हिन्दी भाषा, व्याकरण एवं संप्रेषण

इकाई 1: भाषा का तात्पर्य, परिभाषा, प्रकृति और रूप
HINDI 4.5AECT21 • BA Semester 2 (AEC)

इकाई 1 · भाषा का तात्पर्य, परिभाषा, प्रकृति और रूप; हिन्दी की विशेषताएँ; क्रिया–विभक्ति–सर्वनाम–विशेषण–अव्यय; वर्ण-व्यवस्था; शब्द-भंडार

यह इकाई पूरे पत्र का दरवाजा है। पत्र का पूरा नाम तीन काम बाँधता है — हिन्दी भाषा, व्याकरण, और संप्रेषण। भाषा बिना समझे व्याकरण के नियम टुकड़े रह जाते हैं। व्याकरण बिना समझे पत्र और निबंध केवल अनुमान रह जाते हैं। संप्रेषण का अर्थ है विचार का सही पहुँचना — सुनने वाला वही समझे जो कहने वाला कहना चाहता था। इकाई 1 इसी नींव पर खड़ी है। आधिकारिक शीर्षक चार झुंड खोलता है। पहला: भाषा से तात्पर्य, परिभाषा, प्रकृति और विविध रूप। दूसरा: हिन्दी भाषा की विशेषताएँ। तीसरा: क्रिया, विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण और अव्यय। चौथा: हिन्दी की वर्ण-व्यवस्था और शब्द-भंडार। इकाई 2 शब्द जोड़ती है। इकाई 3 वाक्य और प्रयोग सुधारती है। इकाई 4 पत्र लिखवाती है। इकाई 5 सार, विस्तार और निबंध लिखवाती है। बिना इस इकाई के वे चारों हवा में लटकते हैं।

पाठ्यक्रम का उद्देश्य यही है कि विद्यार्थी दैनिक व्यवहार में शुद्ध और सक्षम हिन्दी चला सके, अपनी बात स्पष्ट कह सके। परिणाम में भाषा के जन्म, प्रकृति, लक्षण, वैशिष्ट्य और प्रकार का बोध चाहिए; व्यवहार में शुद्धि चाहिए; लेखन, कार्यालय और रोजगार तक संप्रेषण पहुँचे। इसलिए यहाँ केवल नामों की सूची नहीं चलेगी। हर परिभाषा के शब्द खोलने होंगे। हर भेद का एक काम बताना होगा। हर उदाहरण को वाक्य तक घुमाना होगा। जो बात दो नामों से मिलती-जुलती लगे, उसे यहीं अलग कर देना होगा — राजभाषा और राष्ट्रभाषा, कारक और विभक्ति, सर्वनाम और सार्वनामिक विशेषण, तत्सम और तद्भव। परीक्षा का छोटा उत्तर इन्हीं अंतरों से बनता है। लंबा उत्तर इन्हीं अंतरों को उदाहरण तक ले जाता है।

1 भाषा से तात्पर्य

भाषा शब्द संस्कृत धातु भाष् से जोड़ा जाता है। धातु का अर्थ है कहना, प्रकट करना, सामने लाना। तात्पर्य यह है: भाषा मनुष्य का वह साधन है जिससे वह अपने भीतर बैठी बात को बाहर लाता है, और दूसरे की बात को भीतर ले आता है। कामताप्रसाद गुरु इसी द्वार से परिभाषा खोलते हैं — प्रकट करना और ग्रहण करना, दोनों। केवल बोलना भाषा नहीं। केवल सुनना भी भाषा नहीं। जो मुँह से निकला और जो कान तक सही अर्थ में पहुँचा — दोनों मिलकर भाषा का काम पूरा करते हैं। कक्षा में अध्यापक बोलें और विद्यार्थी कुछ और समझें, तो ध्वनि तो गई, संप्रेषण नहीं हुआ। पत्र का तीसरा शब्द संप्रेषण यहीं से जुड़ता है। संप्रेषण पहुँच का नाम है। भाषा उस पहुँच का सबसे स्थिर और सबसे लचीला औजार है।

मनुष्य संप्रेषण के और भी रास्ते चलाता है। आँख की चमक, हाथ का इशारा, चित्र, सीटी, लाल बत्ती, सड़क का चिह्न — ये सब संकेत हैं। संकेत सीमित रहते हैं। लाल बत्ती रुकने को कह सकती है, पर यह नहीं कह सकती कि “मैं कल दोपहर बाद पुस्तकालय में तुम्हें इतिहास का प्रश्न समझाऊँगा।” पशु भी ध्वनि निकालते हैं — कुत्ता भौंकता है, पक्षी चहकता है। वह ध्वनि भावना या चेतावनी तक जाती है। नया वाक्य नहीं बनता। मनुष्य सीमित ध्वनियों से असीमित वाक्य बना सकता है। जो बात उसने पहले कभी नहीं कही, वह भी कह सकता है। जो बात उसने पहले कभी नहीं सुनी, वह भी समझ सकता है। यही भाषा को मानव-मात्र की संपत्ति बनाता है। तात्पर्य इसलिए केवल “बोलचाल” नहीं। तात्पर्य है — विचार का ऐसा साधन जो सीखा जा सके, बाँटा जा सके, और नए वाक्य पैदा कर सके।

तात्पर्य तीन स्तरों पर बैठता है। वैयक्तिक स्तर पर भाषा सोचने का माध्यम भी है। बहुत सोच मौन रहकर भी शब्दों में चलती है। बिना भाषा के जटिल विचार टिकते नहीं। सामाजिक स्तर पर भाषा समूह की पहचान है। एक गाँव की बोली, एक प्रदेश की मानक भाषा, एक कक्षा की शब्दावली — ये बताते हैं हम किस समुदाय में खड़े हैं। सांस्कृतिक स्तर पर भाषा साहित्य, शास्त्र, शिक्षा और शासन की वाहक है। गीता, रामचरितमानस, समाचार-पत्र, न्यायालय का आदेश — सब भाषा पर सवार हैं। हिन्दी इन तीनों स्तरों पर उत्तर भारत की प्रमुख भाषा है, और संविधान के बाद संघ के काम की भाषा भी। यहाँ एक भ्रम काटना जरूरी है। राजभाषा संवैधानिक पद है — अनुच्छेद 343 संघ की भाषा को देवनागरी में हिन्दी बनाता है। राष्ट्रभाषा जन-संपर्क का व्यापक रूप है — लोग आपस में जिस भाषा से देश भर में काम चलाएँ। दोनों शब्द एक नहीं। तात्पर्य पढ़ते समय राजभाषा को “देश की एकमात्र भाषा” मत बनाओ, और राष्ट्रभाषा को सरकारी फ़ाइल का नाम मत बनाओ।

तात्पर्य का एक और किनारा लिपि है। बहुत विद्यार्थी भाषा और लिपि को एक मान लेते हैं। भाषा पहले कान की चीज़ है। बालक लिखना सीखने से पहले बोलना सीखता है। निरक्षर व्यक्ति भी पूरी भाषा चलाता है। लिपि स्मृति और शासन की सहेली है — बात को कागज़ पर बाँधती है, ताकि वह समय और दूरी पार कर सके। देवनागरी हिन्दी की लिपि है, हिन्दी स्वयं नहीं। उर्दू हिन्दी के बहुत निकट की भाषा है, लिपि अलग है। तात्पर्य यहीं साफ होता है: भाषा ध्वनि-व्यवस्था है जिससे मनुष्य विचार बाँटता है; लिपि उस व्यवस्था का बाद का चित्र है। इकाई आगे वर्णमाला पढ़ेगी। वर्णमाला लिपि का द्वार है, भाषा की पूरी परिभाषा नहीं।

पाठ्यक्रम परिणाम में भाषा के जन्म का बोध भी माँगता है। जन्म का अर्थ यह नहीं कि किसी एक दिन किसी ने पूरी भाषा गढ़ दी। भाषा समाज में पैदा होती है — साथ रहने, काम बाँटने और सोच बताने की जरूरत से। एक व्यक्ति अकेला भाषा नहीं जन्म देता; समूह ध्वनियों को अर्थ से बाँधता है, बच्चे उसे सुनकर पाते हैं। हिन्दी के ऐतिहासिक जन्म का रास्ता निर्धारित पुस्तकों में यही है — वैदिक भाषा से लौकिक संस्कृत, फिर प्राकृत, फिर अपभ्रंश, फिर आधुनिक हिन्दी। खड़ी बोली उस आधुनिक रूप की मानक धारा बनी। जन्म इसलिए दो स्तरों पर लिखो: सामान्य भाषा समाज की जरूरत से जन्मती है; हिन्दी भारतीय-आर्य धारा के लंबे परिवर्तन से जन्मती है। “भाषा ईश्वर ने एक बार में दे दी” और “भाषा किसी वैज्ञानिक ने प्रयोगशाला में बनाई” — दोनों अति हैं, परीक्षा का उत्तर नहीं।

2 भाषा की परिभाषा

परिभाषा तात्पर्य को जाँचने योग्य वाक्य बनाती है। आचार्य कामताप्रसाद गुरु लिखते हैं — भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है और दूसरों के विचार ग्रहण करता है। यह परिभाषा व्यवहार की है। इसमें दो दिशाएँ साफ हैं। पहली दिशा — मैं कहता हूँ। दूसरी दिशा — मैं समझता हूँ। बिना दूसरी दिशा के भाषा एकतरफा शोर रह जाती है। गुरु की परिभाषा विद्यार्थी को याद इसलिए रखनी चाहिए कि पत्र का संप्रेषण यहीं से खुलता है। कमी यह नहीं कि गुरु गलत हैं। कमी यह है कि यह परिभाषा अभी वैज्ञानिक अंग नहीं खोलती — ध्वनि क्यों, यादृच्छिक क्यों, समाज क्यों। वे अंग तिवारी और ब्लूमफील्ड देते हैं।

भोलानाथ तिवारी परिभाषा को वैज्ञानिक बनाते हैं — भाषा यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा कोई मानव-समाज विचार-विनिमय करता है। इस एक वाक्य के पाँच अंग अलग-अलग खोलो, तभी परिभाषा बैठती है। ध्वनि-प्रतीक का अर्थ है कि मूल इकाई आवाज़ है, और वह आवाज़ किसी अर्थ की ओर संकेत करती है। “जल” की तीन ध्वनियाँ उस तरल पदार्थ की ओर इशारा करती हैं जिसे हम पीते हैं। यादृच्छिक का अर्थ है — शब्द और अर्थ का प्राकृतिक, अनिवार्य बंधन नहीं है। पानी को “जल” कहना पेड़ का नियम नहीं, हिन्दी समाज की स्वीकृति है। अंग्रेज़ी वही वस्तु वाटर कहती है, फ़ारसी आब। यदि शब्द वस्तु से प्रकृति ने बाँधा होता, तो संसार की सब भाषाएँ एक ही शब्द चलातीं। व्यवस्था का अर्थ है — केवल ढेर सारे शब्द नहीं, उनके जोड़ने के नियम भी। “राम पत्र लिखता है” चलता है; “लिखता पत्र राम है” मानक हिन्दी नहीं। मानव-समाज का अर्थ है — एक व्यक्ति की निजी आवाज़ भाषा नहीं। यदि केवल तुम कोई ध्वनि निकालो और कोई दूसरा उसे अर्थ न माने, वह भाषा नहीं, संकेत-प्रयोग है। विचार-विनिमय उद्देश्य है — देना और लेना। तिवारी की परिभाषा परीक्षा के लंबे उत्तर का कंकाल है। प्रत्येक अंग के आगे एक पंक्ति का उदाहरण रखना उत्तर को पूरा करता है।

लियोनार्ड ब्लूमफील्ड कहते हैं — भाषा यादृच्छिक वाचिक प्रतीकों की व्यवस्था है। वाचिक का अर्थ मुख से निकली ध्वनि है। वे लिपि को भाषा का मूल नहीं मानते। फर्डिनांद द सस्यूर भाषा को सामाजिक संकेत-व्यवस्था कहते हैं। वे दो रूप अलग करते हैं। लांग समाज की साझी भाषा है — नियम, शब्द, व्यवस्था, जो व्यक्ति के जन्म से पहले भी चल रही थी और उसके बाद भी चलेगी। पारोल व्यक्ति का एक बार का प्रयोग है — आज सुबह तुमने जो वाक्य कहा। व्याकरण लांग पढ़ती है। संप्रेषण की सफलता पारोल में दिखती है। यदि कोई पूछे “भाषा व्यक्तिगत है या सामाजिक?”, उत्तर है — संपत्ति समाज की है, प्रयोग व्यक्ति का है। भारतीय नाम गुरु या तिवारी लिखो। वैज्ञानिक अंग खोलने पर तिवारी के साथ ब्लूमफील्ड या सस्यूर आ सकते हैं। केवल एक नाम रटना अधूरा उत्तर है।

परिभाषा में जो बात बार-बार आती है उसे स्थिर अंग मानो: ध्वनि या प्रतीक; यादृच्छिकता; व्यवस्था; समाज; विचार-विनिमय। पाँचों में से एक छूटे तो परिभाषा किसी और चीज़ की हो जाती है। चित्र-संकेत ध्वनि नहीं। जन्मजात चीख यादृच्छिक व्यवस्था नहीं। एक व्यक्ति की गुप्त बोली समाज नहीं। बिना अर्थ की आवाज़ विचार-विनिमय नहीं। इकाई की प्रकृति इन्हीं अंगों को धर्म के रूप में फैलाएगी। रूप इन्हीं अंगों को मौखिक-लिखित और बोली-भाषा में बाँटेगी। हिन्दी की विशेषताएँ इन्हीं अंगों को इस भाषा पर बैठाएँगी। इसलिए परिभाषा रटी सूची नहीं, आगे की सब पाठशाला की चाबी है।

आचार्यपरिभाषा का केंद्रउत्तर में क्या जोड़ो
कामताप्रसाद गुरुविचार प्रकट करना और ग्रहण करनादो दिशाएँ — कहना और समझना
भोलानाथ तिवारीयादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की सामाजिक व्यवस्थापाँच अंग खोलकर उदाहरण
ब्लूमफील्डयादृच्छिक वाचिक प्रतीकों की व्यवस्थामूल रूप मुख की ध्वनि
सस्यूरसामाजिक संकेत-व्यवस्थालांग = समाज का रूप; पारोल = व्यक्ति का प्रयोग

3 भाषा की प्रकृति

प्रकृति का अर्थ भाषा का स्वाभाविक धर्म है — वह गुण जो भाषा में लगभग हमेशा रहता है, किसी एक शब्द में नहीं, पूरी व्यवस्था में। परिभाषा ने भाषा को पहचाना। प्रकृति बताती है वह कैसी चीज़ है। तिवारी और बाहरी इन्हीं धर्मों को व्यावहारिक व्याकरण का द्वार कहते हैं। आठ धर्म याद की सूची नहीं, आठ जाँच हैं। प्रत्येक धर्म के आगे एक प्रमाण-वाक्य रखना चाहिए। केवल नाम गिनाना छोटा उत्तर भी अधूरा छोड़ता है।

पहला धर्म — भाषा सामाजिक संपत्ति है। व्यक्ति जन्म से कोई निजी व्याकरण लेकर नहीं आता। वह परिवार, पड़ोस, पाठशाला से भाषा पाता है। यदि एक बच्चा मनुष्यों से दूर पले, उसे मानव-भाषा नहीं मिलती। दूसरा धर्म — भाषा यादृच्छिक है। “गाय” शब्द में गाय जैसा कुछ बना हुआ नहीं बैठा। समाज ने वह ध्वनि उस पशु से बाँधी। तीसरा धर्म — भाषा अर्जित है, जन्मजात नहीं। रोना जन्मजात हो सकता है। “मैं प्यासा हूँ” सीखना पड़ता है। चौथा धर्म — भाषा परिवर्तनशील है। संस्कृत की बहुत इकाइयाँ प्राकृत में बदलीं, प्राकृत अपभ्रंश में, अपभ्रंश से आधुनिक हिन्दी निकली। “अग्नि” से “आग” तक का रास्ता परिवर्तन है। जो भाषा कभी न बदले, वह जीवित व्यवहार की भाषा कम, संरक्षित नमूना अधिक है। पाँचवाँ धर्म — भाषा ध्वन्यात्मक है। मूल रूप वाचिक है। लिपि बाद की सहेली है। छठा धर्म — भाषा व्यवस्थाबद्ध है। वर्ण से शब्द, शब्द से रूप, रूप से वाक्य — स्तर हैं, नियम हैं। सातवाँ धर्म — भाषा प्रतीकात्मक है। ध्वनि स्वयं वस्तु नहीं, वस्तु का संकेत है। “नदी” शब्द से पैर नहीं भीगते; संकेत से नदी का चित्र मन में उठता है। आठवाँ धर्म — भाषा उत्पादक है। सीमित वर्ण और सीमित शब्द से नए-नए वाक्य बनते हैं। “बालक पाठ पढ़ता है”, “बालक पाठ पढ़ रहा है”, “कल बालक कठिन पाठ ध्यान से पढ़ेगा” — एक ही सामग्री, नए वाक्य।

इन आठों के साथ दो बातें और बैठती हैं, जिन्हें कभी नौवाँ-दसवाँ धर्म कहा जाता है। भाषा मानवीय है — मनुष्य के समाज की। भाषा सीखी और सिखाई जा सकती है — इसलिए व्याकरण का शास्त्र बनता है, इसलिए यह पत्र पढ़ाया जाता है। प्रकृति का उलटा सोचना भ्रम पैदा करता है। यदि भाषा व्यक्तिगत संपत्ति होती, तो एक घर का बच्चा पड़ोसी की बात न समझता। यदि भाषा जन्मजात पूर्ण होती, तो अलग-अलग देश अलग भाषाएँ न चलाते। यदि भाषा कभी न बदलती, तो हम आज वैदिक वाक्य बोलते। यदि भाषा केवल शब्द-ढेर होती, व्याकरण की आवश्यकता न होती। प्रकृति इसलिए परिभाषा का विस्तार है, दूसरा विषय नहीं।

परीक्षा में “प्रकृति लिखिए” पर आठ धर्म, प्रत्येक की एक पंक्ति, और यादृच्छिक तथा सामाजिक पर एक-एक उदाहरण काफी है। “परिभाषा और प्रकृति में अंतर” पूछे तो कहो — परिभाषा भाषा को पहचानती है, प्रकृति उसके स्थायी गुण खोलती है। परिभाषा उत्तर देती है “भाषा क्या है”। प्रकृति उत्तर देती है “भाषा कैसी है”। दोनों एक प्रश्न के दो चेहरे हैं, दो अलग पत्र नहीं।

धर्मसरल अर्थएक प्रमाण
सामाजिकसमूह की संपत्तिबालक घर-समाज से भाषा पाता है
यादृच्छिकशब्द-अर्थ प्रकृति ने नहीं बाँधेजल / वाटर / आब — एक वस्तु, तीन संकेत
अर्जितसीखनी पड़ती हैबोलना सुनकर आता है, जन्म से पूरा नहीं
परिवर्तनशीलकाल के साथ रूप बदलता हैअग्नि से आग
ध्वन्यात्मकमूल रूप वाचिकनिरक्षर भी पूरी भाषा चलाता है
व्यवस्थाबद्धस्तर और नियमकर्ता–कर्म–क्रिया का क्रम
प्रतीकात्मकध्वनि अर्थ का संकेत“नदी” से पैर नहीं भीगते
उत्पादकसीमित इकाइयों से नए वाक्यपढ़ता है / पढ़ रहा है / पढ़ेगा

4 भाषा के विविध रूप

पाठ्यक्रम “विविध रूप” कहता है। विद्यार्थी यहाँ एक ही सूची में मौखिक, राजभाषा और ब्रज को गिनकर बैठ जाता है। यह तीन अलग दृष्टियों का मिश्रण है। रूप तभी साफ होते हैं जब तुम पूछो — किस दृष्टि से बाँट रहे हो? तीन दृष्टियाँ स्थिर रखो। पहली — प्रवाह की दृष्टि: बात मुख से जा रही है या लेखनी से। दूसरी — विस्तार की दृष्टि: कितने क्षेत्र और कितनी मानक स्वीकृति। तीसरी — प्रयोजन की दृष्टि: काम क्या है — घर, संपर्क, शासन, साहित्य। तीनों दृष्टियों के नाम एक उत्तर में आएँ, पर तीनों की सूचियाँ मिलाओ मत।

प्रवाह की दृष्टि से दो रूप हैं — मौखिक और लिखित। मौखिक रूप मूल है। बालक पहले सुनता है, बोलता है; लिखना बाद में आता है। मौखिक भाषा सुर, ठहराव, हाव-भाव का सहारा लेती है। एक ही वाक्य “तुम आए” प्रेम से भी कहा जा सकता है, उलाहने से भी। लिखित रूप स्मृति, शिक्षा, कानून और शासन का सहारा है। न्यायालय का निर्णय मौखिक रह जाए तो कल विवाद फिर खड़ा हो सकता है। लिखित रूप अधिक स्थिर और अधिक सोच-समझ कर सजाया जाता है। दोनों एक भाषा के दो रास्ते हैं, दो भाषाएँ नहीं। हिन्दी मौखिक भी है, लिखित भी। जो कहे “लिखित ही सच्ची भाषा है”, उसने प्रकृति का ध्वन्यात्मक धर्म काट दिया। जो कहे “लिखने की जरूरत नहीं”, उसने संप्रेषण के स्थायी रूप को काट दिया।

विस्तार की दृष्टि से तीन स्तर हैं — बोली, उपभाषा, भाषा। बोली छोटे क्षेत्र की बोलचाल है — गाँव, तहसील, एक सीमित समुदाय। व्याकरण वहाँ ढीला-ढाला व्यावहारिक रहता है, साहित्य का बड़ा विस्तार प्रायः नहीं। उपभाषा कई बोलियों का ऐसा समूह है जिसमें आपसी समझ अधिक है और कुछ साझा विशेषताएँ हैं। भाषा वह मानक और साहित्यिक विस्तार है जो शिक्षा, प्रशासन, समाचार और अंतर-क्षेत्रीय संपर्क चलाए। हिन्दी की मानक खड़ी बोली दिल्ली-मेरठ क्षेत्र की बोलचाल से निकलकर गद्य और शासन की भाषा बनी। ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी — ये विस्तृत बोलियाँ / उपभाषा-परंपरा के बड़े नाम हैं। इन्हें “गलत हिन्दी” कहना भ्रम है। ये हिन्दी-परिवार की समृद्धि हैं। मानक हिन्दी परीक्षा और कार्यालय का रूप है। बोली घर और लोक का रूप है। उपभाषा दोनों के बीच का पुल है। तीनों को सीढ़ी की तरह देखो, दुश्मन की तरह नहीं।

प्रयोजन की दृष्टि से कई रूप एक साथ चलते हैं। मातृभाषा वह भाषा है जो व्यक्ति बचपन में स्वाभाविक रूप से पाता है। संपर्क भाषा भिन्न मातृभाषा वालों को जोड़ती है — बाज़ार, छावनी, यात्रा, विश्वविद्यालय। राजभाषा शासन की भाषा है; भारत में संघ की राजभाषा हिन्दी है, देवनागरी लिपि में, अनुच्छेद 343 के अनुसार। राष्ट्रभाषा जन की व्यापक भाषा का विचार है; संविधान ने “राजभाषा” शब्द चुना, “राष्ट्रभाषा” को कानूनी पद नहीं बनाया। साहित्यिक भाषा काव्य और गद्य की सँवरी भाषा है। मानक भाषा शिक्षा, परीक्षा, कोश और कार्यालय की स्थिर भाषा है। हिन्दी ये रूप एक साथ साधती है — कोई बालक घर में राजस्थानी बोले, कक्षा में मानक हिन्दी लिखे, बाज़ार में संपर्क हिन्दी चलाए, और समाचार-पत्र साहित्यिक-मानक मिश्र चलाए। रूप लिखते समय तीन जोड़े आवश्यक हैं: मौखिक–लिखित; बोली–उपभाषा–भाषा; राजभाषा–राष्ट्रभाषा। इन्हीं तीन जोड़ों से “विविध रूप” पूरा होता है।

दृष्टिरूपपहचान
प्रवाहमौखिक · लिखितकान / कागज़
विस्तारबोली · उपभाषा · भाषाक्षेत्र और मानक स्वीकृति
प्रयोजनमातृ · संपर्क · राज · राष्ट्र · साहित्यिक · मानककाम क्या है

5 हिन्दी भाषा की विशेषताएँ

अब सामान्य भाषा से इस पत्र की भाषा पर आते हैं। हिन्दी भारोपीय परिवार की भारतीय-आर्य शाखा की भाषा है। परिवार का अर्थ है — दूर की बहन-भाषाएँ एक पुरानी जड़ साझा करती हैं। अंग्रेज़ी, फ़ारसी, संस्कृत दूर से उसी बड़े परिवार में बैठती हैं। भारतीय-आर्य शाखा का निकट रास्ता वैदिक और लौकिक संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश होता हुआ आधुनिक हिन्दी तक आता है। विशेषता का पहला वाक्य “हिन्दी भारत की भाषा है” नहीं, परिवार और शाखा का वाक्य है। भारत में द्रविड़ परिवार भी है। हिन्दी उनमें से नहीं, भारतीय-आर्य है। यह वाक्य परीक्षा में परिवार पूछे जाने पर काम आता है।

दूसरी विशेषता देवनागरी लिपि है। लेखन बाएँ से दाएँ चलता है। एक ध्वनि के लिए प्रायः एक चिह्न है — यही वैज्ञानिकता का दावा है। वर्णमाला स्वर पहले रखती है, व्यंजन कंठ से ओष्ठ तक स्थान-क्रम में सजाती है। कवर्ग कंठ्य, चवर्ग तालव्य, टवर्ग मूर्धन्य, तवर्ग दंत्य, पवर्ग ओष्ठ्य। रोमन वर्णमाला इस उच्चारण-क्रम पर नहीं चलती। देवनागरी की वैज्ञानिकता यहीं है — स्थान और प्रयत्न से वर्ण सजे हैं, याद की मनमानी पंक्ति से नहीं। तीसरी विशेषता व्याकरण की है। लिंग दो हैं — पुल्लिंग और स्त्रीलिंग। नपुंसक स्वतंत्र कोटि हिन्दी व्यवहार में नहीं चलती; जो वस्तु संस्कृत में नपुंसक थी, हिन्दी ने उसे प्रायः पुल्लिंग या स्त्रीलिंग में बैठा दिया — “पुस्तक” स्त्रीलिंग, “गृह” पुल्लिंग। वचन दो हैं — एकवचन और बहुवचन। कारक मुख्यतः परसर्ग से बनते हैं — ने, को, से, का / के / की, में, पर। संस्कृत में विभक्ति शब्द के अंत से चिपकती थी। हिन्दी में वही काम अलग छोटे शब्द करते हैं। वाक्य-क्रम प्रायः कर्ता, कर्म, क्रिया है — “बालक पत्र लिखता है।” सहायक क्रिया काल और पक्ष जोड़ती है — लिख रहा है, लिख चुका, लिखेगा।

चौथी विशेषता शब्द-भंडार की खुली शक्ति है। तिवारी इसे हिन्दी की बड़ी पूँजी कहते हैं। शब्द चार स्रोतों से आते हैं — तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी। एक ही अर्थ के दो स्तर एक वाक्य में बैठ सकते हैं — “अग्नि” और “आग”, “रात्रि” और “रात”। बोलियों का वैविध्य शक्ति है, दोष नहीं। खड़ी बोली आधुनिक गद्य और शासन की मानक आधार है। ब्रज और अवधी साहित्य की बड़ी उपभाषाएँ रही हैं। पाँचवीं विशेषता संवैधानिक स्थिति है। अनुच्छेद 343 हिन्दी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा बनाता है। अंकों के लिए अंतरराष्ट्रीय रूप का प्रावधान साथ है। अनुच्छेद 351 हिन्दी के विकास का निर्देश है, और यह भी कि वह भारत की अन्य भाषाओं के रूप, शैली और शब्दों को ग्रहण कर समृद्ध हो। राजभाषा शासन की भाषा है। राष्ट्रभाषा जन-संपर्क का व्यापक आदर्श है। दोनों को एक शब्द मत बनाओ।

विशेषताएँ लिखते समय सात बिंदु एक क्रम में लाओ: परिवार और शाखा; देवनागरी और वर्णमाला की वैज्ञानिकता; दो लिंग और दो वचन; परसर्ग-प्रधान कारक; कर्ता–कर्म–क्रिया क्रम; चार शब्द-स्रोत और बोलियों की समृद्धि; अनुच्छेद 343 और 351। प्रत्येक बिंदु एक उदाहरण से खुलता है। “हिन्दी मीठी है”, “हिन्दी जन-जन की भाषा है” — ये भाव हैं, विशेषता के शास्त्रीय बिंदु नहीं। पत्र गुरु, तिवारी और बाहरी के बिंदु माँगता है, شعار नहीं।

बिंदुहिन्दी में रूप
परिवारभारोपीय · भारतीय-आर्य
लिपिदेवनागरी · बाएँ से दाएँ · प्रायः एक ध्वनि एक चिह्न
लिंग / वचनदो / दो
कारकपरसर्ग प्रधान — ने, को, से, का, में, पर
वाक्य-क्रमकर्ता – कर्म – क्रिया
शब्द-स्रोततत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी
संविधानअनुच्छेद 343 राजभाषा · 351 विकास-निर्देश

6 क्रिया

पाठ्यक्रम अब हिन्दी के पाँच व्याकरणिक स्तंभ खोलता है — क्रिया, विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण, अव्यय। संज्ञा का नाम अलग शीर्षक में नहीं है, पर सब स्तंभ संज्ञा के आसपास काम करते हैं। क्रिया उस शब्द को कहते हैं जिससे किसी काम का करना या होना जाना जाए। “लिखता है”, “सोया”, “होगा”, “दिखाई देता है” — इनसे काम या अवस्था खुलती है। गुरु क्रिया को वाक्य की जान कहते हैं। बिना क्रिया के बहुत से वाक्य अधूरे रह जाते हैं। “राम पत्र” कहो तो अधूरा रह जाता है। “राम पत्र लिखता है” पूरा विचार बनता है। धातु क्रिया का मूल रूप है — लिख्, पढ़्, खा, जा, हो। धातु अकेली वाक्य में प्रायः नहीं बैठती। विकरण और प्रत्यय उसे काल, वचन, पुरुष के योग्य बनाते हैं — लिख + ता + है = लिखता है। नामधातु संज्ञा या विशेषण से बनती है — शर्म से शर्माना, दुख से दुखाना, हाथ से हथियाना। नामधातु को प्रेरणार्थक मत समझना। शर्माना संज्ञा से बनी क्रिया है। खिलाना “खा” धातु से बनी प्रेरणार्थक है। दोनों एक नहीं।

कर्म की दृष्टि से पहला बड़ा भेद सकर्मक और अकर्मक है। सकर्मक क्रिया का फल कर्ता पर न रहकर किसी और वस्तु या व्यक्ति पर पड़ता है। वह “कर्म” कहलाती है। “राम पत्र लिखता है” — लिखने का फल पत्र पर है, इसलिए सकर्मक। प्रश्न पूछो — क्या लिखता है? उत्तर आए तो कर्म है। अकर्मक में कर्म नहीं होता। “बालक सोता है” — क्या सोता है? यह प्रश्न नहीं चलता। कुछ धातु द्विकर्मक हैं — दो कर्म लेती हैं। “उसने मुझे पुस्तक दी।” किसे दी — मुझे; क्या दी — पुस्तक। मुख्य कर्म वस्तु है, गौण कर्म व्यक्ति। रचना की दृष्टि से मुख्य क्रिया और सहायक क्रिया हैं। मुख्य काम बताती है। सहायक काल, पक्ष, वाच्य जोड़ती है — है, था, रहा, चुका, जाएगा। “पढ़ रहा है” में पढ़ मुख्य है, रहा और है सहायक हैं। संयुक्त क्रिया दो क्रियाओं का ऐसा योग है जिससे एक नया अर्थ बनता है — पढ़ लिया (समाप्ति), चला गया (प्रस्थान), खा बैठा (आकस्मिकता)। संयुक्त क्रिया दो अलग-अलग काम नहीं, एक सधा हुआ अर्थ है।

प्रेरणार्थक क्रिया दूसरे से काम करवाने की है। खाना स्वयं करना है। खिलाना दूसरे को खिलाना है। खिलवाना किसी तीसरे से करवाना है। तीन सीढ़ियाँ याद रखो — मूल, प्रथम प्रेरणार्थक, द्वितीय प्रेरणार्थक। पूर्वकालिक क्रिया मुख्य क्रिया से पहले पूरा हो चुका काम बताती है — “नहाकर आया”, “पढ़कर सोया”। “कर” वाला रूप प्रायः पूर्वकालिक है। काल तीन हैं — भूत, वर्तमान, भविष्य। पक्ष बताता है काम किस अवस्था में है — सामान्य (लिखता है), अपूर्ण (लिख रहा है), पूर्ण (लिख चुका), संदिग्ध (लिखता होगा)। काल और पक्ष दो परतें हैं। केवल “तीन काल” लिखकर रुकना अधूरा हो सकता है यदि प्रश्न पक्ष भी माँगे। वाच्य तीन हैं। कर्तृवाच्य में कर्ता प्रधान है — “राम पत्र लिखता है।” कर्मवाच्य में कर्म प्रधान है — “पत्र लिखा गया।” भाववाच्य अकर्मक क्रिया पर चलता है, काम की असंभवता या अवस्था बताता है — “उससे चला नहीं जाता।” वाच्य बदलने से परसर्ग और क्रिया-रूप बदलते हैं। काल समय बताता है। वाच्य दृष्टि बताता है — कर्ता से देख रहे हो, कर्म से, या भाव से। दोनों को एक मत बनाओ।

क्रिया पहचानने की सरल जाँच यह है: शब्द पर क्या, कब, कैसे लगाया जा सकता है या नहीं — उससे अधिक यह पूछो कि वाक्य में काम या होना कहाँ है। “लिखना” धातु-संज्ञा भी हो सकती है — “लिखना कठिन है।” वहाँ लिखना विषय है, क्रिया का परिमित रूप नहीं। “वह लिखता है” में लिखता है क्रिया है। भेद वाक्य से खुलता है, शब्दकोश की एक पंक्ति से नहीं। उत्तर में नाम, एक वाक्य की परिभाषा, और एक उदाहरण — तीनों साथ रखो। केवल तालिका रटना शॉर्टकट है; पत्र यहाँ उदाहरण माँगता है।

भेदपहचानउदाहरण
सकर्मककर्म पर फलराम पत्र लिखता है
अकर्मककर्म नहींबालक सोता है
द्विकर्मकदो कर्मउसने मुझे पुस्तक दी
संयुक्तदो क्रियाओं से एक अर्थपढ़ लिया, चला गया
प्रेरणार्थकदूसरे से करवानाखिलाना, खिलवाना
पूर्वकालिकमुख्य से पहले पूरा कामपढ़कर सोया
कर्तृ / कर्म / भाव वाच्यदृष्टि कर्ता, कर्म या भाव परवह लिखता है / पत्र लिखा गया / चला नहीं जाता

7 विभक्ति और कारक

विभक्ति वह चिह्न है जो संज्ञा या सर्वनाम का वाक्य में काम बताता है — यह कर्ता है, यह कर्म है, यह साधन है, यह स्थान है। संस्कृत में विभक्ति शब्द के अंत का प्रत्यय होती थी — रामः, रामम्, रामेण। हिन्दी में वही काम प्रायः परसर्ग करते हैं। परसर्ग संज्ञा के बाद अलग लिखे जाते हैं — ने, को, से, के लिए, का / के / की, में, पर। “राम ने कहा” में “ने” परसर्ग है। बिना “ने” के भी कर्ता हो सकता है — “बालक पढ़ता है।” यहाँ चिह्न शून्य है, काम फिर भी कर्ता का है। इसलिए विभक्ति को केवल दिखने वाले शब्द मत समझो। कभी चिह्न मौजूद है, कभी अर्थ क्रम और क्रिया से निकलता है।

यहाँ सबसे जरूरी अंतर है। कारक अर्थ की दृष्टि है — संज्ञा का क्रिया से क्या संबंध है। विभक्ति या परसर्ग उस संबंध का चिह्न है। आठ कारक हैं। पहला कर्ता — काम करने वाला। चिह्न ने, या शून्य। “राम ने पत्र लिखा।” वर्तमान सामान्य में प्रायः ने नहीं लगता — “राम पत्र लिखता है।” दूसरा कर्म — जिस पर क्रिया का फल पड़े। चिह्न को, या शून्य। “राम को बुलाओ।” “पत्र लिखो” में पत्र कर्म है, को नहीं लगा। सजीव या विशेष कर्म पर को अधिक लगता है। तीसरा करण — साधन। चिह्न से, द्वारा। “कलम से लिखना।” चौथा संप्रदान — जिसके लिए कुछ दिया जाए। चिह्न को, के लिए। “गरीब को वस्त्र दो।” पाँचवाँ अपादान — जिससे अलग होना, डरना, तुलना। चिह्न से। “वृक्ष से पत्ता गिरा।” छठा संबंध — किसी का किसी से नाता। चिह्न का, के, की। “राम का भाई।” संबंध की विशेषता यह है कि यह मुख्यतः दो संज्ञाओं के बीच है, क्रिया से सीधा नहीं। सातवाँ अधिकरण — स्थान या समय का आधार। चिह्न में, पर। “कमरे में बैठो।” “रात को” समय के अधिकरण में कभी को भी आता है। आठवाँ संबोधन — पुकार। हे, अरे, ओ। “हे राम!” संबोधन पर परसर्ग नहीं लगता; यह वाक्य के किनारे की पुकार है।

एक ही परसर्ग दो कार्यों में आ सकता है। ने कर्ता का चिह्न है, करण का नहीं। से करण भी है, अपादान भी, कभी साधन-व्यक्ति भी। अंतर अर्थ से तय होता है। “कलम से लिखता है” — साधन, करण। “छत से गिरा” — अलग होना, अपादान। “राम से पूछो” — व्यक्ति के माध्यम से, प्रायः करण के निकट। को कर्म भी है, संप्रदान भी। “बालक को बुलाओ” कर्म। “बालक को मिठाई दो” संप्रदान। प्रश्न से भेद खुलता है — किसे बुलाओ / किसे दो, क्या दो। बिना वाक्य के परसर्ग का नाम नहीं बँधता। यही कारण है कि विभक्ति की तालिका रटना काफी नहीं। तालिका द्वार है। वाक्य कमरा है।

उत्तर लिखते समय आठों कारक, उनके परसर्ग, और एक-एक उदाहरण दो। फिर एक पंक्ति में लिखो — कारक अर्थ है, विभक्ति चिह्न है, हिन्दी में चिह्न प्रायः परसर्ग है। जो विद्यार्थी “ने को से का में पर” को ही विभक्ति समझकर रुक जाता है, वह संबोधन और शून्य-चिह्न दोनों खो देता है। जो संस्कृत की सात विभक्ति और हिन्दी के आठ कारक को गड्डमड्ड करता है, वह इस पत्र की हिन्दी को संस्कृत बना देता है। हिन्दी का रास्ता परसर्ग का है।

कारकप्रश्न-संकेतपरसर्गउदाहरण
कर्ताकिसने / कौनने / शून्यराम ने कहा · बालक पढ़ता है
कर्मकिसे / क्याको / शून्यराम को बुलाओ · पत्र लिखो
करणकिससे · किसके द्वारासे, द्वाराकलम से लिखना
संप्रदानकिसके लिएको, के लिएगरीब को वस्त्र दो
अपादानकिससे अलगसेवृक्ष से पत्ता गिरा
संबंधकिसकाका, के, कीराम का भाई
अधिकरणकहाँ / कबमें, परकमरे में बैठो
संबोधनपुकारहे, अरेहे मित्र!

8 सर्वनाम

सर्वनाम उस शब्द को कहते हैं जो संज्ञा के स्थान पर आए। नाम बार-बार दोहराने से वाक्य भारी हो जाता है। “मोहन आया। मोहन बैठा। मोहन ने जल माँगा।” तीन मोहन एक कहानी को ठूँस देते हैं। “मोहन आया। वह बैठा। उसने जल माँगा।” सर्वनाम पुनरुक्ति बचाता है। गुरु के व्याकरण में छह भेद स्थिर हैं। इन्हें उदाहरण के बिना मत लिखो। पहला पुरुषवाचक — बोलने वाला, सुनने वाला, जिसके विषय में बात हो। उत्तम पुरुष मैं, हम। मध्यम पुरुष तू, तुम, आप (आदर)। अन्य पुरुष वह, वे, यह, ये। दूसरा निश्चयवाचक — निश्चित व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत — यह, वह, ये, वे। निकट के लिए यह-ये, दूर के लिए वह-वे। तीसरा अनिश्चयवाचक — निश्चित नहीं — कोई, कुछ, किसी ने। चौथा संबंधवाचक — जो, सो; जो पढ़ेगा, वह सफल होगा। पाँचवाँ प्रश्नवाचक — कौन, क्या, कौन-सा, किसे। छठा निजवाचक — स्वयं, खुद, आप। “राम स्वयं आ गया” / “वह आप ही चला गया” में स्वयं और आप निजवाचक हैं — कर्ता अपनी ओर लौटता है। “आप बैठिए” में आप आदर का मध्यम पुरुष है। एक शब्द, दो काम। भेद वाक्य से होता है।

सर्वनाम विकारी है। लिंग, वचन, कारक के अनुसार रूप बदलते हैं — मैं, मुझे, मेरा, हम, हमें; वह, उसे, उसका, वे, उन्हें। यह बदलाव संज्ञा जैसा है, इसलिए सर्वनाम को अव्यय मत समझो। एक सूक्ष्म अंतर परीक्षा तोड़ता है। सार्वनामिक विशेषण अलग कोटि है। जब सर्वनाम जैसा शब्द संज्ञा के साथ खड़ा होकर विशेषता बताए, वह विशेषण बन जाता है। “वह आया” — वह सर्वनाम है, संज्ञा की जगह है। “वह लड़का आया” — वह अब लड़का की विशेषता है, सार्वनामिक विशेषण। “कौन है?” सर्वनाम। “कौन लड़का है?” विशेषण। अंतर वाक्य के काम से तय होता है, शब्दकोश की एक पंक्ति से नहीं।

पुरुषवाचक में आदर और वचन का व्यवहार हिन्दी की विशेषता है। एक व्यक्ति के लिए भी “आप आइए”, “वे आए हैं” बहुवचन जैसा रूप आदर में चलता है। यह व्याकरण की गलती नहीं, सामाजिक शिष्टता का नियम है। “तू” घनिष्ठता या कभी कठोरता में आता है; मानक गद्य प्रायः तुम या आप चलाता है। अनिश्चयवाचक “कोई” व्यक्ति की ओर जाता है, “कुछ” वस्तु या मात्रा की ओर — “कोई आया”, “कुछ गिरा”। संबंधवाचक बिना दूसरे खंड के अधूरा रहता है — केवल “जो” कहकर रुकना वाक्य नहीं। प्रश्नवाचक प्रश्न बनाता है; वही शब्द विस्मय में भी आ सकता है — “क्या बात है!” भेद स्वर और संदर्भ से खुलता है।

उत्तर में छह नाम, प्रत्येक का एक जोड़ा उदाहरण, और सार्वनामिक विशेषण की एक पंक्ति लिखो। “सर्वनाम संज्ञा की जगह आता है” अकेला वाक्य छोटा भी कमजोर है। जगह क्यों आता है, रूप कैसे बदलता है, और वही शब्द विशेषण कब बन जाता है — ये तीन परतें भेद को बैठाती हैं।

भेदकामउदाहरण
पुरुषवाचकबोलने / सुनने / अन्य व्यक्तिमैं, तुम, वह
निश्चयवाचकनिश्चित संकेतयह आया · वह गया
अनिश्चयवाचकअनिश्चितकोई, कुछ
संबंधवाचकदो खंड बाँधनाजो परिश्रम करेगा, वह जीतेगा
प्रश्नवाचकपूछनाकौन आया? क्या लाए?
निजवाचकस्वयं पर लौटनाराम स्वयं चला · वह खुद गया

9 विशेषण

विशेषण उस शब्द को कहते हैं जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताए — कैसा, कितना, कौन-सा, कितनेवाँ। विशेषता गुण हो सकती है, संख्या हो सकती है, नाप हो सकती है, संकेत हो सकता है। “काला घोड़ा” में काला घोड़े का रंग बताता है। “दो घोड़े” में दो गिनती बताता है। जिस संज्ञा की विशेषता बताई जाए उसे विशेष्य कहते हैं। विशेषण प्रायः विशेष्य से पहले आता है — अच्छा बालक। कभी बाद भी आता है — बालक अच्छा है। स्थान बदलने से काम नहीं बदलता, केवल शैली बदलती है।

चार मुख्य भेद हैं। गुणवाचक रूप, रंग, स्वभाव, आकार, दशा बताता है — अच्छा, काला, ईमानदार, लंबा, बीमार, पुराना। परिमाणवाचक नाप-तोल या मात्रा बताता है — थोड़ा जल, बहुत दूध, कुछ चीनी, सेर भर आटा। निश्चित परिमाण नाप देता है — दो किलो। अनिश्चित परिमाण अनुमान देता है — थोड़ा, बहुत। संख्यावाचक गिनती बताता है। निश्चित — एक, दो, दस। अनिश्चित — कई, अनेक। क्रमसूचक — पहला, दूसरा, अंतिम। समुदायवाचक — दोनों, चारों। सार्वनामिक विशेषण वह सर्वनाम है जो संज्ञा के साथ विशेषता बने — वह पुस्तक, कौन लड़का, कोई व्यक्ति, यह गाँव। चारों भेद एक ही शब्द-कक्षा के अंदर हैं। गुण रंग है, परिमाण मात्रा है, संख्या गिनती है, सार्वनामिक संकेत है। “बहुत” कभी परिमाण है — बहुत जल; कभी प्रविशेषण है — बहुत अच्छा। दूसरी स्थिति में वह विशेषण की विशेषता बता रहा है, संज्ञा की सीधे नहीं।

प्रविशेषण विशेषण के आगे आकर उसकी तीव्रता या सीमा बताता है — बहुत अच्छा, अत्यंत कठिन, थोड़ा तीखा, सबसे सुंदर। इसे पाँचवाँ भेद मत बनाओ; यह विशेषण का सहायक है। तुलना की तीन अवस्थाएँ गुणवाचक पर चलती हैं। मूलावस्था साधारण गुण — सुंदर। उत्तरावस्था दो में तुलना — अधिक सुंदर, सुंदरतर। उत्तमावस्था सबसे ऊपर — सबसे सुंदर, सुंदरतम। हिन्दी बोलचाल “अधिक” और “सबसे” से काम चलाती है। तत्सम “तर / तम” साहित्यिक हैं। विशेषण प्रायः विशेष्य के लिंग और वचन के साथ बदलता है — काला घोड़ा, काली घोड़ी, काले घोड़े; अच्छा लड़का, अच्छी लड़की, अच्छे लड़के। जो विशेषण नहीं बदलता उसे कभी अविकारी विशेषण कहा जाता है — बेकार आदमी, बेकार औरत; पर बहुत से संस्कृत तत्सम स्थिर रहते हैं। नियम का सार यह है: हिन्दी का देशी विशेषण प्रायः बदलेगा, कुछ तत्सम और कुछ विदेशी कम बदलेंगे।

विशेषण और क्रिया-विशेषण का अंतर परीक्षा में फँसता है। “वह अच्छा गाता है” में अच्छा गाने की विशेषता है, इसलिए क्रिया-विशेषण। “वह अच्छा लड़का है” में अच्छा लड़के की विशेषता है, इसलिए विशेषण। एक शब्द, दो घर। घर वाक्य तय करता है। उत्तर में चार भेद, तुलना की तीन अवस्थाएँ, प्रविशेषण की एक पंक्ति, और लिंग-वचन समझौते का एक जोड़ा उदाहरण लिखो। “विशेषण विशेषता बताता है” अकेला वाक्य किसी को कुछ नहीं सिखाता। किसकी विशेषता, किस दृष्टि से, रूप बदले या नहीं — यही गहराई है।

भेदपूछता हैउदाहरण
गुणवाचककैसाईमानदार विद्यार्थी, काला घोड़ा
परिमाणवाचककितनाथोड़ा जल, बहुत दूध
संख्यावाचककितने / कितनेवाँदो पुस्तकें, पहला स्थान
सार्वनामिककौन-सा संकेतवह घर, कौन मार्ग, कोई व्यक्ति

10 अव्यय

अव्यय अविकारी शब्द है। लिंग, वचन, कारक, पुरुष से इसका रूप नहीं बदलता। “धीरे” पुरुष बदले या वचन बदले, धीरे ही रहता है — वह धीरे चलता है, वे धीरे चलते हैं, वह धीरे चली। संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया विकारी हैं — रूप बदलते हैं। अव्यय चौथा घर नहीं, अलग जाति है। बाहरी अव्यय को वाक्य का जोड़ने वाला और सँवारने वाला कहते हैं। बिना अव्यय के वाक्य काम तो बताता है, समय, स्थान, कारण, संबंध और भाव की झलक अक्सर अधूरी रह जाती है।

चार भेद स्थिर हैं। पहला क्रिया-विशेषण — क्रिया की विशेषता। कैसे, कब, कहाँ, कितना। रीति — धीरे, ध्यान से, अचानक। काल — कल, आज, नित्य, अभी। स्थान — यहाँ, बाहर, ऊपर। परिमाण — बहुत, थोड़ा, अत्यंत (जब क्रिया या विशेषण पर लगें)। “वह धीरे बोलता है” में धीरे बोलने की रीति है। दूसरा संबंधबोधक — संज्ञा या सर्वनाम का दूसरे पद से संबंध, परसर्ग के निकट किंतु प्रायः समूह के रूप में — के बिना, के सामने, की ओर, के कारण, के साथ, के लिए। “घर के सामने वृक्ष है।” कारक-परसर्ग छोटे और आठ कारकों से बँधे हैं। संबंधबोधक अधिक विशिष्ट संबंध खोलते हैं। सीमा पर दोनों परिवार मिलते हैं — “के लिए” संप्रदान भी कहा जाता है, संबंधबोधक भी। कक्षा का स्थिर मार्ग यह है: आठ कारकों के छोटे चिह्न परसर्ग; लंबे समूह संबंधबोधक। तीसरा समुच्चयबोधक — पदों या वाक्यों को जोड़ता है। संयोजक — और, तथा, एवं। विभाजक — या, अथवा। विरोधदर्शक — किंतु, परंतु, लेकिन। परिणाम / कारण — इसलिए, क्योंकि, अतः। चौथा विस्मयादिबोधक — भाव की झटकेदार पुकार — आह, ओह, हाय, वाह, शाबाश, हे राम। यह वाक्य का अंग कम, भाव का विस्फोट अधिक है।

अव्यय की पहचान रूप न बदलने से होती है, शब्द की एक सूची से नहीं। “कल” कभी संज्ञा है — “कल का काम आज करो।” कभी क्रिया-विशेषण है — “कल जाऊँगा।” “सामने” संबंधबोधक भी है, क्रिया-विशेषण भी — “वह सामने खड़ा है।” भेद प्रश्न से होता है। कब? कैसे? कहाँ? — क्रिया-विशेषण। किसके संबंध में? — संबंधबोधक। दो वाक्य कैसे जुड़े? — समुच्चयबोधक। अचानक निकला भाव? — विस्मयादिबोधक। बिना प्रश्न के भेद अनुमान रह जाता है।

पाँच व्याकरणिक स्तंभों को अब एक दृष्टि में बाँधो। क्रिया काम बताती है। विभक्ति संज्ञा का काम चिह्नित करती है। सर्वनाम संज्ञा की जगह आता है। विशेषण संज्ञा को रंगता है। अव्यय जोड़ता, सँवारता, पुकारता है और स्वयं नहीं बदलता। इकाई ने संज्ञा का अलग पाठ नहीं रखा, क्योंकि संज्ञा इन पाँचों के चारों ओर पहले से बैठी है — नाम वह है जिसके स्थान पर सर्वनाम आए, जिसकी विशेषता विशेषण बताए, जिसका संबंध विभक्ति खोले, जिस पर क्रिया का काम चले। अगला पाठ ध्वनि की सबसे छोटी ईंट पर जाएगा — वर्ण।

भेदकामउदाहरण
क्रिया-विशेषणक्रिया को सँवारनाधीरे, आज, बाहर, बहुत दौड़ा
संबंधबोधकविशिष्ट संबंधके बिना, के सामने, की ओर
समुच्चयबोधकजोड़ / विकल्प / विरोधऔर, या, किंतु, क्योंकि
विस्मयादिबोधकभाव की पुकारहाय, वाह, ओह, शाबाश

11 हिन्दी की वर्ण-व्यवस्था

वर्ण भाषा की सबसे छोटी स्वतंत्र ध्वनि है जिसे और तोड़ा नहीं जा सकता। “कलम” में क्, अ, ल्, अ, म् — ये वर्ण हैं। वर्ण और अक्षर को एक मत समझो। अक्षर वह इकाई है जो उच्चारण में एक झटके में निकलती है — क, का, कि, क्ल। वर्ण ध्वनि का वैज्ञानिक टुकड़ा है। हिन्दी वर्णमाला स्वर और व्यंजन में बँटती है। स्वर वह ध्वनि है जो बिना किसी दूसरे वर्ण की मदद के बोली जा सके — अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। स्वर स्वतंत्र हैं। व्यंजन वह ध्वनि है जिसके उच्चारण में स्वर का सहारा लगता है — क् अकेले पूरा नहीं खुलता, “क” कहने में अ छिपा है। हलंत लगाकर व्यंजन की स्वर-रहित स्थिति दिखाई जाती है — क्।

स्वरों में मात्रा-भेद तीन हैं। ह्रस्व छोटी मात्रा — अ, इ, उ, ऋ। दीर्घ बड़ी मात्रा — आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। प्लुत और लंबी, पुकार या वैदिक पाठ में — राम३। मूल स्वर अ इ उ ऋ माने जाते हैं। ए ऐ ओ औ संयुक्त या मिश्र स्वर कहे जाते हैं — दो स्वर-गुणों के मेल से निकले। अयोगवाह दो हैं — अं अनुस्वार, अः विसर्ग। ये स्वर के साथ चलते हैं, पूर्ण स्वर भी नहीं, पूर्ण व्यंजन भी नहीं; इसीलिए अयोगवाह — न पूरे स्वर, न पूरे व्यंजन। अनुनासिक स्वर नासिका से रंगी ध्वनि है, चंद्रबिंदु से — आँ, हूँ। अनुस्वार व्यंजन के निकट की नासिक्य मात्रा है — अं। दोनों को एक चिह्न मत समझो।

व्यंजन पाँच वर्गों में कंठ से ओष्ठ तक सजे हैं। प्रत्येक वर्ग में पाँच सदस्य हैं — अघोष अल्पप्राण, अघोष महाप्राण, घोष अल्पप्राण, घोष महाप्राण, नासिक्य। अघोष में स्वर-यंत्र कम काँपते हैं; घोष में काँपते हैं। अल्पप्राण में हवा की मात्रा कम; महाप्राण में अधिक — ख, घ में साँस सुनाई देती है। कवर्ग — क ख ग घ ङ, स्थान कंठ। चवर्ग — च छ ज झ ञ, तालु। टवर्ग — ट ठ ड ढ ण, मूर्धा। तवर्ग — त थ द ध न, दंत। पवर्ग — प फ ब भ म, ओष्ठ। वर्ग की वैज्ञानिकता यही पाँच-पाँच का जाल है। इसके बाहर अंतःस्थ य र ल व — ये स्वर और व्यंजन के बीच से लगते हैं, प्रवाह अधिक। ऊष्म श ष स ह — घर्षण वाली गरमी की ध्वनि। ड़ ढ़ उत्क्षिप्त हैं — जीभ उठकर झटके से पड़ती है। क्ष त्र ज्ञ संयुक्त व्यंजन हैं, मूल वर्ग के पाँचवें सदस्य नहीं।

उच्चारण-स्थान कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठ और नासिका हैं। कुछ वर्ण दो स्थान छूते हैं — व दाँत और होंठ दोनों छूता है, ए कंठ और तालु दोनों। प्रयत्न बताता है हवा कैसे निकली — क में पूरी तरह रुककर, स में रगड़कर, न में नाक से, ल में जीभ के किनारे से। देवनागरी की विशेषता यह नहीं कि उसमें “अक्षर सुंदर हैं”। विशेषता यह है कि स्थान और प्रयत्न से वर्ण सजे हैं, इसलिए उच्चारण सिखाया जा सकता है। स्वरों की मात्राएँ उसी व्यवस्था का लेखन-रूप हैं — ा आ की, ि इ की, ी ई की, ु उ की, ू ऊ की, ृ ऋ की, े ए की, ै ऐ की, ो ओ की, ौ औ की। बिना मात्रा का व्यंजन “अ” लेकर चलता है — क = क् + अ। इकाई 2 की संधि इन्हीं वर्णों के पास आने से पैदा होती है। बिना वर्ण-व्यवस्था के संधि जादू लगती है। व्यवस्था समझने के बाद संधि नियम लगती है। पाँच सूत्र याद रखने योग्य हैं — स्वर-भेद; पाँच वर्ग; अंतःस्थ और ऊष्म; प्राण और घोष; स्थान। इन्हीं पाँचों से वर्ण-व्यवस्था बाँधी जाती है।

वर्गवर्णस्थानक्रम का अर्थ
कवर्गक ख ग घ ङकंठअघोष अल्प · अघोष महा · घोष अल्प · घोष महा · नासिक्य
चवर्गच छ ज झ ञतालुवही पाँच क्रम
टवर्गट ठ ड ढ णमूर्धावही पाँच क्रम
तवर्गत थ द ध नदंतवही पाँच क्रम
पवर्गप फ ब भ मओष्ठवही पाँच क्रम
अंतःस्थ / ऊष्मय र ल व / श ष स हमिश्रप्रवाह / घर्षण

12 शब्द-भंडार

शब्द सार्थक वर्ण-समूह है। बिना अर्थ के ध्वनि-समूह शब्द नहीं — “कचट” यदि किसी समाज में अर्थ न रखे तो वह शब्द नहीं। भंडार का अर्थ हिन्दी के शब्दों का भंडार और उसके स्रोत हैं। शब्द कहाँ से आए, कैसे बने, वाक्य में रूप बदलते हैं या नहीं — तीन दृष्टियाँ हैं। पहली दृष्टि उत्पत्ति की है। चार वर्ग गुरु और तिवारी दोनों स्थिर रखते हैं। तत्सम संस्कृत से ज्यों-के-त्यों या अत्यंत निकट रूप में आए — अग्नि, रात्रि, पुष्प, क्षेत्र, वायु, सूर्य। तत्सम का अर्थ है “उसके समान”। तद्भव वही पुरानी जड़ प्राकृत-अपभ्रंश होते हुए बदले रूप में आए — आग, रात, फूल, खेत, पवन। तद्भव का अर्थ है “उससे उत्पन्न”। जोड़ी याद रखो, केवल एक सूची नहीं — अग्नि-आग, रात्रि-रात, दुग्ध-दूध, हस्त-हाथ, कार्य-काम, ग्राम-गाँव, क्षेत्र-खेत, पुष्प-फूल। जोड़ी से अंतर बैठता है। देशज लोक से पैदा हुए, जिन्हें संस्कृत की सीधी संतान नहीं कहा जा सकता — रोटी, पगड़ी, लोटा, खिड़की, ठेस, जूता। ये मिट्टी और व्यवहार की उपज हैं। विदेशी अन्य भाषाओं से आए। अरबी-फ़ारसी से अदालत, कानून, किताब, और, मगर, दुकान। अंग्रेज़ी से टिकट, स्टेशन, स्कूल, बस, पेंसिल। पुर्तगाली से अलमारी, बाल्टी, साबुन, कमरा, पावरोटी। तुर्की से कुर्सी, चाकू, क़मीज़। विदेशी शब्द हिन्दी के दुश्मन नहीं, भंडार के मेहमान हैं जो बस गए।

दूसरी दृष्टि रचना की है। तीन नाम हैं। रूढ़ वह शब्द जिसका अर्थ खंडों से नहीं खुलता — आम, पेड़, हाथ, जल। “आ” और “म” अलग करके आम का फल नहीं मिलता। यौगिक वह शब्द जिसके खंड अर्थ देते हैं — विद्यालय = विद्या + आलय, राजपुत्र = राजा + पुत्र, देवालय = देव + आलय। इकाई 2 का समास और उपसर्ग-प्रत्यय यौगिक शब्द बनाते हैं। योगरूढ़ योग तो है, पर अर्थ रूढ़ हो गया है, खंडों के जोड़ से आगे निकल गया है। पंकज = पंक + ज, कीचड़ में जन्मा — पर शब्द कमल के लिए रूढ़ है; हर कीचड़-जन्य वस्तु पंकज नहीं। जलज कमल है, हर जल-जन्य मछली नहीं। पीतांबर विष्णु हैं, हर पीले वस्त्र वाला नहीं। योगरूढ़ बहुव्रीहि समास के निकट बैठता है; अंतर बाद की इकाई खोलेगी। तीसरी दृष्टि प्रयोग की है। विकारी शब्द रूप बदलते हैं — संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया। अविकारी नहीं बदलते — अव्यय। उत्पत्ति के चार नाम और रचना के तीन नाम अलग सूचियाँ हैं। उन्हें एक तालिका में मिलाना भ्रम है। अग्नि तत्सम भी है और रूढ़ भी हो सकता है। विद्यालय यौगिक है और तत्सम घटकों से बना है। एक शब्द एक साथ दो दृष्टियों में बैठ सकता है, दो दृष्टियाँ एक नहीं हो जातीं।

शब्द-भंडार हिन्दी की विशेषता से वापस जाकर मिलता है। खुलापन यह है कि तत्सम गंभीर, शास्त्रीय रंग देता है; तद्भव घरेलू और चलता रंग देता है; देशज लोक की चोट देता है; विदेशी शासन, बाज़ार, तकनीक के द्वार खोलता है। “अग्नि परीक्षा” और “आग लगना” एक धातु के दो संसार हैं। मानक हिन्दी दोनों संसार चलाती है। तिवारी शब्द-भंडार को हिन्दी की खुली शक्ति कहते हैं। गुरु उसे व्याकरण के आरंभ में रखते हैं, क्योंकि बिना शब्द-पहचान के संधि और समास के उदाहरण नहीं खुलते। इकाई 1 यहीं पूरी होती है — भाषा क्या है, हिन्दी कैसी है, वाक्य के पाँच स्तंभ कौन हैं, ध्वनि की ईंट कौन है, शब्द कहाँ से आए। इकाई 2 इन्हीं शब्दों को जोड़ने के चार औजार पढ़ाएगी — संधि, समास, उपसर्ग, प्रत्यय।

दृष्टिवर्गउदाहरण
उत्पत्तितत्समअग्नि, रात्रि, पुष्प, क्षेत्र
उत्पत्तितद्भवआग, रात, फूल, खेत
उत्पत्तिदेशजरोटी, लोटा, खिड़की, पगड़ी
उत्पत्तिविदेशीअदालत, टिकट, अलमारी, कुर्सी
रचनारूढ़ / यौगिक / योगरूढ़पेड़ / विद्यालय / पंकज
प्रयोगविकारी / अविकारीलड़का–लड़के / और, धीरे

13 इकाई 1 को एक साथ बाँधना

अब तेरह पाठों को एक धागे में पिरोओ। भाषा यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की सामाजिक व्यवस्था है — प्रकट और ग्रहण दोनों। वह समाज की जरूरत से जन्मती है; हिन्दी वैदिक-संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश की धारा से। उसकी प्रकृति सामाजिक, यादृच्छिक, अर्जित, परिवर्तनशील, ध्वन्यात्मक, व्यवस्थाबद्ध, प्रतीकात्मक और उत्पादक है। उसके रूप तीन दृष्टियों से खुलते हैं — मौखिक-लिखित; बोली-उपभाषा-भाषा; राजभाषा-राष्ट्रभाषा। हिन्दी भारतीय-आर्य शाखा की देवनागरी भाषा है; दो लिंग, दो वचन, परसर्ग, कर्ता-कर्म-क्रिया, चार शब्द-स्रोत, अनुच्छेद 343। वाक्य के भीतर क्रिया काम है, विभक्ति चिह्न है, सर्वनाम स्थान है, विशेषण रंग है, अव्यय जोड़ और सजावट है। वर्ण सबसे छोटी ध्वनि है। शब्द सार्थक समूह है और चार स्रोतों से आता है।

जो अंतर बार-बार पूछे जाते हैं उन्हें एक बार फिर अलग रखो। राजभाषा शासन का पद है, राष्ट्रभाषा जन-संपर्क का व्यापक रूप। कारक अर्थ है, विभक्ति चिह्न है, परसर्ग हिन्दी का अलग लिखा चिह्न है। सर्वनाम संज्ञा की जगह है; वही शब्द संज्ञा के साथ लगे तो सार्वनामिक विशेषण। सकर्मक में कर्म है, अकर्मक में नहीं; वाच्य दृष्टि है, काल समय है। तत्सम ज्यों-का-त्यों संस्कृत, तद्भव बदला रूप, देशज लोक, विदेशी बाहर से। रूढ़ खंड से नहीं खुलता, यौगिक खुलता है, योगरूढ़ खुलकर भी किसी एक अर्थ पर जम जाता है। इन जोड़ों को मिलाओ मत। इन्हीं जोड़ों पर छोटा और लंबा दोनों उत्तर खड़े होते हैं।

इकाई 1 नोट्स समाप्त — परीक्षा से पहले दोहराएँ।