हिन्दी भाषा, व्याकरण एवं संप्रेषण
प्रश्न-उत्तर — खंड ख (दीर्घ उत्तर)
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परिभाषा बताती है कि भाषा क्या है; प्रकृति बताती है कि भाषा कैसी है। प्रकृति के आठ धर्म हैं।
पहला धर्म — सामाजिक। बालक घर और समाज से भाषा पाता है; अकेला बच्चा भाषा नहीं गढ़ता। दूसरा धर्म — यादृच्छिक। गाय शब्द में गाय जैसा चित्र बना नहीं बैठा; शब्द और अर्थ का बंधन स्वभाव से नहीं, समाज की स्वीकृति से है। तीसरा धर्म — अर्जित। मैं प्यासा हूँ कहना सीखना पड़ता है; भाषा उपहार में नहीं, अभ्यास से आती है। चौथा धर्म — परिवर्तनशील। अग्नि से आग बना; शब्द और रूप समय के साथ बदलते हैं। पाँचवाँ धर्म — ध्वन्यात्मक। भाषा का मूल रूप वाचिक है; निरक्षर व्यक्ति भी पूरी भाषा चलाता है। छठा धर्म — व्यवस्थाबद्ध। वर्ण से शब्द और शब्द से वाक्य बनते हैं; नियम के बिना शोर है, भाषा नहीं। सातवाँ धर्म — प्रतीकात्मक। नदी कहने से पैर नहीं भीगते; शब्द अर्थ की ओर संकेत करता है। आठवाँ धर्म — उत्पादक। सीमित वर्ण और शब्दों से नित नए वाक्य बनते हैं; जो वाक्य आज बोला वह पहले कभी नहीं बोला गया होगा।
इन्हीं धर्मों से भाषा के रूप समझे जाते हैं। प्रवाह से मौखिक और लिखित रूप हैं; मौखिक मूल है, लिखित स्मृति और शासन का सहारा है। विस्तार से बोली, उपभाषा और भाषा हैं। प्रयोजन से मातृभाषा, संपर्क भाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा हैं। राजभाषा शासन का पद है — अनुच्छेद ३४३ संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिन्दी बनाता है; राष्ट्रभाषा जन-संपर्क का व्यापक रूप है, जिसे संविधान ने कानूनी पद नहीं बनाया।
हिन्दी भारोपीय परिवार की भारतीय-आर्य शाखा की भाषा है। इसका विकास वैदिक भाषा से लौकिक संस्कृत, फिर प्राकृत, फिर अपभ्रंश, फिर आधुनिक हिन्दी के क्रम से हुआ। खड़ी बोली दिल्ली-मेरठ क्षेत्र की बोलचाल से निकलकर मानक हिन्दी बनी; ब्रज, अवधी, भोजपुरी उपभाषा-परंपरा के नाम हैं।
हिन्दी की लिपि देवनागरी है। भाषा और लिपि एक नहीं हैं — भाषा पहले कान की वस्तु है, लिपि उसे कागज़ पर बाँधती है। लेखन बाएँ से दाएँ चलता है। प्रायः एक ध्वनि के लिए एक चिह्न है। स्वर स्वतंत्र भी लिखे जाते हैं और मात्रा बनकर व्यंजन से जुड़ते भी हैं। वर्ण उच्चारण-स्थान के क्रम में सजे हैं — कवर्ग कंठ से पवर्ग ओष्ठ तक। शिरोरेखा शब्दों को बाँधती है। क्ष, त्र, ज्ञ संयुक्त व्यंजन हैं।
लिंग दो हैं — पुल्लिंग और स्त्रीलिंग; लिंग क्रिया और विशेषण तक जाता है — छोटा बालक आया; छोटी बालिका आई। वचन दो हैं — एकवचन और बहुवचन। कारक मुख्यतः परसर्ग से बनते हैं — ने, को, से, का, में, पर। ने केवल पूर्ण भूतकाल की सकर्मक क्रिया के कर्ता पर लगता है। वाक्य-क्रम प्रायः कर्ता, कर्म, क्रिया है — बालक पत्र लिखता है। विशेषण विशेष्य से पहले आता है — लाल साड़ी। सहायक क्रिया काल जोड़ती है — लिख रहा है, लिख चुका, लिखेगा।
शब्द-भंडार चार स्रोतों से आता है। तत्सम संस्कृत के निकट हैं — अग्नि, रात्रि; तद्भव उसी जड़ के बदले रूप हैं — आग, रात; देशज लोक से बने हैं — रोटी, लोटा; विदेशी अन्य भाषाओं से आए हैं — अदालत, कानून फ़ारसी-अरबी से; टिकट, स्कूल अंग्रेज़ी से। अनुच्छेद ३४३ हिन्दी को देवनागरी में संघ की राजभाषा बनाता है; अनुच्छेद ३५१ इसके विकास का निर्देश देता है।
स्वर संधि तब होती है जब स्वर के बाद स्वर आए और दोनों मिलकर एक निश्चित नया रूप बनाएँ। मूल खंड दिखाना संधि-विच्छेद है। भेद पूर्व स्वर और पर स्वर से तय होता है।
पहला भेद — दीर्घ संधि। समान स्वर मिलकर दीर्घ हो जाते हैं। अ या आ के बाद अ या आ आने पर आ बनता है — हिम + आलय = हिमालय; विद्या + आलय = विद्यालय; महा + आत्मा = महात्मा। इ या ई के बाद इ या ई आने पर ई बनता है — कवि + इंद्र = कवींद्र; मुनि + ईश = मुनीश। उ या ऊ के बाद उ या ऊ आने पर ऊ बनता है — भानु + उदय = भानूदय।
दूसरा भेद — गुण संधि। अ या आ के बाद इ या ई आने पर ए बनता है — देव + इंद्र = देवेंद्र; नर + इंद्र = नरेंद्र। अ या आ के बाद उ या ऊ आने पर ओ बनता है — सूर्य + उदय = सूर्योदय; महा + उत्सव = महोत्सव। अ या आ के बाद ऋ आने पर अर् बनता है — महा + ऋषि = महर्षि। विद्यालय दीर्घ है क्योंकि आ + आ मिला; देवेंद्र गुण है क्योंकि अ + इ मिला।
तीसरा भेद — वृद्धि संधि। अ या आ के बाद ए या ऐ आने पर ऐ बनता है — सदा + एव = सदैव; एक + एक = एकैक। अ या आ के बाद ओ या औ आने पर औ बनता है — वन + औषधि = वनौषधि। गुण के परिणाम ए और ओ हैं; वृद्धि के परिणाम ऐ और औ हैं।
चौथा भेद — यण संधि। इ, ई, उ, ऊ या ऋ के बाद भिन्न स्वर आने पर वे य्, व् या र् बन जाते हैं — इति + आदि = इत्यादि; सु + आगत = स्वागत; पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा। बाद वाला स्वर समान हो तो दीर्घ चलती है, यण नहीं — मुनि + ईश = मुनीश।
पाँचवाँ भेद — अयादि संधि। ए से अय्, ऐ से आय्, ओ से अव् और औ से आव् बनता है — ने + अन = नयन; नै + अक = नायक; पो + अन = पवन; पौ + अक = पावक। अयादि में पूर्व स्वर ए, ऐ, ओ या औ है; यण में इ, उ या ऋ है।
समास दो या अधिक पदों का अर्थ-संक्षेप है। जो शब्द बनता है उसे समस्त पद कहते हैं; मूल अर्थ खोलना विग्रह है। छह भेद हैं।
अव्ययीभाव में पूर्व पद प्रधान होता है और समस्त पद अव्यय की तरह चलता है — यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार; प्रतिदिन = प्रत्येक दिन; आजन्म = जन्म से लेकर। यह कब, कैसे, कितना जैसे अर्थ देता है।
तत्पुरुष में उत्तर पद प्रधान होता है — राजपुत्र = राजा का पुत्र; शोकाकुल = शोक से आकुल; जलमग्न = जल में मग्न; गंगाजल = गंगा का जल। यह किसका, किससे, किसलिए जैसे अर्थ देता है।
कर्मधारय में पूर्व पद विशेषण होता है और उत्तर पद विशेष्य — नीलकमल = नीला है जो कमल; महात्मा = महान है जो आत्मा। समस्त पद वही रहता है जो विशेष्य है — नीलकमल कमल ही है।
द्विगु में पूर्व पद संख्या होती है और समूह या समाहार बनता है — सप्तर्षि = सात ऋषियों का समूह; नवग्रह = नौ ग्रहों का समाहार; त्रिभुवन = तीन भुवनों का समाहार।
द्वंद्व में दोनों पद प्रधान रहते हैं और विग्रह और से होता है — रामलक्ष्मण = राम और लक्ष्मण; सुखदुःख = सुख और दुःख; अन्नजल = अन्न और जल।
बहुव्रीहि किसी तीसरे अर्थ का वाचक होता है — पीतांबर = पीला है अंबर जिसका, अर्थात् विष्णु; दशानन = दस हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण; नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव। नीलकमल कमल ही रहता है, इसलिए कर्मधारय है; नीलकंठ शिव है, इसलिए बहुव्रीहि है। यही दोनों की पहचान है।
वाक्य सार्थक पदों का वह क्रम है जिससे पूरा भाव निकले। उद्देश्य वह है जिसके विषय में कुछ कहा जाए; विधेय वह है जो उद्देश्य के विषय में कहा जाए — बालक सोता है में बालक उद्देश्य है, सोता है विधेय। भेद दो दृष्टियों से किए जाते हैं।
अर्थ की दृष्टि से पाँच भेद हैं। विधानार्थक में कथन होता है — सूर्य पूर्व से निकलता है। निषेधार्थक में मना किया जाता है — वह आज नहीं आया। प्रश्नार्थक में पूछा जाता है — तुम कहाँ जा रहे हो? आज्ञार्थक में आदेश या प्रार्थना होती है — बैठो। विस्मयादिबोधक में आश्चर्य, हर्ष या शोक प्रकट होता है — वाह, क्या दृश्य है!
रचना की दृष्टि से तीन भेद हैं। सरल वाक्य में एक क्रिया-सूत्र होता है — पक्षी उड़ता है। संयुक्त वाक्य में दो स्वतंत्र खंड और, किंतु या या से जुड़ते हैं — राम आया और श्याम गया। मिश्र वाक्य में एक मुख्य और एक आश्रित उपवाक्य होता है — जो परिश्रम करेगा, वह सफल होगा।
एक ही वाक्य दोनों सूचियों में बाँटा जा सकता है — जो परिश्रम करेगा, वह सफल होगा रचना से मिश्र है और अर्थ से विधानार्थक है। अर्थ से पाँच भेद हैं, रचना से तीन; दोनों सूचियाँ एक नहीं हैं। हिन्दी का पद-क्रम प्रायः कर्ता, कर्म, क्रिया है — बालक पत्र लिखता है।
वर्ण-व्यवस्था भाषा की ध्वनियों का क्रमबद्ध संग्रह है। हिन्दी की लिपि देवनागरी है; लेखन बाएँ से दाएँ चलता है। प्रायः एक ध्वनि के लिए एक चिह्न है। स्वर स्वतंत्र भी लिखे जाते हैं और मात्रा बनकर व्यंजन से जुड़ते भी हैं — अ, आ, इ, ई की मात्राएँ व्यंजन के साथ लगती हैं। वर्ण उच्चारण-स्थान के क्रम में सजे हैं — कवर्ग कंठ से, चवर्ग तालु से, टवर्ग मूर्धा से, तवर्ग दंत से और पवर्ग ओष्ठ से बोले जाते हैं। शिरोरेखा शब्दों को बाँधती है। अयोगवाह दो हैं — अनुस्वार और विसर्ग। क्ष, त्र, ज्ञ संयुक्त व्यंजन हैं, स्वतंत्र वर्ण नहीं। भाषा और लिपि एक नहीं हैं — भाषा पहले कान की वस्तु है, लिपि उसे कागज़ पर बाँधती है।
शब्द-भंडार चार स्रोतों से आता है। तत्सम शब्द संस्कृत के निकट हैं — अग्नि, रात्रि, दुग्ध; ये गंभीर और शास्त्रीय रंग देते हैं। तद्भव उसी जड़ से बदले हुए रूप हैं — आग, रात, दूध; ये घरेलू रंग देते हैं। अग्नि और आग एक जड़ के दो रूप हैं — तत्सम और तद्भव। देशज शब्द लोक-व्यवहार से बने हैं — रोटी, लोटा, खिड़की। विदेशी शब्द अन्य भाषाओं से आए हैं — अदालत, कानून फ़ारसी-अरबी से; टिकट, स्कूल, रेल अंग्रेज़ी से आए।
शब्द-भंडार की यही विविधता हिन्दी को समृद्ध बनाती है — शास्त्रीय प्रसंग में तत्सम, घरेलू बात में तद्भव और दैनिक व्यवहार में देशज-विदेशी शब्द सहज चलते हैं।
