हिन्दी भाषा, व्याकरण एवं संप्रेषण
मॉक पेपर 1
HINDI 4.5AECT21 • BA Semester 2 • 18 प्रश्न
| समय: 3 घंटे | पूर्णांक: 50 |
| खंड क: लघु उत्तर — 10 × 2 = 20 (सभी अनिवार्य) | |
| खंड ख: दीर्घ उत्तर — 3 में से कोई 2 × 5 = 10 | |
| खंड ग: कौशल — 5 में से कोई 4 × 5 = 20 | |
मातृभाषा वह भाषा है जिसे बालक माँ और घर से सीखता है — जैसे राजस्थानी भाषी बालक की मातृभाषा मारवाड़ी। राष्ट्रभाषा जनसंपर्क की वह व्यापक भाषा है जिससे देश भर के लोग आपस में काम चलाते हैं — भारत में हिन्दी। राजभाषा संविधान द्वारा स्वीकृत शासन की भाषा है — अनुच्छेद 343 के अनुसार देवनागरी लिपि में हिन्दी संघ की राजभाषा है।
सुरेंद्र = सुर + इंद्र (गुण संधि — अ + इ = ए)। विद्यालय = विद्या + आलय (दीर्घ संधि — आ + आ = आ)। पित्राज्ञा = पितृ + आज्ञा (यण संधि — ऋ + आ = रा)। दुष्कर्म = दुः + कर्म (विसर्ग संधि — ः + क = ष्)।
गंगाजल = गंगा का जल (तत्पुरुष — उत्तर पद प्रधान, का/की विभक्ति लुप्त)। चरणकमल = कमल के समान चरण (कर्मधारय — विशेषण-विशेष्य का मेल)। पंचवटी = पाँच वटों का समाहार (द्विगु — संख्या पूर्व, समाहार अर्थ)। नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव (बहुव्रीहि — दोनों पदों से भिन्न तीसरा अर्थ प्रधान)।
उपसर्ग (आगे लगकर): प्र + काश = प्रकाश, सु + गंध = सुगंध। प्रत्यय (पीछे लगकर): पढ़ + आई = पढ़ाई, मीठा + आस = मिठास। उपसर्ग प्रायः अर्थ बदलता है, प्रत्यय नया शब्द या नया वर्ग बनाता है।
जल — पानी, नीर। अग्नि — आग, पावक। सूर्य — सूरज, रवि। कमल — पंकज, जलज। समानार्थक शब्द अर्थ में समान होते हैं, पर प्रयोग संदर्भ के अनुसार बदलता है — पूजा में पुष्प, कविता में सुमन।
समश्रुत भिन्नार्थक वे शब्द हैं जो सुनने में एक जैसे लगते हैं पर अर्थ भिन्न होता है। अन्न = अनाज (खाने योग्य धान्य), अन्य = दूसरा (भिन्न)। आदि = आरंभ (शुरुआत), आदी = अभ्यस्त (जिसे आदत पड़ गई हो)। वाक्य से भेद स्पष्ट होता है — किसान अन्न उपजाता है; अन्य लोग चले गए।
(1) जो कभी न मरे — अमर। (2) जो लिखा न जा सके — अलेख्य। (3) जो सब जानता हो — सर्वज्ञ। वाक्यांश को एक शब्द में बाँधना ही इस प्रश्न की कला है — परिभाषा का सार पकड़ो, शब्द अपने आप मिलेगा।
निविदा (टेंडर) किसी कार्य या सामग्री की आपूर्ति हेतु इच्छुक पक्षों से प्रस्ताव आमंत्रित करने का प्रारूप है — इसमें कार्य का विवरण, शर्तें और अंतिम तिथि होती है। विज्ञप्ति सार्वजनिक सूचना का प्रारूप है — इसमें किसी आयोजन, अवकाश या निर्णय की जानकारी जनसामान्य को दी जाती है। निविदा प्रस्ताव माँगती है, विज्ञप्ति सूचना देती है।
पल्लवन किसी सूत्र, सूक्ति या कहावत के भाव का विस्तार है — बीज को वृक्ष बनाना। अंतर: (1) संक्षेपण बड़े को छोटा करता है, पल्लवन छोटे को बड़ा करता है। (2) संक्षेपण में मूल भाव सुरक्षित रखकर लंबाई एक-तिहाई की जाती है; पल्लवन में सूत्र के अर्थ को उदाहरणों और तर्कों से खोला जाता है।
क्रिया के दो भेद हैं। सकर्मक क्रिया — जिसका कर्म हो, अर्थात् क्रिया का फल कर्ता के साथ कर्म पर भी पड़े: राम ने रोटी खाई (क्या खाई — रोटी)। अकर्मक क्रिया — जिसका कर्म न हो, फल केवल कर्ता तक सीमित रहे: बच्चा सोता है (क्या सोता है — प्रश्न ही नहीं बनता)।
व्यंजन संधि में व्यंजन के बाद व्यंजन या स्वर आता है और पूर्व व्यंजन बदलता है। नियम: (1) त् + च/छ = च्च/च्छ — उच्चारण = उत् + चारण। (2) त् + ज = ज्ज — सज्जन = सत् + जन। (3) त् + ल = ल्ल — उल्लास = उत् + लास। (4) त्/द् + ह = द्ध — उद्धार = उत् + हार। विसर्ग संधि में विसर्ग (:) के बाद स्वर या व्यंजन आता है। नियम: (1) ः + च/छ = श् — निश्चल = निः + चल। (2) ः + त/थ = स् — निस्तेज = निः + तेज। (3) ः + क/ख/ट = ष् — निष्कपट = निः + कपट। (4) अः + घोष व्यंजन = ओ — मनोरथ = मनः + रथ, तपोवन = तपः + वन। पहचान की सीढ़ी: त्/द् के बाद वर्ण दिखे तो व्यंजन संधि, विसर्ग दिखे तो विसर्ग संधि।
उपसर्ग वह शब्दांश है जो सार्थक शब्द के आगे लगकर उसका अर्थ बदलता है — प्र + हार = प्रहार, अ + ज्ञान = अज्ञान, सु + पुत्र = सुपुत्र। प्रमुख उपसर्ग: प्र, परा, अप, सम्, वि, नि, दुस्, दुर्, सु, अति, अधि, अनु, अभि, अव, उत्, उप, परि, प्रति, आ। इनसे अर्थ में विशेषता, विरोध या तीव्रता आती है — ज्ञान से अज्ञान (विरोध), गमन से आगमन (दिशा)। प्रत्यय वह शब्दांश है जो शब्द के पीछे लगकर नया शब्द बनाता है। दो भेद: (1) कृत् प्रत्यय — धातु से संज्ञा/विशेषण बनाता है: पढ़ + आई = पढ़ाई, लिख + आवट = लिखावट। (2) तद्धित प्रत्यय — संज्ञा/विशेषण से नया शब्द: मीठा + आस = मिठास, बूढ़ा + आपा = बुढ़ापा। अंतर: उपसर्ग आगे लगता है और प्रायः अर्थ बदलता है; प्रत्यय पीछे लगता है और नया शब्द या नया वर्ग बनाता है।
मुहावरा रूढ़ पद-समूह है जिसका अर्थ शब्दों के अलग-अलग अर्थ से नहीं निकलता — आँख दिखाना अर्थात् क्रोध से डाँटना, कमर कसना अर्थात् तैयार होना। मुहावरा वाक्य का अंश होता है, स्वतंत्र वाक्य नहीं — शिक्षक ने देर से आने पर आँख दिखाई। लोकोक्ति लोक-अनुभव का संक्षिप्त सार है, पूर्ण स्वतंत्र कथन होती है — अधजल गगरी छलकत जाय अर्थात् थोड़े ज्ञान से अहंकार बढ़ना, ऊँची दुकान फीका पकवान अर्थात् दिखावा अधिक सार कम। अंतर: (1) मुहावरा वाक्यांश है, लोकोक्ति पूर्ण वाक्य। (2) मुहावरे में क्रिया लिंग-वचन के अनुसार बदलती है (नाक कट गई), लोकोक्ति स्थिर रहती है। (3) मुहावरा भाव प्रकट करता है, लोकोक्ति नीति या अनुभव देती है। दोनों ही भाषा को सजीव और प्रभावशाली बनाते हैं।
ज्ञान बुक डिपो, नई सड़क, जोधपुर। दिनांक: 18 सितंबर 2026। सेवा में, व्यवस्थापक, ज्ञान बुक डिपो, जोधपुर। विषय: पाठ्यपुस्तकों की आपूर्ति हेतु आदेश। महोदय, हमें अपने महाविद्यालय पुस्तकालय हेतु निम्नलिखित पुस्तकों की आवश्यकता है — (1) हिन्दी व्याकरण (कामताप्रसाद गुरु) — 20 प्रतियाँ, (2) मानक हिन्दी का स्वरूप (भोलानाथ तिवारी) — 15 प्रतियाँ, (3) व्यावहारिक हिन्दी व्याकरण (हरदेव बाहरी) — 15 प्रतियाँ। कृपया नवीनतम संस्करण की पुस्तकें उचित छूट सहित 15 दिनों के भीतर भेजने का कष्ट करें। भुगतान पुस्तकें प्राप्त होने पर चेक द्वारा किया जाएगा। सधन्यवाद। भवदीय, (हस्ताक्षर) पुस्तकालय प्रभारी, राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर।
राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर। अधिसूचना। क्रमांक: प. 8/अवकाश/2026। दिनांक: 20 मई 2026। सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि महाविद्यालय में ग्रीष्मावकाश दिनांक 25 मई 2026 से 30 जून 2026 तक रहेगा। इस अवधि में समस्त कक्षाएँ बंद रहेंगी। कार्यालय प्रातः 8 बजे से दोपहर 12 बजे तक खुला रहेगा। अवकाश के पश्चात् महाविद्यालय दिनांक 1 जुलाई 2026 को यथावत् खुलेगा। (हस्ताक्षर) प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय, बीकानेर।
शीर्षक: पुस्तकें — सच्ची मित्र। पुस्तकें मनुष्य की सच्ची मित्र हैं जो कभी धोखा नहीं देतीं। नित्य पठन से ज्ञान बढ़ता है और भाषा सुधरती है। वे महापुरुषों के अनुभवों से परिचित कराती हैं। पुस्तक न पढ़ने वाला कुएँ के मेंढक के समान सीमित रहता है। बचपन से पठन-आदत डालनी चाहिए; माता-पिता उपहार में पुस्तकें दें और विद्यालयों में पुस्तकालय हों। पुस्तक-प्रेमी समाज विचारों से समृद्ध होता है।
सूत्र का अर्थ यह है कि जहाँ सच्ची इच्छा होती है, वहाँ मार्ग अपने आप निकल आता है। चाह मन की वह आग है जो बाधाओं को भस्म कर देती है। इतिहास साक्षी है — जिन महापुरुषों ने ठाना, उन्होंने साधनों के अभाव में भी लक्ष्य पाया। एकलव्य के पास गुरु नहीं था, पर सीखने की चाह थी — उसने मिट्टी के द्रोण से ही धनुर्विद्या सिद्ध कर ली। इसके विपरीत, जिसके मन में चाह नहीं, उसे सारी सुविधाएँ भी निष्फल रहती हैं। चाह के साथ धैर्य और परिश्रम जुड़ जाएँ तो असंभव भी संभव हो जाता है। विद्यार्थी जीवन में यह सूत्र विशेष उपयोगी है — लक्ष्य स्पष्ट हो और चाह सच्ची हो, तो राह की हर बाधा सीढ़ी बन जाती है।
रूपरेखा: (1) प्रस्तावना — पर्यावरण का अर्थ और मानव-प्रकृति संबंध। (2) प्रदूषण के प्रकार — वायु, जल, ध्वनि और मृदा प्रदूषण। (3) कारण — औद्योगीकरण, वाहनों का धुआँ, प्लास्टिक, वनों की कटाई। (4) दुष्परिणाम — रोग, जलवायु परिवर्तन, जीवों का विनाश। (5) निवारण — वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा, जन-जागरण। (6) उपसंहार। विस्तार: प्रस्तावना में बताएँ कि जल, वायु, मृदा और वन मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। कारणों में कारखानों का धुआँ, नदियों में कचरा और शोर प्रमुख हैं। दुष्परिणामों में दमा, कैंसर जैसे रोग और ग्लोबल वार्मिंग आते हैं। निवारण हेतु प्रत्येक नागरिक वृक्ष लगाए, प्लास्टिक घटाए और सरकार कठोर नियम लागू करे। उपसंहार — धरती हमारी माँ है, इसकी रक्षा हमारा धर्म है।
