Noteclerical

रस और छंद

Lesson 85 of 113

इस विषय में क्या आता है

परीक्षा पूछती है — वीर का स्थायी भाव क्या, सीता-राम का विरह करुण है या शृंगार, कोयल-चाँदनी आलंबन है या उद्दीपन, दोहा में कितनी मात्रा, सोरठा दोहा का उल्टा क्यों, चौपाई सोलह है या तेरह-ग्यारह, मस्तक में म लघु है या गुरु। पूछ हृदय का नाम या पंक्ति का नाप। उपमा-रूपक का नाम यहाँ नहीं।

यहाँ पढ़ना है

रस-सूत्र, चार अंग, नवरस + वात्सल्य-भक्ति, प्रत्येक का स्थायी भाव, संयोग-विप्रलंभ शृंगार, आलंबन-उद्दीपन, सात्त्विक आठ, संचारी का स्वभाव। छंद: लघु-गुरु, मात्रा के नियम, दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला, उल्लाला-कुंडलिया-छप्पय का ढाँचा, आठ गण।

यहाँ नहीं घुसाना

मुख कमल के समान, चरण-कमल, मनहुँ, तीन बेर — अलंकार। आँख का तारा — मुहावरे। अंधों में काना राजा — लोकोक्तियाँ। हरि के कई अर्थ, गन्ने का रस — अनेकार्थक। गद्यांश पढ़कर शीर्षक-भाव — अपठित। कर्तृ-कर्म — वाच्य।

एक पंक्ति: अलंकार पंक्ति को सुंदर करता है। रस पाठक को भिगोता है। छंद पंक्ति को नापता है। तीनों एक कुंजी नहीं।

तीन घर — गहना, भाव, नाप

घरप्रश्न क्या माँगता हैपक्का संकेत
अलंकारगहना कौन-सासमान, मनहुँ, चरण-कमल, व्यंजन की गूँज — पिछला पृष्ठ
रसहृदय में कौन-सा भाव पकास्थायी भाव, संयोग-वियोग, आलंबन
छंदमात्रा / चरण कितने13+11, 16, गुरु-लघु

एक पद्य तीनों रख सकता है: रहीम का दोहा मात्रा से दोहा है, «पानी» से श्लेष हो सकता है, नीति पढ़कर शांत-सा आस्वाद हो सकता है। प्रश्न जो शब्द लिखे — रस, छंद, अलंकार — वही घर खोलो।

रस क्या है

काव्य, नाटक या गीत पढ़-सुनकर हृदय में जो आस्वाद जगता है — मानो कोई स्वाद चखा हो — वही रस। भरत मुनि का सूत्र कक्षा-10 तक इतना: विभाव + अनुभाव + व्यभिचारी (संचारी) के संयोग से रस की निष्पत्ति। स्थायी भाव कच्चे माल की तरह पहले से पड़ा रहता है; ये तीन उसे पकाकर रस बनाते हैं।

रसोई का रूपक याद रखो। स्थायी भाव आटा है। विभाव आग और तवा। अनुभाव पकते समय दिखने वाला रंग-खुशबू। संचारी कभी नमक कभी मिर्च — आते-जाते। पका हुआ स्वाद = रस। आटा अकेला रस नहीं; स्वाद बिना आटे के भी नहीं।

कसौटी: नाम पूछे तो रस। «किस भाव से बना» पूछे तो स्थायी भाव। दोनों एक नहीं — शृंगार रस है, रति उसका स्थायी भाव है।

शब्द «रस» तीन घर काटता है। काव्य-रस यही पृष्ठ। गन्ने-आम का रस तरल स्वाद — अनेकार्थक। «सरस» सरल का श्रुतिसम नहीं; सरस = रसभरा।

चार अंग

अंगकामएक पंक्ति
स्थायी भावपूरे प्रसंग में बना रहता हैरति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद
विभावभाव जगाने का कारणआलंबन (किस पर) + उद्दीपन (क्या भड़काए)
अनुभावबाहर दिखने वाली चेष्टापुलक, अश्रु, काँपना, मुस्कान, गर्जन
संचारी / व्यभिचारीअस्थायी, कई रसों में घूमताहर्ष, शंका, लज्जा, चिंता, गर्व, निद्रा…

सात्त्विक भाव अनुभाव का ही एक कड़ा घर है — शरीर अपने-आप दिखता है, अभिनय की योजना कम। आठ नाम नीचे विभाव वाले खंड में हैं। प्रश्न «रस के अंग» लिखे तो ये चार; «सात्त्विक» अलग से पूछे तो आठ।

भूल: उपमेय-उपमान-वाचक-धर्म रस के अंग नहीं — वे उपमा के चार अंग हैं। कर्ता-कर्म-भाव वाच्य के हैं।

शृंगार — संयोग और विप्रलंभ

स्थायी भाव रति है। नायक-नायिका का प्रेम। दो बड़े भेद:

भेदस्थितिक्या दिखे
संयोगमिलन, साथहास-विलास, हाव-भाव, चाँदनी में बैठना, बन-ठन (यहाँ रस शृंगार; «बन-ठन» वाला मेघ मानवीकरण भी हो सकता है — प्रश्न क्या पूछे)
विप्रलंभ / वियोगबिछोह, पर दूरियाँ प्रेम टूटा नहींविरह-वेदना, स्मृति, बाट जोहना, पत्र

विप्रलंभ के चार कोने कक्षा-10 में इतने काफी हैं:

  • पूर्वराग — मिलन से पहले की चाह, सुनकर/देखकर प्रेम।
  • मान — रूठना, अभिमान। प्रेम है, बोल बंद।
  • प्रवास — दूर देश, यात्रा; राम-कथा में सीता-हरण / अशोक वाटिका का बिछोह प्रवास-विरह। वनवास में साथ रहते हुए बिछोह मुख्य नहीं।
  • करुण विप्रलंभ — अत्यंत दुःख वाला वियोग; नाम में «करुण» है पर रस अभी शृंगार ही रहता है अगर जड़ रति है।
उदाहरण

अयोध्या में राम-सीता का वन-बिछोह — करुण रस या वियोग शृंगार?

हल

  1. जड़ कौन

    प्रेम बाकी है, मिलन टूटा है। स्थायी रति।

  2. करुण कब

    शोक तब पक्का जब प्रेम की जड़ न हो — दशरथ का प्राण छोड़ना, घायल निर्दोष की मृत्यु।

  3. ठप्पा

    वियोग / विप्रलंभ शृंगार। «करुण» शब्द देखकर घर मत बदलना।

उत्तरवियोग शृंगार

बाकी रस — स्थिति से पकड़ो

रसस्थिति / चित्रनिकट जाल
हास्यविकृति, चुटकुला, नाक-भौं, चेहरा बिगड़ना; हँसी स्थायीसंयोग शृंगार में भी मुस्कान होती है — वहाँ जड़ रति है, हास नहीं
करुणमृत्यु, विपत्ति, दशरथ, घायल पक्षी, अनाथविरह ≠ करुण, ऊपर पढ़ा
रौद्रअपमान पर क्रोध — परशुराम, दुर्गा का प्रचंड रूप, शत्रु-गर्जनवीर उत्साह से लड़ता है; रौद्र गुस्से से जलता है
वीरयुद्ध-उत्साह, धनुष चढ़ाना, «है है» नहीं «चलो लड़ें»दानवीर, धर्मवीर, युद्धवीर — भेद पूछें तो उत्साह की दिशा देखो
भयानकअंधकार, श्मशान, राक्षस-सेना, काँपना, स्वर टूटनाबीभत्स घृणा है, डर नहीं
बीभत्सरक्त-मांस, सड़न, युद्ध-क्षेत्र की घिन, जुगुप्साभयानक से मत मिलाओ
अद्भुतहनुमान पर्वत उठाए, आकाश-सी घटना, मुँह खुला रह जानाअतिशयोक्ति अलंकार हद तोड़ती है; अद्भुत रस आश्चर्य पकाता है — प्रश्न देखो
शांतवैराग्य, संत, राम-नाम, भोग से ऊबउदासी करुण हो सकती है; वैराग्य शांत है
वात्सल्ययशोदा-कृष्ण, माँ-बच्चा, मक्खन, लाड़यह शृंगार नहीं — रति दंपति की, वत्सलता पालक की
भक्तिमीरा, सूर का भगवान् के प्रति अनुरागभगवद्-प्रेम को दांपत्य शृंगार मत ठोकना जब विकल्प में भक्ति हो

वीर के तीन नाम कभी विकल्प में आते हैं: युद्धवीर (शत्रु पर), दानवीर (देने का उत्साह), धर्मवीर (धर्म पर अटल)। स्थायी सबका उत्साह ही रहता है।

विभाव, अनुभाव, सात्त्विक

आलंबन और उद्दीपन

आलंबन — भाव किस पर टिका। शृंगार में नायक-नायिका। करुण में मृत/दुःखी व्यक्ति। वीर में शत्रु या रक्ष्य समाज।

कुछ पुस्तकें आलंबन को दो टुकड़े करती हैं: आश्रय (जिसके हृदय में भाव जगा — नायक) और विषय (जिसकी ओर भाव गया — नायिका)। प्रश्न «आलंबन» लिखे तो दोनों में से जो विकल्प पक्का व्यक्ति हो; चाँदनी को आलंबन मत बनाना।

उद्दीपन — जो भाव को भड़काए, स्वयं प्रेमी न हो। शृंगार: चाँदनी, कोयल, मंद पवन, बसंत, एकांत उद्यान, मेघ। रौद्र: शत्रु का व्यंग्य, रक्त। भयानक: गर्जन, अंधेरा, श्मशान-ध्वनि। करुण: खाली घर, पुरानी वस्तु की स्मृति।

चित्रआलंबनउद्दीपन
राम-सीता चाँदनी मेंराम / सीताचाँदनी, कोयल
यशोदा कृष्ण को डाँटतीयशोदा-कृष्ण (वात्सल्य)मक्खन, बाँसुरी की गूँज
अर्जुन युद्ध-भूमि परअर्जुन (आश्रय), कौरव-सेना (विषय)शंख, ध्वज, नगाड़ा

अनुभाव

इच्छा से दिखने वाली चेष्टा: नयन-मिलान, आलिंगन, मुसकान, भृकुटी, गर्जन, शस्त्र उठाना, पीठ दिखाना। कवि लिखता है «कर क्या रहा» — वही अनुभाव।

सात्त्विक भाव — आठ

शरीर अपने-आप बोलता है। रटो:

  1. स्तंभ — अड़ना, सुन्न।
  2. स्वेद — पसीना।
  3. रोमांच — रोंगटे।
  4. स्वरभंग — गला टूटना।
  5. वेपथु — काँपना।
  6. वैवर्ण्य — रंग उड़ना।
  7. अश्रु — आँसू।
  8. प्रलय — मूर्च्छा, सुध-बुध जाना।

अनुभाव व्यापक घर है; सात्त्विक उसका अनिवार्य, अनिच्छा वाला कमरा है। प्रश्न «सात्त्विक कितने» → आठ। «अंग कितने» → चार।

संचारी भाव — आता है, जाता है

संख्या शास्त्र में 33 मानी जाती है। परीक्षा पूरी सूची कम माँगती है। काम की बात: संचारी किसी एक रस का मालिक नहीं। हर्ष शृंगार में भी, वीर में भी। शंका भयानक में भी, वियोग में भी। स्थायी पूरे प्रसंग का मालिक रहता है; संचारी मेहमान है।

पक्के नाम रटो — हर्ष, शंका, लज्जा, ग्लानि, चिंता, त्रास, गर्व, आलस्य, निद्रा, मोह, स्मृति, आवेग, मरण, उन्माद, चपलता, दैन्य, अमर्ष, विषाद, धृति, वितर्क।

हास दोनों जगह बैठ सकता है। हास्य रस का स्थायी = हास। शृंगार के बीच हल्की हँसी = संचारी। मालिक कौन है, प्रसंग से देखो। शोक करुण का स्थायी है; वियोग में जो दुःख है वह रति के नीचे संचारी-सा चलता है, घर शृंगार ही रहता है।

छंद क्या है

छंद पंक्ति का नाप है — कितनी मात्रा, कितने वर्ण, यति कहाँ, तुक कहाँ। गहना नहीं, भाव नहीं। बिना छंद के भी कविता हो (मुक्त छंद / अतुकांत); परीक्षा का कक्षा-10 वाला हिस्सा प्रायः बद्ध मात्रिक छंद पूछता है: दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला।

घरनाप किससेकक्षा-10 का काम
मात्रिकलघु-गुरु की मात्रा (1 या 2)दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला
वर्णिकवर्णों का गण (तीन-तीन का बंडल)गण पहचानना, नाम याद

यति = पढ़ते समय विश्राम। तुक = चरण के अंत की समान ध्वनि। दोहा के सम चरण प्रायः तुक मिलाते हैं।

मात्रा — लघु और गुरु

गिनती अक्षर के स्वर से होती है, देवनागरी के चित्र से नहीं। एक स्वर-इकाई = एक मात्रा-घर।

नियममात्राउदाहरण
ह्रस्व अ, इ, उ, ऋलघु = 1क, हि, मु, ऋषि का ऋ
दीर्घ आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औगुरु = 2का, की, मू, ने, नै, गो, नौ
अनुस्वार ं, विसर्ग ः, चंद्रबिंदु ँवह वर्ण गुरु = 2कं, चंद्र का चं, दुःख का दुः
संयुक्त व्यंजन से पहले का स्वरगुरु = 2मस्तक में म; धर्म में ध

संयुक्त का मतलब दो व्यंजन एक साथ: स्त, त्र, द्व, क्ष (क्+ष), ज्ञ। उनके ठीक पहले वाला घर गुरु हो जाता है भले स्वर ह्रस्व दिखे।

उदाहरण

रहिमन पानी राखिए — मात्रा कितनी?

हल

  1. टुकड़े

    र(1) हि(1) म(1) न(1) · पा(2) नी(2) · रा(2) खि(1) ए(2)

  2. जोड़

    1+1+1+1 + 2+2 + 2+1+2 = 13

  3. ठप्पा

    दोहे का विषम चरण। अगला चरण बिन पानी सब सून ग्यारह होना चाहिए।

उत्तर13

बिन पानी सब सून — बि(1) न(1) पा(2) नी(2) स(1) ब(1) सू(2) न(1) = 11। पूरा दोहा यहीं बैठता है।

पानी गए न ऊबरै — पा(2) नी(2) ग(1) ए(2) न(1) ऊ(2) ब(1) रै(2) = 13। मोती मानुष चून — मो(2) ती(2) मा(2) नु(1) ष(1) चू(2) न(1) = 11।

गिनते समय। मात्रा स्वर की है: खि इ ह्रस्व = 1, खी = 2। हलंत व्यंजन नया घर नहीं खोलता, पिछले से चिपकता है। संदेह हो तो ज़ोर से पढ़ो — लंबा खिंचे तो गुरु।

दोहा और सोरठा

विषम चरण (1, 3)सम चरण (2, 4)दो पंक्ति = चार चरण
दोहा131124 + 24
सोरठा1113उल्टा दोहा

दोहा चार चरण का मात्रिक छंद। कबीर, रहीम, तुलसी के नीति-दोहे परीक्षा के पक्के मेहमान। तुक प्रायः दूसरे और चौथे चरण के अंत में।

सोरठा दोहे का आईना: पहले ग्यारह, फिर तेरह। मात्राएँ याद रहें तो नाम गड़बड़ाएगा नहीं। विकल्प में «दोहा 11+13» लिखे तो झूठ — वह सोरठा है।

कसौटी: 13 फिर 11 = दोहा। 11 फिर 13 = सोरठा। दोनों 24 की जोड़ी हैं; क्रम उल्टा है।

चौपाई, रोला, उल्लाला

छंदप्रत्येक चरणयति / और बातकहाँ बसता
चौपाई16 मात्राअक्सर 8+8 पर विश्राम; चार चरणरामचरितमानस, तुलसी
रोला24 मात्रायति 11वीं मात्रा पर (11+13)कुंडलिया का दूसरा खंड
उल्लालाविषम 15, सम 13दो चरण की इकाई (15+13=28)छप्पय के अंत में

चौपाई गिनकर देखो। जाकी रही भावना जैसी — जा(2) की(2) र(1) ही(2) भा(2) व(1) ना(2) जै(2) सी(2) = 16। दूसरा चरण प्रभु मूरत देखी तिन तैसी — प्र(1) भु(1) मू(2) र(1) त(1) दे(2) खी(2) ति(1) न(1) तै(2) सी(2) = 16।

भूल: चौपाई को 13+11 मत बना देना। दोहा नीति की दो पंक्ति, चौपाई रामकथा की चार चरण-पंक्ति। मात्रा अलग।

कुंडलिया, छप्पय — ढाँचा

कुंडलिया छह पंक्ति: पहले दोहा, पीछे रोला। दोहे का पहला शब्द / पहला टुकड़ा अंत में लौटकर «कुंडली» बंद करता है — इसलिए नाम। मात्रा: दोहा 13+11, फिर रोला के चरण 24।

छप्पय भी छह चरण: चार रोला + दो उल्लाला (या पुस्तक के अनुसार रोला-उल्लाला मिश्रण)। नाम «छह पद» से।

सवैया वर्णिक घर का मेहमान है — मात्रा नहीं, वर्ण-गण। कक्षा-10 में नाम पहचान काफी; गिनती पत्र कम माँगता है।

मुक्तक = एक स्वतंत्र पद्य, अगली पंक्ति से कहानी न बँधे। दोहा मुक्तक भी हो सकता है (रहीम का एक दोहा अपने में पूरा)।

गण — वर्णिक छंद की ईंट

तीन वर्णों का बंडल = गण। लघु ।, गुरु ऽ। सूत्र: यमाताराजभानसलगा — आठ गण + लघु + गुरु।

गणलघु-गुरुसूत्र से टुकड़ा
यगण। ऽ ऽय मा ता
मगणऽ ऽ ऽमा ता रा
तगणऽ ऽ ।ता रा ज
रगणऽ । ऽरा ज भा
जगण। ऽ ।ज भा न
भगणऽ । ।भा न स
नगण। । ।न स ल — तीन लघु
सगण। । ऽस ल गा — दो लघु, अंत गुरु

इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, वसंततिलका, मालिनी, शार्दूलविक्रीडित — नाम इतने काफी। पत्र «यगण कौन-सा» पूछे तो ।ऽऽ; मात्रा-दोहा यहाँ से मत नापना।

जाल — यहीं कटते हैं

1. वियोग शृंगार को करुण

प्रेम की जड़ बची = शृंगार। मृत्यु/विपत्ति की जड़ = करुण। दशरथ-मरण करुण; राम-सीता बिछोह वियोग शृंगार।

2. वात्सल्य को शृंगार

यशोदा-कृष्ण ममता है, दांपत्य रति नहीं।

3. आलंबन को उद्दीपन

व्यक्ति = आलंबन। चाँदनी-कोयल = उद्दीपन।

4. स्थायी को संचारी

पूरे प्रसंग का मालिक स्थायी। मेहमान संचारी। हास्य का हास स्थायी; शृंगार की हँसी संचारी।

5. वीर को रौद्र

उत्साह ≠ क्रोध।

6. दोहा को सोरठा / चौपाई

13+11 दोहा। 11+13 सोरठा। 16 चौपाई। 24 रोला।

7. अलंकार / मुहावरा / अनेकार्थक

समान-मनहुँ-चरण-कमल — अलंकार। आँख का तारा — मुहावरा। गन्ने का रस — अनेकार्थक।

8. गुरु नियम भूलना

संयुक्त से पहले का घर गुरु। मस्तक का म लघु नहीं।

उदाहरण

दशरथ के प्राण निकलने का प्रसंग — कौन-सा रस?

हल

  1. जड़

    पुत्र-वियोग से शोक, प्रेम-मिलन की रति नहीं।

  2. स्थायी

    शोक → करुण। वियोग शृंगार तब जब नायक-नायिका का रति-सूत्र बचे।

उत्तरकरुण

परीक्षा में पाँच कदम

  1. प्रश्न क्या? रस का नाम, स्थायी भाव, अंग, आलंबन/उद्दीपन — या छंद का नाम, मात्रा गिनो, गण।
  2. रस हो तो जड़ पकड़ो: प्रेम / हँसी / शोक / क्रोध / उत्साह / भय / घृणा / आश्चर्य / वैराग्य / ममता / भक्ति।
  3. शृंगार हो तो मिलन या बिछोह — बिछोह पर करुण मत कूदना।
  4. छंद हो तो गिनो: 13+11 दोहा, 11+13 सोरठा, 16 चौपाई, 24 रोला। संयुक्त = पहले का गुरु।
  5. बाकी घर मत मिलाओ — अलंकार, मुहावरा, वाच्य, अपठित।
भूल-सूची। वीर = क्रोध। विरह = करुण हमेशा। यशोदा = शृंगार। चाँदनी = आलंबन। दोहा = 16 मात्रा। सोरठा = 13+11। चौपाई = 13+11। मस्तक का म = लघु। शृंगार = श्रृंगार। रस = अलंकार। स्थायी = संचारी। उपमा के चार अंग = रस के अंग।

प्रश्न 1–10

प्र. 1

रस किसे कहते हैं?

  1. भाषा का गहना — वह अलंकार है
  2. काव्य पढ़-सुनकर हृदय में जगा आस्वाद; स्थायी भाव का परिपाक
  3. मात्रा का नाप — छंद
  4. गन्ने का तरल — अनेकार्थक घर

हल

  1. आस्वाद

    गहना अलंकार। नाप छंद। गन्ना अनेकार्थक।

उत्तरB
प्र. 2

वीर रस का स्थायी भाव?

  1. क्रोध — वह रौद्र का है
  2. उत्साह
  3. रति
  4. शोक

हल

  1. जोड़ा

    वीर-उत्साह। गुस्सा रौद्र। प्रेम शृंगार।

उत्तरB
प्र. 3

राम-सीता का वन-बिछोह, प्रेम बाकी — रस?

  1. करुण — शोक की जड़ यहाँ मालिक नहीं
  2. वियोग / विप्रलंभ शृंगार
  3. हास्य
  4. शांत

हल

  1. रति बची

    मिलन टूटा, सूत्र प्रेम का। वियोग शृंगार। दशरथ-मरण करुण अलग प्रसंग है।

उत्तरB
प्र. 4

शृंगार में चाँदनी और कोयल की कूक?

  1. आलंबन — व्यक्ति नहीं हैं
  2. उद्दीपन विभाव
  3. स्थायी भाव
  4. संचारी मरण

हल

  1. भड़काएँ

    नायक-नायिका आलंबन। चाँदनी भाव बढ़ाती है — उद्दीपन।

उत्तरB
प्र. 5

शृंगार का स्थायी भाव?

  1. हास
  2. रति
  3. उत्साह
  4. निर्वेद

हल

  1. नाम ≠ भाव

    शृंगार रस है, रति स्थायी। दोनों को एक मत लिखना।

उत्तरB
प्र. 6

दोहा के विषम और सम चरण की मात्रा?

  1. 11 और 13 — वह सोरठा
  2. 13 और 11
  3. 16 और 16 — चौपाई
  4. 24 और 24 बिना तोड़ — रोला का चरण 24 होता, दोहा नहीं

हल

  1. तेरह-ग्यारह

    विषम 13, सम 11। उल्टा सोरठा।

उत्तरB
प्र. 7

सोरठा क्या है?

  1. दोहा का ही दूसरा नाम
  2. दोहे का उल्टा — विषम 11, सम 13
  3. प्रत्येक चरण 16
  4. शब्दालंकार

हल

  1. आईना

    क्रम उलटो। अलंकार नहीं।

उत्तरB
प्र. 8

चौपाई के प्रत्येक चरण में मात्रा?

  1. 13
  2. 16
  3. 11
  4. 24

हल

  1. सोलह

    तुलसी की चौपाई। 24 रोला। 13 दोहा-विषम।

उत्तरB
प्र. 9

मस्तक में «म» की मात्रा?

  1. लघु 1 — अ ह्रस्व दिखता है इसलिए
  2. गुरु 2 — स्त संयुक्त से पहले का स्वर गुरु
  3. मात्रा नहीं गिनी जाती
  4. यह अलंकार है

हल

  1. संयुक्त

    म+स्त। पहले का घर गुरु। दिखने वाला ह्रस्व छंद में टूट जाता है।

उत्तरB
प्र. 10

स्थायी और संचारी में पक्का फर्क?

  1. दोनों पूरे काव्य के मालिक
  2. स्थायी प्रसंग भर रहता है; संचारी आता-जाता मेहमान है, कई रसों में घूमता है
  3. संचारी ही रस का नाम है
  4. स्थायी केवल अलंकार में होता है

हल

  1. मालिक / मेहमान

    रति शृंगार छोड़कर नहीं भागती। हर्ष कई घरों में मेहमान बनता है।

उत्तरB

अभ्यास

ये दस अलग कोण हैं — ऊपर वाले दस की नकल नहीं।

अ. 1

रस के चार अंग?

  1. उपमेय, उपमान, वाचक, धर्म — वे उपमा के हैं
  2. स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव
  3. कर्ता, कर्म, भाव, क्रिया
  4. दोहा, चौपाई, रोला, सोरठा

हल

  1. पकाना

    A अलंकार। C वाच्य। D छंद-नाम।

उत्तरB
अ. 2

करुण रस का स्थायी भाव?

  1. रति
  2. शोक
  3. जुगुप्सा
  4. विस्मय

हल

  1. जोड़ा

    करुण-शोक। रति शृंगार। जुगुप्सा बीभत्स।

उत्तरB
अ. 3

बीभत्स का स्थायी भाव?

  1. भय — वह भयानक का है
  2. जुगुप्सा
  3. क्रोध
  4. हास

हल

  1. घिन

    मांस-सड़न जुगुप्सा। काँपना भय। दोनों अलग रस।

उत्तरB
अ. 4

राम और सीता शृंगार-प्रसंग में?

  1. उद्दीपन — चाँदनी उद्दीपन होती
  2. आलंबन विभाव
  3. सात्त्विक प्रलय
  4. छंद के गण

हल

  1. व्यक्ति

    जिस पर रति टिकी। कोयल नहीं।

उत्तरB
अ. 5

यशोदा का कृष्ण के प्रति लाड़?

  1. शृंगार — दांपत्य नहीं
  2. वात्सल्य
  3. रौद्र
  4. दोहा

हल

  1. ममता

    वत्सलता। रति दंपति की।

उत्तरB
अ. 6

आँख का तारा?

  1. शृंगार रस
  2. मुहावरा — रूढ़ प्रिय; रस/अलंकार का ताज़ा चित्र नहीं
  3. उपमा
  4. चौपाई

हल

  1. थैला

    मुहावरे। हृदय का आस्वाद यहाँ नहीं नापा गया।

उत्तरB
अ. 7

«चरण-कमल बंदौ हरिराई»?

  1. शृंगार रस — प्रश्न गहने का हो तो रस मत
  2. रूपक अलंकार — अभेद; रस-पृष्ठ का विषय नहीं
  3. दोहा 13+11 — यह पंक्ति मात्रा-प्रश्न नहीं
  4. करुण

हल

  1. गहना

    अलंकार पर रूपक। यहाँ भाव या मात्रा नहीं पूछी गई।

उत्तरB
अ. 8

रहिमन पानी राखिए की मात्रा?

  1. 11
  2. 13
  3. 16
  4. 24

हल

  1. गिनती

    र हि म न पा नी रा खि ए = 1+1+1+1+2+2+2+1+2 = 13। दोहे का विषम चरण।

उत्तरB
अ. 9

यगण का क्रम?

  1. ऽ ऽ ऽ — मगण
  2. । ऽ ऽ — लघु, गुरु, गुरु
  3. । । । — नगण
  4. 13+11 — दोहा, गण नहीं

हल

  1. यमातारा

    य मा ता = लघु गुरु गुरु। मात्रा-दोहा वर्णिक गण नहीं।

उत्तरB
अ. 10

गद्यांश पढ़कर शीर्षक, भाव, रेखांकित का अर्थ — यह विषय?

  1. रस का स्थायी भाव गिनना
  2. अपठित गद्यांश — अपठित; यहाँ नाप या आस्वाद की कुंजी नहीं
  3. चौपाई की मात्रा
  4. रूपक

हल

  1. पढ़ना

    अपठित भाषा-बोध है। रस-छंद काव्य-शास्त्र है।

उत्तरB

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