वत का नाम बताते हुए समास भी कहा जा सकता है — हिम का आलय, तत्पुरुष। पत्र स्पष्ट करे तो वही उत्तर दो। अस्पष्ट हो तो दोनों संभावना एक पंक्ति में खोलो, मिलाओ मत।
7 अव्ययीभाव और तत्पुरुष
अव्ययीभाव में पूर्व पद अव्यय होता है और वही प्रधान है। समस्त पद अव्यय की तरह व्यवहार करता है — लिंग-वचन से नहीं बदलता। यथाशक्ति — शक्ति के अनुसार। यथाक्रम — क्रम के अनुसार। आजन्म — जन्म से लेकर। आजीवन — जीवन भर। प्रतिदिन — प्रत्येक दिन। भरपेट — पेट भरकर। विग्रह में अव्यय का अर्थ पहले आता है — अनुसार, तक, प्रत्येक, भर। यदि समस्त पद को बहुवचन बनाने लगो और रूप न बदले, पहचान मजबूत होती है। “प्रतिदिन अच्छे हैं” नहीं चलेगा; प्रतिदिन अव्यय है।
तत्पुरुष में उत्तर पद प्रधान है। पूर्व पद उत्तर को कारक-अर्थ देता है। विग्रह में का, के, से, में, को, के लिए लौट आता है। संबंध तत्पुरुष — राजपुत्र (राजा का पुत्र), गंगाजल (गंगा का जल), देवालय (देव का आलय), घुड़सवार (घोड़े का सवार)। करण — शोकाकुल (शोक से आकुल), प्रेमांध (प्रेम से अंधा)। अपादान — धनहीन (धन से हीन), रोगमुक्त (रोग से मुक्त)। अधिकरण — जलमग्न (जल में मग्न), वनवास (वन में वास)। कर्म — ग्रामगत (ग्राम को गया), स्वर्गप्राप्त। संप्रदान — पुत्रहित (पुत्र के लिए हित), देवादत्त (देव के लिए दिया)। उत्तर पद संज्ञा रहता है। यही कर्मधारय से अंतर का द्वार है। कर्मधारय में पूर्व गुण बताता है, कारक-चिह्न नहीं। तत्पुरुष में पूर्व कारक-अर्थ देता है। राजपुत्र राजा का पुत्र है, “राजा है जो पुत्र” नहीं। नीलकमल नीला है जो कमल — कर्मधारय। दोनों को एक मत बनाओ।
| समास | प्रधान | विग्रह-संकेत | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| अव्ययीभाव | पूर्व | के अनुसार · तक · प्रत्येक | यथाशक्ति, प्रतिदिन, आजन्म |
| तत्पुरुष | उत्तर | का · से · में · को | राजपुत्र, गंगाजल, शोकाकुल |
8 कर्मधारय और द्विगु
कर्मधारय तत्पुरुष का वह भेद है जिसमें पूर्व पद विशेषण है और उत्तर विशेष्य। दोनों पद एक ही वस्तु के दो पहलू हैं, दो अलग वस्तुएँ नहीं। विग्रह में “जो है” आता है। नीलकमल — नीला है जो कमल। महात्मा — महान है जो आत्मा। पीतांबर यदि पीला वस्त्र मात्र हो तो कर्मधारय; यदि विष्णु हो तो बहुव्रीहि — अगला पाठ यह फाँक खोलेगा। पुरुषसिंह — पुरुष रूपी सिंह; उपमान-उपमेय कर्मधारय भी यहीं गिना जाता है। चरणकमल — चरण रूपी कमल। पहचान यह है कि समस्त पद उसी वस्तु का नाम रहता है जिसका उत्तर पद है। नीलकमल कमल ही है, कोई तीसरा देवता नहीं।
द्विगु कर्मधारय के निकट है, किंतु पूर्व पद संख्यावाचक होता है और प्रायः समाहार प्रधान है। त्रिभुवन — तीन भुवनों का समाहार। पंचवटी — पाँच वटों का समूह। सप्तर्षि — सात ऋषियों का समूह। नवग्रह — नौ ग्रहों का समाहार। चौमासा — चार महीनों का समूह। विग्रह में संख्या पहले आती है। कर्मधारय गुण बताता है। द्विगु गिनती बताता है। यही अंतर स्थिर है। नवग्रह को यदि कोई कर्मधारय कहे, उसने संख्या को रंग समझ लिया। महात्मा को यदि कोई द्विगु कहे, उसने “महा” को संख्या समझ लिया। महा यहाँ महान है, गिनती नहीं।
| समास | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| कर्मधारय | विशेषण + विशेष्य · जो है | नीलकमल, महात्मा, चरणकमल |
| द्विगु | संख्या + संज्ञा · समाहार | त्रिभुवन, पंचवटी, नवग्रह, सप्तर्षि |
9 द्वंद्व और बहुव्रीहि
द्वंद्व में दोनों पद प्रधान हैं। कोई किसी के नीचे नहीं। विग्रह “और” से होता है। रामलक्ष्मण — राम और लक्ष्मण। सुखदुःख — सुख और दुःख। अन्नजल — अन्न और जल। पापपुण्य — पाप और पुण्य। सीता-राम। इतरेतर द्वंद्व में प्रत्येक अलग रहता है — दोनों व्यक्ति या दोनों वस्तुएँ अपने-अपने रूप में। समाहार द्वंद्व समूह बनाता है। तत्पुरुष में उत्तर प्रधान है। द्वंद्व में दोनों। यदि कोई रामलक्ष्मण को तत्पुरुष कहे, उसने लक्ष्मण को प्रधान और राम को उसके कारक-अर्थ जैसा बना दिया — अर्थ टूट जाता है।
बहुव्रीहि इस इकाई का सबसे चतुर समास है। समस्त पद किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु का वाचक है। दोनों पद उस अन्य के लक्षण हैं। विग्रह “जिसका / जिसके / जिसमें” से होता है। पीतांबर — पीला है अंबर जिसका, अर्थात् विष्णु। चक्रपाणि — चक्र है पाणि में जिसके, अर्थात् विष्णु। दशानन — दस हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण। लंबोदर — लंबा है उदर जिसका, अर्थात् गणेश। नीलकंठ — नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव। चतुर्भुज — चार हैं भुजाएँ जिसकी। पहचान अन्यार्थ है। कर्मधारय नीलकमल कमल ही है। बहुव्रीहि नीलकंठ शिव है, कंठ नहीं। द्विगु चतुर्भुज यदि केवल “चार भुजाओं का समाहार” हो तो द्विगु; यदि विष्णु हो तो बहुव्रीहि। अर्थ तय करता है, केवल शब्द नहीं। योगरूढ़ शब्द प्रायः बहुव्रीहि की गोद में बैठते हैं — पंकज कमल के लिए रूढ़ हो गया।
छह समासों को एक जाँच-पंक्ति में बाँधो। पूर्व प्रधान और अव्यय — अव्ययीभाव। उत्तर प्रधान और कारक-विग्रह — तत्पुरुष। जो है — कर्मधारय। संख्या और समाहार — द्विगु। और — द्वंद्व। जिसका और कोई तीसरा — बहुव्रीहि। परीक्षा एक ही शब्द पर दो नाम इसलिए पूछती है कि अर्थ बदलते ही समास बदल जाता है। उत्तर में नाम के साथ विग्रह लिखो। बिना विग्रह के नाम अधूरा रहता है।
| समास | विग्रह | उदाहरण |
|---|---|---|
| द्वंद्व | और | रामलक्ष्मण, सुखदुःख, अन्नजल |
| बहुव्रीहि | जिसका / जिसके | पीतांबर, दशानन, चक्रपाणि, नीलकंठ |
10 उपसर्ग
उपसर्ग वह शब्दांश है जो सार्थक शब्द के आगे लगकर अर्थ बदलता है या नया अर्थ देता है। मूल शब्द अपने आप अर्थ रखता है। उपसर्ग उसी अर्थ को मोड़ता है। हार मूल है — हारना या माला, संदर्भ से। प्र + हार = प्रहार, चोट। आ + हार = आहार, भोजन। वि + हार = विहार, घूमना। सम् + हार = संहार, नाश। परि + हार = परिहार, त्याग। एक मूल से पाँच संसार। यही उपसर्ग की शक्ति है। बिना मूल के उपसर्ग अधूरा टुकड़ा है। “प्र” अकेला शब्द नहीं। “हार” के आगे लगकर वह शब्द बनता है।
संस्कृत के प्रचलित उपसर्ग बाईस माने जाते हैं — प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आ, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप। अर्थ के रंग याद रखने योग्य हैं, पूरी कविता नहीं। प्र — आगे, अधिक। परा — उलटा, पीछा। अप — दूर, बुरा। सम् — साथ, पूर्ण। अनु — पीछे, अनुसार। अव — नीचे। निर् / निस् — बिना, बाहर। दुर् / दुस् — कठिन, बुरा। वि — विशेष, अलग। आ — तक, ओर। नि — भीतर, निषेध। अधि — ऊपर, अधिकार। अति — अधिक। सु — अच्छा। उत् — ऊपर, उत्कर्ष। अभि — ओर, सामने। प्रति — उलटा, प्रत्येक। परि — चारों ओर। उप — निकट, सहायक। हिन्दी के अपने उपसर्ग अ, अन, अध, उन, भर, नि, कु हैं — अज्ञान, अनहोनी, अधकचरा, उनतीस, भरपेट, कुचाल। विदेशी उपसर्ग अरबी-फ़ारसी और अंग्रेज़ी से आए — बेईमान, कमज़ोर, लापता, गैरकानूनी, सरदर्द। उपसर्ग शब्द के आगे लगता है, पीछे नहीं। पीछे लगने वाला प्रत्यय है।
पहचान का अभ्यास काट-छाँट है। अनुभव = अनु + भव। स्वागत में सु उपसर्ग है, आगत मूल के निकट; साथ यण संधि भी है — सु + आगत। संतोष = सम् + तोष, व्यंजन संधि सहित। एक शब्द में उपसर्ग और संधि दोनों हो सकते हैं। प्रश्न जो माँगे वही नाम दो, दोनों को एक मत बनाओ। उपसर्ग मूल के अर्थ को मोड़ता है; संधि केवल ध्वनि मिलाती है। प्रहार में प्र अर्थ मोड़ता है। विद्यालय में आ + आ केवल ध्वनि मिलाते हैं, नया उपसर्ग नहीं जोड़ते।
| वर्ग | उपसर्ग | उदाहरण |
|---|---|---|
| संस्कृत | प्र, आ, वि, सु, दुर्, अनु, उप, अभि, परि, सम् | प्रहार, आहार, सुपुत्र, अनुभव, संहार |
| हिन्दी | अ, अन, अध, भर, कु | अज्ञान, अनहोनी, भरपेट, कुचाल |
| विदेशी | बे, कम, ला, गैर, सर | बेईमान, लापता, गैरकानूनी |
11 प्रत्यय
प्रत्यय वह शब्दांश है जो शब्द के पीछे लगकर नया शब्द बनाता है। उपसर्ग आगे है। प्रत्यय पीछे है। दो बड़े परिवार हैं। कृत् प्रत्यय धातु के पीछे लगता है। धातु क्रिया का मूल है — पढ़्, लिख्, चल्, दा। पढ़् + आई = पढ़ाई। लिख् + अक = लेखक। दा + ता = दाता। उड़् + आन = उड़ान। चल् + न = चलन। लिख् + आवट = लिखावट। वाला भी कृत् के निकट गिना जाता है — पढ़नेवाला, रखनेवाला। कृदंत प्रायः क्रिया से संज्ञा या विशेषण बनाते हैं। लेखक संज्ञा है। लिखा विशेषण भी हो सकता है — लिखा हुआ पत्र।
तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण के पीछे लगता है, धातु के पीछे नहीं। बच्चा + पन = बचपन। मानव + ता = मानवता। धर्म + इक = धार्मिक। विज्ञान + इक = वैज्ञानिक। चतुर + आई = चतुराई। एक + ता = एकता। भारत + ईय = भारतीय। कृत् धातु से आता है। तद्धित नाम से आता है। यही अंतर स्थिर है। पढ़ाई कृत् है क्योंकि पढ़् धातु है। बचपन तद्धित है क्योंकि बच्चा संज्ञा है। दोनों में आई / पन जैसे टुकड़े दिख सकते हैं; निर्णय मूल शब्द की जाति से होता है, केवल अंत की ध्वनि से नहीं। स्त्री प्रत्यय तद्धित के निकट परिवार है — देव से देवी, हंस से हंसिनी, छात्र से छात्रा, गोप से गोपी। पुं-रूप के पीछे लगकर स्त्रीलिंग बनता है।
प्रत्यय वर्ग बदल सकता है। लिख् क्रिया है, लेखक संज्ञा, लिखावट संज्ञा। धर्म संज्ञा है, धार्मिक विशेषण। मानव संज्ञा है, मानवता भाववाचक संज्ञा। उपसर्ग प्रायः वर्ग नहीं बदलता, अर्थ मोड़ता है — हार संज्ञा, प्रहार संज्ञा। प्रत्यय प्रायः वर्ग या उपवर्ग बदलता है। यही गहरा अंतर है। उत्तर में कृत् और तद्धित की परिभाषा, प्रत्येक के तीन उदाहरण, स्त्री प्रत्यय की एक पंक्ति, और उपसर्ग से एक वाक्य का अंतर लिखो। “प्रत्यय पीछे लगता है” अकेला वाक्य इकाई नहीं खोलता।
| भेद | लगता है | उदाहरण |
|---|---|---|
| कृत् | धातु के पीछे | पढ़ाई, लेखक, दाता, उड़ान, लिखावट |
| तद्धित | संज्ञा / विशेषण के पीछे | बचपन, धार्मिक, मानवता, भारतीय |
| स्त्री प्रत्यय | पुं-रूप के पीछे | देवी, हंसिनी, छात्रा |
12 चारों औजारों का अंतर
अब चारों को एक मेज़ पर बैठाओ। संधि वर्णों का मेल है। नियम ध्वनि का है। विच्छेद दो खंड लौटाता है — देवेंद्र = देव + इंद्र। समास पदों का संक्षेप है। विग्रह वाक्यांश लौटाता है — राजपुत्र = राजा का पुत्र। विद्यालय संधि का उदाहरण पहले है; राजपुत्र समास का। उपसर्ग सार्थक शब्द के आगे लगता है और अर्थ मोड़ता है — हार, प्रहार, आहार। प्रत्यय पीछे लगता है और प्रायः वर्ग बदलता है — लिख, लिखाई, लेखक। एक वाक्य में — संधि ध्वनि मिलाती है, समास पद जोड़कर काटता है, उपसर्ग आगे से अर्थ मोड़ता है, प्रत्यय पीछे से शब्द गढ़ता है।
मिली-जुली पहचान का अभ्यास करो। स्वागत — सु + आगत, उपसर्ग भी, यण संधि भी। संहार — सम् + हार, उपसर्ग भी, व्यंजन संधि भी। हिमालय — हिम + आलय, दीर्घ संधि; समास की दृष्टि से हिम का आलय, तत्पुरुष। पीतांबर — समास बहुव्रीहि जब विष्णु हो; कर्मधारय जब केवल पीला वस्त्र हो। पत्र जो पूछे वही द्वार खोलो। चारों नाम एक उत्तर में ठूँसना तभी ठीक है जब प्रश्न “अंतर लिखिए” हो। अंतर के चार बिंदु — क्या मिलता है, कहाँ लगता है, क्या खुलता है विच्छेद या विग्रह, अर्थ बदलता है या केवल ध्वनि। इन्हीं चार बिंदुओं पर इकाई 2 पूरी होती है। इकाई 3 इन बने शब्दों को वाक्य में बिठाएगी और अशुद्धि काटेगी।
| औजार | मेल किसका | खोलने का ढंग | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| संधि | वर्ण | विच्छेद | देवेंद्र, विद्यालय, निश्चल |
| समास | पद | विग्रह | राजपुत्र, नीलकमल, दशानन |
| उपसर्ग | आगे का शब्दांश | मूल अलग करना | प्रहार, अनुभव, बेईमान |
| प्रत्यय | पीछे का शब्दांश | धातु या नाम अलग करना | लेखक, बचपन, देवी |
