Noteclerical

समास

Lesson 89 of 113

इस विषय में क्या आता है

परीक्षा पूछती है — राजपुत्र कौन-सा समास है, यथाशक्ति का विग्रह क्या है, पीतांबर कृष्ण क्यों, पंचवटी द्विगु क्यों बहुव्रीहि नहीं, नीलकमल और नीलकंठ में फर्क क्या है। काम एक है: शब्द खोलो (विग्रह), देखो अर्थ किसका चल रहा है (प्रधान), नाम लिखो।

यहाँ पढ़ना है

परिभाषा। समस्त पद, पूर्वपद, उत्तरपद, विग्रह। संधि से फर्क। प्रधान से छह भेद। अव्ययीभाव। तत्पुरुष की विभक्तियाँ और नञ्। कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व (तीन उपभेद), बहुव्रीहि। कर्मधारय–बहुव्रीहि जाल।

यहाँ नहीं घुसाना

अ+इ=ए, सत्+जन=सज्जन — वह संधि है। प्र-, अनु-, सु- शब्द के आगे लगना = उपसर्ग, अगला विषय। कर्ता–कर्म–करण पूरे वाक्य में = कारक, अलग पृष्ठ। यहाँ विभक्ति का नाम केवल तत्पुरुष का उपनाम है।

एक पंक्ति: समास = दो (या अधिक) पदों का ऐसा मेल जिसमें बीच की विभक्ति / योजक शब्द गिर जाते हैं और एक समस्त पद बनता है।

समस्त पद, विग्रह, पूर्व और उत्तर

समस्त पद = सिकुड़ा हुआ शब्द। विग्रह = उसे खोलकर साधारण वाक्यांश बनाना। बिना विग्रह के भेद मत रटो — नाम विग्रह से निकलता है।

समस्त पदविग्रहपूर्वपदउत्तरपद
राजपुत्रराजा का पुत्रराजपुत्र
यथाशक्तिशक्ति के अनुसारयथाशक्ति
नीलकमलनीला कमलनीलकमल
राम-लक्ष्मणराम और लक्ष्मणरामलक्ष्मण
नीलकंठनीला है कंठ जिसका (शिव)नीलकंठ
  • पूर्वपद = पहले वाला टुकड़ा। उत्तरपद = बाद वाला। हिंदी में उत्तर प्रायः दाईं ओर।
  • विग्रह में वो शब्द लौटते हैं जो समास ने निगल लिए: का, को, से, के लिए, में, पर, और, जैसा, जिसका।
  • तीन+ पद भी एक समास हो सकते हैं: राम-लक्ष्मण-भरत द्वंद्व; राजराजेश्वर तत्पुरुष की परत।
संधि और समास एक शब्द पर साथ हो सकते हैं। हिमालय — वर्ण-जोड़ से हिम+आलय (दीर्घ संधि, पिछला विषय)। अर्थ-जोड़ से हिम का आलय (तत्पुरुष, यह विषय)। प्रश्न जो माँगे वही दो: «संधि» लिखा हो तो दीर्घ; «समास» लिखा हो तो तत्पुरुष। दोनों एक उत्तर में मत घुसेड़ो।
भूल: हर छोटा शब्द समास नहीं। घर एक पद है, विग्रह नहीं। किताबघर तो समास (किताबों का घर)। उपसर्ग वाला प्रहार (प्र+हार) अगले पृष्ठ का काम है — विग्रह «प्र और हार» मत लिखना।

प्रधान पद — भेद की कुंजी

समास का नाम इसी से पड़ता है कि अर्थ किस पद का चल रहा है। चार घर याद रखो। कर्मधारय और द्विगु परीक्षा में अलग नाम से आते हैं, हालाँकि कुछ पुस्तकें इन्हें तत्पुरुष के अंदर रखती हैं।

प्रधान कौनभेदविग्रह की पहचान
पूर्वपदअव्ययीभावके अनुसार / तक / प्रति… पूरा पद अव्यय जैसा
उत्तरपदतत्पुरुष (कर्मधारय, द्विगु यहीं की शाखा)का, को, से, में… या विशेषण+संज्ञा
दोनों पदद्वंद्वऔर / तथा — दोनों बराबर
कोई तीसरा (दोनों के बाहर)बहुव्रीहिजिसका / जिसके / जो — अर्थ शिव, कृष्ण, रावण…

पहला प्रश्न: यह शब्द उन्हीं दो टुकड़ों की चीज़ बता रहा है, या किसी तीसरे को? तीसरे को = बहुव्रीहि। नहीं तो बाकी पाँच में से चुनो।

छह भेद — परीक्षा की सूची

कक्षा-10 की वस्तुनिष्ठ शैली में प्रायः ये छह नाम पूछे जाते हैं। «समास के चार भेद» लिखा हो तो कर्मधारय+द्विगु को तत्पुरुष में गिनो (4 = अव्ययीभाव, तत्पुरुष, द्वंद्व, बहुव्रीहि)।

भेदएक शब्दविग्रह
अव्ययीभावयथाशक्तिशक्ति के अनुसार
तत्पुरुषराजपुत्रराजा का पुत्र
कर्मधारयनीलकमलनीला कमल
द्विगुपंचवटीपाँच वटों का समाहार
द्वंद्वमाता-पितामाता और पिता
बहुव्रीहिदशाननदस हैं आनन जिसके (रावण)

अव्ययीभाव — पूर्वपद प्रधान, पूरा अव्यय

पहले पद कोई अव्यय (यथा, प्रति, आ, भर, यावत्, अनु…) होता है और वही प्रधान रहता है। समस्त पद भी अव्यय बन जाता है — लिंग–वचन से नहीं बदलता: यथाशक्ति, यथाशक्तियाँ गलत।

विग्रह प्रायः: के अनुसार, प्रत्येक, तक, भरकर, के समान, के बाद…

समस्त पदविग्रहपूर्व अव्यय
यथाशक्तिशक्ति के अनुसारयथा
यथासंभवसंभव के अनुसारयथा
यथाविधिविधि के अनुसारयथा
यथासमयसमय के अनुसारयथा
प्रतिदिनप्रत्येक दिन / दिन-दिनप्रति
प्रतिवर्षप्रत्येक वर्षप्रति
प्रत्यक्षआँखों के सामने (अक्षि = आँख)प्रति
भरपेटपेट भरकरभर
आमरणमरण तकआ
आजन्मजन्म से लेकरआ
यावज्जीवनजीवन भरयावत्
निर्विवादविवाद के बिनानिर्
बेधड़कधड़क के बिना / निडर होकरबे
अनुरूपरूप के अनुसारअनु
उपसर्ग से मत मिलाओ। प्रतिदिन यहाँ अव्ययीभाव है क्योंकि पूरा पद क्रिया-विशेषण जैसा चलता है। प्रहार, अनुवाद क्रिया बनाने वाले उपसर्ग हैं — अगला विषय। जाल: विकल्प में «उपसर्ग» और «अव्ययीभाव» साथ आएँ तो विग्रह देखो। दिन-दिन / के अनुसार = समास।
उदाहरण

यथाशक्ति तत्पुरुष क्यों नहीं? शक्ति तो उत्तरपद है।

हल

  1. प्रधान

    अर्थ «शक्ति» नहीं, अर्थ «के अनुसार» है — जितनी शक्ति हो उतना। प्रधान पूर्व अव्यय यथा।

  2. व्यवहार

    पूरा शब्द अव्यय: वह यथाशक्ति पढ़ता है। तत्पुरुष में उत्तर संज्ञा प्रधान रहती (राजपुत्र = एक पुत्र)।

उत्तरअव्ययीभाव — पूर्वपद प्रधान

तत्पुरुष — उत्तरपद प्रधान

विग्रह में बीच की विभक्ति गिर गई है। अर्थ उत्तरपद का चलता है: राजपुत्र एक पुत्र है, राजा नहीं। उपनाम उसी विभक्ति से पड़ता है जो विग्रह में लौटती है। कारक का पूरा पाठ नहीं — केवल ये सात घर।

उपभेदविग्रह मेंउदाहरण
कर्म (द्वितीया)कोशरणागत = शरण को आगत · स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त · ग्रामगत = ग्राम को गया
करण (तृतीया)से / द्वारा (साधन)धनहीन = धन से हीन · शस्त्रहत = शस्त्र से हत · मदोन्मत्त = मद से उन्मत्त
संप्रदान (चतुर्थी)के लिएगुरुदक्षिणा = गुरु के लिए दक्षिणा · रसोईघर = रसोई के लिए घर · हथकड़ी = हाथ के लिए कड़ी
अपादान (पंचमी)से (अलग / डर)रोगभीत = रोग से भीत · चोरीभय = चोरी से भय · देशनिकाला = देश से निकाला
संबंध (षष्ठी)का / के / कीराजपुत्र · गंगाजल · सेनापति · रामलीला · देशभक्ति · घुड़सवार · हिमालय (हिम का आलय)
अधिकरण (सप्तमी)में / परवनवास = वन में वास · जलमग्न = जल में मग्न · पुरुषोत्तम = पुरुषों में उत्तम · आपबीती = आप पर बीती
कर्ताके द्वारा (कर्ता)ईश्वरदत्त = ईश्वर के द्वारा दत्त · राजकृत = राजा के द्वारा किया
करण ≠ अपादान। दोनों विग्रह में «से»। करण = साधन (शस्त्र से मारा)। अपादान = अलग होना / डर का स्रोत (रोग से डरा, पेड़ से गिरा)। धनहीन साधन-अभाव = करण। रोगभीत डर = अपादान।

नञ् तत्पुरुष — अ / अन् = अभाव

नञ् = निषेध। पहले पद अ या अन्, अर्थ «नहीं / अभाव»। उत्तरपद प्रधान: अज्ञान = ज्ञान का अभाव (एक तरह का अभाव-पद, ज्ञान नहीं)।

  • अगला वर्ण व्यंजन → अ: अधर्म, अनीति, अज्ञान, असत्य, अशुद्ध
  • अगला वर्ण स्वर → अन्: अनादर, अनिष्ट, अनाथ, अनिच्छा, अनादि

अनाथ = नाथ नहीं जिसका — कुछ पुस्तकें इसे बहुव्रीहि भी लिखती हैं («नाथ नहीं है जिसका»)। «नञ् तत्पुरुष» विकल्प हो तो वही; केवल बहुव्रीहि हो और विग्रह «जिसका नाथ नहीं» तो बहुव्रीहि।

अलुक् तत्पुरुष

कभी विभक्ति गिरती नहीं, चिह्न रह जाता है: युधिष्ठिर = युधि (युद्ध में) स्थिर। अधिकरण की «ि» दिख रही है। कम पूछते हैं; विकल्प में दिखे तो तत्पुरुष का यही उपनाम।

उदाहरण

राजपुत्र, वनवास, शरणागत — तीनों तत्पुरुष। उपभेद?

हल

  1. विग्रह

    राजा का पुत्र = संबंध (षष्ठी)। वन में वास = अधिकरण। शरण को आगत = कर्म।

  2. प्रधान

    तीनों में उत्तर: पुत्र, वास, आगत व्यक्ति। पूर्व राजा/वन/शरण केवल जोड़।

उत्तरसंबंध, अधिकरण, कर्म तत्पुरुष

कर्मधारय — विशेषण + विशेष्य, दोनों एक चीज़

पूर्वपद विशेषण (कैसा), उत्तरपद विशेष्य (कौन-सी चीज़)। विग्रह में प्रायः विभक्ति नहीं, केवल «नीला कमल» / «नीला है जो कमल»। दोनों पद एक ही वस्तु को कह रहे हैं — नीलकमल एक कमल है जो नीला है। इसीलिए कुछ व्याकरण इसे तत्पुरुष का समानाधिकरण भेद कहते हैं। परीक्षा छह नाम माँगे तो कर्मधारय लिखो।

प्रकारसमस्त पदविग्रह
विशेषण–विशेष्यनीलकमल · महात्मा · पीतांबर (वस्त्र) · सज्जन · महाराज · रक्तकमलनीला कमल · महान आत्मा · पीला अंबर
उपमान–उपमेयघनश्याम · चंद्रमुख · कमलनयन (आँखें कमल-जैसी — सावधान, बहुव्रीहि भी)घन जैसा श्याम · चंद्रमा के समान मुख
रूपक (रूपी)चरणकमल · मुखकमल · नेत्रकमलचरण रूपी कमल · मुख रूपी कमल

मध्यपदलोपी: विग्रह में बीच का «रूपी / के समान / से उत्पन्न» समस्त पद में नहीं दिखता। चरणकमल = चरण रूपी कमल। प्राणप्रिय = प्राणों के समान प्रिय।

महात्मा कर्मधारय, महेश संधि। महान + आत्मा = महात्मा (विशेषण+संज्ञा)। महा+ईश = महेश पिछली संधि है, यहाँ विग्रह «महान ईश» मत लिखना अगर प्रश्न संधि का हो। घनश्याम व्यक्ति-कृष्ण माने तो बहुव्रीहि; «बादल जैसा काला रंग» माने तो कर्मधारय। प्रश्न का अर्थ पढ़ो।

द्विगु — पूर्वपद संख्या, अर्थ समूह

पहला पद संख्या (द्वि, त्रि, चतुर्, पंच, सप्त, नव, दश…), दूसरा संज्ञा। विग्रह प्रायः: … का समाहार / समूह। उत्तरपद प्रधान (एक इकाई समूह) — इसलिए शास्त्र में तत्पुरुष की शाखा; परीक्षा में अलग नाम द्विगु।

समस्त पदविग्रह
पंचवटीपाँच वटों का समाहार
त्रिभुवनतीन भुवनों का समाहार
नवरात्र / नवरात्रिनौ रात्रियों का समाहार
चतुर्वेदचार वेदों का समाहार
सप्तर्षिसात ऋषियों का समाहार
नवग्रहनौ ग्रहों का समाहार
त्रिलोकतीन लोकों का समाहार
दोपहरदो पहरों का समाहार (दैनिक व्यवहार)
संख्या दिखी ≠ हमेशा द्विगु। दशानन = दस मुख हैं जिसके (रावण) → बहुव्रीहि, समूह नहीं। चतुर्भुज = चार भुजाएँ जिसकी (विष्णु) → बहुव्रीहि। चतुर्वेद = चार वेद मिलकर एक राशि → द्विगु। पूछो: यह शब्द कोई व्यक्ति है या समूह-वस्तु?

द्वंद्व — दोनों पद प्रधान

विग्रह में और / तथा / वा। कोई एक को गौण मत करो। तीन उपभेद रटो।

1. इतरेतर द्वंद्व

दोनों अलग-अलग गिने जाते हैं, बहुवचन का भाव: राम और लक्ष्मण — दो व्यक्ति। शिव-पार्वती, भाई-बहन, सुख-दुःख (जब दो अलग अवस्थाएँ गिनो), सीता-राम, दिन-रात।

2. समाहार द्वंद्व

मिलकर एक ढेर / एक व्यवहार बनता है, गिनती पर जोर नहीं: अन्न-जल, दाल-रोटी, पाप-पुण्य (एक नैतिक जोड़ा), हाथ-पैर (अंगों का समूह), देश-विदेश। विग्रह फिर भी «और», पर अर्थ समाहार।

3. एकशेष द्वंद्व

दो में से एक शब्द रह जाता है, दूसरा अर्थ में समाया: संस्कृत में पिता+माता → पितरौ पक्का। हिंदी में कुछ कुंजी भाई = भाई और बहन, पुत्र = पुत्र और पुत्री लिखती हैं — कम आते हैं; नाम पहचानो, रोजमर्रा वाक्य «भाई आए» को बहन समेत मत बना बैठना।

द्वंद्व vs तत्पुरुष: रामलीला = राम की लीला (उत्तर लीला प्रधान) → तत्पुरुष। राम-लक्ष्मण = राम और लक्ष्मण → द्वंद्व। बीच में योजक «की» हो तो तत्पुरुष, «और» हो तो द्वंद्व।

बहुव्रीहि — अर्थ किसी तीसरे का

दो पद अपनी चीज़ नहीं बताते, किसी और व्यक्ति / वस्तु को। विग्रह: जो / जिसका / जिसके / जिसकी। प्रधान न पूर्व न उत्तर — बाहर वाला।

समस्त पदविग्रहतीसरा अर्थ
नीलकंठनीला है कंठ जिसकाशिव
पीतांबरपीला है अंबर जिसकाकृष्ण / विष्णु
दशाननदस हैं आनन जिसकेरावण
लंबोदरलंबा है उदर जिसकागणेश
गजाननगज जैसा आनन जिसकागणेश
त्रिलोचनतीन हैं लोचन जिसकेशिव
चक्रपाणि / चक्रधरचक्र है पाणि में जिसकेविष्णु
चतुर्भुजचार हैं भुजाएँ जिसकीविष्णु
पद्माक्षपद्म जैसे अक्षि जिसकेविष्णु
श्वेतांबरश्वेत है अंबर जिसकाएक सम्प्रदाय / व्यक्ति श्वेत वस्त्र वाला

कर्मधारय और बहुव्रीहि — एक ही जोड़ा, दो अर्थ

यह अध्याय का सबसे बड़ा जाल है। शब्द एक, विग्रह दो।

शब्दकर्मधारय (वही वस्तु)बहुव्रीहि (कोई और)
पीतांबरपीला वस्त्रकृष्ण (पीला वस्त्र है जिसका)
नीलकंठनीला कंठ (रंग का वर्णन)शिव
चंद्रमुखचंद्रमा जैसा मुख (मुख ही)वह व्यक्ति जिसका मुख चंद्र जैसा
दीर्घग्रीवलंबी गर्दनऊँट (लंबी है ग्रीवा जिसकी)

फैसला: विकल्प में शिव / कृष्ण / रावण / गणेश / विष्णु हो, या विग्रह «जिसका» हो → बहुव्रीहि। विकल्प «नीला फूल / पीला कपड़ा» हो → कर्मधारय।

उदाहरण

नीलकमल बहुव्रीहि क्यों नहीं, नीलकंठ क्यों है?

हल

  1. नीलकमल

    नीला + कमल = वही फूल। तीसरा व्यक्ति नहीं। कर्मधारय।

  2. नीलकंठ

    नीला + कंठ बोलकर हम कंठ नहीं बेच रहे; शिव को पुकार रहे हैं। अर्थ बाहर गया → बहुव्रीहि।

उत्तरकमल वस्तु स्वयं; कंठ वाला शब्द शिव को कहता है

कौन-सा समास — क्रम से पूछो

  1. विग्रह लिखो। बिना विग्रह नाम मत लगाओ।
  2. अर्थ तीसरे (जिसका / शिव-कृष्ण-रावण) पर गया? → बहुव्रीहि। रुक जाओ।
  3. पूर्वपद अव्यय और पूरा शब्द क्रिया-विशेषण जैसा? → अव्ययीभाव।
  4. पूर्वपद संख्या और अर्थ समूह/समाहार? → द्विगु। (व्यक्ति हो तो वापस बहुव्रीहि।)
  5. विग्रह में और, दोनों बराबर? → द्वंद्व।
  6. विशेषण + वही संज्ञा, «कैसा कमल»? → कर्मधारय।
  7. विभक्ति का / को / से / में / के लिए? → तत्पुरुष, फिर उपभेद। अ/अन् + अभाव = नञ्।
शब्दविग्रह की कुंजीभेद
यथामतिके अनुसारअव्ययीभाव
सेनापतिसेना का पतितत्पुरुष (संबंध)
रक्तकमललाल कमलकर्मधारय
त्रिनेत्रतीन नेत्र जिसके — शिवबहुव्रीहि (द्विगु नहीं)
नवग्रहनौ ग्रहों का समूहद्विगु
पाप-पुण्यऔरद्वंद्व
अनीतिनीति का अभावनञ् तत्पुरुष

प्रश्न 1–10

प्र. 1

राजपुत्र का समास?

  1. अव्ययीभाव — राजा प्रधान
  2. तत्पुरुष संबंध (राजा का पुत्र)
  3. द्वंद्व — राजा और पुत्र
  4. बहुव्रीहि — पुत्र है जिसका

हल

  1. विग्रह

    राजा का पुत्र। विभक्ति «का» = संबंध तत्पुरुष। प्रधान पुत्र।

  2. काटो

    अव्यय नहीं। «और» नहीं। तीसरा व्यक्ति नहीं — वही बेटा।

उत्तरB
प्र. 2

यथाशक्ति का सही विग्रह और भेद?

  1. शक्ति के अनुसार — अव्ययीभाव
  2. यथा की शक्ति — तत्पुरुष
  3. यथा और शक्ति — द्वंद्व
  4. शक्ति है जिसकी — बहुव्रीहि

हल

  1. यथा = अनुसार

    पूर्व अव्यय प्रधान, समस्त पद अव्यय। तत्पुरुष में उत्तर शक्ति प्रधान होती — यहाँ अर्थ «अनुसार» का है।

उत्तरA
प्र. 3

विग्रह «पीला है अंबर जिसका» — शब्द और समास?

  1. पीतांबर — कर्मधारय, केवल वस्त्र
  2. पीतांबर — तत्पुरुष संबंध
  3. पीतांबर — बहुव्रीहि (कृष्ण)
  4. पीतवस्त्र — द्वंद्व

हल

  1. «जिसका»

    अर्थ तीसरे पर गया = बहुव्रीहि = कृष्ण। कर्मधारय तभी जब विग्रह «पीला अंबर / पीला वस्त्र» हो।

उत्तरC
प्र. 4

पंचवटी कौन-सा समास?

  1. बहुव्रीहि — पाँच वट हैं जिसके
  2. द्विगु — पाँच वटों का समाहार
  3. द्वंद्व — पंच और वटी
  4. अव्ययीभाव

हल

  1. संख्या + समूह

    जगह का नाम पाँच पेड़ों का समूह है, कोई व्यक्ति नहीं। द्विगु। «जिसके» वाला सोच दशानन पर लगाना।

उत्तरB
प्र. 5

राम-लक्ष्मण और रामलीला?

  1. दोनों द्वंद्व
  2. दोनों तत्पुरुष
  3. राम-लक्ष्मण तत्पुरुष, रामलीला द्वंद्व
  4. राम-लक्ष्मण द्वंद्व, रामलीला तत्पुरुष (राम की लीला)

हल

  1. और vs की

    राम और लक्ष्मण = दोनों प्रधान, द्वंद्व। राम की लीला = उत्तर लीला प्रधान, संबंध तत्पुरुष।

उत्तरD
प्र. 6

अज्ञान का समास?

  1. नञ् तत्पुरुष — ज्ञान का अभाव
  2. अव्ययीभाव — अ के अनुसार ज्ञान
  3. कर्मधारय — अ जैसा ज्ञान
  4. द्विगु

हल

  1. अ + व्यंजन

    ज्ञान व्यंजन से, इसलिए अ। अर्थ निषेध। अव्यय «अ» यहाँ यथा जैसा नहीं।

उत्तरA
प्र. 7

नीलकमल और नीलकंठ?

  1. दोनों कर्मधारय
  2. दोनों बहुव्रीहि
  3. नीलकमल कर्मधारय, नीलकंठ बहुव्रीहि (शिव)
  4. नीलकमल द्विगु, नीलकंठ तत्पुरुष

हल

  1. वही वस्तु vs तीसरा

    नीला कमल = फूल स्वयं, कर्मधारय। नीला कंठ जिसका = शिव, बहुव्रीहि।

उत्तरC
प्र. 8

वनवास तत्पुरुष का कौन-सा भेद?

  1. संबंध — वन का वास
  2. अधिकरण — वन में वास
  3. करण — वन से वास
  4. अव्ययीभाव

हल

  1. में

    वास जगह वन में होता है = अधिकरण (सप्तमी)। «का» संबंध गंगाजल पर। अव्यय नहीं।

उत्तरB
प्र. 9

चतुर्वेद और चतुर्भुज?

  1. चतुर्वेद द्विगु (चार वेदों का समाहार), चतुर्भुज बहुव्रीहि (विष्णु)
  2. दोनों द्विगु
  3. दोनों बहुव्रीहि
  4. चतुर्वेद बहुव्रीहि, चतुर्भुज द्विगु

हल

  1. समूह vs व्यक्ति

    चार वेद एक राशि = द्विगु। चार भुजाएँ जिसकी = विष्णु = बहुव्रीहि। संख्या दोनों में है, अर्थ अलग।

उत्तरA
प्र. 10

«हिमालय» पर प्रश्न «समास बताओ» हो तो?

  1. दीर्घ स्वर संधि — हिम+आलय; समास नहीं
  2. अव्ययीभाव
  3. द्वंद्व — हिम और आलय
  4. तत्पुरुष संबंध — हिम का आलय (संधि अलग प्रश्न पर)

हल

  1. जो माँगा

    समास = अर्थ-जोड़, षष्ठी तत्पुरुष। संधि वाला दीर्घ तभी जब प्रश्न संधि/विच्छेद लिखे। दोनों सच, उत्तर टैग से चुनो।

उत्तरD

अभ्यास

12345 678910

अ. 1

प्रतिदिन?

  1. अव्ययीभाव — प्रत्येक दिन
  2. तत्पुरुष — प्रति का दिन
  3. उपसर्ग मात्र, समास नहीं
  4. द्विगु

हल

  1. प्रति + दिन

    अव्यय पूर्व, अर्थ दिन-दिन। उपसर्ग वाला पृष्ठ अलग; यहाँ विग्रह «प्रत्येक दिन» समास है।

उत्तरA
अ. 2

सेनापति?

  1. द्वंद्व — सेना और पति
  2. तत्पुरुष संबंध — सेना का पति / स्वामी
  3. बहुव्रीहि
  4. कर्मधारय

हल

  1. का

    सेना का नायक। उत्तर पति प्रधान। और नहीं, विशेषण नहीं।

उत्तरB
अ. 3

महात्मा?

  1. कर्मधारय — महान आत्मा
  2. गुण संधि केवल
  3. बहुव्रीहि अनिवार्य
  4. द्विगु

हल

  1. विशेषण+संज्ञा

    महान आत्मा = वही पुरुष। कर्मधारय। महा+आत्मा दीर्घ संधि भी है — प्रश्न समास का है तो कर्मधारय।

उत्तरA
अ. 4

नवग्रह?

  1. बहुव्रीहि — नौ ग्रह जिसके
  2. द्वंद्व
  3. द्विगु — नौ ग्रहों का समाहार
  4. अव्ययीभाव

हल

  1. संख्या+समूह

    नौ ग्रहों का दल, कोई देवता-नाम नहीं। द्विगु।

उत्तरC
अ. 5

सुख-दुःख?

  1. तत्पुरुष — सुख का दुःख
  2. द्वंद्व — सुख और दुःख
  3. कर्मधारय
  4. नञ्

हल

  1. और

    दोनों प्रधान। इतरेतर या समाहार — द्वंद्व अवश्य।

उत्तरB
अ. 6

दशानन?

  1. द्विगु — दस आनन का समूह
  2. बहुव्रीहि — दस मुख हैं जिसके (रावण)
  3. कर्मधारय
  4. तत्पुरुष अधिकरण

हल

  1. व्यक्ति

    शब्द रावण को कहता है, दस मुखों का ढेर नहीं। बहुव्रीहि। पंचवटी से तुलना करो।

उत्तरB
अ. 7

धनहीन तत्पुरुष?

  1. करण — धन से हीन
  2. अपादान — धन से अलग डर
  3. संबंध — धन का हीन
  4. नञ् — अ+धन

हल

  1. से = साधन-अभाव

    हीनता धन से मापी गई = करण। अपादान डर/गिराव पर (रोगभीत)। नञ् अ- लगता है, धन- नहीं।

उत्तरA
अ. 8

शरणागत?

  1. अधिकरण — शरण में आगत
  2. कर्म तत्पुरुष — शरण को आगत
  3. अव्ययीभाव
  4. द्वंद्व

हल

  1. को

    शरण को आया = कर्म (द्वितीया)। «में» अधिकरण वनवास पर ठीक, यहाँ गति «को» की है।

उत्तरB
अ. 9

अनाथ — नञ् और बहुव्रीहि दोनों क्यों चलते?

  1. नहीं चलते; केवल द्विगु
  2. अ + नाथ = नाथ का अभाव (नञ्); नाथ नहीं जिसका (बहुव्रीहि) — प्रश्न का विकल्प देखो
  3. केवल अव्ययीभाव
  4. केवल कर्मधारय

हल

  1. दो विग्रह

    स्वर से शुरू नाथ → अन्+आथ = अनाथ, नञ्। «जिसका नाथ नहीं» तीसरा अर्थ = बहुव्रीहि। जो विकल्प लिखा हो वही।

उत्तरB
अ. 10

चरणकमल और कमलनयन (सुंदर नेत्र वाले व्यक्ति के अर्थ में)?

  1. दोनों द्विगु
  2. चरणकमल कर्मधारय (रूपी), कमलनयन बहुव्रीहि (नेत्र कमल जैसे जिसके)
  3. दोनों तत्पुरुष संबंध
  4. दोनों अव्ययीभाव

हल

  1. रूपी vs जिसका

    चरण रूपी कमल = वही चरण, कर्मधारय रूपक। कमल जैसे नयन जिसके = व्यक्ति, बहुव्रीहि। अगर केवल «कमल जैसे नयन» (आँखें स्वयं) कहो तो कर्मधारय — अर्थ पढ़ो।

उत्तरB

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