हिन्दी भाषा, व्याकरण एवं संप्रेषण
प्रश्न-उत्तर — खंड क (लघु उत्तर)
10 प्रश्न × 2 अंक (सभी अनिवार्य) = 20 अंक
आचार्य कामताप्रसाद गुरु के अनुसार — भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है और दूसरों के विचार ग्रहण करता है। भोलानाथ तिवारी के अनुसार — भाषा यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा कोई मानव-समाज विचार-विनिमय करता है।
वर्ण भाषा की सबसे छोटी स्वतंत्र ध्वनि है, जिसे और नहीं तोड़ा जा सकता। स्वर बिना दूसरे वर्ण की मदद के बोले जाते हैं — अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ (ग्यारह)। व्यंजन के उच्चारण में स्वर का सहारा लगता है — क्, ख् आदि। अयोगवाह दो हैं — अं (अनुस्वार) और अः (विसर्ग)।
तत्सम संस्कृत के समान रूप वाले शब्द हैं — अग्नि, रात्रि, पुष्प, दुग्ध। तद्भव उसी संस्कृत जड़ से बदले हुए रूप हैं — आग, रात, फूल, दूध। जोड़ी से अंतर स्पष्ट होता है — अग्नि-आग, हस्त-हाथ।
देवेंद्र = देव + इंद्र (गुण संधि — अ + इ = ए)। हिमालय = हिम + आलय (दीर्घ संधि — अ + आ = आ)। महात्मा = महा + आत्मा (दीर्घ संधि — आ + आ = आ)। गिरीश = गिरि + ईश (दीर्घ संधि — इ + ई = ई)।
सदैव = सदा + एव (वृद्धि संधि — आ + ए = ऐ)। इत्यादि = इति + आदि (यण संधि — इ + आ = य्)। नयन = ने + अन (अयादि संधि — ए से अय्)। पवन = पो + अन (अयादि संधि — ओ से अव्)।
सज्जन = सत् + जन (व्यंजन संधि — त् + ज = ज्ज)। उल्लास = उत् + लास (व्यंजन संधि — त् + ल = ल्ल)। निश्चल = निः + चल (विसर्ग संधि — ः + च = श्)। मनोरथ = मनः + रथ (विसर्ग संधि — अः के बाद घोष व्यंजन से ओ)।
राजपुत्र = राजा का पुत्र (तत्पुरुष — उत्तर पद प्रधान)। नीलकमल = नीला है जो कमल (कर्मधारय — विशेषण और विशेष्य)। त्रिभुवन = तीन भुवनों का समाहार (द्विगु — संख्या और समाहार)। पीतांबर = पीला है अंबर जिसका अर्थात् विष्णु (बहुव्रीहि — तीसरे अर्थ का बोध)।
उपसर्ग वह शब्दांश है जो सार्थक शब्द के आगे लगकर अर्थ बदलता है — प्र + हार = प्रहार; अ + ज्ञान = अज्ञान। प्रत्यय शब्द के पीछे लगता है — पढ़् + आई = पढ़ाई (कृत् प्रत्यय); बच्चा + पन = बचपन (तद्धित प्रत्यय)। उपसर्ग प्रायः शब्द-वर्ग नहीं बदलता; प्रत्यय प्रायः वर्ग बदल देता है।
(1) मेरी बहन आई। दोष — लिंग। (2) अनेक लोग आए। दोष — वचन; अनेक स्वयं बहुवचन है इसलिए ओं नहीं लगता। (3) राम जाता है। दोष — कारक; वर्तमान सामान्य काल में ने नहीं लगता।
(1) आँख दिखाना — क्रोध से डाँटना। शिक्षक ने देर से आने पर आँख दिखाई। (2) कमर कसना — तैयार होना। विद्यार्थी ने परीक्षा से पहले कमर कस ली। (3) नाक कटना — प्रतिष्ठा जाना। हार कर उसकी नाक कट गई। (4) हाथ मलना — पछताना। अवसर जाने पर वह हाथ मलता रहा।
(1) अधजल गगरी छलकत जाय — थोड़े ज्ञान से अहंकार बढ़ना। (2) एक अनार सौ बीमार — वस्तु थोड़ी, चाहने वाले बहुत। (3) ऊँची दुकान फीका पकवान — दिखावा बड़ा, सार कम। (4) दूर के ढोल सुहावने — दूर की वस्तु अच्छी लगना।
सुख–दुःख, उदय–अस्त, ज्ञान–अज्ञान, सरल–जटिल, लाभ–हानि, जय–पराजय।
पत्र के अंग हैं — (1) प्रेषक का पता या शीर्षक, (2) दिनांक, (3) प्राप्तकर्ता का पता, (4) संबोधन, (5) विषय, (6) मुख्य भाग, (7) समापन वाक्य, (8) हस्ताक्षर और नाम, (9) संलग्नक (यदि हो)।
शासकीय पत्र कार्यालय से कार्यालय जाता है, पूर्णतः औपचारिक होता है, पत्र-संख्या और दिनांक अनिवार्य हैं, संबोधन सेवा में होता है। अर्धशासकीय पत्र अधिकारी व्यक्तिगत रूप से लिखता है, अपेक्षाकृत कम औपचारिक होता है, संबोधन प्रिय श्री से होता है।
संक्षेपण के नियम हैं — (1) मूल भाव सुरक्षित रहे, (2) लंबाई प्रायः एक-तिहाई हो, (3) अपनी भाषा में लिखें, (4) उपयुक्त शीर्षक दें, (5) उदाहरण, उद्धरण और अलंकार हटा दें।
