इस विषय में क्या आता है
परीक्षा पूछती है — वीर का स्थायी भाव क्या, सीता-राम का विरह करुण है या शृंगार, कोयल-चाँदनी आलंबन है या उद्दीपन, दोहा में कितनी मात्रा, सोरठा दोहा का उल्टा क्यों, चौपाई सोलह है या तेरह-ग्यारह, मस्तक में म लघु है या गुरु। पूछ हृदय का नाम या पंक्ति का नाप। उपमा-रूपक का नाम यहाँ नहीं।
यहाँ पढ़ना है
रस-सूत्र, चार अंग, नवरस + वात्सल्य-भक्ति, प्रत्येक का स्थायी भाव, संयोग-विप्रलंभ शृंगार, आलंबन-उद्दीपन, सात्त्विक आठ, संचारी का स्वभाव। छंद: लघु-गुरु, मात्रा के नियम, दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला, उल्लाला-कुंडलिया-छप्पय का ढाँचा, आठ गण।
यहाँ नहीं घुसाना
मुख कमल के समान, चरण-कमल, मनहुँ, तीन बेर — अलंकार। आँख का तारा — मुहावरे। अंधों में काना राजा — लोकोक्तियाँ। हरि के कई अर्थ, गन्ने का रस — अनेकार्थक। गद्यांश पढ़कर शीर्षक-भाव — अपठित। कर्तृ-कर्म — वाच्य।
एक पंक्ति: अलंकार पंक्ति को सुंदर करता है। रस पाठक को भिगोता है। छंद पंक्ति को नापता है। तीनों एक कुंजी नहीं।
तीन घर — गहना, भाव, नाप
| घर | प्रश्न क्या माँगता है | पक्का संकेत |
|---|---|---|
| अलंकार | गहना कौन-सा | समान, मनहुँ, चरण-कमल, व्यंजन की गूँज — पिछला पृष्ठ |
| रस | हृदय में कौन-सा भाव पका | स्थायी भाव, संयोग-वियोग, आलंबन |
| छंद | मात्रा / चरण कितने | 13+11, 16, गुरु-लघु |
एक पद्य तीनों रख सकता है: रहीम का दोहा मात्रा से दोहा है, «पानी» से श्लेष हो सकता है, नीति पढ़कर शांत-सा आस्वाद हो सकता है। प्रश्न जो शब्द लिखे — रस, छंद, अलंकार — वही घर खोलो।
रस क्या है
काव्य, नाटक या गीत पढ़-सुनकर हृदय में जो आस्वाद जगता है — मानो कोई स्वाद चखा हो — वही रस। भरत मुनि का सूत्र कक्षा-10 तक इतना: विभाव + अनुभाव + व्यभिचारी (संचारी) के संयोग से रस की निष्पत्ति। स्थायी भाव कच्चे माल की तरह पहले से पड़ा रहता है; ये तीन उसे पकाकर रस बनाते हैं।
रसोई का रूपक याद रखो। स्थायी भाव आटा है। विभाव आग और तवा। अनुभाव पकते समय दिखने वाला रंग-खुशबू। संचारी कभी नमक कभी मिर्च — आते-जाते। पका हुआ स्वाद = रस। आटा अकेला रस नहीं; स्वाद बिना आटे के भी नहीं।
कसौटी: नाम पूछे तो रस। «किस भाव से बना» पूछे तो स्थायी भाव। दोनों एक नहीं — शृंगार रस है, रति उसका स्थायी भाव है।
चार अंग
| अंग | काम | एक पंक्ति |
|---|---|---|
| स्थायी भाव | पूरे प्रसंग में बना रहता है | रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद |
| विभाव | भाव जगाने का कारण | आलंबन (किस पर) + उद्दीपन (क्या भड़काए) |
| अनुभाव | बाहर दिखने वाली चेष्टा | पुलक, अश्रु, काँपना, मुस्कान, गर्जन |
| संचारी / व्यभिचारी | अस्थायी, कई रसों में घूमता | हर्ष, शंका, लज्जा, चिंता, गर्व, निद्रा… |
सात्त्विक भाव अनुभाव का ही एक कड़ा घर है — शरीर अपने-आप दिखता है, अभिनय की योजना कम। आठ नाम नीचे विभाव वाले खंड में हैं। प्रश्न «रस के अंग» लिखे तो ये चार; «सात्त्विक» अलग से पूछे तो आठ।
शृंगार — संयोग और विप्रलंभ
स्थायी भाव रति है। नायक-नायिका का प्रेम। दो बड़े भेद:
| भेद | स्थिति | क्या दिखे |
|---|---|---|
| संयोग | मिलन, साथ | हास-विलास, हाव-भाव, चाँदनी में बैठना, बन-ठन (यहाँ रस शृंगार; «बन-ठन» वाला मेघ मानवीकरण भी हो सकता है — प्रश्न क्या पूछे) |
| विप्रलंभ / वियोग | बिछोह, पर दूरियाँ प्रेम टूटा नहीं | विरह-वेदना, स्मृति, बाट जोहना, पत्र |
विप्रलंभ के चार कोने कक्षा-10 में इतने काफी हैं:
- पूर्वराग — मिलन से पहले की चाह, सुनकर/देखकर प्रेम।
- मान — रूठना, अभिमान। प्रेम है, बोल बंद।
- प्रवास — दूर देश, यात्रा; राम-कथा में सीता-हरण / अशोक वाटिका का बिछोह प्रवास-विरह। वनवास में साथ रहते हुए बिछोह मुख्य नहीं।
- करुण विप्रलंभ — अत्यंत दुःख वाला वियोग; नाम में «करुण» है पर रस अभी शृंगार ही रहता है अगर जड़ रति है।
अयोध्या में राम-सीता का वन-बिछोह — करुण रस या वियोग शृंगार?
हल
- जड़ कौन
प्रेम बाकी है, मिलन टूटा है। स्थायी रति।
- करुण कब
शोक तब पक्का जब प्रेम की जड़ न हो — दशरथ का प्राण छोड़ना, घायल निर्दोष की मृत्यु।
- ठप्पा
वियोग / विप्रलंभ शृंगार। «करुण» शब्द देखकर घर मत बदलना।
बाकी रस — स्थिति से पकड़ो
| रस | स्थिति / चित्र | निकट जाल |
|---|---|---|
| हास्य | विकृति, चुटकुला, नाक-भौं, चेहरा बिगड़ना; हँसी स्थायी | संयोग शृंगार में भी मुस्कान होती है — वहाँ जड़ रति है, हास नहीं |
| करुण | मृत्यु, विपत्ति, दशरथ, घायल पक्षी, अनाथ | विरह ≠ करुण, ऊपर पढ़ा |
| रौद्र | अपमान पर क्रोध — परशुराम, दुर्गा का प्रचंड रूप, शत्रु-गर्जन | वीर उत्साह से लड़ता है; रौद्र गुस्से से जलता है |
| वीर | युद्ध-उत्साह, धनुष चढ़ाना, «है है» नहीं «चलो लड़ें» | दानवीर, धर्मवीर, युद्धवीर — भेद पूछें तो उत्साह की दिशा देखो |
| भयानक | अंधकार, श्मशान, राक्षस-सेना, काँपना, स्वर टूटना | बीभत्स घृणा है, डर नहीं |
| बीभत्स | रक्त-मांस, सड़न, युद्ध-क्षेत्र की घिन, जुगुप्सा | भयानक से मत मिलाओ |
| अद्भुत | हनुमान पर्वत उठाए, आकाश-सी घटना, मुँह खुला रह जाना | अतिशयोक्ति अलंकार हद तोड़ती है; अद्भुत रस आश्चर्य पकाता है — प्रश्न देखो |
| शांत | वैराग्य, संत, राम-नाम, भोग से ऊब | उदासी करुण हो सकती है; वैराग्य शांत है |
| वात्सल्य | यशोदा-कृष्ण, माँ-बच्चा, मक्खन, लाड़ | यह शृंगार नहीं — रति दंपति की, वत्सलता पालक की |
| भक्ति | मीरा, सूर का भगवान् के प्रति अनुराग | भगवद्-प्रेम को दांपत्य शृंगार मत ठोकना जब विकल्प में भक्ति हो |
वीर के तीन नाम कभी विकल्प में आते हैं: युद्धवीर (शत्रु पर), दानवीर (देने का उत्साह), धर्मवीर (धर्म पर अटल)। स्थायी सबका उत्साह ही रहता है।
विभाव, अनुभाव, सात्त्विक
आलंबन और उद्दीपन
आलंबन — भाव किस पर टिका। शृंगार में नायक-नायिका। करुण में मृत/दुःखी व्यक्ति। वीर में शत्रु या रक्ष्य समाज।
कुछ पुस्तकें आलंबन को दो टुकड़े करती हैं: आश्रय (जिसके हृदय में भाव जगा — नायक) और विषय (जिसकी ओर भाव गया — नायिका)। प्रश्न «आलंबन» लिखे तो दोनों में से जो विकल्प पक्का व्यक्ति हो; चाँदनी को आलंबन मत बनाना।
उद्दीपन — जो भाव को भड़काए, स्वयं प्रेमी न हो। शृंगार: चाँदनी, कोयल, मंद पवन, बसंत, एकांत उद्यान, मेघ। रौद्र: शत्रु का व्यंग्य, रक्त। भयानक: गर्जन, अंधेरा, श्मशान-ध्वनि। करुण: खाली घर, पुरानी वस्तु की स्मृति।
| चित्र | आलंबन | उद्दीपन |
|---|---|---|
| राम-सीता चाँदनी में | राम / सीता | चाँदनी, कोयल |
| यशोदा कृष्ण को डाँटती | यशोदा-कृष्ण (वात्सल्य) | मक्खन, बाँसुरी की गूँज |
| अर्जुन युद्ध-भूमि पर | अर्जुन (आश्रय), कौरव-सेना (विषय) | शंख, ध्वज, नगाड़ा |
अनुभाव
इच्छा से दिखने वाली चेष्टा: नयन-मिलान, आलिंगन, मुसकान, भृकुटी, गर्जन, शस्त्र उठाना, पीठ दिखाना। कवि लिखता है «कर क्या रहा» — वही अनुभाव।
सात्त्विक भाव — आठ
शरीर अपने-आप बोलता है। रटो:
- स्तंभ — अड़ना, सुन्न।
- स्वेद — पसीना।
- रोमांच — रोंगटे।
- स्वरभंग — गला टूटना।
- वेपथु — काँपना।
- वैवर्ण्य — रंग उड़ना।
- अश्रु — आँसू।
- प्रलय — मूर्च्छा, सुध-बुध जाना।
अनुभाव व्यापक घर है; सात्त्विक उसका अनिवार्य, अनिच्छा वाला कमरा है। प्रश्न «सात्त्विक कितने» → आठ। «अंग कितने» → चार।
संचारी भाव — आता है, जाता है
संख्या शास्त्र में 33 मानी जाती है। परीक्षा पूरी सूची कम माँगती है। काम की बात: संचारी किसी एक रस का मालिक नहीं। हर्ष शृंगार में भी, वीर में भी। शंका भयानक में भी, वियोग में भी। स्थायी पूरे प्रसंग का मालिक रहता है; संचारी मेहमान है।
पक्के नाम रटो — हर्ष, शंका, लज्जा, ग्लानि, चिंता, त्रास, गर्व, आलस्य, निद्रा, मोह, स्मृति, आवेग, मरण, उन्माद, चपलता, दैन्य, अमर्ष, विषाद, धृति, वितर्क।
छंद क्या है
छंद पंक्ति का नाप है — कितनी मात्रा, कितने वर्ण, यति कहाँ, तुक कहाँ। गहना नहीं, भाव नहीं। बिना छंद के भी कविता हो (मुक्त छंद / अतुकांत); परीक्षा का कक्षा-10 वाला हिस्सा प्रायः बद्ध मात्रिक छंद पूछता है: दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला।
| घर | नाप किससे | कक्षा-10 का काम |
|---|---|---|
| मात्रिक | लघु-गुरु की मात्रा (1 या 2) | दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला |
| वर्णिक | वर्णों का गण (तीन-तीन का बंडल) | गण पहचानना, नाम याद |
यति = पढ़ते समय विश्राम। तुक = चरण के अंत की समान ध्वनि। दोहा के सम चरण प्रायः तुक मिलाते हैं।
मात्रा — लघु और गुरु
गिनती अक्षर के स्वर से होती है, देवनागरी के चित्र से नहीं। एक स्वर-इकाई = एक मात्रा-घर।
| नियम | मात्रा | उदाहरण |
|---|---|---|
| ह्रस्व अ, इ, उ, ऋ | लघु = 1 | क, हि, मु, ऋषि का ऋ |
| दीर्घ आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ | गुरु = 2 | का, की, मू, ने, नै, गो, नौ |
अनुस्वार ं, विसर्ग ः, चंद्रबिंदु ँ | वह वर्ण गुरु = 2 | कं, चंद्र का चं, दुःख का दुः |
| संयुक्त व्यंजन से पहले का स्वर | गुरु = 2 | मस्तक में म; धर्म में ध |
संयुक्त का मतलब दो व्यंजन एक साथ: स्त, त्र, द्व, क्ष (क्+ष), ज्ञ। उनके ठीक पहले वाला घर गुरु हो जाता है भले स्वर ह्रस्व दिखे।
रहिमन पानी राखिए — मात्रा कितनी?
हल
- टुकड़े
र(1) हि(1) म(1) न(1) · पा(2) नी(2) · रा(2) खि(1) ए(2)
- जोड़
1+1+1+1 + 2+2 + 2+1+2 = 13
- ठप्पा
दोहे का विषम चरण। अगला चरण
बिन पानी सब सूनग्यारह होना चाहिए।
बिन पानी सब सून — बि(1) न(1) पा(2) नी(2) स(1) ब(1) सू(2) न(1) = 11। पूरा दोहा यहीं बैठता है।
पानी गए न ऊबरै — पा(2) नी(2) ग(1) ए(2) न(1) ऊ(2) ब(1) रै(2) = 13। मोती मानुष चून — मो(2) ती(2) मा(2) नु(1) ष(1) चू(2) न(1) = 11।
खि इ ह्रस्व = 1, खी = 2। हलंत व्यंजन नया घर नहीं खोलता, पिछले से चिपकता है। संदेह हो तो ज़ोर से पढ़ो — लंबा खिंचे तो गुरु। दोहा और सोरठा
| विषम चरण (1, 3) | सम चरण (2, 4) | दो पंक्ति = चार चरण | |
|---|---|---|---|
| दोहा | 13 | 11 | 24 + 24 |
| सोरठा | 11 | 13 | उल्टा दोहा |
दोहा चार चरण का मात्रिक छंद। कबीर, रहीम, तुलसी के नीति-दोहे परीक्षा के पक्के मेहमान। तुक प्रायः दूसरे और चौथे चरण के अंत में।
सोरठा दोहे का आईना: पहले ग्यारह, फिर तेरह। मात्राएँ याद रहें तो नाम गड़बड़ाएगा नहीं। विकल्प में «दोहा 11+13» लिखे तो झूठ — वह सोरठा है।
कसौटी: 13 फिर 11 = दोहा। 11 फिर 13 = सोरठा। दोनों 24 की जोड़ी हैं; क्रम उल्टा है।
चौपाई, रोला, उल्लाला
| छंद | प्रत्येक चरण | यति / और बात | कहाँ बसता |
|---|---|---|---|
| चौपाई | 16 मात्रा | अक्सर 8+8 पर विश्राम; चार चरण | रामचरितमानस, तुलसी |
| रोला | 24 मात्रा | यति 11वीं मात्रा पर (11+13) | कुंडलिया का दूसरा खंड |
| उल्लाला | विषम 15, सम 13 | दो चरण की इकाई (15+13=28) | छप्पय के अंत में |
चौपाई गिनकर देखो। जाकी रही भावना जैसी — जा(2) की(2) र(1) ही(2) भा(2) व(1) ना(2) जै(2) सी(2) = 16। दूसरा चरण प्रभु मूरत देखी तिन तैसी — प्र(1) भु(1) मू(2) र(1) त(1) दे(2) खी(2) ति(1) न(1) तै(2) सी(2) = 16।
कुंडलिया, छप्पय — ढाँचा
कुंडलिया छह पंक्ति: पहले दोहा, पीछे रोला। दोहे का पहला शब्द / पहला टुकड़ा अंत में लौटकर «कुंडली» बंद करता है — इसलिए नाम। मात्रा: दोहा 13+11, फिर रोला के चरण 24।
छप्पय भी छह चरण: चार रोला + दो उल्लाला (या पुस्तक के अनुसार रोला-उल्लाला मिश्रण)। नाम «छह पद» से।
सवैया वर्णिक घर का मेहमान है — मात्रा नहीं, वर्ण-गण। कक्षा-10 में नाम पहचान काफी; गिनती पत्र कम माँगता है।
मुक्तक = एक स्वतंत्र पद्य, अगली पंक्ति से कहानी न बँधे। दोहा मुक्तक भी हो सकता है (रहीम का एक दोहा अपने में पूरा)।
गण — वर्णिक छंद की ईंट
तीन वर्णों का बंडल = गण। लघु ।, गुरु ऽ। सूत्र: यमाताराजभानसलगा — आठ गण + लघु + गुरु।
| गण | लघु-गुरु | सूत्र से टुकड़ा |
|---|---|---|
| यगण | । ऽ ऽ | य मा ता |
| मगण | ऽ ऽ ऽ | मा ता रा |
| तगण | ऽ ऽ । | ता रा ज |
| रगण | ऽ । ऽ | रा ज भा |
| जगण | । ऽ । | ज भा न |
| भगण | ऽ । । | भा न स |
| नगण | । । । | न स ल — तीन लघु |
| सगण | । । ऽ | स ल गा — दो लघु, अंत गुरु |
इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, वसंततिलका, मालिनी, शार्दूलविक्रीडित — नाम इतने काफी। पत्र «यगण कौन-सा» पूछे तो ।ऽऽ; मात्रा-दोहा यहाँ से मत नापना।
जाल — यहीं कटते हैं
1. वियोग शृंगार को करुण
प्रेम की जड़ बची = शृंगार। मृत्यु/विपत्ति की जड़ = करुण। दशरथ-मरण करुण; राम-सीता बिछोह वियोग शृंगार।
2. वात्सल्य को शृंगार
यशोदा-कृष्ण ममता है, दांपत्य रति नहीं।
3. आलंबन को उद्दीपन
व्यक्ति = आलंबन। चाँदनी-कोयल = उद्दीपन।
4. स्थायी को संचारी
पूरे प्रसंग का मालिक स्थायी। मेहमान संचारी। हास्य का हास स्थायी; शृंगार की हँसी संचारी।
5. वीर को रौद्र
उत्साह ≠ क्रोध।
6. दोहा को सोरठा / चौपाई
13+11 दोहा। 11+13 सोरठा। 16 चौपाई। 24 रोला।
7. अलंकार / मुहावरा / अनेकार्थक
समान-मनहुँ-चरण-कमल — अलंकार। आँख का तारा — मुहावरा। गन्ने का रस — अनेकार्थक।
8. गुरु नियम भूलना
संयुक्त से पहले का घर गुरु। मस्तक का म लघु नहीं।
दशरथ के प्राण निकलने का प्रसंग — कौन-सा रस?
हल
- जड़
पुत्र-वियोग से शोक, प्रेम-मिलन की रति नहीं।
- स्थायी
शोक → करुण। वियोग शृंगार तब जब नायक-नायिका का रति-सूत्र बचे।
परीक्षा में पाँच कदम
- प्रश्न क्या? रस का नाम, स्थायी भाव, अंग, आलंबन/उद्दीपन — या छंद का नाम, मात्रा गिनो, गण।
- रस हो तो जड़ पकड़ो: प्रेम / हँसी / शोक / क्रोध / उत्साह / भय / घृणा / आश्चर्य / वैराग्य / ममता / भक्ति।
- शृंगार हो तो मिलन या बिछोह — बिछोह पर करुण मत कूदना।
- छंद हो तो गिनो: 13+11 दोहा, 11+13 सोरठा, 16 चौपाई, 24 रोला। संयुक्त = पहले का गुरु।
- बाकी घर मत मिलाओ — अलंकार, मुहावरा, वाच्य, अपठित।
प्रश्न 1–10
रस किसे कहते हैं?
- भाषा का गहना — वह अलंकार है
- काव्य पढ़-सुनकर हृदय में जगा आस्वाद; स्थायी भाव का परिपाक
- मात्रा का नाप — छंद
- गन्ने का तरल — अनेकार्थक घर
हल
- आस्वाद
गहना अलंकार। नाप छंद। गन्ना अनेकार्थक।
वीर रस का स्थायी भाव?
- क्रोध — वह रौद्र का है
- उत्साह
- रति
- शोक
हल
- जोड़ा
वीर-उत्साह। गुस्सा रौद्र। प्रेम शृंगार।
राम-सीता का वन-बिछोह, प्रेम बाकी — रस?
- करुण — शोक की जड़ यहाँ मालिक नहीं
- वियोग / विप्रलंभ शृंगार
- हास्य
- शांत
हल
- रति बची
मिलन टूटा, सूत्र प्रेम का। वियोग शृंगार। दशरथ-मरण करुण अलग प्रसंग है।
शृंगार में चाँदनी और कोयल की कूक?
- आलंबन — व्यक्ति नहीं हैं
- उद्दीपन विभाव
- स्थायी भाव
- संचारी मरण
हल
- भड़काएँ
नायक-नायिका आलंबन। चाँदनी भाव बढ़ाती है — उद्दीपन।
शृंगार का स्थायी भाव?
- हास
- रति
- उत्साह
- निर्वेद
हल
- नाम ≠ भाव
शृंगार रस है, रति स्थायी। दोनों को एक मत लिखना।
दोहा के विषम और सम चरण की मात्रा?
- 11 और 13 — वह सोरठा
- 13 और 11
- 16 और 16 — चौपाई
- 24 और 24 बिना तोड़ — रोला का चरण 24 होता, दोहा नहीं
हल
- तेरह-ग्यारह
विषम 13, सम 11। उल्टा सोरठा।
सोरठा क्या है?
- दोहा का ही दूसरा नाम
- दोहे का उल्टा — विषम 11, सम 13
- प्रत्येक चरण 16
- शब्दालंकार
हल
- आईना
क्रम उलटो। अलंकार नहीं।
चौपाई के प्रत्येक चरण में मात्रा?
- 13
- 16
- 11
- 24
हल
- सोलह
तुलसी की चौपाई। 24 रोला। 13 दोहा-विषम।
मस्तक में «म» की मात्रा?
- लघु 1 — अ ह्रस्व दिखता है इसलिए
- गुरु 2 — स्त संयुक्त से पहले का स्वर गुरु
- मात्रा नहीं गिनी जाती
- यह अलंकार है
हल
- संयुक्त
म+स्त। पहले का घर गुरु। दिखने वाला ह्रस्व छंद में टूट जाता है।
स्थायी और संचारी में पक्का फर्क?
- दोनों पूरे काव्य के मालिक
- स्थायी प्रसंग भर रहता है; संचारी आता-जाता मेहमान है, कई रसों में घूमता है
- संचारी ही रस का नाम है
- स्थायी केवल अलंकार में होता है
हल
- मालिक / मेहमान
रति शृंगार छोड़कर नहीं भागती। हर्ष कई घरों में मेहमान बनता है।
अभ्यास
ये दस अलग कोण हैं — ऊपर वाले दस की नकल नहीं।
रस के चार अंग?
- उपमेय, उपमान, वाचक, धर्म — वे उपमा के हैं
- स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव
- कर्ता, कर्म, भाव, क्रिया
- दोहा, चौपाई, रोला, सोरठा
हल
- पकाना
A अलंकार। C वाच्य। D छंद-नाम।
करुण रस का स्थायी भाव?
- रति
- शोक
- जुगुप्सा
- विस्मय
हल
- जोड़ा
करुण-शोक। रति शृंगार। जुगुप्सा बीभत्स।
बीभत्स का स्थायी भाव?
- भय — वह भयानक का है
- जुगुप्सा
- क्रोध
- हास
हल
- घिन
मांस-सड़न जुगुप्सा। काँपना भय। दोनों अलग रस।
राम और सीता शृंगार-प्रसंग में?
- उद्दीपन — चाँदनी उद्दीपन होती
- आलंबन विभाव
- सात्त्विक प्रलय
- छंद के गण
हल
- व्यक्ति
जिस पर रति टिकी। कोयल नहीं।
यशोदा का कृष्ण के प्रति लाड़?
- शृंगार — दांपत्य नहीं
- वात्सल्य
- रौद्र
- दोहा
हल
- ममता
वत्सलता। रति दंपति की।
आँख का तारा?
- शृंगार रस
- मुहावरा — रूढ़ प्रिय; रस/अलंकार का ताज़ा चित्र नहीं
- उपमा
- चौपाई
हल
- थैला
मुहावरे। हृदय का आस्वाद यहाँ नहीं नापा गया।
«चरण-कमल बंदौ हरिराई»?
- शृंगार रस — प्रश्न गहने का हो तो रस मत
- रूपक अलंकार — अभेद; रस-पृष्ठ का विषय नहीं
- दोहा 13+11 — यह पंक्ति मात्रा-प्रश्न नहीं
- करुण
हल
- गहना
अलंकार पर रूपक। यहाँ भाव या मात्रा नहीं पूछी गई।
रहिमन पानी राखिए की मात्रा?
- 11
- 13
- 16
- 24
हल
- गिनती
र हि म न पा नी रा खि ए = 1+1+1+1+2+2+2+1+2 = 13। दोहे का विषम चरण।
यगण का क्रम?
- ऽ ऽ ऽ — मगण
- । ऽ ऽ — लघु, गुरु, गुरु
- । । । — नगण
- 13+11 — दोहा, गण नहीं
हल
- यमातारा
य मा ता = लघु गुरु गुरु। मात्रा-दोहा वर्णिक गण नहीं।
गद्यांश पढ़कर शीर्षक, भाव, रेखांकित का अर्थ — यह विषय?
- रस का स्थायी भाव गिनना
- अपठित गद्यांश — अपठित; यहाँ नाप या आस्वाद की कुंजी नहीं
- चौपाई की मात्रा
- रूपक
हल
- पढ़ना
अपठित भाषा-बोध है। रस-छंद काव्य-शास्त्र है।
