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हिन्दी भाषा, व्याकरण एवं संप्रेषण

Lesson 14 of 39

आधार आधिकारिक पाठ्यक्रम HINDI 4.5 AECT 21 है। सहायक पुस्तकें: कामताप्रसाद गुरु, हिन्दी व्याकरण; भोलानाथ तिवारी, मानक हिन्दी का स्वरूप; हरदेव बाहरी, व्यावहारिक हिन्दी व्याकरण एवं रचना और राजकाज में हिन्दी; तिवारी–कुलश्रेष्ठ, पत्र व्यवहार निर्देशिका; भाटिया–तुमन सिंह, संक्षेपण और पल्लवन। ये नोट्स पुस्तक की नकल नहीं हैं। हर बिंदु को कक्षा की भाषा में खोला गया है, ताकि अवधारणा बैठे, केवल सूत्र रटने न पड़ें।

इकाई 1 · भाषा का तात्पर्य, परिभाषा, प्रकृति और रूप; हिन्दी की विशेषताएँ; क्रिया–विभक्ति–सर्वनाम–विशेषण–अव्यय; वर्ण-व्यवस्था; शब्द-भंडार

यह इकाई पूरे पत्र का दरवाजा है। पत्र का पूरा नाम तीन काम बाँधता है — हिन्दी भाषा, व्याकरण, और संप्रेषण। भाषा बिना समझे व्याकरण के नियम टुकड़े रह जाते हैं। व्याकरण बिना समझे पत्र और निबंध केवल अनुमान रह जाते हैं। संप्रेषण का अर्थ है विचार का सही पहुँचना — सुनने वाला वही समझे जो कहने वाला कहना चाहता था। इकाई 1 इसी नींव पर खड़ी है। आधिकारिक शीर्षक चार झुंड खोलता है। पहला: भाषा से तात्पर्य, परिभाषा, प्रकृति और विविध रूप। दूसरा: हिन्दी भाषा की विशेषताएँ। तीसरा: क्रिया, विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण और अव्यय। चौथा: हिन्दी की वर्ण-व्यवस्था और शब्द-भंडार। इकाई 2 शब्द जोड़ती है। इकाई 3 वाक्य और प्रयोग सुधारती है। इकाई 4 पत्र लिखवाती है। इकाई 5 सार, विस्तार और निबंध लिखवाती है। बिना इस इकाई के वे चारों हवा में लटकते हैं।

पाठ्यक्रम का उद्देश्य यही है कि विद्यार्थी दैनिक व्यवहार में शुद्ध और सक्षम हिन्दी चला सके, अपनी बात स्पष्ट कह सके। परिणाम में भाषा के जन्म, प्रकृति, लक्षण, वैशिष्ट्य और प्रकार का बोध चाहिए; व्यवहार में शुद्धि चाहिए; लेखन, कार्यालय और रोजगार तक संप्रेषण पहुँचे। इसलिए यहाँ केवल नामों की सूची नहीं चलेगी। हर परिभाषा के शब्द खोलने होंगे। हर भेद का एक काम बताना होगा। हर उदाहरण को वाक्य तक घुमाना होगा। जो बात दो नामों से मिलती-जुलती लगे, उसे यहीं अलग कर देना होगा — राजभाषा और राष्ट्रभाषा, कारक और विभक्ति, सर्वनाम और सार्वनामिक विशेषण, तत्सम और तद्भव। परीक्षा का छोटा उत्तर इन्हीं अंतरों से बनता है। लंबा उत्तर इन्हीं अंतरों को उदाहरण तक ले जाता है।

1 भाषा से तात्पर्य

भाषा शब्द संस्कृत धातु भाष् से जोड़ा जाता है। धातु का अर्थ है कहना, प्रकट करना, सामने लाना। तात्पर्य यह है: भाषा मनुष्य का वह साधन है जिससे वह अपने भीतर बैठी बात को बाहर लाता है, और दूसरे की बात को भीतर ले आता है। कामताप्रसाद गुरु इसी द्वार से परिभाषा खोलते हैं — प्रकट करना और ग्रहण करना, दोनों। केवल बोलना भाषा नहीं। केवल सुनना भी भाषा नहीं। जो मुँह से निकला और जो कान तक सही अर्थ में पहुँचा — दोनों मिलकर भाषा का काम पूरा करते हैं। कक्षा में अध्यापक बोलें और विद्यार्थी कुछ और समझें, तो ध्वनि तो गई, संप्रेषण नहीं हुआ। पत्र का तीसरा शब्द संप्रेषण यहीं से जुड़ता है। संप्रेषण पहुँच का नाम है। भाषा उस पहुँच का सबसे स्थिर और सबसे लचीला औजार है।

मनुष्य संप्रेषण के और भी रास्ते चलाता है। आँख की चमक, हाथ का इशारा, चित्र, सीटी, लाल बत्ती, सड़क का चिह्न — ये सब संकेत हैं। संकेत सीमित रहते हैं। लाल बत्ती रुकने को कह सकती है, पर यह नहीं कह सकती कि “मैं कल दोपहर बाद पुस्तकालय में तुम्हें इतिहास का प्रश्न समझाऊँगा।” पशु भी ध्वनि निकालते हैं — कुत्ता भौंकता है, पक्षी चहकता है। वह ध्वनि भावना या चेतावनी तक जाती है। नया वाक्य नहीं बनता। मनुष्य सीमित ध्वनियों से असीमित वाक्य बना सकता है। जो बात उसने पहले कभी नहीं कही, वह भी कह सकता है। जो बात उसने पहले कभी नहीं सुनी, वह भी समझ सकता है। यही भाषा को मानव-मात्र की संपत्ति बनाता है। तात्पर्य इसलिए केवल “बोलचाल” नहीं। तात्पर्य है — विचार का ऐसा साधन जो सीखा जा सके, बाँटा जा सके, और नए वाक्य पैदा कर सके।

तात्पर्य तीन स्तरों पर बैठता है। वैयक्तिक स्तर पर भाषा सोचने का माध्यम भी है। बहुत सोच मौन रहकर भी शब्दों में चलती है। बिना भाषा के जटिल विचार टिकते नहीं। सामाजिक स्तर पर भाषा समूह की पहचान है। एक गाँव की बोली, एक प्रदेश की मानक भाषा, एक कक्षा की शब्दावली — ये बताते हैं हम किस समुदाय में खड़े हैं। सांस्कृतिक स्तर पर भाषा साहित्य, शास्त्र, शिक्षा और शासन की वाहक है। गीता, रामचरितमानस, समाचार-पत्र, न्यायालय का आदेश — सब भाषा पर सवार हैं। हिन्दी इन तीनों स्तरों पर उत्तर भारत की प्रमुख भाषा है, और संविधान के बाद संघ के काम की भाषा भी। यहाँ एक भ्रम काटना जरूरी है। राजभाषा संवैधानिक पद है — अनुच्छेद 343 संघ की भाषा को देवनागरी में हिन्दी बनाता है। राष्ट्रभाषा जन-संपर्क का व्यापक रूप है — लोग आपस में जिस भाषा से देश भर में काम चलाएँ। दोनों शब्द एक नहीं। तात्पर्य पढ़ते समय राजभाषा को “देश की एकमात्र भाषा” मत बनाओ, और राष्ट्रभाषा को सरकारी फ़ाइल का नाम मत बनाओ।

तात्पर्य का एक और किनारा लिपि है। बहुत विद्यार्थी भाषा और लिपि को एक मान लेते हैं। भाषा पहले कान की चीज़ है। बालक लिखना सीखने से पहले बोलना सीखता है। निरक्षर व्यक्ति भी पूरी भाषा चलाता है। लिपि स्मृति और शासन की सहेली है — बात को कागज़ पर बाँधती है, ताकि वह समय और दूरी पार कर सके। देवनागरी हिन्दी की लिपि है, हिन्दी स्वयं नहीं। उर्दू हिन्दी के बहुत निकट की भाषा है, लिपि अलग है। तात्पर्य यहीं साफ होता है: भाषा ध्वनि-व्यवस्था है जिससे मनुष्य विचार बाँटता है; लिपि उस व्यवस्था का बाद का चित्र है। इकाई आगे वर्णमाला पढ़ेगी। वर्णमाला लिपि का द्वार है, भाषा की पूरी परिभाषा नहीं।

पाठ्यक्रम परिणाम में भाषा के जन्म का बोध भी माँगता है। जन्म का अर्थ यह नहीं कि किसी एक दिन किसी ने पूरी भाषा गढ़ दी। भाषा समाज में पैदा होती है — साथ रहने, काम बाँटने और सोच बताने की जरूरत से। एक व्यक्ति अकेला भाषा नहीं जन्म देता; समूह ध्वनियों को अर्थ से बाँधता है, बच्चे उसे सुनकर पाते हैं। हिन्दी के ऐतिहासिक जन्म का रास्ता निर्धारित पुस्तकों में यही है — वैदिक भाषा से लौकिक संस्कृत, फिर प्राकृत, फिर अपभ्रंश, फिर आधुनिक हिन्दी। खड़ी बोली उस आधुनिक रूप की मानक धारा बनी। जन्म इसलिए दो स्तरों पर लिखो: सामान्य भाषा समाज की जरूरत से जन्मती है; हिन्दी भारतीय-आर्य धारा के लंबे परिवर्तन से जन्मती है। “भाषा ईश्वर ने एक बार में दे दी” और “भाषा किसी वैज्ञानिक ने प्रयोगशाला में बनाई” — दोनों अति हैं, परीक्षा का उत्तर नहीं।