इस विषय में क्या आता है
परीक्षा पूछती है — मुख कमल के समान कौन-सा अलंकार, चरण-कमल उपमा है या रूपक, मनहुँ दिखे तो क्या, तीन बेर…तीन बेर यमक है या श्लेष, पानी वाली रहीम की पंक्ति में श्लेष कहाँ, व्यंजन बार-बार पड़े तो अनुप्रास। पूछ गहना कौन-सा है, रस का नाम नहीं, छंद की मात्रा नहीं।
यहाँ पढ़ना है
शब्दालंकार: अनुप्रास, यमक, श्लेष। अर्थालंकार: उपमा (चार अंग), रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, विरोधाभास, संदेह, भ्रांतिमान, दृष्टांत। यमक बनाम श्लेष। उपमा बनाम रूपक बनाम उत्प्रेक्षा। पंक्ति पढ़ने के पाँच कदम।
यहाँ नहीं घुसाना
शृंगार-वीर-करुण, दोहा-चौपाई मात्रा — रस / छंद। कर्तृ-कर्म-भाव — वाच्य। आँख का तारा — मुहावरे। अंधों में काना राजा — लोकोक्तियाँ। हरि के कई अर्थ शब्दकोश में — अनेकार्थक (श्लेष तभी जब पंक्ति एक साथ दो अर्थ माँगे)। कमल = पंकज — पर्याय।
एक पंक्ति: अलंकार भाषा को सुंदर करता है। रस पाठक के हृदय का भाव है। छंद पंक्ति का नाप है। तीनों एक नहीं।
दो घर — शब्द और अर्थ
| घर | सुंदरता कहाँ से | पक्के नाम |
|---|---|---|
| शब्दालंकार | शब्द के उच्चारण, दोहराव, दो अर्थ | अनुप्रास, यमक, श्लेष |
| अर्थालंकार | अर्थ की तुलना, बढ़ा-चढ़ा, संभावना | उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति… |
एक पंक्ति में दो भी बैठ सकते हैं: «चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं» — च की आवृत्ति अनुप्रास, किरणों का खेलना मानवीकरण। प्रश्न «प्रमुख / स्पष्ट» माँगे तो वही चुनो जो विकल्प में पक्का हो; दोनों पूछे तो दोनों लिखो।
अनुप्रास — व्यंजन की आवृत्ति
एक ही व्यंजन बार-बार आए, स्वर चाहे बदल जाएँ — अनुप्रास। कान को संगीत-सा लगे। अर्थ की तुलना यहाँ नहीं ढूँढ़नी।
| भेद (कक्षा-10 जितना) | क्या होता है | उदाहरण |
|---|---|---|
| वृत्यनुप्रास | एक व्यंजन अनेक बार | चारु चंद्र की चंचल किरणें — च |
| छेकानुप्रास | कई व्यंजनों का क्रम, प्रायः पास-पास एक-एक बार | तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए — त, र, न का क्रम (केवल त बार-बार = वृत्य, ऊपर वाली च-पंक्ति) |
| लाटानुप्रास | शब्द/वाक्यांश दोहरा, तात्पर्य दूसरा | पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय |
लिपिक प्रायः केवल «अनुप्रास» लिखवाता है। भेद तब जब विकल्प में वृत्य/छेक/लाट हों। त, च, क, म की गूँज कान से पकड़ो — उपमेय-उपमान मत गिनना।
यमक — शब्द दो बार, अर्थ हर बार नया
एक सार्थक शब्द (या शब्द-समूह) दो या अधिक बार आए और हर बार अर्थ अलग हो — यमक। आवृत्ति दिखनी चाहिए। एक बार का शब्द यमक नहीं।
| पंक्ति | शब्द | दो अर्थ |
|---|---|---|
| तीन बेर खाती थीं वे, तीन बेर खाती हैं | बेर | बार (दफा) · बेर का फल |
| कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय | कनक | सोना · धतूरा |
| माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर | फेर / फिरा | माला घुमाना · मन का फेर (विकार) |
श्रुतिसम (नीर–नीड़) दो अलग वर्तनी — अनेकार्थक/श्रुतिसम। यमक में वर्तनी एक, दोहराव है।
श्लेष — शब्द एक बार, अर्थ एक साथ कई
कवि शब्द एक ही जगह रखता है और जान-बूझकर दो-तीन अर्थ एक साथ चलते हैं। दोहराना ज़रूरी नहीं।
रहीम: «पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।» पानी = मोती की चमक / मनुष्य की इज्जत (आब) / चूने का जल। एक शब्द, तीन घर एक साथ — श्लेष।
| यमक | श्लेष | अनेकार्थक | |
|---|---|---|---|
| शब्द कितनी बार | दो या अधिक | प्रायः एक | शब्दकोश का गुण, पंक्ति की ज़रूरत नहीं |
| अर्थ कब खुलें | हर बार अलग टुकड़े में | एक साथ, पंक्ति का खेल | हरि = विष्णु, सिंह, सूर्य — सूची अनेकार्थक |
| परीक्षा | दोहरा शब्द दिखे | एक शब्द, दो अर्थ पूछे | प्रश्न «अनेकार्थक छाँटो» हो तो वहाँ |
कसौटी: दो बार लिखा + दो अर्थ = यमक। एक बार लिखा + पंक्ति दो अर्थ माँगे = श्लेष। शब्द के कई अर्थ बिना काव्य-खेल = अनेकार्थक, अलंकार नहीं।
उपमा — तुलना, चार अंग
एक चीज़ की दूसरी से तुलना, दोनों अलग रहें, बीच में वाचक शब्द हो — उपमा। चार अंग गिनो। चारों हों तो पूर्णोपमा; कोई छूटे तो लुप्तोपमा।
| अंग | सवाल | «पीपर पात सरिस मन डोला» में |
|---|---|---|
| उपमेय | किसकी तुलना? | मन |
| उपमान | किससे तुलना? | पीपर पात (पीपल का पत्ता) |
| वाचक | तुलना का शब्द? | सरिस (समान) |
| साधर्म्य / साधारण धर्म | कौन-सा गुण दोनों में? | डोलना (चंचलता) |
वाचक रटो: सा, से, सी, सम, समान, सदृश, तुल्य, जैसा, ज्यों, जिमि, इव, यथा, भाँति, नाई, सरिस। «मुख कमल के समान है» — उपमा। वाच्य-पृष्ठ ने यही पंक्ति अलंकार को सौंपी थी।
«हरि पद कोमल कमल से» — उपमेय पद, उपमान कमल, वाचक से, धर्म कोमल। पूर्णोपमा।
रूपक — उपमेय ही उपमान, पुल नहीं
कवि कहता है: यह वही है, जैसे नहीं। उपमान का आरोप उपमेय पर, भेद मिटा। वाचक सा/समान प्रायः नहीं। बहुत बार समास: चरण-कमल, मुख-चंद्र, ज्ञान-दीप। समास का नाम समास पर; प्रश्न «अलंकार» हो तो रूपक।
| पंक्ति / पद | अभेद |
|---|---|
| पायो जी मैंने राम-रतन धन पायो | राम ही रतन-धन |
| चरण-कमल बंदौ हरिराई | चरण ही कमल |
| मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों | चंद्र ही खिलौना |
नीलकमल कर्मधारय समास पर था — रंग+फूल। अलंकार तभी जब तुलना/अभेद का खेल हो, सिर्फ़ नामकरण नहीं।
उत्प्रेक्षा — संभावना, मनु-जानो-जनु-मनहुँ
उपमेय में उपमान की कल्पना / संभावना। कवि कहता है: मानो यही हो। पहचान-शब्द: मनु, जानो, जनु, मनहुँ, मानो, निश्चय, इव (कभी)।
उदाहरण: «सोहत ओढ़े पीत पट स्याम सलौने गात। मनहुँ नीलमणि सैल पर आतप परयौ प्रभात।» — श्याम गात पर पीत पट = मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह का धूप। मनहुँ = उत्प्रेक्षा।
| उपमा | रूपक | उत्प्रेक्षा | |
|---|---|---|---|
| संबंध | तुलना, दो अलग | अभेद, एक मान लिया | संभावना, «मानो» |
| शब्द | सा, समान, से | प्रायः नहीं | मनु, जानो, जनु, मनहुँ |
| दृढ़ता | जैसे है | है ही | हो सकता है / लगता है |
संदेह अलंकार: «यह चंद्र है या मुख?» — दो में से एक, निश्चय नहीं। उत्प्रेक्षा में कवि संभावना जताकर सौंदर्य बढ़ाता है, प्रश्नवाचक दुविधा कम। भ्रांतिमान: गलत को सही समझ लेना — सर्प को माला जान लेना।
अतिशयोक्ति — बढ़ा-चढ़ाकर
लोक-सीमा से बाहर बढ़ा देना। असंभव-सा चित्र, पर काव्य में चलता है।
«हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आग। लंका सारी जल गई, गए निशाचर भाग।» — पूँछ में आग लगने से पहले लंका जल गई: समय उलट, अतिशयोक्ति।
मुहावरा «आकाश-पाताल एक करना» रूढ़ पदबंध है — मुहावरे। वही भाव पंक्ति में नया चित्र बने तो अतिशयोक्ति। परीक्षा पदबंध पूछे तो मुहावरा; काव्य-पंक्ति पूछे तो अलंकार।
और अर्थालंकार — कक्षा-10 जितने पक्के
| नाम | क्या है | छोटा चित्र |
|---|---|---|
| मानवीकरण | निर्जीव / प्रकृति पर मनुष्य के काम | मेघ आए बड़े बन-ठन के संवर के। किरणें खेल रही हैं। |
| विरोधाभास | दो विरोधी बातें एक साथ, अर्थ बैठे | सुख में दुख, जागते सोना — कबीर-से पद; विषामृत जब काव्य में एक ही काल में |
| संदेह | उपमेय-उपमान में निश्चय नहीं | यह मुख है या चंद्र? |
| भ्रांतिमान | भूल से एक को दूसरा मान लेना | मोती को जल-बिंदु समझना |
| दृष्टांत | दो स्वतंत्र वाक्य, एक बात दूसरे से सिद्ध | कथन + बिम्ब अलग पंक्ति, वाचक «जैसे» बिना भी |
| अन्योक्ति | प्रस्तुत पर अप्रस्तुत से व्यंग्य/सीख | खीर गाछ पर नारि फल — लक्ष्य दूसरा व्यक्ति |
विलोम शब्द-जोड़ी विलोम पर है। विरोधाभास अलंकार तभी जब पंक्ति में विरोध से नया अर्थ निकले, सिर्फ़ जय-पराजय सूची नहीं।
पंक्ति कैसे पढ़ो — पाँच कदम
- व्यंजन गूँज? हाँ → अनुप्रास (शब्दालंकार)। यहीं रुक सकते हो अगर विकल्प वही हो।
- एक शब्द दो बार, अर्थ दो? यमक। एक बार, दो अर्थ एक साथ? श्लेष।
- सा / समान / से / सरिस? उपमा — चार अंग गिनो।
- वाचक नहीं, अभेद (चरण-कमल)? रूपक। मनहुँ / जानो / जनु? उत्प्रेक्षा।
- सीमा टूटी? अतिशयोक्ति। बादल बोलते / बन-ठन? मानवीकरण। कुछ न मिले तो मुहावरा/रस/छंद के पृष्ठ पर मत कूदना बिना प्रश्न के।
जाल — यहीं कटते हैं
1. यमक को श्लेष
दो बार लिखा = यमक। रहीम का एक «पानी» = श्लेष। कनक कनक दो बार = यमक, अनेकार्थक-सूची नहीं।
2. उपमा को रूपक
समान/सा दिखे तो उपमा। चरण-कमल बिना सा = रूपक। «मुख कमल के समान» वाच्य नहीं, उपमा।
3. उत्प्रेक्षा को उपमा
मनहुँ/जानो संभावना है, सा पक्की तुलना है।
4. मुहावरा / लोकोक्ति
आँख का तारा रूढ़ अर्थ — मुहावरे। नाच न जाने आँगन टेढ़ा — लोकोक्ति। अलंकार पंक्ति का ताज़ा गहना है, थैले का पदबंध नहीं।
5. रस और छंद
शृंगार पढ़कर रोमांच = रस। दोहा 13+11 = छंद। दोनों रस / छंद पर। यहाँ गहना।
«कनक कनक ते सौ गुनी» — यमक, श्लेष, या अनेकार्थक?
हल
- दो बार
कनक…कनक आवृत्ति है।
- दो अर्थ
सोना और धतूरा — अलग-अलग जगह।
- ठप्पा
यमक। श्लेष एक बार होता। अनेकार्थक शब्द का गुण है, इस पंक्ति का अलंकार यमक है।
परीक्षा में पाँच कदम
- प्रश्न क्या? अलंकार का नाम, अंग गिनो, शब्दालंकार/अर्थालंकार, या भेद (यमक/श्लेष)।
- कान: व्यंजन गूँज → अनुप्रास।
- आवृत्ति: दो बार अलग अर्थ → यमक; एक बार कई अर्थ → श्लेष。
- तुलना: वाचक → उपमा; अभेद → रूपक; मानो → उत्प्रेक्षा; हद पार → अतिशयोक्ति।
- बाकी घर मत मिलाओ — रस, छंद, मुहावरा, वाच्य, पर्याय।
प्रश्न 1–10
अलंकार किसे कहते हैं?
- हृदय का स्थायी भाव — वह रस है
- काव्य/भाषा को शब्द या अर्थ से सुंदर बनाने वाला गहना
- मात्रा का नाप — छंद
- रूढ़ वाक्यांश — मुहावरा
हल
- गहना
रस और छंद अगले पृष्ठ। मुहावरा अपना घर।
«चारु चंद्र की चंचल किरणें» में प्रमुख शब्दालंकार?
- उपमा — अर्थालंकार, चंद्र तुलना नहीं बनी पक्की
- अनुप्रास — च की आवृत्ति
- यमक — चंद्र दो अर्थ नहीं
- श्लेष
हल
- कान
चारु, चंद्र, चंचल — च। मानवीकरण «खेल रही» आगे की पंक्ति में हो तो अर्थालंकार दूसरा; इस टुकड़े का पक्का अनुप्रास।
«तीन बेर खाती थीं वे, तीन बेर खाती हैं»?
- श्लेष — शब्द एक बार होना चाहिए
- यमक
- अनुप्रास
- उपमा
हल
- बेर…बेर
दफा और फल। दो बार, दो अर्थ = यमक।
«पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून» — अलंकार?
- यमक — पानी दो बार लिखा नहीं इस प्रसिद्ध रूप में एक ही पानी कई अर्थ
- श्लेष
- अनुप्रास
- अनेकार्थक शब्द मात्र, अलंकार नहीं — पंक्ति काव्य-खेल है
हल
- एक पानी, तीन घर
मोती-चमक, मनुष्य-इज्जत, चूना-जल। श्लेष। अनेकार्थक गुण है, यहाँ अलंकार श्लेष ठहरता है।
«मुख कमल के समान है» — अंग और अलंकार?
- रूपक — वाचक «समान» है इसलिए रूपक नहीं
- उपमा; उपमेय मुख, उपमान कमल, वाचक समान, धर्म (कोमल/शोभा) लुप्त या गर्भित
- कर्मवाच्य
- मुहावरा
हल
- समान
उपमा। धर्म वाक्य में न हो तो लुप्तोपमा। वाच्य परिवर्तन नहीं।
«चरण-कमल बंदौ हरिराई»?
- उपमा — सा नहीं है
- रूपक — चरण ही कमल, अभेद
- उत्प्रेक्षा — मनहुँ नहीं
- अनुप्रास
हल
- पुल नहीं
समास में अभेद। रूपक।
पंक्ति में «मनहुँ» हो तो पक्का?
- उपमा
- उत्प्रेक्षा
- रूपक
- यमक
हल
- संभावना
मनु, जानो, जनु, मनहुँ = उत्प्रेक्षा के झंडे।
हनुमान की पूँछ में आग लगने से पहले लंका जल गई — अलंकार?
- उपमा
- अतिशयोक्ति
- श्लेष
- आकाश-पाताल एक करना — मुहावरा, पंक्ति काव्य की अतिशयोक्ति है
हल
- हद पार
समय उलट, असंभव-सा — अतिशयोक्ति। मुहावरा अलग थैला।
यमक और श्लेष में पक्का फर्क?
- दोनों एक ही — आवृत्ति
- यमक: शब्द दो बार, अर्थ हर बार नया। श्लेष: शब्द एक बार, अर्थ एक साथ कई
- यमक अर्थालंकार है
- श्लेष केवल अनुप्रास है
हल
- गिनती
दोहराव = यमक। एक पद कई अर्थ साथ = श्लेष। दोनों शब्दालंकार।
«मेघ आए बड़े बन-ठन के संवर के» प्रमुख अलंकार?
- उपमा — वाचक नहीं
- मानवीकरण — मेघ पर मनुष्य जैसा शृंगार
- रस शृंगार — भाव अगले पृष्ठ का, प्रश्न अलंकार का
- कर्मवाच्य
हल
- निर्जीव पर मानव-काम
बन-ठन, संवरना। मानवीकरण। शृंगार रस पढ़ना अलग विषय है।
अभ्यास
ये दस अलग कोण हैं — ऊपर वाले दस की नकल नहीं।
उपमा के चार अंग?
- कर्ता, कर्म, भाव, क्रिया
- उपमेय, उपमान, वाचक, साधर्म्य (साधारण धर्म)
- अनुप्रास, यमक, श्लेष, रूपक
- शृंगार, वीर, करुण, हास्य
हल
- तुलना के चार खंभे
A वाच्य है। D रस है। C अलंकार-नाम हैं, अंग नहीं।
«कनक कनक ते सौ गुनी»?
- श्लेष
- यमक
- रूपक
- अनेकार्थक प्रश्न — ठप्पा पंक्ति का यमक है
हल
- दो कनक
सोना और धतूरा। यमक।
«पीपर पात सरिस मन डोला» में वाचक?
- मन
- सरिस
- पात
- डोला — धर्म है, वाचक नहीं
हल
- सरिस = समान
उपमेय मन, उपमान पात, धर्म डोलना।
अनुप्रास किस घर का है?
- अर्थालंकार
- शब्दालंकार
- रस
- छंद
हल
- कान
व्यंजन। अर्थ की तुलना नहीं।
«यह मुख है या चंद्र?» — निकट अलंकार?
- उत्प्रेक्षा — मनहुँ नहीं, प्रश्न दुविधा है
- संदेह
- रूपक
- अतिशयोक्ति
हल
- निश्चय नहीं
संदेह। उत्प्रेक्षा «मानो चंद्र है» कह देती।
आँख का तारा?
- उपमा
- मुहावरा — रूढ़ अर्थ अत्यंत प्रिय; अलंकार की ताज़ा तुलना नहीं
- रूपक
- श्लेष
हल
- थैला
मुहावरे। गहना तभी जब कवि नया चित्र गढ़े।
पायो जी मैंने राम-रतन धन पायो — अलंकार?
- उपमा
- रूपक — राम ही रतन-धन
- यमक
- वाच्य कर्म
हल
- अभेद
सा नहीं। रूपक।
लाटानुप्रास क्या है?
- एक व्यंजन बार-बार — वह वृत्यनुप्रास
- शब्द-समूह दोहरा, तात्पर्य दूसरा
- चार अंग की उपमा
- ने-रचना
हल
- पूत…पूत
वाक्यांश एक, आशय कपूत/सपूत से बदलता — लाटानुप्रास।
«राम पत्र लिखता है → पत्र लिखा जाता है» कौन-सा विषय?
- रूपक
- वाच्य-परिवर्तन — अलंकार नहीं
- अनुप्रास
- उत्प्रेक्षा
हल
- ढाँचा
वाक्य-परिवर्तन। गहना नहीं।
दोहा 13+11 मात्रा — यह?
- अनुप्रास
- छंद — रस / छंद; अलंकार नहीं
- यमक
- शृंगार रस
हल
- नाप
छंद मात्रा गिनता है। रस भाव है। अलंकार गहना है। तीन अलग।
